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उद्योग पर्व · अध्याय 179

भीष्म और परशुराम के युद्ध का आरम्भ

कुरुक्षेत्र में भीष्म ने भूमि पर खड़े परशुराम से रथ पर बैठकर लड़ने से इनकार किया; राम ने उत्तर दिया कि पृथ्वी उनका रथ है, वेद घोड़े और वायु सारथी हैं, और वे अकृतव्रण द्वारा चलाए जाते दिव्य रथ पर दिखाई दिए। भीष्म ने रथ से उतरकर गुरु का सत्कार किया और विजय का आशीर्वाद माँगा; राम ने उनके आचरण की प्रशंसा की, पर विजय का आशीर्वाद नहीं दिया। पहले दिन के युद्ध में भीष्म ने राम का धनुष काटकर उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया, फिर गुरु को पीड़ा पहुँचाने के पश्चात्ताप से भरकर सूर्यास्त होते-होते प्रहार करना बन्द कर दिया।

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.179.1)

तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् । भूमिष्ठं नोत्सहे योद्धुं भवन्तं रथमास्थितः ॥

tamahaṃ smayanniva raṇe pratyabhāṣaṃ vyavasthitam | bhūmiṣṭhaṃ notsahe yoddhuṃ bhavantaṃ rathamāsthitaḥ

रणभूमि में डटे हुए उनसे मैंने मानो मुस्कराते हुए कहा — मैं रथ पर बैठा हूँ, इसलिए भूमि पर खड़े आपसे युद्ध करने का मेरा मन नहीं होता।

श्लोक 2 (5.179.2)

आरोह स्यन्दनं वीर कवचं च महाभुज । बधान समरे राम यदि योद्धुं मयेच्छसि ॥

āroha syandanaṃ vīra kavacaṃ ca mahābhuja | badhāna samare rāma yadi yoddhuṃ mayecchasi

हे वीर, हे महाबाहु राम, यदि आप मुझसे युद्ध करना चाहते हैं तो रथ पर चढ़िए और समर के लिए कवच बाँधिए।

श्लोक 3 (5.179.3)

ततो मामब्रवीद्रामः स्मयमानो रणाजिरे । रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदाः सदश्ववत् ॥

tato māmabravīdrāmaḥ smayamāno raṇājire | ratho me medinī bhīṣma vāhā vedāḥ sadaśvavat

तब रणभूमि में मुस्कराते हुए परशुराम ने मुझसे कहा — भीष्म, पृथ्वी मेरा रथ है और वेद उत्तम घोड़ों की भाँति मेरे वाहन हैं;

राम उवाच

श्लोक 4 (5.179.4)

सूतश्च मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः । सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ॥

sūtaśca mātariśvā vai kavacaṃ vedamātaraḥ | susaṃvīto raṇe tābhiryotsye'haṃ kurunandana

वायु मेरा सारथी है और वेदमाताएँ मेरा कवच हैं। हे कुरुनन्दन, उनसे भली-भाँति ढका हुआ मैं युद्ध करूँगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (5.179.5)

एवं ब्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रमः । शरव्रातेन महता सर्वतः प्रत्यवारयत् ॥

evaṃ bruvāṇo gāndhāre rāmo māṃ satyavikramaḥ | śaravrātena mahatā sarvataḥ pratyavārayat

हे गान्धारीनन्दन, यह कहते हुए सत्यपराक्रमी परशुराम ने बाणों की भारी वर्षा से मुझे चारों ओर से रोक दिया।

श्लोक 6 (5.179.6)

ततोऽपश्यं जामदग्न्यं रथमध्ये व्यवस्थितम् । सर्वायुधवरे श्रीमत्यद्भुतोपमदर्शने ॥

tato'paśyaṃ jāmadagnyaṃ rathamadhye vyavasthitam | sarvāyudhavare śrīmatyadbhutopamadarśane

तब मैंने जमदग्निनन्दन को एक रथ के मध्य खड़ा देखा; वह रथ सब आयुधों में श्रेष्ठ, शोभायुक्त और अद्भुत दिखाई देनेवाला था,

श्लोक 7 (5.179.7)

मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे । दिव्याश्वयुजि सन्नद्धे काञ्चनेन विभूषिते ॥

manasā vihite puṇye vistīrṇe nagaropame | divyāśvayuji sannaddhe kāñcanena vibhūṣite

