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उद्योग पर्व · अध्याय 178

परशुराम द्वारा भीष्म को युद्ध की चुनौती

भीष्म बताते हैं कि ब्राह्मणों की आज्ञा के बिना शस्त्र न उठानेवाले परशुराम ने पहले अम्बा से केवल भीष्म को अपनी बात मनवाने का वचन दिया; अकृतव्रण ने उन्हें उनकी पुरानी प्रतिज्ञाएँ याद दिलाईं, तब राम ने निश्चय किया कि समझाने से काम न बना तो वे भीष्म को मार डालेंगे। कुरुक्षेत्र में राम ने भीष्म को अम्बा को स्वीकार करने की आज्ञा दी; भीष्म ने अपने क्षत्रिय-व्रत और कुमार्गगामी गुरु के त्याग विषयक मरुत्त के श्लोक का हवाला देकर मना कर दिया, और दोनों युद्ध के लिए सहमत हुए। भीष्म श्वेत रथ पर निकले; माता गंगा ने दोनों से विनती की, पर व्यर्थ, और परशुराम ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।

अध्याय 177अध्याय-सूचीअध्याय 179

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.178.1)

एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो । उवाच रुदतीं कन्यां चोदयन्तीं पुनः पुनः ॥

evamuktastadā rāmo jahi bhīṣmamiti prabho | uvāca rudatīṃ kanyāṃ codayantīṃ punaḥ punaḥ

हे प्रभो, "भीष्म को मार डालिए" — यह सुनकर परशुराम ने उस रोती हुई और बार-बार आग्रह करती कन्या से कहा —

राम उवाच

श्लोक 2 (5.178.2)

काश्ये न कामं गृह्णामि शस्त्रं वै वरवर्णिनि । ऋते ब्रह्मविदां हेतोः किमन्यत्करवाणि ते ॥

kāśye na kāmaṃ gṛhṇāmi śastraṃ vai varavarṇini | ṛte brahmavidāṃ hetoḥ kimanyatkaravāṇi te

हे काशिराजकुमारी, हे सुन्दरी, ब्रह्मवेत्ताओं के प्रयोजन के सिवा मैं अपनी इच्छा से शस्त्र नहीं उठाता। इसके अतिरिक्त मैं तुम्हारे लिए और क्या करूँ?

श्लोक 3 (5.178.3)

वाचा भीष्मश्च साल्वश्च मम राज्ञि वशानुगौ । भविष्यतोऽनवद्याङ्गि तत्करिष्यामि मा शुचः ॥

vācā bhīṣmaśca sālvaśca mama rājñi vaśānugau | bhaviṣyato'navadyāṅgi tatkariṣyāmi mā śucaḥ

हे राजकुमारी, हे अनिन्द्य अंगोंवाली, मेरे वचन मात्र से भीष्म और शाल्व दोनों मेरी आज्ञा मानेंगे। यह मैं कर दूँगा; तुम शोक मत करो।

श्लोक 4 (5.178.4)

न तु शस्त्रं ग्रहीष्यामि कथंचिदपि भामिनि । ऋते नियोगाद्विप्राणामेष मे समयः कृतः ॥

na tu śastraṃ grahīṣyāmi kathaṃcidapi bhāmini | ṛte niyogādviprāṇāmeṣa me samayaḥ kṛtaḥ

परन्तु हे भामिनि, ब्राह्मणों की आज्ञा के बिना मैं किसी भी प्रकार शस्त्र नहीं उठाऊँगा। यह मेरा बनाया हुआ नियम है।

अम्बोवाच

श्लोक 5 (5.178.5)

मम दुःखं भगवता व्यपनेयं यतस्ततः । तच्च भीष्मप्रसूतं मे तं जहीश्वर मा चिरम् ॥

mama duḥkhaṃ bhagavatā vyapaneyaṃ yatastataḥ | tacca bhīṣmaprasūtaṃ me taṃ jahīśvara mā ciram

भगवन्, जैसे भी हो, आपको मेरा दुःख दूर करना होगा। वह दुःख भीष्म से उत्पन्न हुआ है; हे समर्थ, उन्हें शीघ्र मार डालिए।

राम उवाच

श्लोक 6 (5.178.6)

काशिकन्ये पुनर्ब्रूहि भीष्मस्ते चरणावुभौ । शिरसा वन्दनार्होऽपि ग्रहीष्यति गिरा मम ॥

kāśikanye punarbrūhi bhīṣmaste caraṇāvubhau | śirasā vandanārho'pi grahīṣyati girā mama

हे काशिकन्ये, फिर से कहो। भीष्म स्वयं वन्दनीय होते हुए भी मेरे कहने से तुम्हारे दोनों चरणों पर सिर झुकाएँगे।

अम्बोवाच

श्लोक 7 (5.178.7)

जहि भीष्मं रणे राम मम चेदिच्छसि प्रियम् । प्रतिश्रुतं च यदपि तत्सत्यं कर्तुमर्हसि ॥

jahi bhīṣmaṃ raṇe rāma mama cedicchasi priyam | pratiśrutaṃ ca yadapi tatsatyaṃ kartumarhasi

हे राम, यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो युद्ध में भीष्म को मार डालिए। और जो आपने प्रतिज्ञा की है, उसे सत्य करना भी आपको उचित है।

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (5.178.8)

तयोः संवदतोरेवं राजन्रामाम्बयोस्तदा । अकृतव्रणो जामदग्न्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥

tayoḥ saṃvadatorevaṃ rājanrāmāmbayostadā | akṛtavraṇo jāmadagnyamidaṃ vacanamabravīt

हे राजन्, जब परशुराम और अम्बा इस प्रकार बातें कर रहे थे, तब अकृतव्रण ने जमदग्निनन्दन से यह वचन कहा —

अकृतव्रण उवाच

श्लोक 9 (5.178.9)

शरणागतां महाबाहो कन्यां न त्यक्तुमर्हसि । यदि भीष्मो रणे राम समाहूतस्त्वया मृधे ॥

śaraṇāgatāṃ mahābāho kanyāṃ na tyaktumarhasi | yadi bhīṣmo raṇe rāma samāhūtastvayā mṛdhe

हे महाबाहो, शरण में आई कन्या को त्यागना आपको उचित नहीं। हे राम, यदि आप भीष्म को रण के लिए ललकारें,

