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उद्योग पर्व · अध्याय 181

परशुराम की शक्तियाँ और भीष्म का टूटा रथ

भीष्म युद्ध के अगले दिनों का वर्णन करते हैं, जिनमें परशुराम प्रतिदिन दिव्य अस्त्र चलाते रहे और भीष्म हर एक का प्रतिकार करते रहे। परशुराम ने एक दहकती शक्ति फेंकी, फिर बारह और, फिर सोने के दण्ड वाली शक्तियाँ; भीष्म ने बाणों से उन्हें काटा, ढाल और तलवार से गिराया और परशुराम के घोड़ों व सारथि पर बाण बरसाए। उत्तर में परशुराम ने एक दिव्य अस्त्र प्रकट किया, जिसके बाणों ने भीष्म के रथ को ढक लिया और उसका धुरा तोड़ दिया। सूर्यास्त पर युद्ध रुका, तब तक दोनों गहरे घायल हो चुके थे।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.181.1)

समागतस्य रामेण पुनरेवातिदारुणम् । अन्येद्युस्तुमुलं युद्धं तदा भरतसत्तम ॥

samāgatasya rāmeṇa punarevātidāruṇam | anyedyustumulaṃ yuddhaṃ tadā bharatasattama

हे भरतसत्तम, अगले दिन परशुराम से फिर भिड़ने पर अत्यन्त भयंकर और घमासान युद्ध हुआ।

श्लोक 2 (5.181.2)

ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः । अयोजयत्स धर्मात्मा दिवसे दिवसे विभुः ॥

tato divyāstravicchūro divyānyastrāṇyanekaśaḥ | ayojayatsa dharmātmā divase divase vibhuḥ

तब दिव्यास्त्रों के ज्ञाता, शूरवीर, धर्मात्मा प्रभु परशुराम प्रतिदिन अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते रहे।

श्लोक 3 (5.181.3)

तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत । व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥

tānyahaṃ tatpratīghātairastrairastrāṇi bhārata | vyadhamaṃ tumule yuddhe prāṇāṃstyaktvā sudustyajān

हे भारत, उस घमासान युद्ध में मैंने अत्यन्त कठिनाई से छूटने वाले प्राणों की परवाह छोड़कर, उनका प्रतिकार करने वाले अस्त्रों से उन अस्त्रों को नष्ट कर दिया।

श्लोक 4 (5.181.4)

अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत । अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राणः स संयुगे ॥

astrairastreṣu bahudhā hateṣveva ca bhārata | akrudhyata mahātejāstyaktaprāṇaḥ sa saṃyuge

हे भारत, जब मेरे अस्त्रों से उनके अस्त्र बार-बार नष्ट हुए, तब वे महातेजस्वी प्राणों की चिन्ता छोड़कर युद्ध में क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 5 (5.181.5)

ततः शक्तिं प्राहिणोद्धोररूपा- । मस्त्रे रुद्धे जामदग्न्यो महात्मा । कालोत्सृष्टां प्रज्वलितामिवोल्कां । संदीप्ताग्रां तेजसा व्याप्य लोकम् ॥

tataḥ śaktiṃ prāhiṇoddhorarūpā- | mastre ruddhe jāmadagnyo mahātmā | kālotsṛṣṭāṃ prajvalitāmivolkāṃ | saṃdīptāgrāṃ tejasā vyāpya lokam

तब अपने अस्त्र रुक जाने पर महात्मा जमदग्निनन्दन ने एक भयंकर शक्ति चलाई, जो काल की छोड़ी हुई दहकती उल्का के समान थी, जिसका अग्रभाग जल रहा था और जिसके तेज से सारा लोक भर गया।

श्लोक 6 (5.181.6)

ततोऽहं तामिषुभिर्दीप्यमानां । समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम् । छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ । ततो ववौ पवनः पुण्यगन्धिः ॥

tato'haṃ tāmiṣubhirdīpyamānāṃ | samāyāntīmantakālārkadīptām | chittvā tridhā pātayāmāsa bhūmau | tato vavau pavanaḥ puṇyagandhiḥ

