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उद्योग पर्व · अध्याय 183

स्वप्न में प्रस्वाप अस्त्र का स्मरण

कई दिनों के अनिर्णीत युद्ध के बाद भीष्म ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं और अन्य प्राणियों को प्रणाम करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि यदि परशुराम को जीता जा सकता है तो देवता उन्हें दर्शन दें। प्रभात के समय वे आठ ब्राह्मण, जिन्होंने उन्हें गिरते समय थामा था, स्वप्न में प्रकट होकर उनसे प्रजापति के प्रस्वाप अस्त्र का स्मरण करने को कहते हैं, जिसे भीष्म पूर्वजन्म में जानते थे और जिसे परशुराम नहीं जानते। वह परशुराम को मारे बिना सुला देगा, और भीष्म संबोधन अस्त्र से उन्हें फिर जगा सकेंगे; इतना कहकर वे आठों अन्तर्धान हो जाते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.183.1)

ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा । ब्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वशः ॥

tato'haṃ niśi rājendra praṇamya śirasā tadā | brāhmaṇānāṃ pitṝṇāṃ ca devatānāṃ ca sarvaśaḥ

हे राजेन्द्र, तब रात्रि में मैंने ब्राह्मणों, पितरों और सब देवताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया,

श्लोक 2 (5.183.2)

नक्तंचराणां भूतानां राजन्यानां विशांपते । शयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम् ॥

naktaṃcarāṇāṃ bhūtānāṃ rājanyānāṃ viśāṃpate | śayanaṃ prāpya rahite manasā samacintayam

और हे प्रजानाथ, रात में विचरने वाले प्राणियों तथा क्षत्रियों को भी; फिर एकान्त में शय्या पर लेटकर मन में विचार किया —

श्लोक 3 (5.183.3)

जामदग्न्येन मे युद्धमिदं परमदारुणम् । अहानि च बहून्यद्य वर्तते सुमहात्ययम् ॥

jāmadagnyena me yuddhamidaṃ paramadāruṇam | ahāni ca bahūnyadya vartate sumahātyayam

"जमदग्निनन्दन के साथ मेरा यह अत्यन्त भयंकर युद्ध आज कई दिनों से चल रहा है; यह बहुत बड़ा संकट है।

श्लोक 4 (5.183.4)

न च रामं महावीर्यं शक्नोमि रणमूर्धनि । विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महाबलम् ॥

na ca rāmaṃ mahāvīryaṃ śaknomi raṇamūrdhani | vijetuṃ samare vipraṃ jāmadagnyaṃ mahābalam

और मैं रणभूमि के अग्रभाग में महापराक्रमी, महाबली, ब्राह्मण जमदग्निनन्दन परशुराम को युद्ध में जीत नहीं पा रहा हूँ।

श्लोक 5 (5.183.5)

यदि शक्यो मया जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् । दैवतानि प्रसन्नानि दर्शयन्तु निशां मम ॥

yadi śakyo mayā jetuṃ jāmadagnyaḥ pratāpavān | daivatāni prasannāni darśayantu niśāṃ mama

यदि प्रतापी जमदग्निनन्दन को मैं जीत सकता हूँ, तो देवता प्रसन्न होकर आज रात मुझे दर्शन दें।"

श्लोक 6 (5.183.6)

ततो निशि च राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः । दक्षिणेनेह पार्श्वेन प्रभातसमये तदा ॥

tato niśi ca rājendra prasuptaḥ śaravikṣataḥ | dakṣiṇeneha pārśvena prabhātasamaye tadā

हे राजेन्द्र, तब उस रात बाणों से घायल मैं दाहिनी करवट सो गया; और फिर प्रभात के समय

श्लोक 7 (5.183.7)

ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् । उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्त्वितः ॥

tato'haṃ vipramukhyaistairyairasmi patito rathāt | utthāpito dhṛtaścaiva mā bhairiti ca sāntvitaḥ

वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण, जिन्होंने रथ से गिरने पर मुझे उठाया था, थाम लिया था और "डरो मत" कहकर सान्त्वना दी थी —

श्लोक 8 (5.183.8)

त एव मां महाराज स्वप्ने दर्शनमेत्य वै । परिवार्याब्रुवन्वाक्यं तन्निबोध कुरूद्वह ॥

ta eva māṃ mahārāja svapne darśanametya vai | parivāryābruvanvākyaṃ tannibodha kurūdvaha

हे महाराज, वे स्वप्न में मेरे सामने प्रकट हुए और मुझे घेरकर बोले। हे कुरुश्रेष्ठ, उन्होंने जो कहा वह सुनो।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 9 (5.183.9)

उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय न भयं तेऽस्ति किंचन । रक्षामहे त्वां कौरव्य स्वशरीरं हि नो भवान् ॥

uttiṣṭha mā bhairgāṅgeya na bhayaṃ te'sti kiṃcana | rakṣāmahe tvāṃ kauravya svaśarīraṃ hi no bhavān

उठो, गंगानन्दन, डरो मत; तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं है। हे कौरव्य, हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारा ही शरीर हो।

श्लोक 10 (5.183.10)

न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथंचन । त्वमेव समरे रामं विजेता भरतर्षभ ॥

na tvāṃ rāmo raṇe jetā jāmadagnyaḥ kathaṃcana | tvameva samare rāmaṃ vijetā bharatarṣabha

जमदग्निपुत्र परशुराम तुम्हें युद्ध में किसी प्रकार नहीं जीत सकेंगे; हे भरतश्रेष्ठ, तुम ही युद्ध में परशुराम को जीतोगे।

श्लोक 11 (5.183.11)

इदमस्त्रं सुदयितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् । विदितं हि तवाप्येतत्पूर्वस्मिन्देहधारणे ॥

idamastraṃ sudayitaṃ pratyabhijñāsyate bhavān | viditaṃ hi tavāpyetatpūrvasmindehadhāraṇe

तुम इस अत्यन्त प्रिय अस्त्र को पहचान लोगे, क्योंकि पूर्वजन्म में शरीर धारण करते समय यह तुम्हें ज्ञात था।

श्लोक 12 (5.183.12)

प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत । न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान्क्वचित् ॥

prājāpatyaṃ viśvakṛtaṃ prasvāpaṃ nāma bhārata | na hīdaṃ veda rāmo'pi pṛthivyāṃ vā pumānkvacit

हे भारत, इसका नाम प्रस्वाप है; यह प्रजापति का अस्त्र है और विश्वकर्मा ने इसे बनाया है। इसे न परशुराम जानते हैं, न पृथ्वी पर कहीं कोई और पुरुष।

श्लोक 13 (5.183.13)

तत्स्मरस्व महाबाहो भृशं संयोजयस्व च । उपस्थास्यति राजेन्द्र स्वयमेव तवानघ ॥

tatsmarasva mahābāho bhṛśaṃ saṃyojayasva ca | upasthāsyati rājendra svayameva tavānagha

हे महाबाहो, उसका स्मरण करो और पूरी शक्ति से उसका प्रयोग करो। हे निष्पाप राजेन्द्र, वह स्वयं ही तुम्हारे पास उपस्थित हो जाएगा,

श्लोक 14 (5.183.14)

येन सर्वान्महावीर्यान्प्रशासिष्यसि कौरव । न च रामः क्षयं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ॥

yena sarvānmahāvīryānpraśāsiṣyasi kaurava | na ca rāmaḥ kṣayaṃ gantā tenāstreṇa narādhipa

और हे कौरव, उससे तुम सभी महापराक्रमियों का दमन कर सकोगे। फिर भी, हे नराधिप, उस अस्त्र से परशुराम का नाश नहीं होगा,

श्लोक 15 (5.183.15)

एनसा न तु संयोगं प्राप्स्यसे जातु मानद । स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्बाणबलपीडितः ॥

enasā na tu saṃyogaṃ prāpsyase jātu mānada | svapsyate jāmadagnyo'sau tvadbāṇabalapīḍitaḥ

और हे मानद, तुम्हें कभी कोई पाप भी नहीं लगेगा। तुम्हारे बाणों के बल से पीड़ित होकर जमदग्निनन्दन सो जाएँगे।

श्लोक 16 (5.183.16)

ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापयिष्यसि । अस्त्रेण दयितेनाजौ भीष्म संबोधनेन वै ॥

tato jitvā tvamevainaṃ punarutthāpayiṣyasi | astreṇa dayitenājau bhīṣma saṃbodhanena vai

हे भीष्म, फिर उन्हें जीतकर तुम स्वयं ही युद्धभूमि में संबोधन नामक प्रिय अस्त्र से उन्हें फिर उठा दोगे।

श्लोक 17 (5.183.17)

एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः । प्रसुप्तं वा मृतं वेति तुल्यं मन्यामहे वयम् ॥

evaṃ kuruṣva kauravya prabhāte rathamāsthitaḥ | prasuptaṃ vā mṛtaṃ veti tulyaṃ manyāmahe vayam

हे कौरव्य, प्रातःकाल रथ पर बैठकर ऐसा ही करना; क्योंकि हम सोए हुए और मरे हुए को एक समान मानते हैं।

श्लोक 18 (5.183.18)

न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव । ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ॥

na ca rāmeṇa martavyaṃ kadācidapi pārthiva | tataḥ samutpannamidaṃ prasvāpaṃ yujyatāmiti

हे राजन्, परशुराम की मृत्यु कभी नहीं होनी चाहिए। इसलिए तुम्हें प्राप्त हुए इस प्रस्वाप अस्त्र का प्रयोग करो।

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (5.183.19)

इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन्सर्व एव द्विजोत्तमाः । अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः ॥

ityuktvāntarhitā rājansarva eva dvijottamāḥ | aṣṭau sadṛśarūpāste sarve bhāsuramūrtayaḥ

हे राजन्, ऐसा कहकर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अन्तर्धान हो गए — वे आठों, जो एक-से रूप वाले और तेजोमय शरीर वाले थे।

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