उद्योग पर्व · अध्याय 189
शिखण्डी का विवाह और दशार्णराज की धमकी
भीष्म आगे कहते हैं: द्रुपद ने पुत्र की भाँति पाली गई शिखण्डिनी को लेखन, शिल्पों और द्रोण से धनुर्विद्या की शिक्षा दिलाई। माता के आग्रह पर और शिव के वचन पर भरोसा करके दम्पती ने उसका विवाह दशार्णों के शक्तिशाली राजा हिरण्यवर्मा की पुत्री से कर दिया। वधू को पता चल गया कि उसका पति स्त्री है; उसने अपनी धायों को बताया और उन्होंने यह समाचार दशार्ण भेज दिया। क्रोधित हिरण्यवर्मा ने दूत भेजा, जिसने एकान्त में द्रुपद से कहा कि वह उन्हें बन्धु-बान्धवों सहित उखाड़ फेंकने आएगा।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.189.1)
चकार यत्नं द्रुपदः सुतायाः सर्वकर्मसु । ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेषु च परंतप ॥
cakāra yatnaṃ drupadaḥ sutāyāḥ sarvakarmasu | tato lekhyādiṣu tathā śilpeṣu ca paraṃtapa
द्रुपद ने अपनी पुत्री को सभी कलाओं में निपुण बनाने का बड़ा प्रयत्न किया; फिर, हे परंतप, लेखन आदि विद्याओं और शिल्पों में भी,
श्लोक 2 (5.189.2)
इष्वस्त्रे चैव राजेन्द्र द्रोणशिष्यो बभूव ह । तस्य माता महाराज राजानं वरवर्णिनी ॥
iṣvastre caiva rājendra droṇaśiṣyo babhūva ha | tasya mātā mahārāja rājānaṃ varavarṇinī
और हे राजेन्द्र, धनुर्विद्या में भी वह द्रोण की शिष्य बनी। फिर, हे महाराज, उसकी सुन्दर वर्ण वाली माता ने
श्लोक 3 (5.189.3)
चोदयामास भार्यार्थं कन्यायाः पुत्रवत्तदा । ततस्तां पार्षतो दृष्ट्वा कन्यां संप्राप्तयौवनाम् । स्त्रियं मत्वा ततश्चिन्तां प्रपेदे सह भार्यया ॥
codayāmāsa bhāryārthaṃ kanyāyāḥ putravattadā | tatastāṃ pārṣato dṛṣṭvā kanyāṃ saṃprāptayauvanām | striyaṃ matvā tataścintāṃ prapede saha bhāryayā
राजा से आग्रह किया कि पुत्र की भाँति उस कन्या के लिए भी पत्नी लाई जाए। तब पृषतपुत्र द्रुपद यह देखकर कि कन्या युवावस्था को प्राप्त हो गई है, और उसे स्त्री जानकर, अपनी पत्नी के साथ चिन्ता में पड़ गए।
द्रुपद उवाच
श्लोक 4 (5.189.4)
कन्या ममेयं संप्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी । मया प्रच्छादिता चेयं वचनाच्छूलपाणिनः ॥
kanyā mameyaṃ saṃprāptā yauvanaṃ śokavardhinī | mayā pracchāditā ceyaṃ vacanācchūlapāṇinaḥ
मेरी यह कन्या युवावस्था को प्राप्त हो गई है और मेरा शोक बढ़ा रही है। शूलपाणि शिव के वचन के कारण मैंने इसे छिपाकर रखा है।
भार्योवाच
श्लोक 5 (5.189.5)
न तन्मिथ्या महाराज भविष्यति कथंचन । त्रैलोक्यकर्ता कस्माद्धि वृथा वक्तुमिहार्हति ॥
na tanmithyā mahārāja bhaviṣyati kathaṃcana | trailokyakartā kasmāddhi vṛthā vaktumihārhati
हे महाराज, वह बात किसी प्रकार भी मिथ्या नहीं होगी। तीनों लोकों के रचयिता भला व्यर्थ बात क्यों कहेंगे?
