उद्योग पर्व · अध्याय 177
अम्बा की परशुराम से भीष्म-वध की प्रार्थना
अकृतव्रण अम्बा से पूछते हैं कि वह किससे बदला चाहती है — शाल्व से या भीष्म से — और मानते हैं कि गर्वीले और विजय-मद में चूर भीष्म ही उसकी दशा के लिए उत्तरदायी हैं। अगले दिन प्रातः जमदग्नि-पुत्र परशुराम अपने शिष्यों के साथ आते हैं और उनका सत्कार होता है; होत्रवाहन अपनी नातिन का परिचय कराते हैं, और अम्बा परशुराम की शरण लेकर उन्हें अपनी कथा सुनाती है। परशुराम भीष्म के पास सन्देश भेजने और न मानने पर उन्हें युद्ध में भस्म करने का, अथवा शाल्व को इस कार्य में लगाने का प्रस्ताव करते हैं; अम्बा उनसे प्रार्थना करती है कि वे उसकी विपत्ति के मूल भीष्म का वैसे ही वध करें जैसे इन्द्र ने वृत्र का किया था।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 1 (5.177.1)
दुःखं द्वयोरिदं भद्रे कतरस्य चिकीर्षसि । प्रतिकर्तव्यमबले तत्त्वं वत्से वदस्व मे ॥
duḥkhaṃ dvayoridaṃ bhadre katarasya cikīrṣasi | pratikartavyamabale tattvaṃ vatse vadasva me
हे भद्रे, तुम्हारा यह दुःख दो व्यक्तियों के कारण है। हे अबले, उनमें से किससे तुम बदला लेना चाहती हो? वत्से, यह बात मुझे ठीक-ठीक बताओ।
श्लोक 2 (5.177.2)
यदि सौभपतिर्भद्रे नियोक्तव्यो मतस्तव । नियोक्ष्यति महात्मा स रामस्त्वद्धितकाम्यया ॥
yadi saubhapatirbhadre niyoktavyo matastava | niyokṣyati mahātmā sa rāmastvaddhitakāmyayā
हे भद्रे, यदि तुम्हारा विचार है कि सौभपति को तुम्हें स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाए, तो तुम्हारा हित चाहने वाले महात्मा राम उसे बाध्य कर देंगे।
श्लोक 3 (5.177.3)
अथापगेयं भीष्मं त्वं रामेणेच्छसि धीमता । रणे विनिर्जितं द्रष्टुं कुर्यात्तदपि भार्गवः ॥
athāpageyaṃ bhīṣmaṃ tvaṃ rāmeṇecchasi dhīmatā | raṇe vinirjitaṃ draṣṭuṃ kuryāttadapi bhārgavaḥ
अथवा यदि तुम बुद्धिमान राम के द्वारा गंगापुत्र भीष्म को युद्ध में पराजित देखना चाहती हो, तो भार्गव वह भी कर देंगे।
श्लोक 4 (5.177.4)
सृञ्जयस्य वचः श्रुत्वा तव चैव शुचिस्मिते । यदत्र ते भृशं कार्यं तदद्यैव विचिन्त्यताम् ॥
sṛñjayasya vacaḥ śrutvā tava caiva śucismite | yadatra te bhṛśaṃ kāryaṃ tadadyaiva vicintyatām
हे शुचिस्मिते, सृंजय की बात और तुम्हारी अपनी बात सुनकर, यहाँ तुम्हारे लिए जो सबसे आवश्यक कार्य हो, उस पर आज ही विचार कर लिया जाए।
अम्बोवाच
श्लोक 5 (5.177.5)
अपनीतास्मि भीष्मेण भगवन्नविजानता । नाभिजानाति मे भीष्मो ब्रह्मन्साल्वगतं मनः ॥
apanītāsmi bhīṣmeṇa bhagavannavijānatā | nābhijānāti me bhīṣmo brahmansālvagataṃ manaḥ