श्लोक 10 (5.178.10)

निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूयात्कुर्याद्वा वचनं तव । कृतमस्या भवेत्कार्यं कन्याया भृगुनन्दन ॥

nirjito'smīti vā brūyātkuryādvā vacanaṃ tava | kṛtamasyā bhavetkāryaṃ kanyāyā bhṛgunandana

तो वे या तो कहेंगे "मैं हार गया", या आपकी बात मान लेंगे। हे भृगुनन्दन, इस प्रकार इस कन्या का काम बन जाएगा,

श्लोक 11 (5.178.11)

वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो । इयं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने ॥

vākyaṃ satyaṃ ca te vīra bhaviṣyati kṛtaṃ vibho | iyaṃ cāpi pratijñā te tadā rāma mahāmune

और हे वीर, हे प्रभो, आपका वचन भी सत्य हो जाएगा। हे महामुनि राम, उस समय की आपकी यह प्रतिज्ञा भी है —

श्लोक 12 (5.178.12)

जित्वा वै क्षत्रियान्सर्वान्ब्राह्मणेषु प्रतिश्रुता । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव रणे यदि ॥

jitvā vai kṣatriyānsarvānbrāhmaṇeṣu pratiśrutā | brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdraścaiva raṇe yadi

समस्त क्षत्रियों को जीतकर आपने ब्राह्मणों के बीच प्रतिज्ञा की थी — "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, जो कोई युद्ध में

श्लोक 13 (5.178.13)

ब्रह्मद्विड्भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव । शरणार्थे प्रपन्नानां भीतानां शरणार्थिनाम् ॥

brahmadviḍbhavitā taṃ vai haniṣyāmīti bhārgava | śaraṇārthe prapannānāṃ bhītānāṃ śaraṇārthinām

ब्राह्मणों का द्वेषी बनेगा, उसे मैं मार डालूँगा", हे भार्गव; और "जो भयभीत होकर आश्रय पाने के लिए शरण में आएँगे,

श्लोक 14 (5.178.14)

न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तुं जीवन्कथंचन । यश्च कृत्स्नं रणे क्षत्रं विजेष्यति समागतम् ॥

na śakṣyāmi parityāgaṃ kartuṃ jīvankathaṃcana | yaśca kṛtsnaṃ raṇe kṣatraṃ vijeṣyati samāgatam

उनका त्याग मैं जीते-जी कभी नहीं कर सकूँगा। और जो युद्ध में एकत्र हुए समस्त क्षत्रियों को जीत लेगा,

श्लोक 15 (5.178.15)

दीप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव । स एवं विजयी राम भीष्मः कुरुकुलोद्वहः । तेन युध्यस्व सङ्ग्रामे समेत्य भृगुनन्दन ॥

dīptātmānamahaṃ taṃ ca haniṣyāmīti bhārgava | sa evaṃ vijayī rāma bhīṣmaḥ kurukulodvahaḥ | tena yudhyasva saṅgrāme sametya bhṛgunandana

उस तेजस्वी को भी मैं मार डालूँगा", हे भार्गव। हे राम, कुरुकुल का धुरन्धर भीष्म ऐसा ही विजयी है। हे भृगुनन्दन, उससे भिड़कर संग्राम में युद्ध कीजिए।

राम उवाच

श्लोक 16 (5.178.16)

स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम । तथैव च करिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते ॥

smarāmyahaṃ pūrvakṛtāṃ pratijñāmṛṣisattama | tathaiva ca kariṣyāmi yathā sāmnaiva lapsyate

हे ऋषिश्रेष्ठ, मुझे पहले की हुई अपनी प्रतिज्ञा याद है। फिर भी मैं ऐसा करूँगा जिससे यह काम समझाने-बुझाने से ही सिद्ध हो जाए।

श्लोक 17 (5.178.17)

कार्यमेतन्महद्ब्रह्मन्काशिकन्यामनोगतम् । गमिष्यामि स्वयं तत्र कन्यामादाय यत्र सः ॥

kāryametanmahadbrahmankāśikanyāmanogatam | gamiṣyāmi svayaṃ tatra kanyāmādāya yatra saḥ

हे ब्रह्मन्, काशिराजकुमारी के मन में बसा यह काम बड़ा है। मैं स्वयं इस कन्या को लेकर वहाँ जाऊँगा जहाँ वे हैं।

श्लोक 18 (5.178.18)

यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वचः । हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ॥

yadi bhīṣmo raṇaślāghī na kariṣyati me vacaḥ | haniṣyāmyenamudriktamiti me niścitā matiḥ

यदि युद्ध पर गर्व करनेवाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा, तो मैं उस उद्धत को मार डालूँगा — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।

श्लोक 19 (5.178.19)

न हि बाणा मयोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रियसंगरे ॥

na hi bāṇā mayotsṛṣṭāḥ sajjantīha śarīriṇām | kāyeṣu viditaṃ tubhyaṃ purā kṣatriyasaṃgare

मेरे छोड़े हुए बाण देहधारियों के शरीरों में अटककर नहीं रुकते; यह तुम पहले क्षत्रियों के साथ हुए युद्ध में देख चुके हो।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (5.178.20)

एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । प्रयाणाय मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महातपाः ॥

evamuktvā tato rāmaḥ saha tairbrahmavādibhiḥ | prayāṇāya matiṃ kṛtvā samuttasthau mahātapāḥ

यह कहकर महातपस्वी परशुराम ने उन ब्रह्मवादियों के साथ प्रस्थान का निश्चय किया और उठ खड़े हुए।

श्लोक 21 (5.178.21)

ततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसाः । हुताग्नयो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मञ्जिघांसया ॥

tataste tāmuṣitvā tu rajanīṃ tatra tāpasāḥ | hutāgnayo japtajapyāḥ pratasthurmañjighāṃsayā

तब वे तपस्वी वह रात वहीं बिताकर, अग्निहोत्र और जप करके, मुझे मारने की इच्छा से चल पड़े।

श्लोक 22 (5.178.22)

अभ्यगच्छत्ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ॥

abhyagacchattato rāmaḥ saha tairbrahmavādibhiḥ | kurukṣetraṃ mahārāja kanyayā saha bhārata