श्लोक 6 (5.189.6)
यदि ते रोचते राजन्वक्ष्यामि शृणु मे वचः । श्रुत्वेदानीं प्रपद्येथाः स्वां मतिं पृषतात्मज ॥
yadi te rocate rājanvakṣyāmi śṛṇu me vacaḥ | śrutvedānīṃ prapadyethāḥ svāṃ matiṃ pṛṣatātmaja
हे राजन्, यदि आपको अच्छा लगे तो मैं कहती हूँ, मेरी बात सुनिए। हे पृषतनन्दन, उसे सुनकर फिर आप अपना निश्चय कीजिए।
श्लोक 7 (5.189.7)
क्रियतामस्य यत्नेन विधिवद्दारसंग्रहः । भविता तद्वचः सत्यमिति मे निश्चिता मतिः ॥
kriyatāmasya yatnena vidhivaddārasaṃgrahaḥ | bhavitā tadvacaḥ satyamiti me niścitā matiḥ
इसके लिए यत्नपूर्वक विधि के अनुसार विवाह किया जाए। वह वचन सत्य होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (5.189.8)
ततस्तौ निश्चयं कृत्वा तस्मिन्कार्येऽथ दंपती । वरयाञ्चक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम् ॥
tatastau niścayaṃ kṛtvā tasminkārye'tha daṃpatī | varayāñcakratuḥ kanyāṃ daśārṇādhipateḥ sutām
तब उन पति-पत्नी ने उस कार्य के विषय में निश्चय करके दशार्णराज की पुत्री का वरण किया।
श्लोक 9 (5.189.9)
ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः । सर्वान्राज्ञः कुलतः सन्निशाम्य । दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां । शिखण्डिने वरयामास दारान् ॥
tato rājā drupado rājasiṃhaḥ | sarvānrājñaḥ kulataḥ sanniśāmya | dāśārṇakasya nṛpatestanūjāṃ | śikhaṇḍine varayāmāsa dārān
फिर राजाओं में सिंह के समान राजा द्रुपद ने सब राजाओं के कुलों पर विचार करके दशार्णनरेश की पुत्री को शिखण्डी की पत्नी के रूप में वरण किया।
श्लोक 10 (5.189.10)
हिरण्यवर्मेति नृपो योऽसौ दाशार्णकः स्मृतः । स च प्रादान्महीपालः कन्यां तस्मै शिखण्डिने ॥
hiraṇyavarmeti nṛpo yo'sau dāśārṇakaḥ smṛtaḥ | sa ca prādānmahīpālaḥ kanyāṃ tasmai śikhaṇḍine
हिरण्यवर्मा नाम से विख्यात जो दशार्णनरेश थे, उन भूपाल ने अपनी कन्या शिखण्डी को दे दी।
श्लोक 11 (5.189.11)
स च राजा दशार्णेषु महानासीत्सुदुर्जयः । हिरण्यवर्मा दुर्धर्षो महासेनो महामनाः ॥
sa ca rājā daśārṇeṣu mahānāsītsudurjayaḥ | hiraṇyavarmā durdharṣo mahāseno mahāmanāḥ
दशार्ण देश के वे राजा हिरण्यवर्मा महान और अत्यन्त दुर्जय थे; वे दुर्धर्ष, विशाल सेना वाले और महामना थे।
श्लोक 12 (5.189.12)
कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम । यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी ॥
kṛte vivāhe tu tadā sā kanyā rājasattama | yauvanaṃ samanuprāptā sā ca kanyā śikhaṇḍinī
हे राजश्रेष्ठ, विवाह हो जाने पर वह कन्या पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हुई, और कन्या शिखण्डिनी भी।
श्लोक 13 (5.189.13)
कृतदारः शिखण्डी च काम्पिल्यं पुनरागमत् । न च सा वेद तां कन्यां कंचित्कालं स्त्रियं किल । यदा त्वेनामजानात्सा स्त्रियमेव नृपात्मजा ॥
kṛtadāraḥ śikhaṇḍī ca kāmpilyaṃ punarāgamat | na ca sā veda tāṃ kanyāṃ kaṃcitkālaṃ striyaṃ kila | yadā tvenāmajānātsā striyameva nṛpātmajā
विवाह करके शिखण्डी फिर काम्पिल्य लौट आया। कुछ समय तक उस राजकुमारी को यह पता न चला कि उसका पति स्त्री है; किन्तु जब उस राजपुत्री ने जान लिया कि वह स्त्री ही है,
श्लोक 14 (5.189.14)
धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदयत् । कन्यां पाञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ॥
dhātrīṇāṃ ca sakhīnāṃ ca vrīḍamānā nyavedayat | kanyāṃ pāñcālarājasya sutāṃ tāṃ vai śikhaṇḍinīm
तब उसने लज्जित होकर अपनी धायों और सखियों को बताया कि पांचालराज की सन्तान शिखण्डिनी कन्या है।
श्लोक 15 (5.189.15)
ततस्ता राजशार्दूल धात्र्यो दाशार्णिकास्तदा । जग्मुरार्तिं परां प्रेष्याः प्रेषयामासुरेव च ॥
tatastā rājaśārdūla dhātryo dāśārṇikāstadā | jagmurārtiṃ parāṃ preṣyāḥ preṣayāmāsureva ca
