उद्योग पर्व · अध्याय 187
शिव का वरदान और अम्बा का अग्नि-प्रवेश
तपस्वी अम्बा को तपस्या से लौटाने का प्रयत्न करते हैं, पर वह कहती है कि उसका व्रत केवल भीष्म के वध के लिए है और स्त्रीभाव से ऊबकर वह पुरुष बनना चाहती है। महर्षियों के बीच शिव प्रकट होकर वर देते हैं कि वह भीष्म को मारेगी; जब वह पूछती है कि स्त्री युद्ध में कैसे जीतेगी, तो शिव वचन देते हैं कि वह द्रुपद के कुल में जन्म लेकर महारथी बनेगी, समय आने पर पुरुष होगी और नए शरीर में भी उसे सब स्मरण रहेगा। तब अम्बा यमुना के तट पर चिता बनाकर भीष्म के वध का संकल्प बोलते हुए अग्नि में प्रवेश करती है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.187.1)
ततस्ते तापसाः सर्वे तपसे धृतनिश्चयाम् । दृष्ट्वा न्यवर्तयंस्तात किं कार्यमिति चाब्रुवन् ॥
tataste tāpasāḥ sarve tapase dhṛtaniścayām | dṛṣṭvā nyavartayaṃstāta kiṃ kāryamiti cābruvan
तात, तब उन सभी तपस्वियों ने उसे तपस्या के लिए दृढ़-निश्चय देखकर लौटाने का प्रयास किया और पूछा — "तुम क्या करना चाहती हो?"
श्लोक 2 (5.187.2)
तानुवाच ततः कन्या तपोवृद्धानृषींस्तदा । निराकृतास्मि भीष्मेण भ्रंशिता पतिधर्मतः ॥
tānuvāca tataḥ kanyā tapovṛddhānṛṣīṃstadā | nirākṛtāsmi bhīṣmeṇa bhraṃśitā patidharmataḥ
तब उस कन्या ने उन तपोवृद्ध ऋषियों से कहा — "भीष्म ने मुझे ठुकरा दिया है और पत्नी-धर्म से वंचित कर दिया है।
अम्बोवाच
श्लोक 3 (5.187.3)
वधार्थं तस्य दीक्षा मे न लोकार्थं तपोधनाः । निहत्य भीष्मं गच्छेयं शान्तिमित्येव निश्चयः ॥
vadhārthaṃ tasya dīkṣā me na lokārthaṃ tapodhanāḥ | nihatya bhīṣmaṃ gaccheyaṃ śāntimityeva niścayaḥ
हे तपोधनो, मेरी यह दीक्षा उसके वध के लिए है, उत्तम लोकों के लिए नहीं। भीष्म को मारकर ही मुझे शान्ति मिलेगी — यही मेरा निश्चय है।
श्लोक 4 (5.187.4)
यत्कृते दुःखवसतिमिमां प्राप्ताऽस्मि शाश्वतीम् । पतिलोकाद्विहीना च नैव स्त्री न पुमानिह ॥
yatkṛte duḥkhavasatimimāṃ prāptā'smi śāśvatīm | patilokādvihīnā ca naiva strī na pumāniha
उसी के कारण मैं इस अन्तहीन दुःखमय दशा को प्राप्त हुई हूँ — पतिलोक से वंचित, यहाँ न स्त्री हूँ, न पुरुष।
श्लोक 5 (5.187.5)
नाहत्वा युधि गाङ्गेयं निवर्तिष्ये तपोधनाः । एष मे हृदि संकल्पो यदिदं कथितं मया ॥
nāhatvā yudhi gāṅgeyaṃ nivartiṣye tapodhanāḥ | eṣa me hṛdi saṃkalpo yadidaṃ kathitaṃ mayā
हे तपोधनो, युद्ध में गाङ्गेय को मारे बिना मैं नहीं लौटूँगी। मेरे हृदय में यही संकल्प है, जो मैंने आपसे कह दिया।
श्लोक 6 (5.187.6)
