उद्योग पर्व · अध्याय 180
भीष्म और परशुराम का परस्पर आघात
भीष्म दुर्योधन को बताते हैं कि प्रभात होते ही जमदग्निपुत्र परशुराम के साथ युद्ध फिर कैसे आरम्भ हुआ। दोनों दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हैं — वायव्य के सामने गुह्यक और आग्नेय के सामने वारुण। परशुराम के बाण से भीष्म मूर्च्छित हो जाते हैं और सारथि उन्हें रणभूमि से हटा ले जाता है; फिर लौटकर भीष्म एक दीप्त बाण से परशुराम को धराशायी कर देते हैं, जिससे तपस्वी और काशिराज की कन्या व्याकुल हो उठते हैं। सचेत होकर परशुराम भीष्म को फिर घायल करते हैं और उनके घोड़े मार डालते हैं; दोनों के बाण आकाश ढक लेते हैं और जलकर भस्म हो जाते हैं। संध्या होने पर युद्ध रुकता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.180.1)
आत्मनस्तु ततः सूतो हयानां च विशांपते । मम चापनयामास शल्यान्कुशलसंमतः ॥
ātmanastu tataḥ sūto hayānāṃ ca viśāṃpate | mama cāpanayāmāsa śalyānkuśalasaṃmataḥ
हे प्रजानाथ, तब अपनी कुशलता के लिए सम्मानित सारथि ने मेरे और घोड़ों के शरीर से बाण निकाल दिए।
श्लोक 2 (5.180.2)
स्नातापवृत्तैस्तुरगैर्लब्धतोयैरविह्वलैः । प्रभाते चोदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत ॥
snātāpavṛttaisturagairlabdhatoyairavihvalaiḥ | prabhāte codite sūrye tato yuddhamavartata
जब घोड़ों को नहला दिया गया, वे धरती पर लोट चुके, पानी पी चुके और उनकी व्याकुलता मिट गई, तथा प्रभात में सूर्य उदित हुआ, तब युद्ध आरम्भ हुआ।
श्लोक 3 (5.180.3)
दृष्ट्वा मां तूर्णमायान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम् । अकरोद्रथमत्यर्थं रामः सज्जं प्रतापवान् ॥
dṛṣṭvā māṃ tūrṇamāyāntaṃ daṃśitaṃ syandane sthitam | akarodrathamatyarthaṃ rāmaḥ sajjaṃ pratāpavān
मुझे कवच पहने, रथ पर खड़े, तेज़ी से आते देखकर प्रतापी परशुराम ने अपना रथ पूरी तरह तैयार कर लिया।
श्लोक 4 (5.180.4)
ततोऽहं राममायान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम् । धनुःश्रेष्ठं समित्सृज्य सहसावतरं रथात् ॥
tato'haṃ rāmamāyāntaṃ dṛṣṭvā samarakāṅkṣiṇam | dhanuḥśreṣṭhaṃ samitsṛjya sahasāvataraṃ rathāt
तब युद्ध के इच्छुक परशुराम को आते देखकर मैंने अपना श्रेष्ठ धनुष रख दिया और तुरन्त रथ से उतर पड़ा।
श्लोक 5 (5.180.5)
अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत । युयुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः ॥
abhivādya tathaivāhaṃ rathamāruhya bhārata | yuyutsurjāmadagnyasya pramukhe vītabhīḥ sthitaḥ
हे भारत, पहले की ही भाँति उन्हें प्रणाम करके मैं फिर रथ पर चढ़ा और युद्ध की इच्छा से निर्भय होकर जमदग्निनन्दन के सामने खड़ा हो गया।
श्लोक 6 (5.180.6)
ततोऽहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् । स च मां शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरत् ॥
tato'haṃ śaravarṣeṇa mahatā samavākiram | sa ca māṃ śaravarṣeṇa varṣantaṃ samavākirat
तब मैंने उन पर बाणों की भारी वर्षा की, और जब मैं बाण बरसा रहा था, तब उन्होंने भी मुझ पर बाणों की वर्षा करके मुझे ढक दिया।
श्लोक 7 (5.180.7)
संक्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव सुतेजितान् । संप्रैषीन्मे शरान्घोरान्दीप्तास्यानुरगानिव ॥
saṃkruddho jāmadagnyastu punareva sutejitān | saṃpraiṣīnme śarānghorāndīptāsyānuragāniva
तब क्रोध से भरे जमदग्निपुत्र ने फिर मुझ पर तीखी धार वाले भयंकर बाण छोड़े, जो दहकते मुख वाले सर्पों जैसे थे।
श्लोक 8 (5.180.8)
ततोऽहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः । अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ॥
tato'haṃ niśitairbhallaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | acchidaṃ sahasā rājannantarikṣe punaḥ punaḥ
हे राजन्, मैंने तीखे भल्लों से उन्हें सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में, बार-बार और तुरन्त, आकाश में ही काट डाला।
श्लोक 9 (5.180.9)
ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् । मयि प्रयोजयामास तान्यहं प्रत्यषेधयम् ॥
tatastvastrāṇi divyāni jāmadagnyaḥ pratāpavān | mayi prayojayāmāsa tānyahaṃ pratyaṣedhayam
तब प्रतापी जमदग्निनन्दन ने मुझ पर दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, और मैंने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 10 (5.180.10)
अस्त्रैरेव महाबाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रियाम् । ततो दिवि महान्नादः प्रादुरासीत्समन्ततः ॥
astraireva mahābāho cikīrṣannadhikāṃ kriyām | tato divi mahānnādaḥ prādurāsītsamantataḥ
हे महाबाहो, मैं केवल अस्त्रों के बल पर ही उनसे बढ़कर पराक्रम दिखाना चाहता था; तब आकाश में चारों ओर भारी गर्जना उठी।
श्लोक 11 (5.180.11)
ततोऽहमस्त्रं वायव्यं जामदग्न्ये प्रयुक्तवान् । प्रत्याजघ्ने च तद्रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ॥
tato'hamastraṃ vāyavyaṃ jāmadagnye prayuktavān | pratyājaghne ca tadrāmo guhyakāstreṇa bhārata
तब मैंने जमदग्निनन्दन पर वायव्य अस्त्र चलाया, और हे भारत, परशुराम ने गुह्यकास्त्र से उसे लौटा दिया।
श्लोक 12 (5.180.12)
ततोऽहमस्त्रमाग्नेयमनुमन्त्र्य प्रयुक्तवान् । वारुणेनैव तद्रामो वारयामास मे विभुः ॥
tato'hamastramāgneyamanumantrya prayuktavān | vāruṇenaiva tadrāmo vārayāmāsa me vibhuḥ
फिर मैंने मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके आग्नेय अस्त्र छोड़ा, और प्रभु परशुराम ने वारुणास्त्र से उसे रोक दिया।
श्लोक 13 (5.180.13)
एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारयम् । रामश्च मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिन्दमः ॥
evamastrāṇi divyāni rāmasyāhamavārayam | rāmaśca mama tejasvī divyāstravidarindamaḥ
इस प्रकार मैं परशुराम के दिव्य अस्त्रों को रोकता रहा, और शत्रुओं का दमन करने वाले, दिव्यास्त्रों के ज्ञाता, तेजस्वी परशुराम मेरे अस्त्रों को।
श्लोक 14 (5.180.14)
ततो मां सव्यतो राजन्रामः कुर्वन्द्विजोत्तमः । उरस्यविध्यत्संक्रुद्धो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥
tato māṃ savyato rājanrāmaḥ kurvandvijottamaḥ | urasyavidhyatsaṃkruddho jāmadagnyaḥ pratāpavān
हे राजन्, तब द्विजश्रेष्ठ, प्रतापी जमदग्निपुत्र परशुराम ने मुझे अपनी बाईं ओर रखते हुए घूमकर क्रोध में मेरी छाती बींध दी।
श्लोक 15 (5.180.15)
ततोऽहं भारतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे । ततो मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमुदावहत् ॥
tato'haṃ bhārataśreṣṭha saṃnyaṣīdaṃ rathottame | tato māṃ kaśmalāviṣṭaṃ sūtastūrṇamudāvahat
हे भरतश्रेष्ठ, इससे मैं अपने उत्तम रथ पर बैठ गया; मुझे मूर्च्छा में डूबा देखकर सारथि तुरन्त रथ को दूर ले चला —
श्लोक 16 (5.180.16)
ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम् । ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम् ॥
glāyantaṃ bharataśreṣṭha rāmabāṇaprapīḍitam | tato māmapayātaṃ vai bhṛśaṃ viddhamacetasam
हे भरतश्रेष्ठ, मुझे, जो शिथिल पड़ रहा था और परशुराम के बाणों से पीड़ित था। तब मुझे हटाया गया, बुरी तरह घायल और अचेत देखकर,
श्लोक 17 (5.180.17)
रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा विचुक्रुशुः । अकृतव्रणप्रभृतयः काशिकन्या च भारत ॥
rāmasyānucarā hṛṣṭāḥ sarve dṛṣṭvā vicukruśuḥ | akṛtavraṇaprabhṛtayaḥ kāśikanyā ca bhārata
हे भारत, परशुराम के सभी अनुयायी — अकृतव्रण आदि — और काशिराज की कन्या भी हर्ष से चिल्ला उठे।
श्लोक 18 (5.180.18)
ततस्तु लब्धसंज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम् । याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ॥
tatastu labdhasaṃjño'haṃ jñātvā sūtamathābruvam | yāhi sūta yato rāmaḥ sajjo'haṃ gatavedanaḥ
फिर होश में आकर और स्थिति समझकर मैंने सारथि से कहा — "सारथि, जहाँ परशुराम हैं वहाँ चलो। मेरी पीड़ा चली गई है, मैं तैयार हूँ।"