हे महाराज, हे भारत, तब परशुराम उन ब्रह्मवादियों और उस कन्या के साथ कुरुक्षेत्र आए।

श्लोक 23 (5.178.23)

न्यविशन्त ततः सर्वे परिगृह्य सरस्वतीम् । तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ॥

nyaviśanta tataḥ sarve parigṛhya sarasvatīm | tāpasāste mahātmāno bhṛguśreṣṭhapuraskṛtāḥ

वहाँ भृगुश्रेष्ठ को आगे रखकर वे सब महात्मा तपस्वी सरस्वती नदी के तट पर ठहर गए।

श्लोक 24 (5.178.24)

ततस्तृतीये दिवसे समे देशे व्यवस्थितः । प्रेषयामास मे राजन्प्राप्तोऽस्मीति महाव्रतः ॥

tatastṛtīye divase same deśe vyavasthitaḥ | preṣayāmāsa me rājanprāpto'smīti mahāvrataḥ

हे राजन्, फिर तीसरे दिन समतल भूमि पर ठहरे हुए उन महाव्रती ने मुझे सन्देश भेजा — "मैं आ पहुँचा हूँ।"

श्लोक 25 (5.178.25)

तमागतमहं श्रुत्वा विषयान्तं महाबलम् । अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ॥

tamāgatamahaṃ śrutvā viṣayāntaṃ mahābalam | abhyagacchaṃ javenāśu prītyā tejonidhiṃ prabhum

उन महाबली, तेज के भण्डार, समर्थ गुरु को राज्य की सीमा पर आया सुनकर मैं प्रेमपूर्वक तुरन्त उनके पास गया,

श्लोक 26 (5.178.26)

गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारितः । ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ॥

gāṃ puraskṛtya rājendra brāhmaṇaiḥ parivāritaḥ | ṛtvigbhirdevakalpaiśca tathaiva ca purohitaiḥ

हे राजेन्द्र, आगे गौ को रखकर, ब्राह्मणों, देवतुल्य ऋत्विजों और पुरोहितों से घिरा हुआ।

श्लोक 27 (5.178.27)

स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् । प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमब्रवीत् ॥

sa māmabhigataṃ dṛṣṭvā jāmadagnyaḥ pratāpavān | pratijagrāha tāṃ pūjāṃ vacanaṃ cedamabravīt

मुझे आया देखकर प्रतापी जमदग्निनन्दन ने वह पूजा स्वीकार की और यह वचन कहा —

राम उवाच

श्लोक 28 (5.178.28)

भीष्म कां बुद्धिमास्थाय काशिराजसुता तदा । अकामेन त्वया नीता पुनश्चैव विसर्जिता ॥

bhīṣma kāṃ buddhimāsthāya kāśirājasutā tadā | akāmena tvayā nītā punaścaiva visarjitā

भीष्म, किस विचार से तुमने उस समय काशिराज की पुत्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हर लिया और फिर उसे छोड़ भी दिया?

श्लोक 29 (5.178.29)

विभ्रंशिता त्वया हीयं धर्मादास्ते यशस्विनी । परामृष्टां त्वया हीमां को हि गन्तुमिहार्हति ॥

vibhraṃśitā tvayā hīyaṃ dharmādāste yaśasvinī | parāmṛṣṭāṃ tvayā hīmāṃ ko hi gantumihārhati

तुमने इस यशस्विनी को धर्म से गिरा दिया है, और यह यों ही बैठी है। तुम्हारे द्वारा स्पर्श की गई इसे अब कौन अपनाने आएगा?

श्लोक 30 (5.178.30)

प्रत्याख्याता हि साल्वेन त्वया नीतेति भारत । तस्मादिमां मन्नियोगात्प्रतिगृह्णीष्व भारत ॥

pratyākhyātā hi sālvena tvayā nīteti bhārata | tasmādimāṃ manniyogātpratigṛhṇīṣva bhārata

हे भारत, तुम इसे हर ले गए थे, इसलिए शाल्व ने इसे ठुकरा दिया। अतः मेरी आज्ञा से तुम इसे स्वीकार करो।

श्लोक 31 (5.178.31)

स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्वियम् । न युक्तस्त्ववमानोऽयं राज्ञां कर्तुं त्वयाऽनघ ॥

svadharmaṃ puruṣavyāghra rājaputrī labhatviyam | na yuktastvavamāno'yaṃ rājñāṃ kartuṃ tvayā'nagha

हे पुरुषसिंह, इस राजकुमारी को उसका अपना धर्म मिलना चाहिए। हे निष्पाप, राजाओं का ऐसा अपमान करना तुम्हें शोभा नहीं देता।

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (5.178.32)

ततस्तं वै विमनसमुदीक्ष्याहमथाब्रुवम् । नाहमेनां पुनर्दद्यां ब्रह्मन्भ्रात्रे कथञ्चन ॥

tatastaṃ vai vimanasamudīkṣyāhamathābruvam | nāhamenāṃ punardadyāṃ brahmanbhrātre kathañcana

तब उन्हें अप्रसन्न देखकर मैंने कहा — ब्रह्मन्, मैं इसे फिर अपने भाई को कभी नहीं दूँगा।

श्लोक 33 (5.178.33)

साल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामेव भार्गव । मया चैवाभ्यनुज्ञाता गतेयं नगरं प्रति ॥

sālvasyāhamiti prāha purā māmeva bhārgava | mayā caivābhyanujñātā gateyaṃ nagaraṃ prati

हे भार्गव, इसने पहले स्वयं मुझसे कहा था कि "मैं शाल्व की हूँ", और मेरी अनुमति से ही यह उसके नगर को गई थी।

श्लोक 34 (5.178.34)

न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलोभान्न काम्यया । क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम् ॥

na bhayānnāpyanukrośānnārthalobhānna kāmyayā | kṣātraṃ dharmamahaṃ jahyāmiti me vratamāhitam

न भय से, न दया से, न धन के लोभ से और न कामना से मैं क्षत्रिय-धर्म छोड़ूँगा — यह मेरा लिया हुआ व्रत है।

श्लोक 35 (5.178.35)