स्त्रीभावे परिनिर्विण्णा पुंस्त्वार्थे कृतनिश्चया । भीष्मे प्रतिचिकीर्षामि नास्मि वार्येति वै पुनः ॥
strībhāve parinirviṇṇā puṃstvārthe kṛtaniścayā | bhīṣme praticikīrṣāmi nāsmi vāryeti vai punaḥ
स्त्रीभाव से मैं ऊब चुकी हूँ और पुरुषत्व पाने का निश्चय कर चुकी हूँ। मैं भीष्म से बदला लेना चाहती हूँ; अब मुझे फिर रोका नहीं जा सकता।"
भीष्म उवाच
श्लोक 7 (5.187.7)
तां देवो दर्शयामास शूलपाणिरुमापतिः । मध्ये तेषां महर्षीणां स्वेन रूपेण तापसीम् ॥
tāṃ devo darśayāmāsa śūlapāṇirumāpatiḥ | madhye teṣāṃ maharṣīṇāṃ svena rūpeṇa tāpasīm
तब हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले उमापति महादेव ने उन महर्षियों के बीच उस तपस्विनी को अपने स्वरूप में दर्शन दिए।
श्लोक 8 (5.187.8)
छन्द्यमाना वरेणाथ सा वव्रे मत्पराजयम् । हनिष्यसीति तां देवः प्रत्युवाच मनस्विनीम् ॥
chandyamānā vareṇātha sā vavre matparājayam | haniṣyasīti tāṃ devaḥ pratyuvāca manasvinīm
वर माँगने को कहे जाने पर उसने मेरी पराजय का वर माँगा। देव ने उस मनस्विनी को उत्तर दिया — "तुम उसे मारोगी।"
श्लोक 9 (5.187.9)
ततः सा पुनरेवाथ कन्या रुद्रमुवाच ह । उपपद्येत्कथं देव स्त्रिया युधि जयो मम ॥
tataḥ sā punarevātha kanyā rudramuvāca ha | upapadyetkathaṃ deva striyā yudhi jayo mama
तब उस कन्या ने फिर रुद्र से कहा — "हे देव, मुझ स्त्री को युद्ध में विजय कैसे मिल सकती है?
अम्बोवाच
श्लोक 10 (5.187.10)
स्त्रीभावेन च मे गाढं मनः शान्तमुमापते । प्रतिश्रुतश्च भूतेश त्वया भीष्मपराजयः ॥
strībhāvena ca me gāḍhaṃ manaḥ śāntamumāpate | pratiśrutaśca bhūteśa tvayā bhīṣmaparājayaḥ
हे उमापते, स्त्री होने के कारण मेरा मन युद्ध के तेज से सर्वथा रहित है; फिर भी, हे भूतेश, आपने मुझे भीष्म की पराजय का वचन दिया है।
श्लोक 11 (5.187.11)
यथा स सत्यो भवति तथा कुरु वृषध्वज । यथा हन्यां समागम्य भीष्मं शान्तनवं युधि ॥
yathā sa satyo bhavati tathā kuru vṛṣadhvaja | yathā hanyāṃ samāgamya bhīṣmaṃ śāntanavaṃ yudhi
हे वृषध्वज, ऐसा कीजिए कि वह वचन सत्य हो, जिससे मैं युद्ध में शान्तनुनन्दन भीष्म से भिड़कर उन्हें मार सकूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (5.187.12)
तामुवाच महादेवः कन्यां किल वृषध्वजः । न मे वागनृतं प्राह सत्यं भद्रे भविष्यसि ॥
tāmuvāca mahādevaḥ kanyāṃ kila vṛṣadhvajaḥ | na me vāganṛtaṃ prāha satyaṃ bhadre bhaviṣyasi
तब वृषध्वज महादेव ने उस कन्या से कहा — "मेरी वाणी ने कभी असत्य नहीं कहा। भद्रे, यह तुम्हारे लिए सत्य होकर रहेगा।
