उद्योग पर्व · अध्याय 176
अम्बा और उसके नाना होत्रवाहन
भीष्म अम्बा की कथा आगे सुनाते हैं। वन के तपस्वी विचार करते हैं कि उसका क्या किया जाए और उसे पिता के घर लौट जाने की सलाह देते हैं, पर वह मना करके तप करने का निश्चय करती है। तभी उसकी माता के पिता राजर्षि होत्रवाहन वहाँ आते हैं, उसकी कथा सुनते हैं और उसे जमदग्नि-पुत्र परशुराम के पास भेजते हैं। परशुराम के अनुचर अकृतव्रण वहाँ प्रकट होते हैं, और होत्रवाहन उन्हें बताते हैं कि भीष्म किस प्रकार काशी की तीनों राजकुमारियों को हर ले गए और शाल्व ने अम्बा को ठुकरा दिया; अम्बा कहती है कि राम जो कहेंगे वही वह करेगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.176.1)
ततस्ते तापसाः सर्वे कार्यवन्तोऽभवंस्तदा । तां कन्यां चिन्तयन्तस्ते किंकार्यमिति धर्मिणः ॥
tataste tāpasāḥ sarve kāryavanto'bhavaṃstadā | tāṃ kanyāṃ cintayantaste kiṃkāryamiti dharmiṇaḥ
तब वे सभी तपस्वी कर्तव्य की चिन्ता में पड़ गए। वे धर्मात्मा उस कन्या के विषय में सोचने लगे कि अब क्या किया जाए।
श्लोक 2 (5.176.2)
केचिदाहुः पितुर्वेश्म नीयतामिति तापसाः । केचिदस्मदुपालम्भे मतिं चक्रुर्हि तापसाः ॥
kecidāhuḥ piturveśma nīyatāmiti tāpasāḥ | kecidasmadupālambhe matiṃ cakrurhi tāpasāḥ
कुछ तपस्वियों ने कहा कि इसे इसके पिता के घर पहुँचा दिया जाए; कुछ ने मुझे उलाहना देने का विचार किया।
श्लोक 3 (5.176.3)
केचित्साल्वपतिं गत्वा नियोज्यमिति मेनिरे । नेति केचिद्व्यवस्यन्ति प्रत्याख्याता हि तेन सा ॥
kecitsālvapatiṃ gatvā niyojyamiti menire | neti kecidvyavasyanti pratyākhyātā hi tena sā
कुछ ने सोचा कि शाल्वराज के पास जाकर उसे इसके लिए प्रेरित किया जाए; पर कुछ ने इसे ठीक नहीं समझा, क्योंकि वह इसे पहले ही ठुकरा चुका था।
श्लोक 4 (5.176.4)
एवं गते तु किं शक्यं भद्रे कर्तुं मनीषिभिः । पुनरूचुश्च तां सर्वे तापसाः संशितव्रताः ॥
evaṃ gate tu kiṃ śakyaṃ bhadre kartuṃ manīṣibhiḥ | punarūcuśca tāṃ sarve tāpasāḥ saṃśitavratāḥ
"हे भद्रे, ऐसी स्थिति में बुद्धिमान लोग क्या कर सकते हैं?" फिर कठोर व्रत वाले सभी तपस्वी उससे दोबारा बोले।
तापसा ऊचुः
श्लोक 5 (5.176.5)
अलं प्रव्रजितेनेह भद्रे शृणु हितं वचः । इतो गच्छस्व भद्रं ते पितुरेव निवेशनम् ॥
alaṃ pravrajiteneha bhadre śṛṇu hitaṃ vacaḥ | ito gacchasva bhadraṃ te pitureva niveśanam
"हे भद्रे, यहाँ संन्यास लेने की बात छोड़ो और अपने हित की बात सुनो। तुम्हारा कल्याण हो — यहाँ से अपने पिता के ही घर चली जाओ।
श्लोक 6 (5.176.6)
प्रतिपत्स्यति राजा स पिता ते यदनन्तरम् । तत्र वत्स्यसि कल्याणि सुखं सर्वगुणान्विता ॥
pratipatsyati rājā sa pitā te yadanantaram | tatra vatsyasi kalyāṇi sukhaṃ sarvaguṇānvitā