मन से रचा हुआ, पवित्र, नगर के समान विशाल, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ, पूर्णतः सज्जित और सोने से अलंकृत।

श्लोक 8 (5.179.8)

कवचेन महाबाहो सोमार्ककृतलक्ष्मणा । धनुर्धरो बद्धतूणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ॥

kavacena mahābāho somārkakṛtalakṣmaṇā | dhanurdharo baddhatūṇo baddhagodhāṅgulitravān

हे महाबाहो, वे चन्द्र और सूर्य के चिह्नों से अंकित कवच पहने थे; हाथ में धनुष लिए, तूणीर बाँधे और गोह के चमड़े के अंगुलित्राण पहने हुए थे।

श्लोक 9 (5.179.9)

सारथ्यं कृतवांस्तत्र युयुत्सोरकृतव्रणः । सखा वेदविदत्यन्तं दयितो भार्गवस्य ह ॥

sārathyaṃ kṛtavāṃstatra yuyutsorakṛtavraṇaḥ | sakhā vedavidatyantaṃ dayito bhārgavasya ha

वहाँ युद्ध के इच्छुक परशुराम का सारथ्य अकृतव्रण कर रहे थे, जो वेदों के ज्ञाता और भार्गव के अत्यन्त प्रिय सखा थे।

श्लोक 10 (5.179.10)

आह्वयानः स मां युद्धे मनो हर्षयतीव मे । पुनः पुनरभिक्रोशन्नभियाहीति भार्गवः ॥

āhvayānaḥ sa māṃ yuddhe mano harṣayatīva me | punaḥ punarabhikrośannabhiyāhīti bhārgavaḥ

युद्ध के लिए ललकारते और बार-बार "आगे बढ़ो!" पुकारते हुए भार्गव मानो मेरे मन को हर्षित कर रहे थे।

श्लोक 11 (5.179.11)

तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महाबलम् । क्षत्रियान्तकरं राममेकमेकः समासदम् ॥

tamādityamivodyantamanādhṛṣyaṃ mahābalam | kṣatriyāntakaraṃ rāmamekamekaḥ samāsadam

उदय होते सूर्य के समान, अजेय, महाबली, क्षत्रियों के संहारक, अकेले खड़े परशुराम के पास मैं अकेला पहुँचा।

श्लोक 12 (5.179.12)

ततोऽहं बाणपातेषु त्रिषु वाहान्निगृह्य वै । अवतीर्य धनुर्न्यस्य पदातिर्ऋषिसत्तमम् ॥

tato'haṃ bāṇapāteṣu triṣu vāhānnigṛhya vai | avatīrya dhanurnyasya padātirṛṣisattamam

तब तीन बाण जाने भर की दूरी पर मैंने घोड़ों को रोका, रथ से उतरा और धनुष रखकर पैदल ही उन ऋषिश्रेष्ठ की ओर,

श्लोक 13 (5.179.13)

अभ्यागच्छं तदा राममर्चिष्यन्द्विजसत्तमम् । अभिवाद्य चैनं विधिवदब्रुवं वाक्यमुत्तमम् ॥

abhyāgacchaṃ tadā rāmamarciṣyandvijasattamam | abhivādya cainaṃ vidhivadabruvaṃ vākyamuttamam

द्विजश्रेष्ठ परशुराम का सत्कार करने के लिए गया। विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करके मैंने यह उत्तम वचन कहा —

श्लोक 14 (5.179.14)

योत्स्ये त्वया रणे राम सदृशेनाधिकेन वा । गुरुणा धर्मशीलेन जयमाशास्व मे विभो ॥

yotsye tvayā raṇe rāma sadṛśenādhikena vā | guruṇā dharmaśīlena jayamāśāsva me vibho

हे राम, आप मेरे समान या मुझसे बढ़कर हैं और मेरे धर्मशील गुरु हैं; मैं रण में आपसे युद्ध करूँगा। हे प्रभो, मुझे विजय का आशीर्वाद दीजिए।

राम उवाच

श्लोक 15 (5.179.15)

एवमेतत्कुरुश्रेष्ठ कर्तव्यं भूतिमिच्छता । धर्मो ह्येष महाबाहो विशिष्टैः सह युध्यताम् ॥

evametatkuruśreṣṭha kartavyaṃ bhūtimicchatā | dharmo hyeṣa mahābāho viśiṣṭaiḥ saha yudhyatām