अथ मामब्रवीद्रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । न करिष्यसि चेदेतद्वाक्यं मे नरपुङ्गव ॥

atha māmabravīdrāmaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ | na kariṣyasi cedetadvākyaṃ me narapuṅgava

तब क्रोध से व्याकुल नेत्रोंवाले परशुराम ने मुझसे कहा — "हे नरश्रेष्ठ, यदि तुम मेरी यह बात नहीं मानोगे,

श्लोक 36 (5.178.36)

हनिष्यामि सहामात्यं त्वामद्येति पुनः पुनः । संरम्भादब्रवीद्रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥

haniṣyāmi sahāmātyaṃ tvāmadyeti punaḥ punaḥ | saṃrambhādabravīdrāmaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ

तो आज ही तुम्हें मन्त्रियों सहित मार डालूँगा!" क्रोध से व्याकुल नेत्रोंवाले परशुराम ने आवेश में बार-बार यही कहा।

श्लोक 37 (5.178.37)

तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिन्दम । अयाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ॥

tamahaṃ gīrbhiriṣṭābhiḥ punaḥ punararindama | ayācaṃ bhṛguśārdūlaṃ na caiva praśaśāma saḥ

हे शत्रुदमन, मैंने उन भृगुश्रेष्ठ से मधुर वचनों द्वारा बार-बार विनती की, किन्तु वे शान्त नहीं हुए।

श्लोक 38 (5.178.38)

प्रणम्य तमहं मूर्ध्ना भूयो ब्राह्मणसत्तमम् । अब्रुवं कारणं किं तद्यत्त्वं युद्धं मयेच्छसि ॥

praṇamya tamahaṃ mūrdhnā bhūyo brāhmaṇasattamam | abruvaṃ kāraṇaṃ kiṃ tadyattvaṃ yuddhaṃ mayecchasi

उन ब्राह्मणश्रेष्ठ को फिर सिर झुकाकर प्रणाम करके मैंने कहा — क्या कारण है कि आप मुझसे युद्ध करना चाहते हैं?

श्लोक 39 (5.178.39)

इष्वस्त्रं मम बालस्य भवतैव चतुर्विधम् । उपदिष्टं महाबाहो शिष्योऽस्मि तव भार्गव ॥

iṣvastraṃ mama bālasya bhavataiva caturvidham | upadiṣṭaṃ mahābāho śiṣyo'smi tava bhārgava

हे महाबाहो, बचपन में आपने ही मुझे चार प्रकार की धनुर्विद्या सिखाई थी। हे भार्गव, मैं आपका शिष्य हूँ।

श्लोक 40 (5.178.40)

ततो मामब्रवीद्रामः क्रोधसंरक्तलोचनः । जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्णासीमां न चैव ह ॥

tato māmabravīdrāmaḥ krodhasaṃraktalocanaḥ | jānīṣe māṃ guruṃ bhīṣma gṛhṇāsīmāṃ na caiva ha

तब क्रोध से लाल आँखोंवाले परशुराम ने मुझसे कहा — भीष्म, तुम मुझे अपना गुरु मानते हो, फिर भी इसे स्वीकार नहीं करते,

राम उवाच

श्लोक 41 (5.178.41)

सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थं महामते । न हि मे विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन ॥

sutāṃ kāśyasya kauravya matpriyārthaṃ mahāmate | na hi me vidyate śāntiranyathā kurunandana

हे कौरव्य, हे महामति, मेरी प्रसन्नता के लिए भी काशिराज की इस पुत्री को। हे कुरुनन्दन, इसके बिना मुझे शान्ति नहीं मिलेगी।

श्लोक 42 (5.178.42)

गृहाणेमां महाबाहो रक्षस्व कुलमात्मनः । त्वया विभ्रंशिता हीयं भर्तारं नाधिगच्छति ॥

gṛhāṇemāṃ mahābāho rakṣasva kulamātmanaḥ | tvayā vibhraṃśitā hīyaṃ bhartāraṃ nādhigacchati

हे महाबाहो, इसे ग्रहण करो और अपने कुल की रक्षा करो। तुमने इसे पतित कर दिया है, अब इसे कोई पति नहीं मिलता।

भीष्म उवाच

श्लोक 43 (5.178.43)

तथा ब्रुवन्तं तमहं रामं परपुरंजयम् । नैतदेवं पुनर्भावि ब्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ॥

tathā bruvantaṃ tamahaṃ rāmaṃ parapuraṃjayam | naitadevaṃ punarbhāvi brahmarṣe kiṃ śrameṇa te

शत्रुओं के नगर जीतनेवाले परशुराम के ऐसा कहने पर मैंने उत्तर दिया — हे ब्रह्मर्षि, अब ऐसा फिर नहीं होगा; आप व्यर्थ परिश्रम क्यों करते हैं?

श्लोक 44 (5.178.44)

गुरुत्वं त्वयि संप्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् । प्रसादये त्वां भगवंस्त्यक्तैषा तु पुरा मया ॥

gurutvaṃ tvayi saṃprekṣya jāmadagnya purātanam | prasādaye tvāṃ bhagavaṃstyaktaiṣā tu purā mayā

हे जामदग्न्य, आपमें अपने पुराने गुरु को देखते हुए मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ, भगवन्; परन्तु इसे तो मैं पहले ही त्याग चुका हूँ।

श्लोक 45 (5.178.45)

को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् । वासयेत गृहे जानन्स्त्रीणां दोषो महात्ययः ॥

ko jātu parabhāvāṃ hi nārīṃ vyālīmiva sthitām | vāsayeta gṛhe jānanstrīṇāṃ doṣo mahātyayaḥ

कौन जान-बूझकर पराए पुरुष में मन लगाए हुई स्त्री को नागिन की भाँति अपने घर में रखेगा? स्त्रियों का ऐसा दोष बड़ा अनर्थकारी होता है।

श्लोक 46 (5.178.46)

न भयाद्वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाव्रत । प्रसीद मा वा यद्वा ते कार्यं तत्कुरु मा चिरम् ॥

na bhayādvāsavasyāpi dharmaṃ jahyāṃ mahāvrata | prasīda mā vā yadvā te kāryaṃ tatkuru mā ciram

हे महाव्रती, इन्द्र के भय से भी मैं धर्म नहीं छोड़ूँगा। आप प्रसन्न हों या न हों, आपको जो करना हो, शीघ्र कीजिए।