भगवन्, भीष्म अनजाने में मुझे हर ले गए थे; हे ब्रह्मन्, भीष्म नहीं जानते थे कि मेरा मन शाल्व में लगा है।
श्लोक 6 (5.177.6)
एतद्विचार्य मनसा भवानेतद्विनिश्चयम् । विचिनोतु यथान्यायं विधानं क्रियतां तथा ॥
etadvicārya manasā bhavānetadviniścayam | vicinotu yathānyāyaṃ vidhānaṃ kriyatāṃ tathā
इस पर मन में विचार करके आप इसका निर्णय करें; जो न्यायोचित हो उसे चुनें और उसी के अनुसार उपाय किया जाए।
श्लोक 7 (5.177.7)
भीष्मे वा कुरुशार्दूले शाल्वराजेऽथवा पुनः । उभयोरेव वा ब्रह्मन्युक्तं यत्तत्समाचर ॥
bhīṣme vā kuruśārdūle śālvarāje'thavā punaḥ | ubhayoreva vā brahmanyuktaṃ yattatsamācara
हे ब्रह्मन्, कुरुश्रेष्ठ भीष्म के प्रति, या शाल्वराज के प्रति, या दोनों के प्रति — जो उचित हो, वही कीजिए।
श्लोक 8 (5.177.8)
निवेदितं मया ह्येतद्दुःखमूलं यथातथम् । विधानं तत्र भगवन्कर्तुमर्हसि युक्तितः ॥
niveditaṃ mayā hyetadduḥkhamūlaṃ yathātatham | vidhānaṃ tatra bhagavankartumarhasi yuktitaḥ
मैंने अपने दुःख का मूल आपको ज्यों का त्यों बता दिया है। भगवन्, अब आप युक्तिपूर्वक इसका उपाय करें।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 9 (5.177.9)
उपपन्नमिदं भद्रे यदेवं वरवर्णिनि । धर्मं प्रतिवचो ब्रूयाः शृणु चेदं वचो मम ॥
upapannamidaṃ bhadre yadevaṃ varavarṇini | dharmaṃ prativaco brūyāḥ śṛṇu cedaṃ vaco mama
हे भद्रे, हे सुन्दरी, यह उचित ही है कि तुम धर्म को ध्यान में रखकर ऐसी बात कहो। अब मेरी यह बात सुनो।
श्लोक 10 (5.177.10)
यदि त्वामापगेयो वै न नयेद्गजसाह्वयम् । साल्वस्त्वा शिरसा भीरु गृह्णीयाद्रामचोदितः ॥
yadi tvāmāpageyo vai na nayedgajasāhvayam | sālvastvā śirasā bhīru gṛhṇīyādrāmacoditaḥ
हे भीरु, यदि गंगापुत्र तुम्हें हस्तिनापुर न ले जाते, तो राम की प्रेरणा से शाल्व तुम्हें सिर झुकाकर स्वीकार कर लेता।
श्लोक 11 (5.177.11)
तेन त्वं निर्जिता भद्रे यस्मान्नीतासि भामिनि । संशयः साल्वराजस्य तेन त्वयि सुमध्यमे ॥
tena tvaṃ nirjitā bhadre yasmānnītāsi bhāmini | saṃśayaḥ sālvarājasya tena tvayi sumadhyame
हे भद्रे, हे भामिनी, क्योंकि भीष्म तुम्हें जीतकर ले गए, इसी कारण हे सुमध्यमे, शाल्वराज को तुम पर सन्देह हुआ है।
श्लोक 12 (5.177.12)
भीष्मः पुरुषमानी च जितकाशी तथैव च । तस्मात्प्रतिक्रिया युक्ता भीष्मे कारयितुं तव ॥
bhīṣmaḥ puruṣamānī ca jitakāśī tathaiva ca | tasmātpratikriyā yuktā bhīṣme kārayituṃ tava
भीष्म अपने पुरुषत्व पर गर्व करते हैं और विजय के मद में चूर हैं; इसलिए तुम्हारे लिए भीष्म से ही बदला दिलवाना उचित है।
अम्बोवाच
श्लोक 13 (5.177.13)
ममाप्येष सदा ब्रह्मन्हृदि कामोऽभिवर्तते । घातयेयं यदि रणे भीष्ममित्येव नित्यदा ॥
