उद्योग पर्व · अध्याय 186
अम्बा की तपस्या और उसका नदी रूप में जन्म
परशुराम अम्बा से कहते हैं कि उन्होंने पूरी शक्ति से युद्ध किया पर वे भीष्म को नहीं जीत सके, और उसे भीष्म की ही शरण लेने की सलाह देते हैं; अम्बा इसे अस्वीकार करके स्वयं भीष्म को गिराने का संकल्प लेती है। परशुराम महेन्द्र पर्वत लौट जाते हैं, भीष्म घर लौटकर सत्यवती को सब बताते हैं और अम्बा पर दृष्टि रखवाते हैं; नारद और व्यास उन्हें सान्त्वना देते हैं। अम्बा बारह वर्ष तक कठोर तप करती है और अनेक आश्रमों तथा तीर्थों में स्नान करती है; गङ्गा उसे चेतावनी देती हैं कि उसका कुटिल व्रत उसे केवल वर्षा में बहने वाली टेढ़ी नदी बना देगा, और अम्बा अपने आधे शरीर से वत्सदेश में अम्बा नदी बन जाती है तथा आधे से कन्या बनी रहती है।
राम उवाच
श्लोक 1 (5.186.1)
प्रत्यक्षमेतल्लोकानां सर्वेषामेव भामिनि । यथाशक्त्या मया युद्धं कृतं वै पौरुषं परम् ॥
pratyakṣametallokānāṃ sarveṣāmeva bhāmini | yathāśaktyā mayā yuddhaṃ kṛtaṃ vai pauruṣaṃ param
"हे भामिनि, सब लोकों के सामने यह प्रत्यक्ष है कि मैंने अपनी पूरी शक्ति से युद्ध किया और परम पुरुषार्थ दिखाया।"
श्लोक 2 (5.186.2)
न चैवमपि शक्नोमि भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् । विशेषयितुमत्यर्थमुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥
na caivamapi śaknomi bhīṣmaṃ śastrabhṛtāṃ varam | viśeṣayitumatyarthamuttamāstrāṇi darśayan
"फिर भी उत्तम अस्त्रों का प्रदर्शन करके भी मैं शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म से बढ़कर नहीं हो सका।"
श्लोक 3 (5.186.3)
एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम् । यथेष्टं गम्यतां भद्रे किमन्यद्वा करोमि ते ॥
eṣā me paramā śaktiretanme paramaṃ balam | yatheṣṭaṃ gamyatāṃ bhadre kimanyadvā karomi te
"यही मेरी परम शक्ति है, यही मेरा परम बल। भद्रे, जहाँ चाहो चली जाओ; मैं तुम्हारे लिए और क्या कर सकता हूँ?"
श्लोक 4 (5.186.4)
भीष्ममेव प्रपद्यस्व न तेऽन्या विद्यते गतिः । निर्जितो ह्यस्मि भीष्मेण महास्त्राणि प्रमुञ्चता ॥
bhīṣmameva prapadyasva na te'nyā vidyate gatiḥ | nirjito hyasmi bhīṣmeṇa mahāstrāṇi pramuñcatā
"तुम भीष्म की ही शरण लो; तुम्हारे लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं है। महान् अस्त्र छोड़ते हुए भीष्म ने मुझे पराजित कर दिया है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (5.186.5)
एवमुक्त्वा ततो रामो विनिःश्वस्य महामनाः । तूष्णीमासीत्ततः कन्या प्रोवाच भृगुनन्दनम् ॥
evamuktvā tato rāmo viniḥśvasya mahāmanāḥ | tūṣṇīmāsīttataḥ kanyā provāca bhṛgunandanam
ऐसा कहकर महामना राम ने लम्बी साँस ली और मौन हो गए। तब उस कन्या ने भृगुनन्दन से कहा —
अम्बोवाच
श्लोक 6 (5.186.6)
भगवन्नेवमेवैतद्यथाऽऽह भगवांस्तथा । अजेयो युधि भीष्मोऽयमपि देवैरुदारधीः ॥
bhagavannevamevaitadyathā''ha bhagavāṃstathā | ajeyo yudhi bhīṣmo'yamapi devairudāradhīḥ
"भगवन्, आप जैसा कहते हैं, बात वैसी ही है। ये उदारबुद्धि भीष्म युद्ध में देवताओं से भी अजेय हैं।"
श्लोक 7 (5.186.7)
यथाशक्ति यथोत्साहं मम कार्यं कृतं त्वया । अनिवार्यं रणे वीर्यमस्त्राणि विविधानि च ॥