श्लोक 47 (5.178.47)

अयं चापि विशुद्धात्मन्पुराणे श्रूयते विभो । मरुत्तेन महाबुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ॥

ayaṃ cāpi viśuddhātmanpurāṇe śrūyate vibho | maruttena mahābuddhe gītaḥ śloko mahātmanā

हे विशुद्धात्मा, हे प्रभो, पुराण में यह श्लोक भी सुना जाता है, जिसे हे महाबुद्धि, महात्मा मरुत्त ने गाया था —

श्लोक 48 (5.178.48)

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥

gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ | utpathaṃ pratipannasya parityāgo vidhīyate

"जो गुरु भी घमण्डी हो, कर्तव्य-अकर्तव्य न जानता हो और कुमार्ग पर चल पड़ा हो, उसका त्याग विहित है।"

श्लोक 49 (5.178.49)

स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मया संमानितो भृशम् । गुरुवृत्तिं न जानीषे तस्माद्योत्स्यामि वै त्वया ॥

sa tvaṃ gururiti premṇā mayā saṃmānito bhṛśam | guruvṛttiṃ na jānīṣe tasmādyotsyāmi vai tvayā

आपको गुरु मानकर मैंने प्रेम से आपका बहुत सम्मान किया है। परन्तु आप गुरु का आचरण नहीं जानते, इसलिए मैं आपसे युद्ध करूँगा।

श्लोक 50 (5.178.50)

गुरुं न हन्यां समरे ब्राह्मणं च विशेषतः । विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मया तव ॥

guruṃ na hanyāṃ samare brāhmaṇaṃ ca viśeṣataḥ | viśeṣatastapovṛddhamevaṃ kṣāntaṃ mayā tava

मैं युद्ध में गुरु को नहीं मारूँगा, विशेषकर ब्राह्मण को, और उसमें भी तपस्या में बढ़े हुए को। इसीलिए मैंने आपको अब तक सहा है।

श्लोक 51 (5.178.51)

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् । यो हन्यात्समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायिनम् ॥

udyateṣumatho dṛṣṭvā brāhmaṇaṃ kṣatrabandhuvat | yo hanyātsamare kruddhaṃ yudhyantamapalāyinam

किन्तु जो किसी ब्राह्मण को अधम क्षत्रिय की भाँति बाण उठाए देखकर, युद्ध में क्रुद्ध होकर लड़ते और पीठ न दिखाते हुए उसे मार डाले,

श्लोक 52 (5.178.52)

ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः । क्षत्रियाणां स्थितो धर्मे क्षत्रियोऽस्मि तपोधन ॥

brahmahatyā na tasya syāditi dharmeṣu niścayaḥ | kṣatriyāṇāṃ sthito dharme kṣatriyo'smi tapodhana

उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता — धर्मशास्त्रों का यही निर्णय है। हे तपोधन, मैं क्षत्रिय-धर्म में स्थित क्षत्रिय हूँ।

श्लोक 53 (5.178.53)

यो यथा वर्तते यस्मिंस्तस्मिन्नेव प्रवर्तयन् । नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति ॥

yo yathā vartate yasmiṃstasminneva pravartayan | nādharmaṃ samavāpnoti na cāśreyaśca vindati

जो जिसके साथ जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करनेवाला न अधर्म का भागी होता है, न उसका अमंगल होता है।

श्लोक 54 (5.178.54)

अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् । अर्थसंशयमापन्नः श्रेयान्निःसंशयो नरः ॥

arthe vā yadi vā dharme samartho deśakālavit | arthasaṃśayamāpannaḥ śreyānniḥsaṃśayo naraḥ

अर्थ या धर्म के विषय में देश-काल को जाननेवाला समर्थ पुरुष, जब अर्थ के बारे में संशय हो, तब निःसंशय धर्म पर टिके रहे — यही श्रेयस्कर है।

श्लोक 55 (5.178.55)

यस्मात्संशयितेऽप्यर्थेऽयथान्यायं प्रवर्तसे । तस्माद्योत्स्यामि सहितस्त्वया राम महाहवे ॥

yasmātsaṃśayite'pyarthe'yathānyāyaṃ pravartase | tasmādyotsyāmi sahitastvayā rāma mahāhave

क्योंकि संशय की स्थिति में आप अनुचित आचरण कर रहे हैं, इसलिए हे राम, मैं महासंग्राम में आपसे भिड़ूँगा।

श्लोक 56 (5.178.56)

पश्य मे बाहुवीर्यं च विक्रमं चातिमानुषम् । एवं गतेऽपि तु मया यच्छक्यं भृगुनन्दन ॥

paśya me bāhuvīryaṃ ca vikramaṃ cātimānuṣam | evaṃ gate'pi tu mayā yacchakyaṃ bhṛgunandana

मेरी भुजाओं का बल और अलौकिक पराक्रम देखिए। हे भृगुनन्दन, ऐसी स्थिति में भी मुझसे जो बन पड़ेगा,

श्लोक 57 (5.178.57)

तत्करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वया सह । द्वन्द्वे राम यथेष्टं मे सज्जीभव महाद्युते ॥

tatkariṣye kurukṣetre yotsye vipra tvayā saha | dvandve rāma yatheṣṭaṃ me sajjībhava mahādyute

वह मैं कुरुक्षेत्र में करूँगा; हे विप्र, वहाँ मैं आपसे लड़ूँगा। हे राम, जैसा मैं चाहता हूँ वैसे द्वन्द्वयुद्ध के लिए, हे महातेजस्वी, आप तैयार हो जाइए।

श्लोक 58 (5.178.58)

तत्र त्वं निहतो राम मया शरशतार्दितः । प्राप्स्यसे निर्जिताँल्लोकाञ्शस्त्रपूतो महारणे ॥

tatra tvaṃ nihato rāma mayā śaraśatārditaḥ | prāpsyase nirjitām̐llokāñśastrapūto mahāraṇe

हे राम, वहाँ मेरे सैकड़ों बाणों से पीड़ित होकर मारे जाने पर, महायुद्ध में शस्त्रों से पवित्र होकर आप अपने जीते हुए लोकों को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 59 (5.178.59)