तुम्हारे पिता राजा आगे जो करना होगा, उसकी व्यवस्था करेंगे। हे कल्याणी, सब गुणों से सम्पन्न तुम वहाँ सुख से रहोगी।
श्लोक 7 (5.176.7)
न च तेऽन्या गतिर्न्याय्या भवेद्भद्रे यथा पिता । पतिर्वापि गतिर्नार्याः पिता वा वरवर्णिनि । गतिः पतिः समस्थाया विषमे च पिता गतिः ॥
na ca te'nyā gatirnyāyyā bhavedbhadre yathā pitā | patirvāpi gatirnāryāḥ pitā vā varavarṇini | gatiḥ patiḥ samasthāyā viṣame ca pitā gatiḥ
हे भद्रे, तुम्हारे लिए पिता के समान कोई दूसरा आश्रय उचित नहीं है। हे सुन्दरी, स्त्री का आश्रय या तो पति है या पिता — अच्छे समय में पति आश्रय है और विपत्ति में पिता।
श्लोक 8 (5.176.8)
प्रव्रज्या हि सुदुःखेयं सुकुमार्या विशेषतः । राजपुत्र्याः प्रकृत्या च कुमार्यास्तव भामिनि ॥
pravrajyā hi suduḥkheyaṃ sukumāryā viśeṣataḥ | rājaputryāḥ prakṛtyā ca kumāryāstava bhāmini
संन्यास का यह जीवन बहुत कष्टदायक है, विशेषकर सुकुमार स्त्री के लिए; और हे भामिनी, तुम तो स्वभाव से ही सुख में पली राजकुमारी और कुमारी हो।
श्लोक 9 (5.176.9)
भद्रे दोषा हि विद्यन्ते बहवो वरवर्णिनि । आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेयुः पितुर्गृहे ॥
bhadre doṣā hi vidyante bahavo varavarṇini | āśrame vai vasantyāste na bhaveyuḥ piturgṛhe
हे भद्रे, हे सुन्दरी, आश्रम में रहते हुए तुम्हारे सामने बहुत-से कष्ट आएँगे, जो पिता के घर में नहीं आएँगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (5.176.10)
ततस्त्वन्येऽब्रुवन्वाक्यं तापसास्तां तपस्विनीम् ॥
tatastvanye'bruvanvākyaṃ tāpasāstāṃ tapasvinīm
तब दूसरे तपस्वियों ने उस तपस्विनी से यह बात कही—
तापसा ऊचुः
श्लोक 11 (5.176.11)
त्वामिहैकाकिनीं दृष्ट्वा निर्जने गहने वने । प्रार्थयिष्यन्ति राजानस्तस्मान्मैवं मनः कृथाः ॥
tvāmihaikākinīṃ dṛṣṭvā nirjane gahane vane | prārthayiṣyanti rājānastasmānmaivaṃ manaḥ kṛthāḥ
"इस निर्जन, घने वन में तुम्हें अकेली देखकर राजा लोग तुम्हें पाना चाहेंगे; इसलिए ऐसा विचार मत करो।"
अम्बोवाच
श्लोक 12 (5.176.12)
न शक्यं काशिनगरं पुनर्गन्तुं पितुर्गृहान् । अवज्ञाता भविष्यामि बान्धवानां न संशयः ॥
na śakyaṃ kāśinagaraṃ punargantuṃ piturgṛhān | avajñātā bhaviṣyāmi bāndhavānāṃ na saṃśayaḥ
मैं काशी नगरी में अपने पिता के घर फिर नहीं जा सकती। वहाँ मैं अपने बन्धु-बान्धवों में अपमानित होऊँगी, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 13 (5.176.13)
उषितास्मि तथा बाल्ये पितुर्वेश्मनि तापसाः । नाहं गमिष्ये भद्रं वस्तत्र यत्र पिता मम । तपस्तप्तुमभीप्सामि तापसैः परिरक्षिता ॥
uṣitāsmi tathā bālye piturveśmani tāpasāḥ | nāhaṃ gamiṣye bhadraṃ vastatra yatra pitā mama | tapastaptumabhīpsāmi tāpasaiḥ parirakṣitā
