उद्योग पर्व · अध्याय 188
शिखण्डी का कन्या रूप में जन्म और पुत्र रूप में पालन
दुर्योधन पूछता है कि पहले कन्या रहा शिखण्डी पुरुष कैसे बना। भीष्म बताते हैं कि निःसन्तान द्रुपद ने भीष्म से बदला लेने वाले पुत्र के लिए तप करके शिव को प्रसन्न किया, और शिव ने कहा कि सन्तान कन्या रूप में जन्म लेकर बाद में पुरुष बनेगी। द्रुपद की रानी ने कन्या को जन्म दिया पर उसे पुत्र घोषित किया; द्रुपद ने पुरुष की भाँति उसके सब संस्कार करवाए और उसका नाम शिखण्डी पड़ा। गुप्तचर, नारद के वचन, देव के वरदान और अम्बा की तपस्या के कारण केवल भीष्म ही यह रहस्य जानते थे।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (5.188.1)
कथं शिखण्डी गाङ्गेय कन्या भूत्वा पुरा तदा । पुरुषोऽभूद्युधिश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kathaṃ śikhaṇḍī gāṅgeya kanyā bhūtvā purā tadā | puruṣo'bhūdyudhiśreṣṭha tanme brūhi pitāmaha
हे गाङ्गेय, हे योद्धाओं में श्रेष्ठ पितामह, पहले कन्या होकर शिखण्डी फिर पुरुष कैसे बन गया? यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (5.188.2)
भार्या तु तस्य राजेन्द्र द्रुपदस्य महीपतेः । महिषी दयिता ह्यासीदपुत्रा च विशांपते ॥
bhāryā tu tasya rājendra drupadasya mahīpateḥ | mahiṣī dayitā hyāsīdaputrā ca viśāṃpate
हे राजेन्द्र, पृथ्वीपति राजा द्रुपद की प्रिय पटरानी थी; हे प्रजानाथ, वह पुत्रहीन थी।
श्लोक 3 (5.188.3)
एतस्मिन्नेव काले तु द्रुपदो वै महीपतिः । अपत्यार्थे महाराज तोषयामास शङ्करम् ॥
etasminneva kāle tu drupado vai mahīpatiḥ | apatyārthe mahārāja toṣayāmāsa śaṅkaram
हे महाराज, उसी समय पृथ्वीपति द्रुपद सन्तान पाने के लिए शंकर को प्रसन्न करने में लगे थे।
श्लोक 4 (5.188.4)
अस्मद्वधार्थं निश्चित्य तपो घोरं समास्थितः । ऋते कन्यां महादेव पुत्रो मे स्यादिति ब्रुवन् ॥
asmadvadhārthaṃ niścitya tapo ghoraṃ samāsthitaḥ | ṛte kanyāṃ mahādeva putro me syāditi bruvan
मेरे वध का निश्चय करके उन्होंने घोर तप किया और कहते रहे — "हे महादेव, मुझे कन्या नहीं, पुत्र प्राप्त हो।"
श्लोक 5 (5.188.5)
भगवन्पुत्रमिच्छामि भीष्मं प्रतिचिकीर्षया । इत्युक्तो देवदेवेन स्त्रीपुमांस्ते भविष्यति ॥
bhagavanputramicchāmi bhīṣmaṃ praticikīrṣayā | ityukto devadevena strīpumāṃste bhaviṣyati
"भगवन्, भीष्म से बदला लेने के लिए मैं पुत्र चाहता हूँ।" ऐसा कहे जाने पर देवाधिदेव ने कहा — "तुम्हें ऐसी सन्तान होगी जो स्त्री भी होगी और पुरुष भी।
श्लोक 6 (5.188.6)
निवर्तस्व महीपाल नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । स तु गत्वा च नगरं भार्यामिदमुवाच ह ॥
nivartasva mahīpāla naitajjātvanyathā bhavet | sa tu gatvā ca nagaraṃ bhāryāmidamuvāca ha
हे महीपाल, लौट जाओ; यह कभी अन्यथा नहीं हो सकता।" तब वे नगर में जाकर अपनी पत्नी से यह बोले —
द्रुपद उवाच
श्लोक 7 (5.188.7)
कृतो यत्नो महादेवस्तपसाऽऽराधितो मया । कन्या भूत्वा पुमान्भावी इति चोक्तोस्मि शंभुना ॥
kṛto yatno mahādevastapasā''rādhito mayā | kanyā bhūtvā pumānbhāvī iti coktosmi śaṃbhunā
"मैंने प्रयत्न कर लिया है; तपस्या से महादेव की आराधना की है, और शम्भु ने मुझसे कहा है कि 'कन्या होकर वह पुरुष बनेगी।'
श्लोक 8 (5.188.8)
पुनः पुनर्याच्यमानो दिष्टमित्यब्रवीच्छिवः । न तदन्यच्च भविता भवितव्यं हि तत्तथा ॥
punaḥ punaryācyamāno diṣṭamityabravīcchivaḥ | na tadanyacca bhavitā bhavitavyaṃ hi tattathā
बार-बार प्रार्थना करने पर भी शिव ने यही कहा कि 'यह प्रारब्ध है।' वह अन्यथा नहीं होगा; जो होना है, वह वैसा ही होगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 9 (5.188.9)
ततः सा नियता भूत्वा ऋतुकाले मनस्विनी । पत्नी द्रुपदराजस्य द्रुपदं प्रविवेश ह ॥
tataḥ sā niyatā bhūtvā ṛtukāle manasvinī | patnī drupadarājasya drupadaṃ praviveśa ha