yathāśakti yathotsāhaṃ mama kāryaṃ kṛtaṃ tvayā | anivāryaṃ raṇe vīryamastrāṇi vividhāni ca
"आपने अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार, रण में अपने अदम्य पराक्रम और नाना प्रकार के अस्त्रों से, मेरा कार्य किया है।"
श्लोक 8 (5.186.8)
न चैव शक्यते युद्धे विशेषयितुमन्ततः । न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथंचन ॥
na caiva śakyate yuddhe viśeṣayitumantataḥ | na cāhamenaṃ yāsyāmi punarbhīṣmaṃ kathaṃcana
"अन्ततः युद्ध में उनसे बढ़कर नहीं हुआ जा सकता; और मैं अब किसी भी प्रकार फिर उन भीष्म के पास नहीं जाऊँगी।"
श्लोक 9 (5.186.9)
गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन । समरे पातयिष्यामि स्वयमेव भृगूद्वह ॥
gamiṣyāmi tu tatrāhaṃ yatra bhīṣmaṃ tapodhana | samare pātayiṣyāmi svayameva bhṛgūdvaha
"हे तपोधन, हे भृगुश्रेष्ठ, मैं तो वहाँ जाऊँगी जहाँ मैं स्वयं ही युद्ध में भीष्म को गिरा सकूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (5.186.10)
एवमुक्त्वा ययौ कन्या रोषव्याकुललोचना । तापस्ये धृतसंकल्पा सा मे चिन्तयती वधम् ॥
evamuktvā yayau kanyā roṣavyākulalocanā | tāpasye dhṛtasaṃkalpā sā me cintayatī vadham
ऐसा कहकर वह कन्या चली गई। उसकी आँखें क्रोध से व्याकुल थीं; उसने तपस्या का संकल्प ले लिया था और वह मेरे वध का चिन्तन कर रही थी।
श्लोक 11 (5.186.11)
ततो महेन्द्रं सहितैर्मुनिभिर्भृगुसत्तमः । यथाऽऽगतं तथा सोऽगन्मामुपामन्त्र्य भारत ॥
tato mahendraṃ sahitairmunibhirbhṛgusattamaḥ | yathā''gataṃ tathā so'ganmāmupāmantrya bhārata
हे भारत, तब भृगुश्रेष्ठ राम मुझसे विदा लेकर मुनियों के साथ जैसे आए थे वैसे ही महेन्द्र पर्वत को लौट गए।
श्लोक 12 (5.186.12)
ततो रथं समारुह्य स्तूयमानो द्विजातिभिः । प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥
tato rathaṃ samāruhya stūyamāno dvijātibhiḥ | praviśya nagaraṃ mātre satyavatyai nyavedayam
तब मैं रथ पर चढ़कर, ब्राह्मणों से स्तुति पाते हुए, नगर में प्रविष्ट हुआ और माता सत्यवती को
श्लोक 13 (5.186.13)
यथावृत्तं महाराज सा च मां प्रत्यनन्दत । पुरुषांश्चादिशं प्राज्ञान्कन्यावृत्तान्तकर्मणि ॥
yathāvṛttaṃ mahārāja sā ca māṃ pratyanandata | puruṣāṃścādiśaṃ prājñānkanyāvṛttāntakarmaṇi
हे महाराज, सारा वृत्तान्त सुनाया; उन्होंने मेरा अभिनन्दन किया। मैंने उस कन्या के वृत्तान्त की खोज-खबर रखने के काम पर बुद्धिमान् पुरुषों को लगा दिया।
श्लोक 14 (5.186.14)
दिवसे दिवसे ह्यस्या गतिजल्पितचेष्टितम् । प्रत्याहरंश्च मे युक्ताः स्थिताः प्रियहिते सदा ॥
divase divase hyasyā gatijalpitaceṣṭitam | pratyāharaṃśca me yuktāḥ sthitāḥ priyahite sadā
मेरे प्रिय और हित में सदा लगे रहने वाले वे सावधान पुरुष प्रतिदिन उसकी गति, बातचीत और चेष्टाओं का समाचार मुझे लाते रहे।
श्लोक 15 (5.186.15)
यदैव हि वनं प्रायात्सा कन्या तपसे धृता । तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम् ॥
yadaiva hi vanaṃ prāyātsā kanyā tapase dhṛtā | tadaiva vyathito dīno gatacetā ivābhavam
जिस क्षण से वह कन्या तपस्या का निश्चय करके वन को गई, उसी क्षण से मैं व्यथित, दीन और मानो सुध-बुध खोया-सा हो गया।
श्लोक 16 (5.186.16)
न हि मां क्षत्रियः कश्चिद्वीर्येण व्यजयद्युधि । ऋते ब्रह्मविदस्तात तपसा संशितव्रतात् ॥