हे तपस्वियो, बचपन में मैं पिता के घर रह चुकी हूँ। आपका कल्याण हो, जहाँ मेरे पिता हैं वहाँ मैं नहीं जाऊँगी। तपस्वियों के संरक्षण में रहकर मैं तप करना चाहती हूँ।
श्लोक 14 (5.176.14)
यथा परेऽपि मे लोके न स्यादेवं महात्ययः । दौर्भाग्यं तापसश्रेष्ठास्तस्मात्तप्स्याम्यहं तपः ॥
yathā pare'pi me loke na syādevaṃ mahātyayaḥ | daurbhāgyaṃ tāpasaśreṣṭhāstasmāttapsyāmyahaṃ tapaḥ
हे श्रेष्ठ तपस्वियो, जिससे परलोक में भी मुझ पर ऐसी विपत्ति और ऐसा दुर्भाग्य न आए, इसलिए मैं तप करूँगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (5.176.15)
इत्येवं तेषु विप्रेषु चिन्तयत्सु यथातथम् । राजर्षिस्तद्वनं प्राप्तस्तपस्वी होत्रवाहनः । तां तथा भाविनीं दृष्ट्वा श्रुत्वा चोद्विग्नमानसः ॥
ityevaṃ teṣu vipreṣu cintayatsu yathātatham | rājarṣistadvanaṃ prāptastapasvī hotravāhanaḥ | tāṃ tathā bhāvinīṃ dṛṣṭvā śrutvā codvignamānasaḥ
जब वे ब्राह्मण इस प्रकार विचार कर रहे थे, तभी तपस्वी राजर्षि होत्रवाहन उस वन में आ पहुँचे। उस युवती को उस दशा में देखकर और उसकी बात सुनकर उनका मन उद्विग्न हो गया।
श्लोक 16 (5.176.16)
ततस्ते तापसाः सर्वे पूजयन्ति स्म तं नृपम् । पूजाभिः स्वागताद्याभिरासनेनोदकेन च ॥
tataste tāpasāḥ sarve pūjayanti sma taṃ nṛpam | pūjābhiḥ svāgatādyābhirāsanenodakena ca
तब सभी तपस्वियों ने स्वागत आदि सत्कारों से, आसन और जल देकर उस राजा का सम्मान किया।
श्लोक 17 (5.176.17)
तस्योपविष्टस्य सतो विश्रान्तस्योपशृण्वतः । पुनरेव कथां चक्रुः कन्यां प्रति वनौकसः ॥
tasyopaviṣṭasya sato viśrāntasyopaśṛṇvataḥ | punareva kathāṃ cakruḥ kanyāṃ prati vanaukasaḥ
जब वे बैठकर विश्राम कर चुके और सुनने लगे, तब वनवासी फिर उस कन्या के विषय में चर्चा करने लगे।
श्लोक 18 (5.176.18)
अम्बायास्तां कथां श्रुत्वा काशिराज्ञश्च भारत । राजर्षिः स महातेजा बभूवोद्विग्नमानसः ॥
ambāyāstāṃ kathāṃ śrutvā kāśirājñaśca bhārata | rājarṣiḥ sa mahātejā babhūvodvignamānasaḥ
हे भारत, अम्बा और काशिराज की वह कथा सुनकर वे महातेजस्वी राजर्षि मन में व्याकुल हो उठे।
श्लोक 19 (5.176.19)
तां तथावादिनीं श्रुत्वा दृष्ट्वा च स महातपाः । राजर्षिः कृपयाविष्टो महात्मा होत्रवाहनः ॥
tāṃ tathāvādinīṃ śrutvā dṛṣṭvā ca sa mahātapāḥ | rājarṣiḥ kṛpayāviṣṭo mahātmā hotravāhanaḥ
उसे ऐसा कहते सुनकर और देखकर वे महातपस्वी, महात्मा राजर्षि होत्रवाहन करुणा से भर गए।
श्लोक 20 (5.176.20)
स वेपमान उत्थाय मातुस्तस्याः पिता तदा । तां कन्यामङ्कमारोप्य पर्याश्वासयत प्रभो ॥
sa vepamāna utthāya mātustasyāḥ pitā tadā | tāṃ kanyāmaṅkamāropya paryāśvāsayata prabho