स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्रं रणप्रिय । तत्रैष्यामि महाबाहो युद्धाय त्वां तपोधन ॥

sa gaccha vinivartasva kurukṣetraṃ raṇapriya | tatraiṣyāmi mahābāho yuddhāya tvāṃ tapodhana

अतः हे युद्धप्रेमी, लौटकर कुरुक्षेत्र जाइए। हे महाबाहु तपोधन, मैं वहीं आपसे युद्ध करने आऊँगा।

श्लोक 60 (5.178.60)

अपि यत्र त्वया राम कृतं शौचं पुरा पितुः । तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ॥

api yatra tvayā rāma kṛtaṃ śaucaṃ purā pituḥ | tatrāhamapi hatvā tvāṃ śaucaṃ kartāsmi bhārgava

हे राम, जहाँ आपने पहले अपने पिता के लिए शुद्धि-कर्म किया था, हे भार्गव, वहीं मैं भी आपको मारकर शुद्धि-कर्म करूँगा।

श्लोक 61 (5.178.61)

तत्र राम समागच्छ त्वरितं युद्धदुर्मद । व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं ब्राह्मणब्रुव ॥

tatra rāma samāgaccha tvaritaṃ yuddhadurmada | vyapaneṣyāmi te darpaṃ paurāṇaṃ brāhmaṇabruva

हे युद्धोन्मत्त राम, शीघ्र वहाँ आइए। हे नाममात्र के ब्राह्मण, मैं आपका पुराना घमण्ड दूर कर दूँगा।

श्लोक 62 (5.178.62)

यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिवत्सरे । निर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छ्रुणु ॥

yaccāpi katthase rāma bahuśaḥ parivatsare | nirjitāḥ kṣatriyā loke mayaikeneti tacchruṇu

हे राम, और जो आप वर्षों से बार-बार डींग मारते रहे हैं कि "संसार के क्षत्रियों को मैंने अकेले जीत लिया", उसके विषय में सुनिए —

श्लोक 63 (5.178.63)

न तदा जातवान्भीष्मः क्षत्रियो वापि मद्विधः । पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया ॥

na tadā jātavānbhīṣmaḥ kṣatriyo vāpi madvidhaḥ | paścājjātāni tejāṃsi tṛṇeṣu jvalitaṃ tvayā

उस समय न भीष्म जन्मा था, न मेरे जैसा कोई क्षत्रिय। सच्चे तेजस्वी तो बाद में जन्मे हैं; आप तो तिनकों में ही धधके थे।

श्लोक 64 (5.178.64)

यस्ते युद्धमयं दर्पं कामं च व्यपनाशयेत् । सोऽहं जातो महाबाहो भीष्मः परपुरंजयः । व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः ॥

yaste yuddhamayaṃ darpaṃ kāmaṃ ca vyapanāśayet | so'haṃ jāto mahābāho bhīṣmaḥ parapuraṃjayaḥ | vyapaneṣyāmi te darpaṃ yuddhe rāma na saṃśayaḥ

और कोई ऐसा नहीं था जो युद्ध के आपके घमण्ड और लालसा को नष्ट कर सके। हे महाबाहो, अब शत्रुओं के नगर जीतनेवाला मैं भीष्म जन्म ले चुका हूँ; हे राम, युद्ध में मैं आपका घमण्ड दूर करूँगा, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 65 (5.178.65)

ततो मामब्रवीद्रामः प्रहसन्निव भारत । दिष्ट्या भीष्म मया सार्धं योद्धुमिच्छसि संगरे ॥

tato māmabravīdrāmaḥ prahasanniva bhārata | diṣṭyā bhīṣma mayā sārdhaṃ yoddhumicchasi saṃgare

हे भारत, तब परशुराम ने मानो हँसते हुए मुझसे कहा — भीष्म, सौभाग्य की बात है कि तुम मेरे साथ युद्ध करना चाहते हो!

राम उवाच

श्लोक 66 (5.178.66)

अयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वया सह । भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप ॥

ayaṃ gacchāmi kauravya kurukṣetraṃ tvayā saha | bhāṣitaṃ te kariṣyāmi tatrāgaccha paraṃtapa

हे कौरव्य, मैं तुम्हारे साथ कुरुक्षेत्र चलता हूँ। तुमने जो कहा है, वही करूँगा। हे परन्तप, वहाँ आना।

श्लोक 67 (5.178.67)

तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् । जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कबलाशनम् ॥

tatra tvāṃ nihataṃ mātā mayā śaraśatācitam | jāhnavī paśyatāṃ bhīṣma gṛdhrakaṅkabalāśanam

भीष्म, वहाँ तुम्हारी माता जाह्नवी तुम्हें मेरे हाथों मारा गया, सैकड़ों बाणों से बिंधा और गिद्धों, कंकों तथा कौओं का भोजन बना देखें।

श्लोक 68 (5.178.68)

कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता । मया विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ॥

kṛpaṇaṃ tvāmabhiprekṣya siddhacāraṇasevitā | mayā vinihataṃ devī rodatāmadya pārthiva

हे राजा, सिद्धों और चारणों से सेवित वह देवी आज मेरे द्वारा मारे गए तुम्हें दयनीय दशा में देखकर रोए।

श्लोक 69 (5.178.69)

अतदर्हा महाभागा भगीरथसुताऽनघा । या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ॥

atadarhā mahābhāgā bhagīrathasutā'naghā | yā tvāmajījananmandaṃ yuddhakāmukamāturam

भगीरथ की वह महाभाग्यवती, निष्पाप पुत्री इसके योग्य नहीं है, जिसने तुम जैसे मूर्ख, युद्ध के लोभी और विकल पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 70 (5.178.70)

एहि गच्छ मया भीष्म युद्धकामुक दुर्मद । गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ॥

ehi gaccha mayā bhīṣma yuddhakāmuka durmada | gṛhāṇa sarvaṃ kauravya rathādi bharatarṣabha

आओ भीष्म, हे युद्धलोलुप दुर्मद, मेरे साथ चलो। हे कौरव्य, हे भरतश्रेष्ठ, रथ आदि सब कुछ ले लो।

भीष्म उवाच

श्लोक 71 (5.178.71)