श्लोक 19 (5.180.19)
ततो मामवहत्सूतो हयैः परमशोभितैः । नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ॥
tato māmavahatsūto hayaiḥ paramaśobhitaiḥ | nṛtyadbhiriva kauravya mārutapratimairgatau
हे कौरव्य, तब सारथि मुझे अत्यन्त सुन्दर घोड़ों से ले चला, जो वायु के समान वेग से चलते हुए मानो नाच रहे थे।
श्लोक 20 (5.180.20)
ततोऽहं राममासाद्य बाणवर्षैश्च कौरव । अवाकिरं सुसंरब्धः संरब्धं च जिगीषया ॥
tato'haṃ rāmamāsādya bāṇavarṣaiśca kaurava | avākiraṃ susaṃrabdhaḥ saṃrabdhaṃ ca jigīṣayā
हे कौरव, परशुराम के पास पहुँचकर मैंने क्रोधपूर्वक, उन्हें जीतने की इच्छा से, उन क्रुद्ध परशुराम पर बाणों की झड़ी लगा दी।
श्लोक 21 (5.180.21)
तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्मगान् । बाणैरेवाच्छिनत्तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ॥
tānāpatata evāsau rāmo bāṇānajihmagān | bāṇairevācchinattūrṇamekaikaṃ tribhirāhave
पर परशुराम ने युद्ध में अपनी ओर आते उन सीधे जाने वाले बाणों में से प्रत्येक को अपने तीन-तीन बाणों से तुरन्त काट डाला।
श्लोक 22 (5.180.22)
ततस्ते सूदिताः सर्वे मम बाणाः सुसंशिताः । रामबाणैर्द्विधा च्छिन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tataste sūditāḥ sarve mama bāṇāḥ susaṃśitāḥ | rāmabāṇairdvidhā cchinnāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
इस प्रकार मेरे सभी तीखे बाण परशुराम के बाणों से दो-दो टुकड़े होकर सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में नष्ट हो गए।
श्लोक 23 (5.180.23)
ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसंमितम् । असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया ॥
tataḥ punaḥ śaraṃ dīptaṃ suprabhaṃ kālasaṃmitam | asṛjaṃ jāmadagnyāya rāmāyāhaṃ jighāṃsayā
तब मैंने वध करने की इच्छा से जमदग्निनन्दन परशुराम पर फिर एक दहकता, चमकीला, काल के समान बाण छोड़ा।
श्लोक 24 (5.180.24)
तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः । मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह ॥
tena tvabhihato gāḍhaṃ bāṇavegavaśaṃ gataḥ | mumoha samare rāmo bhūmau ca nipapāta ha
उससे गहरी चोट खाकर और बाण के वेग से विवश होकर परशुराम युद्ध में मूर्च्छित हो गए और धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 25 (5.180.25)
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलमाश्रिते । जगद्भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत् ॥
tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ rāme bhūtalamāśrite | jagadbhārata saṃvignaṃ yathārkapatane bhavet
हे भारत, परशुराम के भूमि पर गिरते ही सारा जगत हाहाकार कर उठा और ऐसा व्याकुल हो गया जैसे सूर्य के गिर पड़ने पर होता।
श्लोक 26 (5.180.26)
तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः । तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥
tata enaṃ samudvignāḥ sarva evābhidudruvuḥ | tapodhanāste sahasā kāśyā ca kurunandana
हे कुरुनन्दन, तब वे सभी तपस्वी अत्यन्त घबराकर तुरन्त उनकी ओर दौड़े, और काशिराज की कन्या भी।
श्लोक 27 (5.180.27)
तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा । पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥
tata enaṃ pariṣvajya śanairāśvāsayaṃstadā | pāṇibhirjalaśītaiśca jayāśīrbhiśca kaurava
हे कौरव, उन्होंने उन्हें गले लगाकर, जल से ठंडे किए हाथों से और विजय के आशीर्वादों से धीरे-धीरे उन्हें ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 28 (5.180.28)
ततः स विह्वलं वाक्यं राम उत्थाय चाब्रवीत् । तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति बाणं संधाय कार्मुके ॥
tataḥ sa vihvalaṃ vākyaṃ rāma utthāya cābravīt | tiṣṭha bhīṣma hato'sīti bāṇaṃ saṃdhāya kārmuke
तब परशुराम उठे और विचलित स्वर में, धनुष पर बाण चढ़ाते हुए बोले — "ठहर, भीष्म! तू मारा गया!"
