Skip to main content

उद्योग पर्व · अध्याय 185

देवताओं द्वारा भीष्म और परशुराम के युद्ध का निवारण

जब भीष्म परशुराम पर प्रस्वापन अस्त्र छोड़ने को उद्यत होते हैं, तब आकाश में कोलाहल उठता है और नारद तथा आठ ब्रह्मवादी उन्हें गुरु का सम्मान करते हुए रुकने को कहते हैं; भीष्म अस्त्र लौटा लेते हैं और परशुराम अपनी हार स्वीकार करते हैं। परशुराम के पितर प्रकट होकर उनसे शस्त्र त्यागने को कहते हैं और बताते हैं कि भीष्म एक वसु हैं, जिनकी मृत्यु अर्जुन के द्वारा नियत है। परशुराम नहीं मानते, और मुनियों तथा गङ्गा के समझाने पर भी भीष्म पीछे नहीं हटते; अंत में पितर परशुराम से शस्त्र रखवा देते हैं। तब भीष्म परशुराम को प्रणाम करते हैं; परशुराम उन्हें क्षत्रियों में अद्वितीय बताकर सबके सामने अम्बा को बुलाते हैं।

अध्याय 184अध्याय-सूचीअध्याय 186

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.185.1)

ततो हलहलाशब्दो दिवि राजन्महानभूत् । प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ॥

tato halahalāśabdo divi rājanmahānabhūt | prasvāpaṃ bhīṣma mā srākṣīriti kauravanandana

तब हे राजन्, आकाश में बड़ा कोलाहल उठा — "हे कुरुनन्दन भीष्म, प्रस्वापन अस्त्र मत छोड़ो!"

श्लोक 2 (5.185.2)

अयुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने । प्रस्वापं मां प्रयुञ्जानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥

ayuñjameva caivāhaṃ tadastraṃ bhṛgunandane | prasvāpaṃ māṃ prayuñjānaṃ nārado vākyamabravīt

फिर भी मैंने वह अस्त्र भृगुनन्दन पर साध ही लिया। मुझे प्रस्वापन का प्रयोग करते देख नारद ने मुझसे यह वचन कहा —

नारद उवाच

श्लोक 3 (5.185.3)

एते वियति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः । ते त्वां निवारयन्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रयोजय ॥

ete viyati kauravya divi devagaṇāḥ sthitāḥ | te tvāṃ nivārayantyadya prasvāpaṃ mā prayojaya

"हे कौरव्य, ये देवगण आकाश में स्थित हैं; वे आज तुम्हें रोक रहे हैं। प्रस्वापन का प्रयोग मत करो।"

श्लोक 4 (5.185.4)

रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्च गुरुश्च ते । तस्यावमानं कौरव्य मास्म कार्षीः कथञ्चन ॥

rāmastapasvī brahmaṇyo brāhmaṇaśca guruśca te | tasyāvamānaṃ kauravya māsma kārṣīḥ kathañcana

"राम तपस्वी हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं, ब्राह्मण हैं और तुम्हारे गुरु हैं। हे कौरव्य, किसी भी प्रकार उनका अपमान मत करो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (5.185.5)

ततोऽपश्यं दिविष्ठान्वै तानष्टौ ब्रह्मवादिनः । ते मां स्मयन्तो राजेन्द्र शनकैरिदमब्रुवन् ॥

tato'paśyaṃ diviṣṭhānvai tānaṣṭau brahmavādinaḥ | te māṃ smayanto rājendra śanakairidamabruvan

तब मैंने आकाश में स्थित उन आठ ब्रह्मवादियों को देखा। हे राजेन्द्र, वे मुस्कराते हुए धीरे से मुझसे बोले —

ब्रह्मवादिन ऊचुः

श्लोक 6 (5.185.6)

यथाऽऽह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत्तथा कुरु । एतद्धि परमं श्रेयो लोकानां भरतर्षभ ॥

yathā''ha bharataśreṣṭha nāradastattathā kuru | etaddhi paramaṃ śreyo lokānāṃ bharatarṣabha

"हे भरतश्रेष्ठ, नारद जैसा कहते हैं वैसा ही करो। हे भरतर्षभ, इसी में लोकों का परम कल्याण है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (5.185.7)

ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं महत् । ब्रह्मास्त्रं दीपयाञ्चक्रे तस्मिन्युधि यथाविधि ॥

tataśca pratisaṃhṛtya tadastraṃ svāpanaṃ mahat | brahmāstraṃ dīpayāñcakre tasminyudhi yathāvidhi

तब मैंने उस महान् प्रस्वापन अस्त्र को लौटा लिया और उस युद्ध में विधिपूर्वक ब्रह्मास्त्र को प्रज्वलित किया।

श्लोक 8 (5.185.8)

ततो रामो हृषितो राजसिंह । दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै । जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दबुद्धि- । रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ॥

tato rāmo hṛṣito rājasiṃha | dṛṣṭvā tadastraṃ vinivartitaṃ vai | jito'smi bhīṣmeṇa sumandabuddhi- | rityeva vākyaṃ sahasā vyamuñcat

हे राजसिंह, तब उस अस्त्र को लौटाया गया देखकर राम रोमांचित हो उठे और सहसा बोल पड़े — "मुझ मन्दबुद्धि को भीष्म ने जीत लिया!"

श्लोक 9 (5.185.9)

ततोऽपश्यत्पितरं जामदग्न्यः । पितुस्तथा पितरं चास्य मान्यम् । ते तत्र चैनं परिवार्य तस्थु- । रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ॥

tato'paśyatpitaraṃ jāmadagnyaḥ | pitustathā pitaraṃ cāsya mānyam | te tatra cainaṃ parivārya tasthu- | rūcuścainaṃ sāntvapūrvaṃ tadānīm

तब जमदग्निनन्दन ने अपने पिता को और अपने पिता के पूज्य पिता को भी देखा। वे वहाँ उन्हें घेरकर खड़े हो गए और सान्त्वना देते हुए उनसे बोले —

पितर ऊचुः

श्लोक 10 (5.185.10)

मा स्मैवं साहसं तात पुनः कार्षीः कथञ्चन । भीष्मेण संयुगं गन्तुं क्षत्रियेण विशेषतः ॥

mā smaivaṃ sāhasaṃ tāta punaḥ kārṣīḥ kathañcana | bhīṣmeṇa saṃyugaṃ gantuṃ kṣatriyeṇa viśeṣataḥ

"तात, फिर कभी ऐसा दुस्साहस मत करना — भीष्म से, और विशेषकर किसी क्षत्रिय से, युद्ध करने जाना।"

श्लोक 11 (5.185.11)

क्षत्रियस्य तु धर्मोऽयं यद्युद्धं भृगुनन्दन । स्वाध्यायो व्रतचर्याऽथ ब्राह्मणानां परं धनम् ॥

kṣatriyasya tu dharmo'yaṃ yadyuddhaṃ bhṛgunandana | svādhyāyo vratacaryā'tha brāhmaṇānāṃ paraṃ dhanam

"हे भृगुनन्दन, युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है; ब्राह्मणों का परम धन तो स्वाध्याय और व्रतों का पालन है।"

श्लोक 12 (5.185.12)

इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभिः प्रागुदाहृतम् । शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्चाकार्यं कृतं त्वया ॥

idaṃ nimitte kasmiṃścidasmābhiḥ prāgudāhṛtam | śastradhāraṇamatyugraṃ taccākāryaṃ kṛtaṃ tvayā

"एक बार पहले किसी विशेष कारण से हमने तुमसे शस्त्र धारण करने को कहा था, जो अत्यन्त उग्र कर्म है; और अब तुमने वह कर डाला है जो नहीं करना चाहिए था।"

श्लोक 13 (5.185.13)

वत्स पर्याप्तमेतावद्भीष्मेण सह संयुगे । विमर्दस्ते महाबाहो व्यपयाहि रणादितः ॥

vatsa paryāptametāvadbhīṣmeṇa saha saṃyuge | vimardaste mahābāho vyapayāhi raṇāditaḥ

"वत्स, भीष्म के साथ युद्ध में तुम्हारा इतना संघर्ष पर्याप्त है। हे महाबाहो, अब इस रणभूमि से हट जाओ।"

श्लोक 14 (5.185.14)

पर्याप्तमेतद्भद्रं ते तव कार्मुकधारणम् । विसर्जयैतद्दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव ॥

paryāptametadbhadraṃ te tava kārmukadhāraṇam | visarjayaitaddurdharṣa tapastapyasva bhārgava

"तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारा धनुष धारण करना अब बहुत हुआ। हे दुर्धर्ष भार्गव, इसे त्याग दो और तप करो।"