हे कुरुश्रेष्ठ, कल्याण चाहनेवाले को ऐसा ही करना चाहिए। हे महाबाहो, अपने से श्रेष्ठ के साथ लड़नेवालों का यही धर्म है।

श्लोक 16 (5.179.16)

शपेयं त्वां नचेदेवमागच्छेथा विशांपते । युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्ब्य कौरव ॥

śapeyaṃ tvāṃ nacedevamāgacchethā viśāṃpate | yudhyasva tvaṃ raṇe yatto dhairyamālambya kaurava

हे प्रजानाथ, यदि तुम इस प्रकार मेरे पास न आते तो मैं तुम्हें शाप दे देता। हे कौरव, धैर्य धारण करके सावधानी से रण में युद्ध करो।

श्लोक 17 (5.179.17)

न तु ते जयमाशासे त्वां विजेतुमहं स्थितः । गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ॥

na tu te jayamāśāse tvāṃ vijetumahaṃ sthitaḥ | gaccha yudhyasva dharmeṇa prīto'smi caritena te

परन्तु मैं तुम्हें विजय का आशीर्वाद नहीं देता, क्योंकि मैं स्वयं तुम्हें जीतने के लिए खड़ा हूँ। जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो; मैं तुम्हारे आचरण से प्रसन्न हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (5.179.18)

ततोऽहं तं नमस्कृत्य रथमारुह्य सत्वरः । प्राध्मापयं रणे शङ्खं पुनर्हेमपरिष्कृतम् ॥

tato'haṃ taṃ namaskṛtya rathamāruhya satvaraḥ | prādhmāpayaṃ raṇe śaṅkhaṃ punarhemapariṣkṛtam

तब मैंने उन्हें प्रणाम किया, तुरन्त रथ पर चढ़ा और रणभूमि में अपना स्वर्णजटित शंख फिर से बजाया।

श्लोक 19 (5.179.19)

ततो युद्धं समभवन्मम तस्य च भारत । दिवसान्सुबहून्राजन्परस्परजिगीषया ॥

tato yuddhaṃ samabhavanmama tasya ca bhārata | divasānsubahūnrājanparasparajigīṣayā

हे भारत, तब मेरे और उनके बीच युद्ध छिड़ गया; हे राजन्, एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से वह बहुत दिनों तक चलता रहा।

श्लोक 20 (5.179.20)

स मे तस्मिन्रणे पूर्वं प्राहरत्कङ्कपत्रिभिः । षष्ट्या शतैश्च नवभिः शराणां नतपर्वणाम् ॥

sa me tasminraṇe pūrvaṃ prāharatkaṅkapatribhiḥ | ṣaṣṭyā śataiśca navabhiḥ śarāṇāṃ nataparvaṇām

उस युद्ध में पहले उन्होंने मुझ पर कंक-पंखवाले, चिकनी गाँठोंवाले नौ सौ साठ बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 21 (5.179.21)

चत्वारस्तेन मे वाहाः सूतश्चैव विशांपते । प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशितः स्थितः ॥

catvārastena me vāhāḥ sūtaścaiva viśāṃpate | pratiruddhāstathaivāhaṃ samare daṃśitaḥ sthitaḥ

हे प्रजानाथ, उन्होंने मेरे चारों घोड़ों और सारथी को रोक दिया, और मैं भी कवच पहने समर में वैसे ही डटा रहा।

श्लोक 22 (5.179.22)

नमस्कृत्य च देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः । तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ॥

namaskṛtya ca devebhyo brāhmaṇebhyo viśeṣataḥ | tamahaṃ smayanniva raṇe pratyabhāṣaṃ vyavasthitam

देवताओं को और विशेषकर ब्राह्मणों को प्रणाम करके मैंने रणभूमि में डटे हुए उनसे मानो मुस्कराते हुए कहा —

श्लोक 23 (5.179.23)

आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वयि । भूयश्च शृणु मे ब्रह्मन्संपदं धर्मसंग्रहे ॥

ācāryatā mānitā me nirmaryāde hyapi tvayi | bhūyaśca śṛṇu me brahmansaṃpadaṃ dharmasaṃgrahe