हे राजसिंह, तब दशार्ण से आई वे धायें बहुत दुःखी हुईं, और उन सेविकाओं ने अपने देश संदेश भेजा।
श्लोक 16 (5.189.16)
ततो दशार्णाधिपतेः प्रेष्याः सर्वा न्यवेदयन् । विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ॥
tato daśārṇādhipateḥ preṣyāḥ sarvā nyavedayan | vipralambhaṃ yathāvṛttaṃ sa ca cukrodha pārthivaḥ
तब सब सेविकाओं ने दशार्णराज को वह छल जैसा हुआ था वैसा ही बता दिया, और राजा क्रोधित हो उठे।
श्लोक 17 (5.189.17)
शिखण्ड्यपि महाराज पुंवद्राजकुले तदा । विजहार मुदा युक्तः स्त्रीत्वं नैवातिरोचयन् ॥
śikhaṇḍyapi mahārāja puṃvadrājakule tadā | vijahāra mudā yuktaḥ strītvaṃ naivātirocayan
हे महाराज, उधर शिखण्डी राजकुल में पुरुष की भाँति आनन्द से विचरता रहा; उसे स्त्रीत्व तनिक भी नहीं भाता था।
श्लोक 18 (5.189.18)
ततः कतिपयाहस्य तच्छ्रुत्वा भरतर्षभ । हिरण्यवर्मा राजेन्द्र रोषादार्तिं जगाम ह ॥
tataḥ katipayāhasya tacchrutvā bharatarṣabha | hiraṇyavarmā rājendra roṣādārtiṃ jagāma ha
हे भरतश्रेष्ठ, यह सुनने के कुछ दिन बाद, हे राजेन्द्र, हिरण्यवर्मा क्रोध के कारण गहरी पीड़ा में भर गए।
श्लोक 19 (5.189.19)
ततो दाशार्णको राजा तीव्रकोपसमन्वितः । दूतं प्रस्थापयामास द्रुपदस्य निवेशनम् ॥
tato dāśārṇako rājā tīvrakopasamanvitaḥ | dūtaṃ prasthāpayāmāsa drupadasya niveśanam
तब तीव्र क्रोध से भरे दशार्णनरेश ने द्रुपद के महल में एक दूत भेजा।
श्लोक 20 (5.189.20)
ततो द्रुपदमासाद्य दूतः काञ्चनवर्मणः । एक एकान्तमुत्सार्य रहो वचनमब्रवीत् ॥
tato drupadamāsādya dūtaḥ kāñcanavarmaṇaḥ | eka ekāntamutsārya raho vacanamabravīt
द्रुपद के पास पहुँचकर काञ्चनवर्मा (हिरण्यवर्मा) के उस दूत ने उन्हें अकेले एकान्त में ले जाकर गुप्त रूप से यह बात कही।
दूत उवाच
श्लोक 21 (5.189.21)
दाशार्णराजो राजंस्त्वामिदं वचनमब्रवीत् । अभिषङ्गात्प्रकुपितो विप्रलब्धस्त्वयाऽनघ ॥
dāśārṇarājo rājaṃstvāmidaṃ vacanamabravīt | abhiṣaṅgātprakupito vipralabdhastvayā'nagha
हे राजन्, अपमान से कुपित दशार्णराज ने आपके लिए यह संदेश भेजा है, क्योंकि हे निष्पाप, आपने उन्हें धोखा दिया है:
श्लोक 22 (5.189.22)
अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव । यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे मोहाद्याचितवानसि ॥
avamanyase māṃ nṛpate nūnaṃ durmantritaṃ tava | yanme kanyāṃ svakanyārthe mohādyācitavānasi
हे नृपते, निश्चय ही तुम मेरा अपमान करते हो; यह तुम्हारी कुमन्त्रणा थी कि तुमने मोहवश अपनी कन्या के लिए मेरी कन्या माँगी।
श्लोक 23 (5.189.23)
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते । एष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव ॥
tasyādya vipralambhasya phalaṃ prāpnuhi durmate | eṣa tvāṃ sajanāmātyamuddharāmi sthiro bhava
हे दुर्बुद्धे, अब उस छल का फल भोगो। मैं तुम्हें तुम्हारे स्वजनों और मन्त्रियों सहित उखाड़ फेंकूँगा; डटे रहो!
श्लोक 24 (5.189.24)
अवमत्य च वीर्यं मे कुलं चारित्रमेव च । विप्रलम्भस्त्वयापूर्वो मनुष्येषु प्रवर्तितः ॥
avamatya ca vīryaṃ me kulaṃ cāritrameva ca | vipralambhastvayāpūrvo manuṣyeṣu pravartitaḥ
मेरे पराक्रम, कुल और चरित्र का तिरस्कार करके तुमने मनुष्यों में ऐसा छल चलाया है जो पहले कभी नहीं हुआ।
श्लोक 25 (5.189.25)
कुरु सर्वाणि कार्याणि भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान् । अभियास्यामि शीघ्रं त्वां समुद्धर्तुं सबान्धवम् ॥
kuru sarvāṇi kāryāṇi bhuṅkṣva bhogānanuttamān | abhiyāsyāmi śīghraṃ tvāṃ samuddhartuṃ sabāndhavam
जो कुछ करना हो कर लो और उत्तम भोगों को भोग लो; मैं शीघ्र ही तुम्हें बन्धु-बान्धवों सहित उखाड़ने के लिए तुम पर चढ़ाई करूँगा।