mamāpyeṣa sadā brahmanhṛdi kāmo'bhivartate | ghātayeyaṃ yadi raṇe bhīṣmamityeva nityadā
हे ब्रह्मन्, मेरे हृदय में भी सदा यही कामना बनी रहती है कि मैं युद्ध में भीष्म का वध करवा सकूँ — निरन्तर यही।
श्लोक 14 (5.177.14)
भीष्मं वा साल्वराजं वा यं वा दोषेण गच्छसि । प्रशाधि तं महाबाहो यत्कृतेऽहं सुदुःखिता ॥
bhīṣmaṃ vā sālvarājaṃ vā yaṃ vā doṣeṇa gacchasi | praśādhi taṃ mahābāho yatkṛte'haṃ suduḥkhitā
हे महाबाहो, भीष्म हों या शाल्वराज, जिसे भी आप दोषी समझें, उसे दण्ड दीजिए, जिसके कारण मैं इतनी दुःखी हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (5.177.15)
एवं कथयतामेव तेषां स दिवसो गतः । रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ सुखशीतोष्णमारुता ॥
evaṃ kathayatāmeva teṣāṃ sa divaso gataḥ | rātriśca bharataśreṣṭha sukhaśītoṣṇamārutā
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार बातें करते-करते उनका वह दिन बीत गया, और सुखद, शीतल-उष्ण पवन वाली रात भी बीत गई।
श्लोक 16 (5.177.16)
ततो रामः प्रादुरासीत्प्रज्वलन्निव तेजसा । शिष्यैः परिवृतो राजञ्जटाचीरधरो मुनिः ॥
tato rāmaḥ prādurāsītprajvalanniva tejasā | śiṣyaiḥ parivṛto rājañjaṭācīradharo muniḥ
हे राजन्, तब जटा और वल्कल धारण किए मुनि राम अपने शिष्यों से घिरे हुए, मानो तेज से प्रज्वलित होते हुए, वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 17 (5.177.17)
धनुष्पाणिरदीनात्मा खड्गं बिभ्रत्परश्वधी । विरजा राजशार्दूल सृञ्जयं सोऽभ्ययान्नृपम् ॥
dhanuṣpāṇiradīnātmā khaḍgaṃ bibhratparaśvadhī | virajā rājaśārdūla sṛñjayaṃ so'bhyayānnṛpam
हे राजशार्दूल, हाथ में धनुष लिए, अदीन चित्त वाले, खड्ग और फरसा धारण किए, रजोगुण से रहित वे राजा सृंजय के पास पहुँचे।
श्लोक 18 (5.177.18)
ततस्तं तापसा दृष्ट्वा स च राजा महातपाः । तस्थुः प्राञ्जलयो राजन्सा च कन्या तपस्विनी ॥
tatastaṃ tāpasā dṛṣṭvā sa ca rājā mahātapāḥ | tasthuḥ prāñjalayo rājansā ca kanyā tapasvinī
हे राजन्, उन्हें देखकर तपस्वी और महातपस्वी राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गए, और वह तपस्विनी कन्या भी।
श्लोक 19 (5.177.19)
पूजयामासुरव्यग्रा मधुपर्केण भार्गवम् । अर्चितश्च यथान्यायं निषसाद सहैव तैः ॥
pūjayāmāsuravyagrā madhuparkeṇa bhārgavam | arcitaśca yathānyāyaṃ niṣasāda sahaiva taiḥ
उन्होंने शान्त भाव से मधुपर्क द्वारा भार्गव का पूजन किया, और यथोचित सत्कार पाकर वे उन्हीं के साथ बैठ गए।
श्लोक 20 (5.177.20)
ततः पूर्वव्यतीतानि कथयन्तौ स्म तावुभौ । आसातां जामदग्न्यश्च सृञ्जयश्चैव भारत ॥