तब ऋतुकाल आने पर नियमों का पालन करके राजा द्रुपद की वह मनस्विनी पत्नी द्रुपद के पास गई।
श्लोक 10 (5.188.10)
लेभे गर्भं यथाकालं विधिदृष्टेन कर्मणा । पार्षतस्य महीपाल यथा मां नारदोऽब्रवीत् ॥
lebhe garbhaṃ yathākālaṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā | pārṣatasya mahīpāla yathā māṃ nārado'bravīt
हे महीपाल, जैसा नारद ने मुझे बताया था, उसने यथासमय शास्त्रविहित विधि से पार्षत (द्रुपद) का गर्भ धारण किया।
श्लोक 11 (5.188.11)
ततो दधार सा देवी गर्भं राजीवलोचना । तां स राजा प्रियां भार्यां द्रुपदः कुरुनन्दन ॥
tato dadhāra sā devī garbhaṃ rājīvalocanā | tāṃ sa rājā priyāṃ bhāryāṃ drupadaḥ kurunandana
तब उस कमलनयनी रानी ने गर्भ धारण किया। हे कुरुनन्दन, राजा द्रुपद अपनी उस प्रिय पत्नी की
श्लोक 12 (5.188.12)
पुत्रस्नेहान्महाबाहुः सुखं पर्यचरत्तदा । सर्वानभिप्रायकृतान्भार्याऽलभत कौरव ॥
putrasnehānmahābāhuḥ sukhaṃ paryacarattadā | sarvānabhiprāyakṛtānbhāryā'labhata kaurava
पुत्र-स्नेह के कारण वे महाबाहु राजा तब सुखपूर्वक सेवा करते रहे; और हे कौरव, रानी को उसकी सभी मनचाही वस्तुएँ मिलती रहीं।
श्लोक 13 (5.188.13)
अपुत्रस्य सतो राज्ञो द्रुपदस्य महीपतेः । यथाकालं तु सा देवी महिषी द्रुपदस्य ह ॥
aputrasya sato rājño drupadasya mahīpateḥ | yathākālaṃ tu sā devī mahiṣī drupadasya ha
तब समय आने पर, पुत्रहीन पृथ्वीपति राजा द्रुपद की उस पटरानी ने
श्लोक 14 (5.188.14)
कन्यां प्रवररूपां तु प्राजायत नराधिप । अपुत्रस्य तु राज्ञः सा द्रुपदस्य मनस्विनी ॥
kanyāṃ pravararūpāṃ tu prājāyata narādhipa | aputrasya tu rājñaḥ sā drupadasya manasvinī
हे नराधिप, अत्यन्त रूपवती कन्या को जन्म दिया। किन्तु पुत्रहीन राजा द्रुपद की उस मनस्विनी पत्नी ने
श्लोक 15 (5.188.15)
ख्यापयामास राजेन्द्र पुत्रो ह्येष ममेति वै । ततः स राजा द्रुपदः प्रच्छन्नाया नराधिप ॥
khyāpayāmāsa rājendra putro hyeṣa mameti vai | tataḥ sa rājā drupadaḥ pracchannāyā narādhipa
हे राजेन्द्र, यह घोषणा कर दी कि "यह मेरा पुत्र है।" तब, हे नराधिप, राजा द्रुपद ने उस छिपाई गई कन्या के
श्लोक 16 (5.188.16)
पुत्रवत्पुत्रकार्याणि सर्वाणि समकारयत् । रक्षणं चैव मन्त्रस्य महिषी द्रुपदस्य सा ॥
putravatputrakāryāṇi sarvāṇi samakārayat | rakṣaṇaṃ caiva mantrasya mahiṣī drupadasya sā
सभी पुत्रोचित संस्कार पुत्र की ही भाँति करवाए। और द्रुपद की पटरानी ने इस रहस्य की
श्लोक 17 (5.188.17)
चकार सर्वयत्नेन ब्रुवाणा पुत्र इत्युत । न च तां वेद नगरे कश्चिदन्यत्र पार्षतात् ॥
cakāra sarvayatnena bruvāṇā putra ityuta | na ca tāṃ veda nagare kaścidanyatra pārṣatāt
पूरे यत्न से रक्षा की और उसे पुत्र ही कहती रही; पार्षत द्रुपद के सिवा नगर में कोई इस बात को नहीं जानता था।
श्लोक 18 (5.188.18)
श्रद्दधानो हि तद्वाक्यं देवस्याच्युततेजसः । छादयामास तां कन्यां पुमानिति च सोब्रवीत् ॥
śraddadhāno hi tadvākyaṃ devasyācyutatejasaḥ | chādayāmāsa tāṃ kanyāṃ pumāniti ca sobravīt
अक्षय तेज वाले देव के वचन पर श्रद्धा रखकर उन्होंने उस कन्या को छिपाए रखा और कहा कि "यह पुरुष है।"
श्लोक 19 (5.188.19)
जातकर्माणि सर्वाणि कारयामास पार्थिवः । पुंवद्विधानयुक्तानि शिखण्डीति च तां विदुः ॥
jātakarmāṇi sarvāṇi kārayāmāsa pārthivaḥ | puṃvadvidhānayuktāni śikhaṇḍīti ca tāṃ viduḥ
राजा ने पुरुष के लिए विहित विधि से जातकर्म आदि सभी संस्कार करवाए, और लोग उसे "शिखण्डी" नाम से जानने लगे।
श्लोक 20 (5.188.20)
अहमेकस्तु चारेण वचनान्नारदस्य च । ज्ञातवान्देववाक्येन अम्बायास्तपसा तथा ॥
ahamekastu cāreṇa vacanānnāradasya ca | jñātavāndevavākyena ambāyāstapasā tathā
केवल मैं ही गुप्तचर के द्वारा, नारद के वचन से, देव के वचन से और अम्बा की तपस्या के कारण यह रहस्य जानता था।