na hi māṃ kṣatriyaḥ kaścidvīryeṇa vyajayadyudhi | ṛte brahmavidastāta tapasā saṃśitavratāt
क्योंकि, तात, तपस्या से तीक्ष्ण व्रत वाले ब्रह्मज्ञानी को छोड़कर कोई भी क्षत्रिय युद्ध में पराक्रम से मुझे नहीं जीत सका।
श्लोक 17 (5.186.17)
अपि चैतन्मया राजन्नारदेऽपि निवेदितम् । व्यासे चैव तथा कार्यं तौ चोभौ मामवोचताम् ॥
api caitanmayā rājannārade'pi niveditam | vyāse caiva tathā kāryaṃ tau cobhau māmavocatām
हे राजन्, यह बात मैंने नारद को और उचित समझकर व्यास को भी बताई, और उन दोनों ने मुझसे कहा —
नारदव्यासावूचतुः
श्लोक 18 (5.186.18)
न विषादस्त्वया कार्यो भीष्म काशिसुतां प्रति । दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ॥
na viṣādastvayā kāryo bhīṣma kāśisutāṃ prati | daivaṃ puruṣakāreṇa ko nivartitumutsahet
"भीष्म, काशिराज की पुत्री को लेकर तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिए। पुरुषार्थ से दैव को कौन लौटा सकता है?"
भीष्म उवाच
श्लोक 19 (5.186.19)
सा कन्या तु महाराज प्रविश्याश्रममण्डलम् । यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेऽतिमानुषम् ॥
sā kanyā tu mahārāja praviśyāśramamaṇḍalam | yamunātīramāśritya tapastepe'timānuṣam
हे महाराज, वह कन्या आश्रममण्डल में प्रवेश करके यमुना के तट का आश्रय लेकर अलौकिक तपस्या करने लगी।
श्लोक 20 (5.186.20)
निराहारा कृशा रूक्षा जटिला मलपङ्किनी । षण्मासान्वायुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना ॥
nirāhārā kṛśā rūkṣā jaṭilā malapaṅkinī | ṣaṇmāsānvāyubhakṣā ca sthāṇubhūtā tapodhanā
निराहार, दुर्बल, रूखी, जटाधारी, मैल और कीचड़ से लिपटी वह तपस्विनी छह महीने तक केवल वायु पीकर ठूँठ के समान स्थिर खड़ी रही।
श्लोक 21 (5.186.21)
यमुनाजलमाश्रित्य संवत्सरमथाऽपरम् । उदवासं निराहारा पारयामास भामिनी ॥
yamunājalamāśritya saṃvatsaramathā'param | udavāsaṃ nirāhārā pārayāmāsa bhāminī
फिर यमुना के जल का आश्रय लेकर उस भामिनी ने एक और वर्ष जल में निवास करते हुए निराहार बिताया।
श्लोक 22 (5.186.22)
शीर्णपर्णेन चैकेन पारयामास सा परम् । संवत्सरं तीव्रकोपा पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिता ॥
śīrṇaparṇena caikena pārayāmāsa sā param | saṃvatsaraṃ tīvrakopā pādāṅguṣṭhāgradhiṣṭhitā
उसके बाद तीव्र क्रोध से भरी उसने एक और वर्ष केवल एक सूखे पत्ते पर निर्वाह करते हुए, पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर खड़े होकर बिताया।
श्लोक 23 (5.186.23)
एवं द्वादश वर्षाणि तापयामास रोदसी । निवर्त्यमानापि च सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते ॥
evaṃ dvādaśa varṣāṇi tāpayāmāsa rodasī | nivartyamānāpi ca sā jñātibhirnaiva śakyate
इस प्रकार बारह वर्षों तक उसने आकाश और पृथ्वी को तपाया; उसके बन्धु-बान्धवों ने उसे लौटाना चाहा, पर वह किसी प्रकार न लौटी।
श्लोक 24 (5.186.24)
ततोऽगमद्वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् । आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् ॥
tato'gamadvatsabhūmiṃ siddhacāraṇasevitām | āśramaṃ puṇyaśīlānāṃ tāpasānāṃ mahātmanām
फिर वह सिद्धों और चारणों से सेवित वत्सभूमि में, पुण्यशील महात्मा तपस्वियों के आश्रम में गई।