इति ब्रुवाणं तमहं रामं परपुरंजयम् । प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रवम् ॥

iti bruvāṇaṃ tamahaṃ rāmaṃ parapuraṃjayam | praṇamya śirasā rāmamevamastvityathābravam

शत्रुओं के नगर जीतनेवाले परशुराम के ऐसा कहने पर मैंने सिर झुकाकर प्रणाम किया और उनसे कहा — ऐसा ही हो।

श्लोक 72 (5.178.72)

एवमुक्त्वा ययौ रामः कुरुक्षेत्रं युयुत्सया । प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥

evamuktvā yayau rāmaḥ kurukṣetraṃ yuyutsayā | praviśya nagaraṃ cāhaṃ satyavatyai nyavedayam

यह कहकर परशुराम युद्ध की इच्छा से कुरुक्षेत्र चले गए, और मैंने नगर में जाकर सत्यवती को सब बताया।

श्लोक 73 (5.178.73)

ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दितः । द्विजातीन्वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ॥

tataḥ kṛtasvastyayano mātrā ca pratinanditaḥ | dvijātīnvācya puṇyāhaṃ svasti caiva mahādyute

तब स्वस्त्ययन कराकर, माता का अभिनन्दन पाकर, और हे महातेजस्वी, ब्राह्मणों से पुण्याहवाचन तथा स्वस्तिवाचन कराकर,

श्लोक 74 (5.178.74)

रथमास्थाय रुचिरं राजतं पाण्डुरैर्हयैः । सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥

rathamāsthāya ruciraṃ rājataṃ pāṇḍurairhayaiḥ | sūpaskaraṃ svadhiṣṭhānaṃ vaiyāghraparivāraṇam

मैं श्वेत घोड़ों से जुते सुन्दर चाँदी के रथ पर सवार हुआ, जो सामग्री से भली-भाँति सज्जित, उत्तम बैठकवाला और बाघम्बर से ढका हुआ था,

श्लोक 75 (5.178.75)

उपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् । तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे ॥

upapannaṃ mahāśastraiḥ sarvopakaraṇānvitam | tatkulīnena vīreṇa hayaśāstravidā raṇe

बड़े-बड़े शस्त्रों और सब उपकरणों से युक्त था, और जिसे युद्ध में अश्वविद्या का ज्ञाता, कुलीन, वीर,

श्लोक 76 (5.178.76)

यत्तं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ॥

yattaṃ sūtena śiṣṭena bahuśo dṛṣṭakarmaṇā | daṃśitaḥ pāṇḍureṇāhaṃ kavacena vapuṣmatā

सुशिक्षित और अनेक बार अपना कौशल दिखा चुका सारथी सावधानी से चला रहा था। चमकते श्वेत कवच से सुसज्जित होकर,

श्लोक 77 (5.178.77)

पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्रायां भरतसत्तम । पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥

pāṇḍuraṃ kārmukaṃ gṛhya prāyāṃ bharatasattama | pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani

हे भरतश्रेष्ठ, श्वेत धनुष लेकर मैं चल पड़ा; मेरे सिर पर श्वेत छत्र तना हुआ था,

श्लोक 78 (5.178.78)

पाण्डुरैश्चापि व्यजनैर्वीज्यमानो नराधिप । शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ॥

pāṇḍuraiścāpi vyajanairvījyamāno narādhipa | śuklavāsāḥ sitoṣṇīṣaḥ sarvaśuklavibhūṣaṇaḥ

हे नरेश्वर, श्वेत पंखों से मुझ पर हवा की जा रही थी; मेरे वस्त्र श्वेत थे, पगड़ी श्वेत थी और सारे आभूषण भी श्वेत थे।

श्लोक 79 (5.178.79)

स्तूयमानो जयाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वयात् । कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ ॥

stūyamāno jayāśīrbhirniṣkramya gajasāhvayāt | kurukṣetraṃ raṇakṣetramupāyāṃ bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, विजय के आशीर्वादों से स्तुति पाता हुआ मैं हस्तिनापुर से निकलकर रणभूमि कुरुक्षेत्र पहुँचा।

श्लोक 80 (5.178.80)

ते हयाश्चोदितास्तेन सूतेन परमाहवे । अवहन्मां भृशं राजन्मनोमारुतरंहसः ॥

te hayāścoditāstena sūtena paramāhave | avahanmāṃ bhṛśaṃ rājanmanomārutaraṃhasaḥ

हे राजन्, उस सारथी द्वारा हाँके गए, मन और वायु के समान वेगवाले वे घोड़े मुझे तीव्र गति से उस महासंग्राम में ले गए।

श्लोक 81 (5.178.81)

गत्वाऽहं तत्कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् । युद्धाय सहसा राजन्पराक्रान्तौ परस्परम् ॥

gatvā'haṃ tatkurukṣetraṃ sa ca rāmaḥ pratāpavān | yuddhāya sahasā rājanparākrāntau parasparam

हे राजन्, कुरुक्षेत्र पहुँचकर मैं और प्रतापी परशुराम सहसा युद्ध के लिए एक-दूसरे की ओर बढ़े।

श्लोक 82 (5.178.82)

ततः संदर्शनेऽतिष्ठं रामस्यातितपस्विनः । प्रगृह्य शङ्खप्रवरं ततः प्राधममुत्तमम् ॥

tataḥ saṃdarśane'tiṣṭhaṃ rāmasyātitapasvinaḥ | pragṛhya śaṅkhapravaraṃ tataḥ prādhamamuttamam

तब मैं महातपस्वी परशुराम की आँखों के सामने जा खड़ा हुआ और अपना श्रेष्ठ शंख लेकर उसे ज़ोर से बजाया।

श्लोक 83 (5.178.83)

ततस्तत्र द्विजा राजंस्तापसाश्च वनौकसः । अपश्यन्त रणं दिव्यं देवाः सेन्द्रगणास्तदा ॥

tatastatra dvijā rājaṃstāpasāśca vanaukasaḥ | apaśyanta raṇaṃ divyaṃ devāḥ sendragaṇāstadā

हे राजन्, तब वहाँ के ब्राह्मण, वनवासी तपस्वी और इन्द्र सहित देवगण उस दिव्य युद्ध को देखने लगे।

श्लोक 84 (5.178.84)