श्लोक 15 (5.185.15)

एष भीष्मः शान्तनवो देवैः सर्वैर्निवारितः । निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रसादितः ॥

eṣa bhīṣmaḥ śāntanavo devaiḥ sarvairnivāritaḥ | nivartasva raṇādasmāditi caiva prasāditaḥ

"शान्तनुनन्दन इन भीष्म को सभी देवताओं ने रोक दिया है और उनसे अनुनय किया है कि 'इस युद्ध से लौट जाओ;'"

श्लोक 16 (5.185.16)

रामेण सह मायोत्सीर्गुरुणेति पुनः पुनः । न हि रामो रणे जेतुं त्वया न्याय्यः कुरूद्वह ॥

rāmeṇa saha māyotsīrguruṇeti punaḥ punaḥ | na hi rāmo raṇe jetuṃ tvayā nyāyyaḥ kurūdvaha

"और बार-बार कहा है कि 'अपने गुरु राम से युद्ध मत करो; हे कुरुश्रेष्ठ, रण में राम को जीतना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।'"

श्लोक 17 (5.185.17)

मानं कुरुष्व गाङ्गेय ब्राह्मणस्य रणाजिरे । वयं तु गुरवस्तुभ्यं तस्मात्त्वां वारयामहे ॥

mānaṃ kuruṣva gāṅgeya brāhmaṇasya raṇājire | vayaṃ tu guravastubhyaṃ tasmāttvāṃ vārayāmahe

"'हे गाङ्गेय, रणभूमि में ब्राह्मण का सम्मान करो।' हम तुम्हारे गुरुजन हैं, इसलिए तुम्हें रोक रहे हैं।"

श्लोक 18 (5.185.18)

भीष्मो वसूनामन्यतमो दिष्ट्या जीवसि पुत्रक । गाङ्गेयः शन्तनोः पुत्रो वसुरेष महायशाः ॥

bhīṣmo vasūnāmanyatamo diṣṭyā jīvasi putraka | gāṅgeyaḥ śantanoḥ putro vasureṣa mahāyaśāḥ

"भीष्म वसुओं में से एक हैं; पुत्र, सौभाग्य से तुम जीवित हो। गङ्गा के पुत्र, शान्तनु के ये पुत्र महायशस्वी वसु हैं।"

श्लोक 19 (5.185.19)

कथं शक्यस्त्वया जेतुं निवर्तस्वेह भार्गव । अर्जुनः पाण्डवश्रेष्ठः पुरन्दरसुतो बली ॥

kathaṃ śakyastvayā jetuṃ nivartasveha bhārgava | arjunaḥ pāṇḍavaśreṣṭhaḥ purandarasuto balī

"तुम उन्हें कैसे जीत सकते हो? हे भार्गव, यहीं से लौट जाओ। पाण्डवों में श्रेष्ठ, इन्द्र के बलवान् पुत्र अर्जुन"

श्लोक 20 (5.185.20)

नरः प्रजापतिर्वीरः पूर्वदेवः सनातनः । सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् । भीष्ममृत्युर्यथाकालं विहितो वै स्वयंभुवा ॥

naraḥ prajāpatirvīraḥ pūrvadevaḥ sanātanaḥ | savyasācīti vikhyātastriṣu lokeṣu vīryavān | bhīṣmamṛtyuryathākālaṃ vihito vai svayaṃbhuvā

"नर हैं, वीर प्रजापति हैं, सनातन पूर्वदेव हैं, जो अपने पराक्रम से तीनों लोकों में सव्यसाची नाम से विख्यात हैं। स्वयम्भू ब्रह्मा ने उन्हीं को समय आने पर भीष्म की मृत्यु नियत किया है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 21 (5.185.21)

एवमुक्तः स पितृभिः पितॄन्रामोऽब्रवीदिदम् । नाहं युधि निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् । न निवर्तितपूर्वश्च कदाचिद्रणमूर्धनि ॥

evamuktaḥ sa pitṛbhiḥ pitṝnrāmo'bravīdidam | nāhaṃ yudhi nivarteyamiti me vratamāhitam | na nivartitapūrvaśca kadācidraṇamūrdhani

पितरों के ऐसा कहने पर राम ने उनसे यह कहा — "मेरा यह व्रत है कि मैं युद्ध से पीछे नहीं हटता; रण के मुहाने पर मैं पहले कभी नहीं लौटाया गया।"

