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उद्योग पर्व · अध्याय 184

ब्रह्मास्त्रों की टक्कर

स्वप्न से प्रसन्न होकर भीष्म जागते हैं और युद्ध फिर आरम्भ होता है। परशुराम एक शक्ति से भीष्म की हँसली पर प्रहार करते हैं; भीष्म परशुराम के ललाट पर बाण मारते हैं, फिर छाती पर लगे बाण से गिर पड़ते हैं, और होश में आकर एक शक्ति से परशुराम की छाती पर प्रहार करते हैं, जिससे अकृतव्रण को उन्हें सँभालना पड़ता है। तब परशुराम ब्रह्मास्त्र छोड़ते हैं और भीष्म भी ब्रह्मास्त्र से उत्तर देते हैं; दोनों बीच में टकराते हैं, आकाश जल उठता है और सारे लोक संतप्त हो जाते हैं। उसी क्षण भीष्म प्रस्वाप अस्त्र चलाने का निश्चय करते हैं, और वह उनके मन में प्रकट हो जाता है।

अध्याय 183अध्याय-सूचीअध्याय 185

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.184.1)

ततो रात्रौ व्यतीतायां प्रतिबुद्धोऽस्मि भारत । ततः संचिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ॥

tato rātrau vyatītāyāṃ pratibuddho'smi bhārata | tataḥ saṃcintya vai svapnamavāpaṃ harṣamuttamam

हे भारत, तब रात बीत जाने पर मैं जागा, और उस स्वप्न का विचार करके मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ।

श्लोक 2 (5.184.2)

ततः समभवद्युद्धं मम तस्य च भारत । तुमुलं सर्वभूतानां रोमहर्षणमद्भुतम् ॥

tataḥ samabhavadyuddhaṃ mama tasya ca bhārata | tumulaṃ sarvabhūtānāṃ romaharṣaṇamadbhutam

हे भारत, तब मेरा और उनका युद्ध आरम्भ हुआ — घमासान और अद्भुत, जिससे सब प्राणियों के रोंगटे खड़े हो गए।

श्लोक 3 (5.184.3)

ततो बाणमयं वर्षं ववर्ष मयि भार्गवः । न्यवारयमहं तच्च शरजालेन भारत ॥

tato bāṇamayaṃ varṣaṃ vavarṣa mayi bhārgavaḥ | nyavārayamahaṃ tacca śarajālena bhārata

हे भारत, भृगुनन्दन ने मुझ पर बाणों की वर्षा की, और मैंने बाणों के जाल से उसे रोक दिया।

श्लोक 4 (5.184.4)

ततः परमसंक्रुद्धः पुनरेव महातपाः । ह्यस्तनेन च कोपेन शक्तिं वै प्राहिणोन्मयि ॥

tataḥ paramasaṃkruddhaḥ punareva mahātapāḥ | hyastanena ca kopena śaktiṃ vai prāhiṇonmayi

तब अत्यन्त क्रुद्ध उस महातपस्वी ने, पिछले दिन के क्रोध को लिए हुए, फिर मुझ पर एक शक्ति चलाई —

श्लोक 5 (5.184.5)

इन्द्राशनिसमस्पर्शां यमदण्डसमप्रभाम् । ज्वलन्तीमग्निवत्सङ्ख्ये लेलिहानां समन्ततः ॥

indrāśanisamasparśāṃ yamadaṇḍasamaprabhām | jvalantīmagnivatsaṅkhye lelihānāṃ samantataḥ

जिसका स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान और जिसकी प्रभा यमराज के दण्ड के समान थी, जो युद्ध में अग्नि की तरह दहकती हुई चारों ओर लपलपा रही थी।

श्लोक 6 (5.184.6)

ततो भरतशार्दूल धिष्ण्यमाकाशगं यथा । सा ममाभ्यवधीत्तूर्णं जत्रुदेशे कुरूद्वह ॥

tato bharataśārdūla dhiṣṇyamākāśagaṃ yathā | sā mamābhyavadhīttūrṇaṃ jatrudeśe kurūdvaha

हे भरतसिंह, हे कुरुश्रेष्ठ, तब आकाश में चलती दहकती उल्का की भाँति वह तेज़ी से मेरी हँसली पर आ लगी।