tataḥ pūrvavyatītāni kathayantau sma tāvubhau | āsātāṃ jāmadagnyaśca sṛñjayaścaiva bhārata
हे भारत, फिर जामदग्न्य और सृंजय दोनों बीती बातों की चर्चा करते हुए बैठे रहे।
श्लोक 21 (5.177.21)
तथा कथान्ते राजर्षिर्भृगुश्रेष्ठं महाबलम् । उवाच मधुरं काले रामं वचनमर्थवत् ॥
tathā kathānte rājarṣirbhṛguśreṣṭhaṃ mahābalam | uvāca madhuraṃ kāle rāmaṃ vacanamarthavat
फिर बातचीत के अन्त में राजर्षि ने उचित अवसर देखकर भृगुश्रेष्ठ, महाबली राम से मधुर और सार्थक वचन कहे—
होत्रवाहन उवाच
श्लोक 22 (5.177.22)
रामेयं मम दौहित्री काशिराजसुता प्रभो । अस्याः शृणु यथातत्त्वं कार्यं कार्यविशारद ॥
rāmeyaṃ mama dauhitrī kāśirājasutā prabho | asyāḥ śṛṇu yathātattvaṃ kāryaṃ kāryaviśārada
"हे प्रभो राम, यह मेरी दौहित्री है, काशिराज की पुत्री। हे कार्यकुशल, इसका जो कार्य है, उसे इससे ठीक-ठीक सुनिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (5.177.23)
परमं कथ्यतां चेति तां रामः प्रत्यभाषत । ततः साभ्यवदद्रामं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥
paramaṃ kathyatāṃ ceti tāṃ rāmaḥ pratyabhāṣata | tataḥ sābhyavadadrāmaṃ jvalantamiva pāvakam
"जो तुम्हें सबसे अधिक कहना है, वह कहो," राम ने उससे कहा। तब वह अग्नि के समान प्रज्वलित राम से बोली।
श्लोक 24 (5.177.24)
ततोऽभिवाद्य चरणौ रामस्य शिरसा शुभौ । स्पृष्ट्वा पद्मदलाभाभ्यां पाणिभ्यामग्रतः स्थिता ॥
tato'bhivādya caraṇau rāmasya śirasā śubhau | spṛṣṭvā padmadalābhābhyāṃ pāṇibhyāmagrataḥ sthitā
राम के शुभ चरणों में सिर झुकाकर और कमल-दल जैसे हाथों से उन्हें छूकर वह उनके सामने खड़ी हो गई।
श्लोक 25 (5.177.25)
रुरोद सा शोकवती बाष्पव्याकुललोचना । प्रपेदे शरणं चैव शरण्यं भृगुनन्दनम् ॥
ruroda sā śokavatī bāṣpavyākulalocanā | prapede śaraṇaṃ caiva śaraṇyaṃ bhṛgunandanam
शोक से भरी, आँसुओं से धुँधली आँखों वाली वह रो पड़ी और शरणदाता भृगुनन्दन की शरण में गई।
राम उवाच
श्लोक 26 (5.177.26)
यथा त्वं सृंजयस्यास्य तथा मे त्वं नृपात्मजे । ब्रूहि यत्ते मनोदुःखं करिष्ये वचनं तव ॥
yathā tvaṃ sṛṃjayasyāsya tathā me tvaṃ nṛpātmaje | brūhi yatte manoduḥkhaṃ kariṣye vacanaṃ tava
हे राजकुमारी, जैसे तुम इन सृंजय की हो, वैसे ही मेरी भी हो। अपने मन का दुःख बताओ; मैं तुम्हारा कहा करूँगा।
अम्बोवाच
श्लोक 27 (5.177.27)
भगवञ्शरणं त्वाद्य प्रपन्नाऽस्मि महाव्रतम् । शोकपङ्कार्णवान्मग्नं घोरादुद्धर मां विभो ॥
bhagavañśaraṇaṃ tvādya prapannā'smi mahāvratam | śokapaṅkārṇavānmagnaṃ ghorāduddhara māṃ vibho
भगवन्, हे महाव्रती, आज मैं आपकी शरण में आई हूँ। हे विभो, शोक के भयंकर कीचड़ भरे सागर में डूबी हुई मुझको उबार लीजिए।