राम उवाच

श्लोक 22 (5.185.22)

निवर्त्यतामापगेयः कामं युद्धात्पितामहाः । न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात्कथंचन ॥

nivartyatāmāpageyaḥ kāmaṃ yuddhātpitāmahāḥ | na tvahaṃ vinivartiṣye yuddhādasmātkathaṃcana

"हे पितामहो, आप चाहें तो गङ्गानन्दन भीष्म को युद्ध से लौटा दीजिए; मैं तो किसी भी प्रकार इस युद्ध से नहीं लौटूँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 23 (5.185.23)

ततस्ते मुनयो राजन्नृचीकप्रमुखास्तदा । नारदेनैव सहिताः समागम्येदमब्रुवन् ॥

tataste munayo rājannṛcīkapramukhāstadā | nāradenaiva sahitāḥ samāgamyedamabruvan

हे राजन्, तब ऋचीक आदि मुनियों ने नारद के साथ मेरे पास आकर यह कहा —

श्लोक 24 (5.185.24)

निवर्तस्व रणात्तात मानयस्व द्विजोत्तमम् । इत्यवोचमहं तांश्च क्षत्रधर्मव्यपेक्षया ॥

nivartasva raṇāttāta mānayasva dvijottamam | ityavocamahaṃ tāṃśca kṣatradharmavyapekṣayā

"तात, युद्ध से लौट जाओ और इन श्रेष्ठ ब्राह्मण का सम्मान करो।" क्षत्रियधर्म का ध्यान रखते हुए मैंने उनसे कहा —

श्लोक 25 (5.185.25)

मम व्रतमिदं लोके नाहं युद्धात्कदाचन । विमुखो विनिवर्तेयं पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ॥

mama vratamidaṃ loke nāhaṃ yuddhātkadācana | vimukho vinivarteyaṃ pṛṣṭhato'bhyāhataḥ śaraiḥ

"संसार में मेरा यह व्रत है कि मैं कभी युद्ध से मुँह मोड़कर, पीठ पर बाणों की चोट खाते हुए, नहीं लौटूँगा।"

श्लोक 26 (5.185.26)

नाहं लोभान्न कार्पण्यान्न भयान्नार्थकारणात् । त्यजेयं शाश्वतं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः ॥

nāhaṃ lobhānna kārpaṇyānna bhayānnārthakāraṇāt | tyajeyaṃ śāśvataṃ dharmamiti me niścitā matiḥ

"न लोभ से, न दीनता से, न भय से और न किसी स्वार्थ के कारण मैं सनातन धर्म का त्याग करूँगा — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।"

श्लोक 27 (5.185.27)

ततस्ते मुनयः सर्वे नारदप्रमुखा नृप । भागीरथी च मे माता रणमध्यं प्रपेदिरे ॥

tataste munayaḥ sarve nāradapramukhā nṛpa | bhāgīrathī ca me mātā raṇamadhyaṃ prapedire

हे नृप, तब नारद आदि वे सभी मुनि और मेरी माता भागीरथी रणभूमि के बीच आ पहुँचे।

श्लोक 28 (5.185.28)

तथैवात्तशरो धन्वी तथैव दृढनिश्चयः । स्थितोऽहमाहवे योद्धुं ततस्ते राममब्रुवन् ॥

tathaivāttaśaro dhanvī tathaiva dṛḍhaniścayaḥ | sthito'hamāhave yoddhuṃ tataste rāmamabruvan

मैं पहले की ही भाँति बाण लिए, धनुष धारण किए, उसी दृढ़ निश्चय के साथ युद्ध के लिए डटा रहा। तब उन्होंने राम से कहा —

श्लोक 29 (5.185.29)

समेत्य सहिता भूयः समरे भृगुनन्दनम् । नावनीतं हि हृदयं विप्राणां शाम्य भार्गव ॥

sametya sahitā bhūyaḥ samare bhṛgunandanam | nāvanītaṃ hi hṛdayaṃ viprāṇāṃ śāmya bhārgava

और एक बार फिर रणभूमि में भृगुनन्दन के पास एकत्र होकर कहा — "ब्राह्मणों का हृदय तो नवनीत के समान कोमल होता है; हे भार्गव, शान्त हो जाओ।"

मुनय ऊचुः

श्लोक 30 (5.185.30)