श्लोक 25 (5.186.25)
तत्र पुण्येषु तीर्थेषु साऽऽप्लुताङ्गी दिवानिशम् । व्यचरत्काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी ॥
tatra puṇyeṣu tīrtheṣu sā''plutāṅgī divāniśam | vyacaratkāśikanyā sā yathākāmavicāriṇī
वहाँ पवित्र तीर्थों में रात-दिन स्नान करती हुई वह काशिकन्या इच्छानुसार विचरती रही।
श्लोक 26 (5.186.26)
नन्दाश्रमे महाराज तथोलूकाश्रमे शुभे । च्यवनस्याश्रमे चैव ब्रह्मणः स्थान एव च ॥
nandāśrame mahārāja tatholūkāśrame śubhe | cyavanasyāśrame caiva brahmaṇaḥ sthāna eva ca
हे महाराज, नन्द के आश्रम में, उलूक के सुन्दर आश्रम में, च्यवन के आश्रम में और ब्रह्मा के स्थान पर;
श्लोक 27 (5.186.27)
प्रयागे देवयजने देवारण्येषु चैव ह । भोगवत्यां महाराज कौशिकस्याश्रमे तथा ॥
prayāge devayajane devāraṇyeṣu caiva ha | bhogavatyāṃ mahārāja kauśikasyāśrame tathā
देवताओं की यज्ञभूमि प्रयाग में, देवारण्यों में, हे महाराज, भोगवती में और कौशिक के आश्रम में;
श्लोक 28 (5.186.28)
माण्डव्यस्याश्रमे राजन्दिलीपस्याश्रमे तथा । रामह्रदे च कौरव्य पैलगर्गस्य चाश्रमे ॥
māṇḍavyasyāśrame rājandilīpasyāśrame tathā | rāmahrade ca kauravya pailagargasya cāśrame
हे राजन्, माण्डव्य के आश्रम में, दिलीप के आश्रम में, हे कौरव्य, रामह्रद में और पैलगर्ग के आश्रम में —
श्लोक 29 (5.186.29)
एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशांपते । आप्लावयत गात्राणि व्रतमास्थाय दुष्करम् ॥
eteṣu tīrtheṣu tadā kāśikanyā viśāṃpate | āplāvayata gātrāṇi vratamāsthāya duṣkaram
हे प्रजानाथ, इन तीर्थों में वह काशिकन्या कठिन व्रत धारण करके स्नान करती रही।
श्लोक 30 (5.186.30)
तामब्रवीच्च कौरव्य मम माता जले स्थिता । किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेव वदस्व मे ॥
tāmabravīcca kauravya mama mātā jale sthitā | kimarthaṃ kliśyase bhadre tathyameva vadasva me
हे कौरव्य, तब जल में स्थित मेरी माता ने उससे कहा — "भद्रे, तुम किसलिए इतना क्लेश सह रही हो? मुझे सच-सच बताओ।"
श्लोक 31 (5.186.31)
सैनामथाब्रवीद्राजन्कृताञ्जलिरनिन्दिता । भीष्मेण समरे रामो निर्जितश्चारुलोचनि ॥
saināmathābravīdrājankṛtāñjaliraninditā | bhīṣmeṇa samare rāmo nirjitaścārulocani
हे राजन्, तब उस अनिन्द्य कन्या ने हाथ जोड़कर उनसे कहा — "हे सुन्दर नेत्रों वाली, युद्ध में भीष्म ने राम को पराजित कर दिया है।"
अम्बोवाच
श्लोक 32 (5.186.32)
कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपतिः । साहं भीष्मविनाशाय तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ॥
ko'nyastamutsahejjetumudyateṣuṃ mahīpatiḥ | sāhaṃ bhīṣmavināśāya tapastapsye sudāruṇam
"जब वे बाण उठाए हों, तब उन्हें जीतने का साहस और कौन राजा कर सकता है? इसलिए मैं भीष्म के विनाश के लिए अत्यन्त कठोर तप करूँगी।
श्लोक 33 (5.186.33)
विचरामि महीं देवि यथा हन्यामहं नृपम् । एतद्व्रतफलं देवि परमस्मिन्यथा हि मे ॥
vicarāmi mahīṃ devi yathā hanyāmahaṃ nṛpam | etadvrataphalaṃ devi paramasminyathā hi me
हे देवि, मैं पृथ्वी पर इसलिए विचर रही हूँ कि उस राजा का वध कर सकूँ। हे देवि, मेरे व्रत का यही परम फल हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (5.186.34)