महादेव उवाच
श्लोक 13 (5.187.13)
हनिष्यसि रणे भीष्मं पुरुषत्वं च लप्स्यसे । स्मरिष्यसि च तत्सर्वं देहमन्यं गता सती ॥
haniṣyasi raṇe bhīṣmaṃ puruṣatvaṃ ca lapsyase | smariṣyasi ca tatsarvaṃ dehamanyaṃ gatā satī
तुम युद्ध में भीष्म को मारोगी और पुरुषत्व प्राप्त करोगी; दूसरा शरीर पाकर भी तुम्हें यह सब स्मरण रहेगा।
श्लोक 14 (5.187.14)
द्रुपदस्य कुले जाता भविष्यसि महारथः । शीघ्रास्त्रश्चित्रयोधी च भविष्यसि सुसंमतः ॥
drupadasya kule jātā bhaviṣyasi mahārathaḥ | śīghrāstraścitrayodhī ca bhaviṣyasi susaṃmataḥ
द्रुपद के कुल में जन्म लेकर तुम महारथी बनोगी — शीघ्रता से अस्त्र चलाने वाले, विचित्र रीति से युद्ध करने वाले और सबके द्वारा सम्मानित योद्धा।
श्लोक 15 (5.187.15)
यथोक्तमेव कल्याणि सर्वमेतद्भविष्यति । भविष्यसि पुमान्पश्चात्कस्माच्चित्कालपर्ययात् ॥
yathoktameva kalyāṇi sarvametadbhaviṣyati | bhaviṣyasi pumānpaścātkasmāccitkālaparyayāt
हे कल्याणि, जैसा मैंने कहा है, यह सब वैसा ही होगा। कुछ समय बीतने पर किसी कारण से तुम आगे चलकर पुरुष बन जाओगी।"
भीष्म उवाच
श्लोक 16 (5.187.16)
एवमुक्त्वा महादेवः कपर्दी वृषभध्वजः । पश्यतामेव विप्राणां तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamuktvā mahādevaḥ kapardī vṛṣabhadhvajaḥ | paśyatāmeva viprāṇāṃ tatraivāntaradhīyata
ऐसा कहकर जटाजूटधारी, वृषभध्वज महादेव ब्राह्मणों के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 17 (5.187.17)
ततः सा पश्यतां तेषां महर्षीणामनिन्दिता । समाहृत्य वनात्तस्मात्काष्ठानि वरवर्णिनी ॥
tataḥ sā paśyatāṃ teṣāṃ maharṣīṇāmaninditā | samāhṛtya vanāttasmātkāṣṭhāni varavarṇinī
तब उन महर्षियों के देखते-देखते उस अनिन्द्य, सुन्दर कन्या ने उस वन से लकड़ियाँ इकट्ठी कीं,
श्लोक 18 (5.187.18)
चितां कृत्वा सुमहतीं प्रदाय च हुताशनम् । प्रदीप्तेऽग्नौ महाराज रोषदीप्तेन चेतसा ॥
citāṃ kṛtvā sumahatīṃ pradāya ca hutāśanam | pradīpte'gnau mahārāja roṣadīptena cetasā
एक बहुत बड़ी चिता बनाकर उसमें आग लगा दी; और हे महाराज, जब अग्नि प्रज्वलित हो उठी, तब क्रोध से जलते हुए मन से
श्लोक 19 (5.187.19)
उक्त्वा भीष्मवधायेति प्रविवेश हुताशनम् । ज्येष्ठा काशिसुता राजन्यमुनामभितो नदीम् ॥
uktvā bhīṣmavadhāyeti praviveśa hutāśanam | jyeṣṭhā kāśisutā rājanyamunāmabhito nadīm
"भीष्म के वध के लिए!" — ऐसा कहकर, हे राजन्, काशिराज की वह ज्येष्ठ पुत्री यमुना नदी के तट पर अग्नि में प्रवेश कर गई।