आप मर्यादा लाँघ चुके हैं, फिर भी मैंने आपके आचार्य-पद का सम्मान किया है। हे ब्रह्मन्, अब धर्म के सार के विषय में मुझसे और सुनिए।

श्लोक 24 (5.179.24)

ये ते वेदाः शरीरस्था ब्राह्मण्यं यच्च ते महत् । तपश्च ते महत्तप्तं न तेभ्यः प्रहराम्यहम् ॥

ye te vedāḥ śarīrasthā brāhmaṇyaṃ yacca te mahat | tapaśca te mahattaptaṃ na tebhyaḥ praharāmyaham

आपके शरीर में जो वेद स्थित हैं, जो आपका महान् ब्राह्मणत्व है और जो महान् तप आपने किया है — उन पर मैं प्रहार नहीं करता।

श्लोक 25 (5.179.25)

प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं त्वं राम समाश्रितः । ब्राह्मणः क्षत्रियत्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात् ॥

prahare kṣatradharmasya yaṃ tvaṃ rāma samāśritaḥ | brāhmaṇaḥ kṣatriyatvaṃ hi yāti śastrasamudyamāt

हे राम, आपने जिस क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लिया है, उसी पर मैं प्रहार करता हूँ; क्योंकि शस्त्र उठाने से ब्राह्मण क्षत्रियत्व को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 26 (5.179.26)

पश्य मे धनुषो वीर्यं पश्य बाह्वोर्बलं मम । एष ते कार्मुकं वीर छिनद्मि निशितेषुणा ॥

paśya me dhanuṣo vīryaṃ paśya bāhvorbalaṃ mama | eṣa te kārmukaṃ vīra chinadmi niśiteṣuṇā

मेरे धनुष का पराक्रम देखिए, मेरी भुजाओं का बल देखिए! हे वीर, यह लीजिए, मैं तीखे बाण से आपका धनुष काटता हूँ।

श्लोक 27 (5.179.27)

तस्याहं निशितं भल्लं चिक्षेप भरतर्षभ । तेनास्य धनुषः कोटिं छित्वा भूमावपातयम् ॥

tasyāhaṃ niśitaṃ bhallaṃ cikṣepa bharatarṣabha | tenāsya dhanuṣaḥ koṭiṃ chitvā bhūmāvapātayam

हे भरतश्रेष्ठ, मैंने उन पर एक तीखा भल्ल चलाया और उससे उनके धनुष का सिरा काटकर भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 28 (5.179.28)

तथैव च पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् । चिक्षेप कङ्कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति ॥

tathaiva ca pṛṣatkānāṃ śatāni nataparvaṇām | cikṣepa kaṅkapatrāṇāṃ jāmadagnyarathaṃ prati

इसी प्रकार मैंने जमदग्निनन्दन के रथ पर कंक-पंखवाले, चिकनी गाँठोंवाले सैकड़ों बाण चलाए।

श्लोक 29 (5.179.29)

काये विषक्तास्तु तदा वायुना समुदीरिताः । चेलुः क्षरन्तो रुधिरं नागा इव च ते शराः ॥

kāye viṣaktāstu tadā vāyunā samudīritāḥ | celuḥ kṣaranto rudhiraṃ nāgā iva ca te śarāḥ

उनके शरीर में धँसे हुए वे बाण वायु से हिलते हुए रक्त टपकाते सर्पों के समान काँपने लगे।

श्लोक 30 (5.179.30)

क्षतजोक्षितसर्वाङ्गः क्षरन्स रुधिरं रणे । बभौ रामस्तदा राजन्मेरुर्धातूनिवोत्सृजन् ॥

kṣatajokṣitasarvāṅgaḥ kṣaransa rudhiraṃ raṇe | babhau rāmastadā rājanmerurdhātūnivotsṛjan

हे राजन्, रक्त से भीगे सब अंगोंवाले, रणभूमि में रक्त बहाते परशुराम उस समय धातुओं के स्रोत बहाते मेरु पर्वत के समान शोभित हुए।

श्लोक 31 (5.179.31)

हेमन्तान्तेऽशोक इव रक्तस्तबकमण्डितः । बभौ रामस्तथा राजन्प्रफुल्ल इव किंशुकः ॥

hemantānte'śoka iva raktastabakamaṇḍitaḥ | babhau rāmastathā rājanpraphulla iva kiṃśukaḥ