राम राम निवर्तस्व युद्धादस्माद्द्विजोत्तम । अवध्यो वै त्वया भीष्मस्त्वं च भीष्मस्य भार्गव ॥

rāma rāma nivartasva yuddhādasmāddvijottama | avadhyo vai tvayā bhīṣmastvaṃ ca bhīṣmasya bhārgava

"हे राम, हे राम, हे द्विजश्रेष्ठ, इस युद्ध से लौट जाओ। हे भार्गव, न भीष्म तुम्हारे हाथों मारे जा सकते हैं, न तुम भीष्म के हाथों।"

भीष्म उवाच

श्लोक 31 (5.185.31)

एवं ब्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम् । न्यासयाञ्चक्रिरे शस्त्रं पितरो भृगुनन्दनम् ॥

evaṃ bruvantaste sarve pratirudhya raṇājiram | nyāsayāñcakrire śastraṃ pitaro bhṛgunandanam

ऐसा कहते हुए उन सबने रणभूमि को घेरकर रोक दिया, और पितरों ने भृगुनन्दन से शस्त्र रखवा दिया।

श्लोक 32 (5.185.32)

ततोऽहं पुनरेवाथ तानष्टौ ब्रह्मवादिनः । अद्राक्षं दीप्यमानान्वै ग्रहानष्टाविवोदितान् ॥

tato'haṃ punarevātha tānaṣṭau brahmavādinaḥ | adrākṣaṃ dīpyamānānvai grahānaṣṭāvivoditān

तब मैंने फिर उन आठ ब्रह्मवादियों को देखा, जो उदित हुए आठ ग्रहों के समान दीप्तिमान् थे।

श्लोक 33 (5.185.33)

ते मां सप्रणयं वाक्यमब्रुवन्समरे स्थितम् । प्रैहि रामं महाबाहो गुरुं लोकहितं कुरु ॥

te māṃ sapraṇayaṃ vākyamabruvansamare sthitam | praihi rāmaṃ mahābāho guruṃ lokahitaṃ kuru

रणभूमि में खड़े मुझसे उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा — "हे महाबाहो, अपने गुरु राम के पास जाओ और लोकों का हित करो।"

श्लोक 34 (5.185.34)

दृष्ट्वा निवर्तितं रामं सुहृद्वाक्येन तेन वै । लोकानां च हितं कुर्वन्नहमप्याददे वचः ॥

dṛṣṭvā nivartitaṃ rāmaṃ suhṛdvākyena tena vai | lokānāṃ ca hitaṃ kurvannahamapyādade vacaḥ

हितैषियों के वचन से राम को लौटा हुआ देखकर मैंने भी लोकों का हित करते हुए उनकी बात मान ली।

श्लोक 35 (5.185.35)

ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षतः । रामश्चाभ्युत्स्मयन्प्रेम्णा मामुवाच महातपाः ॥

tato'haṃ rāmamāsādya vavande bhṛśavikṣataḥ | rāmaścābhyutsmayanpremṇā māmuvāca mahātapāḥ

तब बुरी तरह घायल मैंने राम के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया, और महातपस्वी राम ने प्रेम से मुस्कराते हुए मुझसे कहा —

राम उवाच

श्लोक 36 (5.185.36)

त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्क्षत्रियः पृथिवीचरः । गम्यतां भीष्म युद्धेऽस्मिंस्तोषितोऽहं भृशं त्वया ॥

tvatsamo nāsti loke'sminkṣatriyaḥ pṛthivīcaraḥ | gamyatāṃ bhīṣma yuddhe'smiṃstoṣito'haṃ bhṛśaṃ tvayā

"इस संसार में पृथ्वी पर विचरने वाला तुम्हारे समान कोई क्षत्रिय नहीं है। भीष्म, जाओ; इस युद्ध में तुमने मुझे बहुत संतुष्ट किया है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 37 (5.185.37)

मम चैव समक्षं तां कन्यामाहूय भार्गवः । उक्तवान्दीनया वाचा मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥

mama caiva samakṣaṃ tāṃ kanyāmāhūya bhārgavaḥ | uktavāndīnayā vācā madhye teṣāṃ mahātmanām

और मेरे सामने ही भार्गव ने उस कन्या को बुलाकर उन महात्माओं के बीच दीन वाणी में उससे कहा।

अध्याय 184अध्याय-सूचीअध्याय 186