श्लोक 7 (5.184.7)

अथास्रमस्रवद्धोरं गिरेर्गैरिकधातुवत् । रामेण सुमहाबाहो क्षतस्य क्षतजेक्षण ॥

athāsramasravaddhoraṃ girergairikadhātuvat | rāmeṇa sumahābāho kṣatasya kṣatajekṣaṇa

हे रक्तनेत्र महाबाहो, तब परशुराम से घायल मेरे शरीर से भयंकर रक्त ऐसे बहने लगा जैसे पर्वत से गेरू बहता है।

श्लोक 8 (5.184.8)

ततोऽहं जामदग्न्याय भृशं क्रोधसमन्वितः । चिक्षेप मृत्युसंकाशं बाणं सर्पविषोपमम् ॥

tato'haṃ jāmadagnyāya bhṛśaṃ krodhasamanvitaḥ | cikṣepa mṛtyusaṃkāśaṃ bāṇaṃ sarpaviṣopamam

तब मैंने अत्यन्त क्रोध में भरकर जमदग्निनन्दन पर मृत्यु के समान, सर्प के विष जैसा घातक बाण छोड़ा।

श्लोक 9 (5.184.9)

स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तमः । अशोभत महाराज सशृङ्ग इव पर्वतः ॥

sa tenābhihato vīro lalāṭe dvijasattamaḥ | aśobhata mahārāja saśṛṅga iva parvataḥ

हे महाराज, ललाट पर उससे आहत होकर वह वीर द्विजश्रेष्ठ शिखर वाले पर्वत की भाँति शोभा पाने लगे।

श्लोक 10 (5.184.10)

स संरब्धः समावृत्य शरं कालान्तकोपमम् । संदधे बलवत्कृष्य घोरं शत्रुनिबर्हणम् ॥

sa saṃrabdhaḥ samāvṛtya śaraṃ kālāntakopamam | saṃdadhe balavatkṛṣya ghoraṃ śatrunibarhaṇam

तब क्रुद्ध होकर उन्होंने पलटकर, बलपूर्वक धनुष खींचकर, काल और अन्तक के समान, शत्रुओं का संहार करने वाला एक भयंकर बाण चढ़ाया।

श्लोक 11 (5.184.11)

स वक्षसि पपातोग्रः शरो व्याल इव श्वसन् । महीं राजंस्ततश्चाहमगमं रुधिराविलः ॥

sa vakṣasi papātograḥ śaro vyāla iva śvasan | mahīṃ rājaṃstataścāhamagamaṃ rudhirāvilaḥ

वह उग्र बाण सर्प की तरह फुफकारता हुआ मेरी छाती पर गिरा, और हे राजन्, मैं रक्त से लथपथ होकर धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 12 (5.184.12)

संप्राप्य तु पुनः संज्ञां जामदग्न्याय धीमते । प्राहिण्वं विमलां शक्तिं ज्वलन्तीमशनीमिव ॥

saṃprāpya tu punaḥ saṃjñāṃ jāmadagnyāya dhīmate | prāhiṇvaṃ vimalāṃ śaktiṃ jvalantīmaśanīmiva

फिर होश में आकर मैंने बुद्धिमान जमदग्निनन्दन पर वज्र की तरह दहकती एक चमकीली शक्ति चलाई।

श्लोक 13 (5.184.13)

सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे । विह्वलश्चाभवद्राजन्वेपथुश्चैनमाविशत् ॥

sā tasya dvijamukhyasya nipapāta bhujāntare | vihvalaścābhavadrājanvepathuścainamāviśat

वह उस ब्राह्मणश्रेष्ठ की छाती पर जा गिरी; हे राजन्, वे विचलित हो गए और उन्हें कँपकँपी छूट गई।

श्लोक 14 (5.184.14)

तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपाः । अकृतव्रणः शुभैर्वाक्यैराश्वासयदनेकधा ॥

tata enaṃ pariṣvajya sakhā vipro mahātapāḥ | akṛtavraṇaḥ śubhairvākyairāśvāsayadanekadhā

तब उनके मित्र, महातपस्वी ब्राह्मण अकृतव्रण ने उन्हें गले लगाकर शुभ वचनों से अनेक प्रकार से सांत्वना दी।

श्लोक 15 (5.184.15)