श्लोक 29 (5.180.29)
स मुक्तो न्यपतत्तूर्णं सव्ये पार्श्वे महाहवे । येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ॥
sa mukto nyapatattūrṇaṃ savye pārśve mahāhave | yenāhaṃ bhṛśamudvigno vyāghūrṇita iva drumaḥ
छूटते ही वह बाण उस महायुद्ध में तेज़ी से मेरी बाईं पसली में आ लगा, जिससे मैं अत्यन्त विचलित होकर वृक्ष की तरह डगमगा गया।
श्लोक 30 (5.180.30)
हत्वा हयांस्ततो रामः शीघ्रास्त्रेण महाहवे । अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ॥
hatvā hayāṃstato rāmaḥ śīghrāstreṇa mahāhave | avākiranmāṃ visrabdho bāṇaistairlomavāhibhiḥ
तब उस महायुद्ध में परशुराम ने शीघ्रास्त्र से मेरे घोड़ों को मार डाला और निश्चिन्त होकर पंखदार बाणों से मुझे ढक दिया।
श्लोक 31 (5.180.31)
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम् । अवासृजं महाबाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शराः ॥
tato'hamapi śīghrāstraṃ samaraprativāraṇam | avāsṛjaṃ mahābāho te'ntarādhiṣṭhitāḥ śarāḥ
हे महाबाहो, तब मैंने भी युद्ध में सब कुछ रोक देने वाला शीघ्रास्त्र छोड़ा; और परशुराम के तथा मेरे बाण बीच आकाश में अटककर
श्लोक 32 (5.180.32)
रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः । न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ॥
rāmasya mama caivāśu vyomāvṛtya samantataḥ | na sma sūryaḥ pratapati śarajālasamāvṛtaḥ
तुरन्त सारे आकाश में चारों ओर छा गए। बाणों के जाल से ढका सूर्य तपना बन्द हो गया।
श्लोक 33 (5.180.33)
मातरिश्वा ततस्तस्मिन्मेघरुद्ध इवाभवत् । ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ॥
mātariśvā tatastasminmegharuddha ivābhavat | tato vāyoḥ prakampācca sūryasya ca gabhastibhiḥ
उस बीच वायु मानो बादलों से रुक-सी गई। तब वायु के कम्पन से, सूर्य की किरणों से
श्लोक 34 (5.180.34)
अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत । ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ॥
abhighātaprabhāvācca pāvakaḥ samajāyata | te śarāḥ svasamutthena pradīptāścitrabhānunā
और टकराने के वेग से अग्नि उत्पन्न हुई; और वे बाण अपनी ही उत्पन्न की हुई अग्नि से जल उठे,
श्लोक 35 (5.180.35)
भूमौ सर्वे तदा राजन्भस्मभूताः प्रपेदिरे । तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥
bhūmau sarve tadā rājanbhasmabhūtāḥ prapedire | tadā śatasahasrāṇi prayutānyarbudāni ca
हे राजन्, और सबके सब भस्म होकर धरती पर आ गिरे। तब सैकड़ों हज़ार, प्रयुत और अर्बुद,
श्लोक 36 (5.180.36)
अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव । रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ॥
ayutānyatha kharvāṇi nikharvāṇi ca kaurava | rāmaḥ śarāṇāṃ saṃkruddho mayi tūrṇaṃ nyapātayat
अयुत, खर्व और निखर्व बाण, हे कौरव, क्रुद्ध परशुराम ने तुरन्त मुझ पर बरसाए।
श्लोक 37 (5.180.37)
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः । संछिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ॥
tato'haṃ tānapi raṇe śarairāśīviṣopamaiḥ | saṃchidya bhūmau nṛpate pātayeyaṃ nagāniva
हे नरेश, मैंने उन्हें भी युद्ध में विषधर सर्पों जैसे बाणों से काटकर कटे हुए वृक्षों की तरह धरती पर गिरा दिया।
श्लोक 38 (5.180.38)
एवं तदभवद्युद्धं तदा भरतसत्तम । सन्ध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात्स च मे गुरुः ॥
evaṃ tadabhavadyuddhaṃ tadā bharatasattama | sandhyākāle vyatīte tu vyapāyātsa ca me guruḥ
हे भरतसत्तम, उस दिन ऐसा युद्ध हुआ; और संध्या का समय बीत जाने पर मेरे गुरु युद्ध से हट गए।