भीष्म उवाच
श्लोक 28 (5.177.28)
तस्याश्च दृष्ट्वा रूपं च वपुश्चाभिनवं पुनः । सौकुमार्यं परं चैव रामश्चिन्तापरोऽभवत् ॥
tasyāśca dṛṣṭvā rūpaṃ ca vapuścābhinavaṃ punaḥ | saukumāryaṃ paraṃ caiva rāmaścintāparo'bhavat
उसका रूप, नवयौवन से युक्त शरीर और अत्यन्त सुकुमारता देखकर राम चिन्ता में पड़ गए।
श्लोक 29 (5.177.29)
किमियं वक्ष्यतीत्येवं विममर्श भृगूद्वहः । इति दध्यौ चिरं रामः कृपयाभिपरिप्लुतः ॥
kimiyaṃ vakṣyatītyevaṃ vimamarśa bhṛgūdvahaḥ | iti dadhyau ciraṃ rāmaḥ kṛpayābhipariplutaḥ
"यह क्या कहेगी?" — भृगुकुलश्रेष्ठ इस प्रकार सोचने लगे; करुणा से भरे राम देर तक इसी चिन्तन में रहे।
श्लोक 30 (5.177.30)
कथ्यतामिति सा भूयो रामेणोक्ता शुचिस्मिता । सर्वमेव यथातत्त्वं कथयामास भार्गवे ॥
kathyatāmiti sā bhūyo rāmeṇoktā śucismitā | sarvameva yathātattvaṃ kathayāmāsa bhārgave
राम के फिर कहने पर कि "कहो", उस मधुर मुस्कान वाली कन्या ने भार्गव को सारी बात ज्यों की त्यों बता दी।
श्लोक 31 (5.177.31)
तच्छ्रुत्वा जामदग्न्यस्तु राजपुत्र्या वचस्तदा । उवाच तां वरारोहां निश्चित्यार्थविनिश्चयम् ॥
tacchrutvā jāmadagnyastu rājaputryā vacastadā | uvāca tāṃ varārohāṃ niścityārthaviniścayam
राजकुमारी की वह बात सुनकर जमदग्नि-पुत्र ने अपना निश्चय करके उस सुन्दरी से कहा—
राम उवाच
श्लोक 32 (5.177.32)
प्रेषयिष्यामि भीष्माय कुरुश्रेष्ठाय भामिनि । करिष्यति वचो मह्यं श्रुत्वा च स नराधिपः ॥
preṣayiṣyāmi bhīṣmāya kuruśreṣṭhāya bhāmini | kariṣyati vaco mahyaṃ śrutvā ca sa narādhipaḥ
हे भामिनी, मैं कुरुश्रेष्ठ भीष्म के पास सन्देश भेजूँगा। वह नरेश उसे सुनकर मेरी बात मानेगा।
श्लोक 33 (5.177.33)
न चेत्करिष्यति वचो मयोक्तं जाह्नवीसुतः । धक्ष्याम्यहं रणे भद्रे सामात्यं शस्त्रतेजसा ॥
na cetkariṣyati vaco mayoktaṃ jāhnavīsutaḥ | dhakṣyāmyahaṃ raṇe bhadre sāmātyaṃ śastratejasā
हे भद्रे, यदि जाह्नवीपुत्र मेरी कही बात नहीं मानेगा, तो मैं युद्ध में अपने शस्त्रों के तेज से उसे उसके मन्त्रियों सहित भस्म कर दूँगा।
श्लोक 34 (5.177.34)
अथवा ते मतिस्तत्र राजपुत्रि न वर्तते । यावत्साल्वपतिं वीरं योजयाम्यत्र कर्मणि ॥
athavā te matistatra rājaputri na vartate | yāvatsālvapatiṃ vīraṃ yojayāmyatra karmaṇi
अथवा हे राजकुमारी, यदि तुम्हारा मन उस ओर नहीं है, तो मैं वीर शाल्वराज को ही इस कार्य में लगा देता हूँ।
अम्बोवाच
श्लोक 35 (5.177.35)
विसर्जिताऽहं भीष्मेण श्रुत्वैव भृगुनन्दन । साल्वराजगतं भावं मम पूर्वं मनीषितम् ॥
visarjitā'haṃ bhīṣmeṇa śrutvaiva bhṛgunandana | sālvarājagataṃ bhāvaṃ mama pūrvaṃ manīṣitam