ततो दिव्यानि माल्यानि प्रादुरासंस्ततस्ततः । वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह ॥

tato divyāni mālyāni prādurāsaṃstatastataḥ | vāditrāṇi ca divyāni meghavṛndāni caiva ha

तब जहाँ-तहाँ दिव्य मालाएँ प्रकट होने लगीं, दिव्य बाजे बजने लगे और मेघों के समूह भी छा गए।

श्लोक 85 (5.178.85)

ततस्ते तापसाः सर्वे भार्गवस्यानुयायिनः । प्रेक्षकाः समपद्यन्त परिवार्य रणाजिरम् ॥

tataste tāpasāḥ sarve bhārgavasyānuyāyinaḥ | prekṣakāḥ samapadyanta parivārya raṇājiram

तब परशुराम के साथ आए वे सब तपस्वी रणभूमि को घेरकर दर्शक बन गए।

श्लोक 86 (5.178.86)

ततो मामब्रवीद्देवी सर्वभूतहितैषिणी । माता स्वरूपिणी राजन्किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥

tato māmabravīddevī sarvabhūtahitaiṣiṇī | mātā svarūpiṇī rājankimidaṃ te cikīrṣitam

हे राजन्, तब समस्त प्राणियों का हित चाहनेवाली मेरी माता देवी गंगा ने अपने रूप में प्रकट होकर मुझसे कहा — तुम यह क्या करना चाहते हो?

गङ्गोवाच

श्लोक 87 (5.178.87)

गत्वाऽहं जामदग्न्यं तु प्रयाचिष्ये कुरूद्वह । भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति पुनः पुनः ॥

gatvā'haṃ jāmadagnyaṃ tu prayāciṣye kurūdvaha | bhīṣmeṇa saha mā yotsīḥ śiṣyeṇeti punaḥ punaḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, मैं जमदग्निनन्दन के पास जाकर बार-बार विनती करूँगी — "अपने शिष्य भीष्म से युद्ध मत करो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 88 (5.178.88)

मा मैवं पुत्र निर्बन्धं कुरु विप्रेण पार्थिव । जामदग्न्येन समरे योद्धुमित्येव भर्त्सयत् ॥

mā maivaṃ putra nirbandhaṃ kuru vipreṇa pārthiva | jāmadagnyena samare yoddhumityeva bhartsayat

"बेटा, हे राजन्, ब्राह्मण जमदग्निनन्दन से युद्ध करने का ऐसा हठ मत करो" — यह कहकर उन्होंने मुझे डाँटा।

गङ्गोवाच

श्लोक 89 (5.178.89)

किं न वै क्षत्रियहणो हरतुल्यपराक्रमः । विदितः पुत्र रामस्ते यतस्तं योद्धुमिच्छसि ॥

kiṃ na vai kṣatriyahaṇo haratulyaparākramaḥ | viditaḥ putra rāmaste yatastaṃ yoddhumicchasi

बेटा, क्या तुम नहीं जानते कि परशुराम क्षत्रियों के संहारक और शिव के समान पराक्रमी हैं, जो तुम उनसे लड़ना चाहते हो?

भीष्म उवाच

श्लोक 90 (5.178.90)

ततोऽहमब्रवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । सर्वं तद्भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे ॥

tato'hamabravaṃ devīmabhivādya kṛtāñjaliḥ | sarvaṃ tadbharataśreṣṭha yathāvṛttaṃ svayaṃvare

तब मैंने हाथ जोड़कर देवी को प्रणाम किया और हे भरतश्रेष्ठ, स्वयंवर में जो कुछ हुआ था, वह सब ज्यों-का-त्यों कह सुनाया;

श्लोक 91 (5.178.91)

यथा च रामो राजेन्द्र मया पूर्वं प्रचोदितः । काशिराजसुतायाश्च यथा कर्म पुरातनम् ॥

yathā ca rāmo rājendra mayā pūrvaṃ pracoditaḥ | kāśirājasutāyāśca yathā karma purātanam

और हे राजेन्द्र, कैसे मैंने पहले परशुराम से अनुरोध किया था, तथा काशिराज की पुत्री ने पहले क्या किया था।

श्लोक 92 (5.178.92)

ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी । मदर्थं तमृषिं वीक्ष्य क्षमयामास भार्गवम् ॥

tataḥ sā rāmamabhyetya jananī me mahānadī | madarthaṃ tamṛṣiṃ vīkṣya kṣamayāmāsa bhārgavam

तब मेरी माता महानदी गंगा ने परशुराम के पास जाकर, उन ऋषि की ओर देखते हुए, मेरे लिए भार्गव से क्षमा माँगी।

श्लोक 93 (5.178.93)

भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति वचोऽब्रवीत् । स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय । न च मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ॥

bhīṣmeṇa saha mā yotsīḥ śiṣyeṇeti vaco'bravīt | sa ca tāmāha yācantīṃ bhīṣmameva nivartaya | na ca me kurute kāmamityahaṃ tamupāgamam

उन्होंने कहा — "अपने शिष्य भीष्म से युद्ध मत करो।" विनती करती हुई गंगा से उन्होंने कहा — "तुम भीष्म को ही लौटाओ, क्योंकि वह मेरी इच्छा पूरी नहीं करता।" तब मैं उनके पास गया।

श्लोक 94 (5.178.94)

ततो गङ्गा सुतस्नेहान्मां सा पुनरुपागमत् । नास्या अकरवं वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥

tato gaṅgā sutasnehānmāṃ sā punarupāgamat | nāsyā akaravaṃ vākyaṃ krodhaparyākulekṣaṇaḥ

तब पुत्र-स्नेह के कारण गंगा फिर मेरे पास आईं; पर क्रोध से व्याकुल नेत्रोंवाले मैंने उनकी बात नहीं मानी।

श्लोक 95 (5.178.95)

अथादृश्यत धर्मात्मा भृगुश्रेष्ठो महातपाः । आह्वयामास च तदा युद्धाय द्विजसत्तमः ॥

athādṛśyata dharmātmā bhṛguśreṣṭho mahātapāḥ | āhvayāmāsa ca tadā yuddhāya dvijasattamaḥ

तब धर्मात्मा, महातपस्वी भृगुश्रेष्ठ प्रकट हुए और उन द्विजश्रेष्ठ ने मुझे युद्ध के लिए ललकारा।

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