प्रलयकाल के सूर्य जैसी दहकती उस शक्ति को अपनी ओर आते देख मैंने बाणों से उसके तीन टुकड़े करके उसे धरती पर गिरा दिया; तब पवित्र सुगन्ध वाली वायु बहने लगी।

श्लोक 7 (5.181.7)

तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तोऽथ रामः । शक्तीर्घोराः प्राहिणोद्‌द्वादशान्याः । तासां रूपं भारत नोत शक्यं । तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम् ॥

tasyāṃ chinnāyāṃ krodhadīpto'tha rāmaḥ | śaktīrghorāḥ prāhiṇoddvādaśānyāḥ | tāsāṃ rūpaṃ bhārata nota śakyaṃ | tejasvitvāllāghavāccaiva vaktum

उसके कट जाने पर क्रोध से जलते परशुराम ने बारह और भयंकर शक्तियाँ चलाईं। हे भारत, वे इतनी तेजस्वी और इतनी वेगवान थीं कि उनके रूप का वर्णन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 8 (5.181.8)

किन्त्वेवाहं विह्वलः संप्रदृश्य । दिग्भ्यः सर्वास्ता महोत्का इवाग्नेः । नानारूपास्तेजसोग्रेण दीप्ता । यथाऽऽदित्या द्वादश लोकसंक्षये ॥

kintvevāhaṃ vihvalaḥ saṃpradṛśya | digbhyaḥ sarvāstā mahotkā ivāgneḥ | nānārūpāstejasogreṇa dīptā | yathā''dityā dvādaśa lokasaṃkṣaye

उन्हें चारों दिशाओं से अग्नि की बड़ी उल्काओं की भाँति, अनेक रूपों वाली, प्रचण्ड तेज से दहकती, प्रलय के समय के बारह सूर्यों जैसी अपनी ओर आते देखकर मैं विचलित हो गया।

श्लोक 9 (5.181.9)

ततो जालं बाणमयं विवृत्तं । संदृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन् । द्वादशेषून्प्राहिणवं रणेऽहं । ततः शक्तीरप्यधमं घोररूपाः ॥

tato jālaṃ bāṇamayaṃ vivṛttaṃ | saṃdṛśya bhittvā śarajālena rājan | dvādaśeṣūnprāhiṇavaṃ raṇe'haṃ | tataḥ śaktīrapyadhamaṃ ghorarūpāḥ

हे राजन्, तब फैले हुए बाणों के जाल को देखकर मैंने अपने बाणों के जाल से उसे छिन्न-भिन्न कर दिया और युद्ध में बारह बाण छोड़कर उन भयंकर शक्तियों को भी नष्ट कर दिया।

श्लोक 10 (5.181.10)

ततो राजञ्जामदग्न्यो महात्मा । शक्तीर्घोरा व्याक्षिपद्धेमदण्डाः । विचित्रिताः काञ्चनपट्टनद्धा । यथा महोल्का ज्वलितास्तथा ताः ॥

tato rājañjāmadagnyo mahātmā | śaktīrghorā vyākṣipaddhemadaṇḍāḥ | vicitritāḥ kāñcanapaṭṭanaddhā | yathā maholkā jvalitāstathā tāḥ

हे राजन्, तब महात्मा जमदग्निनन्दन ने सोने के दण्ड वाली भयंकर शक्तियाँ फेंकीं, जो विचित्र ढंग से सजी, सोने की पट्टियों से बँधी और बड़ी उल्काओं की तरह दहक रही थीं।

श्लोक 11 (5.181.11)

ताश्चाप्युग्राश्चर्मणा वारयित्वा । खड्गेनाजौ पातयित्वा नरेन्द्र । बाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य सङ्ख्ये । दिव्यानश्वानभ्यवर्षं ससूतान् ॥

tāścāpyugrāścarmaṇā vārayitvā | khaḍgenājau pātayitvā narendra | bāṇairdivyairjāmadagnyasya saṅkhye | divyānaśvānabhyavarṣaṃ sasūtān