ततोऽब्रवीत्सागरगा जिह्मं चरसि भामिनि । नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्यः प्राप्तुं त्वयाऽबले ॥
tato'bravītsāgaragā jihmaṃ carasi bhāmini | naiṣa kāmo'navadyāṅgi śakyaḥ prāptuṃ tvayā'bale
तब सागरगामिनी गङ्गा ने कहा — "भामिनि, तुम कुटिल मार्ग पर चल रही हो। हे निर्दोष अंगों वाली अबला, यह कामना तुम पूरी नहीं कर सकती।"
गङ्गोवाच
श्लोक 35 (5.186.35)
यदि भीष्मविनाशाय काश्ये चरसि वै व्रतम् । व्रतस्था च शरीरं त्वं यदि नाम विमोक्ष्यसि ॥
yadi bhīṣmavināśāya kāśye carasi vai vratam | vratasthā ca śarīraṃ tvaṃ yadi nāma vimokṣyasi
"हे काशिराजकुमारी, यदि तुम भीष्म के विनाश के लिए यह व्रत कर रही हो, और यदि व्रत में स्थित रहते हुए ही अपना शरीर त्याग दोगी,
श्लोक 36 (5.186.36)
नदी भविष्यसि शुभे कुटिला वार्षिकोदका । दुस्तीर्था न तु विज्ञेया वार्षिकी नाष्टमासिकी ॥
nadī bhaviṣyasi śubhe kuṭilā vārṣikodakā | dustīrthā na tu vijñeyā vārṣikī nāṣṭamāsikī
तो हे शुभे, तुम एक टेढ़ी-मेढ़ी नदी बन जाओगी, जिसमें केवल वर्षा का जल होगा; जिसे पार करना कठिन होगा और जिसे पहचाना न जा सकेगा; जो केवल वर्षा ऋतु में बहेगी, आठ महीने नहीं।
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (5.186.37)
भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभयंकरी । एवमुक्त्वा ततो राजन्काशिकन्यां न्यवर्तत ॥
bhīmagrāhavatī ghorā sarvabhūtabhayaṃkarī | evamuktvā tato rājankāśikanyāṃ nyavartata
भयंकर ग्राहों से भरी, घोर और सब प्राणियों को भयभीत करने वाली।" हे राजन्, काशिकन्या से ऐसा कहकर वे लौट गईं —
श्लोक 38 (5.186.38)
माता मम महाभागा स्मयमानेव भामिनी । कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद्दशमे तथा । न प्राश्नीतोदकमपि पुनः सा वरवर्णिनी ॥
mātā mama mahābhāgā smayamāneva bhāminī | kadācidaṣṭame māsi kadāciddaśame tathā | na prāśnītodakamapi punaḥ sā varavarṇinī
मेरी महाभाग, सुन्दरी माता, मानो मुस्कराती हुई। और वह सुन्दर वर्ण वाली कन्या फिर कभी आठ महीने तक, कभी दस महीने तक जल भी ग्रहण नहीं करती थी।
श्लोक 39 (5.186.39)
सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात्ततस्ततः । पतिता परिधावन्ती पुनः काशिपतेः सुता ॥
sā vatsabhūmiṃ kauravya tīrthalobhāttatastataḥ | patitā paridhāvantī punaḥ kāśipateḥ sutā
हे कौरव्य, तीर्थों के लोभ से इधर-उधर भटकती हुई वह काशिराज की पुत्री फिर वत्सभूमि में आ पहुँची।
श्लोक 40 (5.186.40)
सा नदी वत्सभूम्यां तु प्रथिताम्बेति भारत । वार्षिकी ग्राहबहुला दुस्तीर्था कुटिला तथा ॥
sā nadī vatsabhūmyāṃ tu prathitāmbeti bhārata | vārṣikī grāhabahulā dustīrthā kuṭilā tathā
हे भारत, वत्सभूमि में वह "अम्बा" नाम की नदी के रूप में प्रसिद्ध है — जो केवल वर्षा में बहती है, ग्राहों से भरी है, दुस्तर और टेढ़ी-मेढ़ी है।
श्लोक 41 (5.186.41)
सा कन्या तपसा तेन देहार्धेन व्यजायत । नदी च राजन्वत्सेषु कन्या चैवाभवत्तदा ॥
sā kanyā tapasā tena dehārdhena vyajāyata | nadī ca rājanvatseṣu kanyā caivābhavattadā
हे राजन्, उस तपस्या के प्रभाव से वह कन्या अपने आधे शरीर से वत्सदेश में नदी बन गई और (शेष आधे से) कन्या ही बनी रही।