समाश्वस्तस्ततो रामः क्रोधामर्षसमन्वितः । प्रादुश्चक्रे तदा ब्राह्मं परमास्त्रं महाव्रतः ॥

samāśvastastato rāmaḥ krodhāmarṣasamanvitaḥ | prāduścakre tadā brāhmaṃ paramāstraṃ mahāvrataḥ

सँभलने पर क्रोध और अमर्ष से भरे महाव्रती परशुराम ने तब परम अस्त्र ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।

श्लोक 16 (5.184.16)

ततस्तत्प्रतिघातार्थं ब्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम् । मया प्रयुक्तं जज्वाल युगान्तमिव दर्शयत् ॥

tatastatpratighātārthaṃ brāhmamevāstramuttamam | mayā prayuktaṃ jajvāla yugāntamiva darśayat

तब उसका प्रतिकार करने के लिए मैंने भी वही उत्तम ब्रह्मास्त्र चलाया, और वह मानो प्रलय का दृश्य दिखाता हुआ जल उठा।

श्लोक 17 (5.184.17)

तयोर्ब्रह्मास्त्रयोरासीदन्तरा वै समागमः । असंप्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ॥

tayorbrahmāstrayorāsīdantarā vai samāgamaḥ | asaṃprāpyaiva rāmaṃ ca māṃ ca bhāratasattama

हे भरतसत्तम, वे दोनों ब्रह्मास्त्र न परशुराम तक पहुँचे न मुझ तक, बीच में ही आपस में टकरा गए।

श्लोक 18 (5.184.18)

ततो व्योम्नि प्रादुरभूत्तेज एव हि केवलम् । भूतानि चैव सर्वाणि जग्मुरार्तिं विशांपते ॥

tato vyomni prādurabhūtteja eva hi kevalam | bhūtāni caiva sarvāṇi jagmurārtiṃ viśāṃpate

हे प्रजानाथ, तब आकाश में केवल तेज ही तेज दिखाई देने लगा, और सभी प्राणी पीड़ा से भर गए।

श्लोक 19 (5.184.19)

ऋषयश्च सगन्धर्वा देवताश्चैव भारत । संतापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोभिपीडिताः ॥

ṛṣayaśca sagandharvā devatāścaiva bhārata | saṃtāpaṃ paramaṃ jagmurastratejobhipīḍitāḥ

हे भारत, गन्धर्वों सहित ऋषि और देवता भी अस्त्रों के तेज से पीड़ित होकर अत्यन्त संतप्त हो गए।

श्लोक 20 (5.184.20)

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । संतप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम् ॥

tataścacāla pṛthivī saparvatavanadrumā | saṃtaptāni ca bhūtāni viṣādaṃ jagmuruttamam

तब पर्वतों, वनों और वृक्षों सहित पृथ्वी काँप उठी, और संतप्त प्राणी गहरे विषाद में डूब गए।

श्लोक 21 (5.184.21)

प्रजज्वाल नभो राजन्धूमायन्ते दिशो दश । न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा ॥

prajajvāla nabho rājandhūmāyante diśo daśa | na sthātumantarikṣe ca śekurākāśagāstadā

हे राजन्, आकाश जलने लगा, दसों दिशाएँ धुएँ से भर गईं, और आकाश में चलने वाले प्राणी आकाश में ठहर न सके।

श्लोक 22 (5.184.22)

ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे । इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामोऽस्मि भारत ॥

tato hāhākṛte loke sadevāsurarākṣase | idamantaramityevaṃ moktukāmo'smi bhārata

तब देवताओं, असुरों और राक्षसों सहित सारे लोक में हाहाकार मचने पर मैंने सोचा, "यही अवसर है," और हे भारत, मैंने निश्चय किया

श्लोक 23 (5.184.23)

प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद्ब्रह्मवादिनाम् । चिन्तितं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात्तदा ॥

prasvāpamastraṃ tvarito vacanādbrahmavādinām | cintitaṃ ca tadastraṃ me manasi pratyabhāttadā

कि वेदवेत्ताओं के कथनानुसार तुरन्त प्रस्वाप अस्त्र छोड़ूँ; और चिन्तन करते ही वह अस्त्र मेरे मन में प्रकट हो गया।

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