हे नरेन्द्र, उन उग्र शक्तियों को ढाल से रोककर और तलवार से युद्धभूमि में गिराकर मैंने जमदग्निनन्दन के दिव्य घोड़ों और सारथि पर दिव्य बाणों की वर्षा की।

श्लोक 12 (5.181.12)

निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा । दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा । क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी ॥

nirmuktānāṃ pannagānāṃ sarūpā | dṛṣṭvā śaktīrhemacitrā nikṛttāḥ | prāduścakre divyamastraṃ mahātmā | krodhāviṣṭo haihayeśapramāthī

केंचुल छोड़े हुए सर्पों जैसी अपनी स्वर्ण-जटित शक्तियों को कटा देखकर हैहयराज का संहार करने वाले महात्मा परशुराम ने क्रोध में भरकर एक दिव्य अस्त्र प्रकट किया।

श्लोक 13 (5.181.13)

ततः श्रेण्यः शलभानामिवोग्राः । समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ताः । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं । हयान्सूतं सरथं चैव मह्यम् ॥

tataḥ śreṇyaḥ śalabhānāmivogrāḥ | samāpeturviśikhānāṃ pradīptāḥ | samācinoccāpi bhṛśaṃ śarīraṃ | hayānsūtaṃ sarathaṃ caiva mahyam

तब टिड्डियों के उग्र दलों की भाँति दहकते बाणों की पंक्तियाँ गिरने लगीं, और उन्होंने मेरे शरीर, घोड़ों, सारथि और रथ को घना ढक दिया।

श्लोक 14 (5.181.14)

रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभू- । त्तथा वाहाः सारथिश्चैव राजन् । युगं रथेषा च तथैव चक्रे । तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ॥

rathaḥ śarairme nicitaḥ sarvato'bhū- | ttathā vāhāḥ sārathiścaiva rājan | yugaṃ ratheṣā ca tathaiva cakre | tathaivākṣaḥ śarakṛtto'tha bhagnaḥ

हे राजन्, मेरा रथ चारों ओर से बाणों से भर गया, वैसे ही घोड़े और सारथि भी; जुआ, रथ का दण्ड और पहिये भी, और बाणों से कटकर धुरा टूट गया।

श्लोक 15 (5.181.15)

ततस्तस्मिन्बाणवर्षे व्यतीते । शरौघेण प्रत्यवर्षं गुरुं तम् । स विक्षतो मार्गणैर्ब्रह्मराशि- । र्देहादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम् ॥

tatastasminbāṇavarṣe vyatīte | śaraugheṇa pratyavarṣaṃ guruṃ tam | sa vikṣato mārgaṇairbrahmarāśi- | rdehādasaktaṃ mumuce bhūri raktam

तब उस बाणवर्षा के थम जाने पर मैंने अपने गुरु पर बाणों की बौछार लौटाई; ब्रह्मतेज की राशि वे बाणों से क्षत-विक्षत होकर निरन्तर अपने शरीर से बहुत-सा रक्त बहाने लगे।

श्लोक 16 (5.181.16)

यथा रामो बाणजालाभितप्त- । स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्धः । ततो युद्धं व्यरमच्चापराह्णे । भानावस्तं प्रतियाते महीध्रम् ॥

yathā rāmo bāṇajālābhitapta- | stathaivāhaṃ subhṛśaṃ gāḍhaviddhaḥ | tato yuddhaṃ vyaramaccāparāhṇe | bhānāvastaṃ pratiyāte mahīdhram

जैसे परशुराम बाणों के जाल से संतप्त थे, वैसे ही मैं भी अत्यन्त गहरा बिंधा हुआ था। तब अपराह्न में, जब सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहे थे, युद्ध रुक गया।

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