हे राजन्, हेमन्त के अन्त में लाल गुच्छों से सजे अशोक वृक्ष की भाँति, परशुराम खिले हुए पलाश के समान शोभित हुए।

श्लोक 32 (5.179.32)

ततोऽन्यद्धनुरादाय रामः क्रोधसमन्वितः । हेमपुङ्खान्सुनिशिताञ्शरांस्तान्हि ववर्ष सः ॥

tato'nyaddhanurādāya rāmaḥ krodhasamanvitaḥ | hemapuṅkhānsuniśitāñśarāṃstānhi vavarṣa saḥ

तब क्रोध से भरे परशुराम ने दूसरा धनुष उठाया और सोने के पंखोंवाले अत्यन्त तीखे बाण बरसाए।

श्लोक 33 (5.179.33)

ते समासाद्य मां रौद्रा बहुधा मर्मभेदिनः । अकम्पयन्महावेगाः सर्पानलविषोपमाः ॥

te samāsādya māṃ raudrā bahudhā marmabhedinaḥ | akampayanmahāvegāḥ sarpānalaviṣopamāḥ

सर्प, अग्नि और विष के समान भयंकर, मर्मभेदी और महावेगवाले वे बाण मुझ तक पहुँचकर अनेक प्रकार से मुझे कँपाने लगे।

श्लोक 34 (5.179.34)

तमहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे । शतसंख्यैः शरैः क्रुद्धस्तदा राममवाकिरम् ॥

tamahaṃ samavaṣṭabhya punarātmānamāhave | śatasaṃkhyaiḥ śaraiḥ kruddhastadā rāmamavākiram

युद्ध में फिर अपने को सँभालकर मैंने क्रोधपूर्वक सैकड़ों बाणों से परशुराम को ढक दिया।

श्लोक 35 (5.179.35)

स तैरग्न्यर्कसङ्काशैः शरैराशीविषोपमैः । शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत् ॥

sa tairagnyarkasaṅkāśaiḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | śitairabhyardito rāmo mandacetā ivābhavat

अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी, विषधर सर्पों जैसे उन तीखे बाणों से पीड़ित होकर परशुराम मानो अचेत-से हो गए।

श्लोक 36 (5.179.36)

ततोऽहं कृपयाऽऽविष्टो विनिन्द्यात्मानमात्मना । धिग्धिगित्यब्रुवं युद्धं क्षत्रधर्मं च भारत ॥

tato'haṃ kṛpayā''viṣṭo vinindyātmānamātmanā | dhigdhigityabruvaṃ yuddhaṃ kṣatradharmaṃ ca bhārata

हे भारत, तब मैं करुणा से भर गया और स्वयं अपनी निन्दा करते हुए बोला — "युद्ध को और क्षत्रिय-धर्म को धिक्कार है, धिक्कार है!"

श्लोक 37 (5.179.37)

असकृच्चाब्रुवं राजञ्शोकवेगपरिप्लुतः । अहो बत कृतं पापं मयेदं क्षत्रकर्मणा ॥

asakṛccābruvaṃ rājañśokavegapariplutaḥ | aho bata kṛtaṃ pāpaṃ mayedaṃ kṣatrakarmaṇā

हे राजन्, शोक के वेग में डूबा हुआ मैं बार-बार कहने लगा — "हाय, इस क्षत्रिय-कर्म के द्वारा मैंने यह कैसा पाप कर डाला,

श्लोक 38 (5.179.38)

गुरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः । ततो न प्राहरं भूयो जामदग्न्याय भारत ॥

gururdvijātirdharmātmā yadevaṃ pīḍitaḥ śaraiḥ | tato na prāharaṃ bhūyo jāmadagnyāya bhārata

कि मेरे धर्मात्मा ब्राह्मण गुरु बाणों से इस प्रकार पीड़ित हुए!" हे भारत, उसके बाद मैंने जमदग्निनन्दन पर फिर प्रहार नहीं किया।

श्लोक 39 (5.179.39)

अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससंक्षये । जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत् ॥

athāvatāpya pṛthivīṃ pūṣā divasasaṃkṣaye | jagāmāstaṃ sahasrāṃśustato yuddhamupāramat

तब दिन ढलने पर पृथ्वी को तपाकर सहस्र किरणोंवाले सूर्य अस्त हो गए और युद्ध रुक गया।

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