हे भृगुनन्दन, जैसे ही भीष्म ने सुना कि मेरा मन पहले से शाल्वराज में लगा है, उन्होंने मुझे विदा कर दिया।
श्लोक 36 (5.177.36)
सौभराजमुपेत्याहमवोचं दुर्वचं वचः । न च मां प्रत्यगृह्णात्स चारित्र्यपरिशङ्कितः ॥
saubharājamupetyāhamavocaṃ durvacaṃ vacaḥ | na ca māṃ pratyagṛhṇātsa cāritryapariśaṅkitaḥ
मैं सौभराज के पास गई और ऐसी बात कही जिसे कहना कठिन था; पर मेरे चरित्र पर शंका करके उसने मुझे स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 37 (5.177.37)
एतत्सर्वं विनिश्चित्य स्वबुद्ध्या भृगुनन्दन । यदत्रौपयिकं कार्यं तच्चिन्तयितुमर्हसि ॥
etatsarvaṃ viniścitya svabuddhyā bhṛgunandana | yadatraupayikaṃ kāryaṃ taccintayitumarhasi
हे भृगुनन्दन, अपनी बुद्धि से इन सब बातों का निश्चय करके आप सोचें कि यहाँ क्या उपाय उचित है।
श्लोक 38 (5.177.38)
मम तु व्यसनस्यास्य भीष्मो मूलं महाव्रतः । येनाहं वशमानीता समुत्क्षिप्य बलात्तदा ॥
mama tu vyasanasyāsya bhīṣmo mūlaṃ mahāvrataḥ | yenāhaṃ vaśamānītā samutkṣipya balāttadā
परन्तु मेरी इस विपत्ति का मूल महाव्रती भीष्म ही हैं, जिन्होंने उस समय बलपूर्वक उठाकर मुझे अपने वश में कर लिया।
श्लोक 39 (5.177.39)
भीष्मं जहि महाबाहो यत्कृते दुःखमीदृशम् । प्राप्ताहं भृगुशार्दूल चराम्यप्रियमुत्तमम् ॥
bhīṣmaṃ jahi mahābāho yatkṛte duḥkhamīdṛśam | prāptāhaṃ bhṛguśārdūla carāmyapriyamuttamam
हे महाबाहो, हे भृगुश्रेष्ठ, भीष्म का वध कीजिए, जिनके कारण मुझे ऐसा दुःख मिला है और मैं अत्यन्त अप्रिय दशा में भटक रही हूँ।
श्लोक 40 (5.177.40)
स हि लुब्धश्च नीचश्च जितकाशी च भार्गव । तस्मात्प्रतिक्रिया कर्तुं युक्ता तस्मै त्वयाऽनघ ॥
sa hi lubdhaśca nīcaśca jitakāśī ca bhārgava | tasmātpratikriyā kartuṃ yuktā tasmai tvayā'nagha
हे भार्गव, वह लोभी, नीच और विजय के मद में चूर है; इसलिए हे निष्पाप, आपका उससे बदला लेना उचित है।
श्लोक 41 (5.177.41)
एष मे ह्रियमाणाया भारतेन तदा विभो । अभवद्धृदि संकल्पो घातयेयं महाव्रतम् ॥
eṣa me hriyamāṇāyā bhāratena tadā vibho | abhavaddhṛdi saṃkalpo ghātayeyaṃ mahāvratam
हे विभो, उस समय जब भरतवंशी भीष्म मुझे हरकर ले जा रहे थे, तभी मेरे हृदय में यह संकल्प उठा था कि मैं उन महाव्रती का वध करवाऊँगी।
श्लोक 42 (5.177.42)
तस्मात्कामं ममाद्येमं राम संपादयानघ । जहि भीष्मं महाबाहो यथा वृत्रं पुरन्दरः ॥
tasmātkāmaṃ mamādyemaṃ rāma saṃpādayānagha | jahi bhīṣmaṃ mahābāho yathā vṛtraṃ purandaraḥ
इसलिए हे निष्पाप राम, आज मेरी यह कामना पूरी कीजिए। हे महाबाहो, जैसे पुरन्दर (इन्द्र) ने वृत्र को मारा था, वैसे ही भीष्म का वध कीजिए।