हे प्रभो, वे काँपते हुए उठे — वे उसकी माता के पिता थे — और उस कन्या को गोद में बिठाकर उसे ढाढ़स बँधाने लगे।
श्लोक 21 (5.176.21)
स तामपृच्छत्कार्त्स्न्येन व्यसनोत्पत्तिमादितः । सा च तस्मै यथावृत्तं विस्तरेण न्यवेदयत् ॥
sa tāmapṛcchatkārtsnyena vyasanotpattimāditaḥ | sā ca tasmai yathāvṛttaṃ vistareṇa nyavedayat
उन्होंने उससे आरम्भ से पूरी बात पूछी कि उसकी यह विपत्ति कैसे उत्पन्न हुई, और उसने उन्हें सारा वृत्तान्त विस्तार से बता दिया।
श्लोक 22 (5.176.22)
ततः स राजर्षिरभूद्दुःखशोकसमन्वितः । कार्यं च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपाः ॥
tataḥ sa rājarṣirabhūdduḥkhaśokasamanvitaḥ | kāryaṃ ca pratipede tanmanasā sumahātapāḥ
तब वे राजर्षि दुःख और शोक से भर गए, और उन महातपस्वी ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि क्या करना है।
श्लोक 23 (5.176.23)
अब्रवीद्वेपमानश्च कन्यामार्तां सुदुःखितः । मा गाः पितुर्गृहं भद्रे मातुस्ते जनको ह्यहम् ॥
abravīdvepamānaśca kanyāmārtāṃ suduḥkhitaḥ | mā gāḥ piturgṛhaṃ bhadre mātuste janako hyaham
काँपते हुए और अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने उस पीड़ित कन्या से कहा — "हे भद्रे, पिता के घर मत जाओ; मैं तुम्हारी माता का पिता हूँ।
होत्रवाहन उवाच
श्लोक 24 (5.176.24)
दुःखं छिन्द्यामहं ते वै मयि वर्तस्व पुत्रिके । पर्याप्तं ते मनो वत्से यदेवं परिशुष्यसि ॥
duḥkhaṃ chindyāmahaṃ te vai mayi vartasva putrike | paryāptaṃ te mano vatse yadevaṃ pariśuṣyasi
मैं तुम्हारा दुःख दूर करूँगा; बेटी, मेरा आश्रय लो। वत्से, तुम्हारा मन बहुत सह चुका है, जो तुम इस प्रकार घुलती जा रही हो।
श्लोक 25 (5.176.25)
गच्छ मद्वचनाद्रामं जामदग्न्यं तपस्विनम् । रामस्ते सुमहद्दुःखं शोकं चैवापनेष्यति ॥
gaccha madvacanādrāmaṃ jāmadagnyaṃ tapasvinam | rāmaste sumahadduḥkhaṃ śokaṃ caivāpaneṣyati
मेरे कहने से तुम जमदग्नि-पुत्र तपस्वी परशुराम के पास जाओ। राम तुम्हारे महान दुःख और शोक को दूर कर देंगे।
श्लोक 26 (5.176.26)
हनिष्यति रणे भीष्मं न करिष्यति चेद्वचः । तं गच्छ भार्गवश्रेष्ठं कालाग्निसमतेजसम् ॥
haniṣyati raṇe bhīṣmaṃ na kariṣyati cedvacaḥ | taṃ gaccha bhārgavaśreṣṭhaṃ kālāgnisamatejasam
यदि भीष्म उनकी बात न मानेंगे तो वे युद्ध में भीष्म का वध कर देंगे। प्रलयकाल की अग्नि के समान तेजस्वी उन भृगुश्रेष्ठ के पास जाओ।
भीष्म उवाच
श्लोक 27 (5.176.27)
प्रतिष्ठापयिता स त्वां समे पथि महातपाः । ततस्तु सुस्वरं बाष्पमुत्सृजन्ती पुनः पुनः ॥
pratiṣṭhāpayitā sa tvāṃ same pathi mahātapāḥ | tatastu susvaraṃ bāṣpamutsṛjantī punaḥ punaḥ
"वे महातपस्वी तुम्हें सम मार्ग पर स्थापित कर देंगे।" तब बार-बार ