उद्योग पर्व · अध्याय 182
आठ ब्राह्मणों द्वारा भीष्म की रक्षा
अगली सुबह परशुराम भीष्म के सारथि को मार डालते हैं और भीष्म को भी धराशायी कर देते हैं, जिस पर परशुराम का पक्ष विजय-घोष करता है। गिरते समय आठ तेजस्वी ब्राह्मण उन्हें आकाश में ही थाम लेते हैं और ढाढ़स बँधाते हैं; भीष्म देखते हैं कि उनकी माता गंगा उनके रथ पर खड़ी घोड़ों को सँभाले हुए हैं। स्वयं घोड़े हाँकते हुए भीष्म भयंकर अपशकुनों के बीच हृदय भेदने वाले बाण से परशुराम को गिरा देते हैं; परशुराम क्रोध में फिर उठते हैं, पर महर्षि उन्हें रोक लेते हैं, और रात होने पर युद्ध थमता है। ऐसा युद्ध तेईस दिनों तक चलता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.182.1)
ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमलतां गते । भार्गवस्य मया सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ॥
tataḥ prabhāte rājendra sūrye vimalatāṃ gate | bhārgavasya mayā sārdhaṃ punaryuddhamavartata
हे राजेन्द्र, तब प्रभात होने पर, जब सूर्य निर्मल होकर चमकने लगे, भृगुवंशी परशुराम का मेरे साथ फिर युद्ध आरम्भ हुआ।
श्लोक 2 (5.182.2)
ततोऽभ्रान्ते रथे तिष्ठन्रामः प्रहरतां वरः । ववर्ष शरजालानि मयि मेघ इवाचले ॥
tato'bhrānte rathe tiṣṭhanrāmaḥ praharatāṃ varaḥ | vavarṣa śarajālāni mayi megha ivācale
तब योद्धाओं में श्रेष्ठ परशुराम बादलों के निकट रथ पर खड़े होकर मुझ पर वैसे ही बाणों के जाल बरसाने लगे जैसे बादल पर्वत पर बरसता है।
श्लोक 3 (5.182.3)
ततः सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः । अपयातो रथोपस्थान्मनो मम विषादयन् ॥
tataḥ sūto mama suhṛccharavarṣeṇa tāḍitaḥ | apayāto rathopasthānmano mama viṣādayan
तब बाणवर्षा से आहत मेरा मित्र सारथि रथ की बैठक से खिसक पड़ा, जिससे मेरा मन विषाद से भर गया।
श्लोक 4 (5.182.4)
ततः सूतो ममात्यर्थं कश्मलं प्राविशन्महत् । पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ॥
tataḥ sūto mamātyarthaṃ kaśmalaṃ prāviśanmahat | pṛthivyāṃ ca śarāghātānnipapāta mumoha ca
मेरा सारथि गहरी मूर्च्छा में डूब गया, और बाणों की चोट से धरती पर गिरकर अचेत हो गया।
श्लोक 5 (5.182.5)
ततः सूतोऽजहात्प्राणान्रामबाणप्रपीडितः । मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत्तदा ॥
tataḥ sūto'jahātprāṇānrāmabāṇaprapīḍitaḥ | muhūrtādiva rājendra māṃ ca bhīrāviśattadā
हे राजेन्द्र, तब परशुराम के बाणों से पीड़ित सारथि ने क्षण भर में प्राण त्याग दिए, और मेरे मन में भय समा गया।
श्लोक 6 (5.182.6)
ततः सूते हते तस्मिन्क्षिपतस्तस्य मे शरान् । प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसंमितम् ॥
tataḥ sūte hate tasminkṣipatastasya me śarān | pramattamanaso rāmaḥ prāhiṇonmṛtyusaṃmitam
तब सारथि के मारे जाने पर, जब मैं विचलित मन से बाण चला रहा था, परशुराम ने मुझ पर मृत्यु के समान एक बाण छोड़ा।
श्लोक 7 (5.182.7)
ततः सूतव्यसनिनं विप्लुतं मां स भार्गवः । शरेणाभ्यहनद्गाढं विकृष्य बलवद्धनुः ॥
tataḥ sūtavyasaninaṃ viplutaṃ māṃ sa bhārgavaḥ | śareṇābhyahanadgāḍhaṃ vikṛṣya balavaddhanuḥ
सारथि के गिरने से व्यथित होकर जब मैं डगमगा रहा था, तब भृगुनन्दन ने अपना प्रबल धनुष खींचकर एक बाण से मुझ पर गहरी चोट की।
श्लोक 8 (5.182.8)
स मे भुजान्तरे राजन्निपत्य रुधिराशनः । मयैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ॥
sa me bhujāntare rājannipatya rudhirāśanaḥ | mayaiva saha rājendra jagāma vasudhātalam
हे राजन्, रक्त पीने वाला वह बाण मेरी दोनों भुजाओं के बीच छाती में जा लगा, और हे राजेन्द्र, मेरे साथ ही धरती पर जा गिरा।
श्लोक 9 (5.182.9)
मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ । मेघवद्विननादोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ॥
matvā tu nihataṃ rāmastato māṃ bharatarṣabha | meghavadvinanādoccairjahṛṣe ca punaḥ punaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तब मुझे मरा हुआ समझकर परशुराम बादल की तरह ऊँचे स्वर में गरजे और बार-बार हर्षित होने लगे।
श्लोक 10 (5.182.10)
तथा तु पतिते राजन्मयि रामो मुदा युतः । उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुयायिभिः ॥
tathā tu patite rājanmayi rāmo mudā yutaḥ | udakrośanmahānādaṃ saha tairanuyāyibhiḥ
हे राजन्, मेरे इस प्रकार गिर जाने पर परशुराम ने आनन्द में भरकर अपने अनुयायियों के साथ बड़ी गर्जना की।
श्लोक 11 (5.182.11)
मम तत्राभवन्ये तु कुरवः पार्श्वतः स्थिताः । आगता अपि युद्धं तञ्जनास्तत्र दिदृक्षवः । आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा पतिते मयि ॥
mama tatrābhavanye tu kuravaḥ pārśvataḥ sthitāḥ | āgatā api yuddhaṃ tañjanāstatra didṛkṣavaḥ | ārtiṃ paramikāṃ jagmuste tadā patite mayi
परन्तु मेरे पास खड़े कुरुवंशी और युद्ध देखने के लिए वहाँ आए लोग, मेरे गिरने पर अत्यन्त दुःखी हो गए।
श्लोक 12 (5.182.12)
ततोऽपश्यं पतितो राजसिंह । द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् । ते मां समन्तात्परिवार्य तस्थुः । स्वबाहुभिः परिधार्याजिमध्ये ॥
tato'paśyaṃ patito rājasiṃha | dvijānaṣṭau sūryahutāśanābhān | te māṃ samantātparivārya tasthuḥ | svabāhubhiḥ paridhāryājimadhye
हे राजसिंह, तब गिरे हुए मैंने सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी आठ ब्राह्मणों को देखा। वे रणभूमि के बीच मुझे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए और अपनी भुजाओं से मुझे थाम लिया।
श्लोक 13 (5.182.13)
रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् । अन्तरिक्षे धृतो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्बान्धवैरिव ॥
rakṣyamāṇaśca tairviprairnāhaṃ bhūmimupāspṛśam | antarikṣe dhṛto hyasmi tairviprairbāndhavairiva
उन ब्राह्मणों से सुरक्षित होकर मैंने धरती का स्पर्श नहीं किया; उन ब्राह्मणों ने मुझे अपने बन्धुओं की भाँति आकाश में ही थामे रखा।
श्लोक 14 (5.182.14)
श्वसन्निवान्तरिक्षे च जलबिन्दुभिरुक्षितः । ततस्ते ब्राह्मणा राजन्नब्रुवन्परिगृह्य माम् ॥
śvasannivāntarikṣe ca jalabindubhirukṣitaḥ | tataste brāhmaṇā rājannabruvanparigṛhya mām
मैं मानो आकाश में साँस ले रहा था और वे मुझ पर जल की बूँदें छिड़क रहे थे। हे राजन्, तब उन ब्राह्मणों ने मुझे पकड़े हुए कहा —
श्लोक 15 (5.182.15)
मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् । ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पितः सहसोत्थितः । मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम् ॥
mā bhairiti samaṃ sarve svasti te'stviti cāsakṛt | tatasteṣāmahaṃ vāgbhistarpitaḥ sahasotthitaḥ | mātaraṃ saritāṃ śreṣṭhāmapaśyaṃ rathamāsthitām
सबने एक साथ और बार-बार कहा — "डरो मत! तुम्हारा कल्याण हो!" उनके वचनों से तृप्त होकर मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ और देखा कि नदियों में श्रेष्ठ मेरी माता मेरे रथ पर खड़ी हैं।
श्लोक 16 (5.182.16)
हयाश्च मे संगृहीतास्तयाऽऽस- । न्महानद्या संयति कौरवेन्द्र । पादौ जनन्याः प्रतिगृह्य चाहं । तथा पितॄणां रथमभ्यरोहम् ॥
hayāśca me saṃgṛhītāstayā''sa- | nmahānadyā saṃyati kauravendra | pādau jananyāḥ pratigṛhya cāhaṃ | tathā pitṝṇāṃ rathamabhyaroham
हे कुरुराज, उस महानदी ने युद्ध में मेरे घोड़ों को थाम रखा था; मैंने माता के चरण पकड़कर और उसी प्रकार पितरों को प्रणाम करके रथ पर आरोहण किया।
श्लोक 17 (5.182.17)
ररक्ष सा मां सरथं हयांश्चोपस्काराणि च । तामहं प्राञ्जलिर्भूत्वा पुनरेव व्यसर्जयम् ॥
rarakṣa sā māṃ sarathaṃ hayāṃścopaskārāṇi ca | tāmahaṃ prāñjalirbhūtvā punareva vyasarjayam
उन्होंने मेरी, मेरे रथ, घोड़ों और सारे साज़-सामान की रक्षा की; फिर मैंने हाथ जोड़कर उन्हें विदा किया।
श्लोक 18 (5.182.18)
ततोऽहं स्वयमुद्यम्य हयांस्तान्वातरंहसः । अयुध्यं जामदग्न्येन निवृत्तेऽहनि भारत ॥
tato'haṃ svayamudyamya hayāṃstānvātaraṃhasaḥ | ayudhyaṃ jāmadagnyena nivṛtte'hani bhārata
हे भारत, तब मैंने वायु के समान वेगवान उन घोड़ों को स्वयं सँभाला और दिन ढलते समय जमदग्निनन्दन से युद्ध किया।
श्लोक 19 (5.182.19)
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महाबलम् । अमुञ्चं समरे बाणं रामाय हृदयच्छिदम् ॥
tato'haṃ bharataśreṣṭha vegavantaṃ mahābalam | amuñcaṃ samare bāṇaṃ rāmāya hṛdayacchidam
हे भरतश्रेष्ठ, तब मैंने युद्ध में परशुराम पर हृदय भेद देने वाला एक वेगवान और महाबली बाण छोड़ा।
श्लोक 20 (5.182.20)
ततो जगाम वसुधां मम बाणप्रपीडितः । जानुभ्यां धनुरुत्सृज्य रामो मोहवशं गतः ॥
tato jagāma vasudhāṃ mama bāṇaprapīḍitaḥ | jānubhyāṃ dhanurutsṛjya rāmo mohavaśaṃ gataḥ
मेरे बाण से पीड़ित होकर परशुराम धनुष छोड़कर घुटनों के बल धरती पर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 21 (5.182.21)
ततस्तस्मिन्निपतिते रामे भूरिसहस्रदे । आवव्रुर्जलदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं बहु ॥
tatastasminnipatite rāme bhūrisahasrade | āvavrurjaladā vyoma kṣaranto rudhiraṃ bahu
सहस्रों का दान करने वाले परशुराम के गिरते ही बादलों ने आकाश ढक लिया और वे बहुत-सा रक्त बरसाने लगे।
श्लोक 22 (5.182.22)
उल्काश्च शतशः पेतुः सनिर्घाताः सकम्पनाः । अर्कं च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत् ॥
ulkāśca śataśaḥ petuḥ sanirghātāḥ sakampanāḥ | arkaṃ ca sahasā dīptaṃ svarbhānurabhisaṃvṛṇot
सैकड़ों उल्काएँ वज्रपात और बिजली के साथ गिरने लगीं, और राहु ने सहसा दहकते सूर्य को ढक लिया।
श्लोक 23 (5.182.23)
ववुश्च वाताः परुषाश्चलिता च वसुंधरा । गृध्रा बलाश्च कङ्काश्च परिपेतुर्मुदा युताः ॥
vavuśca vātāḥ paruṣāścalitā ca vasuṃdharā | gṛdhrā balāśca kaṅkāśca paripeturmudā yutāḥ
कठोर हवाएँ चलने लगीं, धरती काँप उठी, और गिद्ध, बगुले तथा कंक पक्षी हर्ष से मँडराने लगे।
श्लोक 24 (5.182.24)
दीप्तायां दिशि गोमायुर्दारुणं मुहुरुन्नदत् । अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्भृशनिःस्वनाः ॥
dīptāyāṃ diśi gomāyurdāruṇaṃ muhurunnadat | anāhatā dundubhayo vinedurbhṛśaniḥsvanāḥ
जलती हुई दिशा में एक सियार बार-बार भयंकर स्वर में चिल्लाने लगा, और बिना बजाए नगाड़े ज़ोर से बज उठे।
श्लोक 25 (5.182.25)
एतदौत्पातिकं सर्वं घोरमासीद्भयंकरम् । विसंज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि ॥
etadautpātikaṃ sarvaṃ ghoramāsīdbhayaṃkaram | visaṃjñakalpe dharaṇīṃ gate rāme mahātmani
जब महात्मा परशुराम लगभग अचेत होकर धरती पर पड़े थे, तब ये सब भयंकर और डरावने उत्पात प्रकट हुए।
श्लोक 26 (5.182.26)
ततो वै सहसोत्थाय रामो मामभ्यवर्तत । पुनर्युद्धाय कौरव्य विह्वलः क्रोधमूर्छितः ॥
tato vai sahasotthāya rāmo māmabhyavartata | punaryuddhāya kauravya vihvalaḥ krodhamūrchitaḥ
हे कौरव्य, तब परशुराम सहसा उठकर, विचलित और क्रोध से उन्मत्त होकर, फिर युद्ध के लिए मेरी ओर बढ़े,
श्लोक 27 (5.182.27)
आददानो महाबाहुः कार्मुकं तालसन्निभम् । ततो मय्याददानं तं राममेव न्यवारयन् ॥
ādadāno mahābāhuḥ kārmukaṃ tālasannibham | tato mayyādadānaṃ taṃ rāmameva nyavārayan
ताड़ के वृक्ष जैसा विशाल धनुष उठाए हुए वे महाबाहु। पर जब वे मुझ पर बाण साधने लगे, तब परशुराम को ही रोक दिया
श्लोक 28 (5.182.28)
महर्षयः कृपायुक्ताः क्रोधाविष्टोऽपि भार्गवः । समाहरदमेयात्मा शरं कालानलोपमम् ॥
maharṣayaḥ kṛpāyuktāḥ krodhāviṣṭo'pi bhārgavaḥ | samāharadameyātmā śaraṃ kālānalopamam
करुणा से भरे महर्षियों ने; और अपार आत्मबल वाले भृगुनन्दन ने क्रोध में होते हुए भी कालाग्नि के समान अपना बाण वापस ले लिया।
श्लोक 29 (5.182.29)
ततो रविर्मन्दमरीचिमण्डलो । जगामास्तं पांसुपुञ्जावगूढः । निशा व्यगाहत्सुखशीतमारुता । ततो युद्धं प्रत्यवहारयावः ॥
tato ravirmandamarīcimaṇḍalo | jagāmāstaṃ pāṃsupuñjāvagūḍhaḥ | niśā vyagāhatsukhaśītamārutā | tato yuddhaṃ pratyavahārayāvaḥ
तब मन्द किरणों वाला सूर्यमण्डल धूल के बादलों में छिपकर अस्त हो गया; सुखद शीतल वायु वाली रात आ गई, और हम दोनों ने युद्ध रोक दिया।
श्लोक 30 (5.182.30)
एवं राजन्नवहारो बभूव । ततः पुनर्विमलेऽभूत्सुघोरम् । कल्यंकल्यं विंशतिं वै दिनानि । तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि ॥
evaṃ rājannavahāro babhūva | tataḥ punarvimale'bhūtsughoram | kalyaṃkalyaṃ viṃśatiṃ vai dināni | tathaiva cānyāni dināni trīṇi
हे राजन्, इस प्रकार युद्ध में विराम हुआ; और हर प्रातःकाल निर्मल दिन निकलने पर फिर भयंकर युद्ध होता — बीस दिनों तक, और फिर तीन दिन और।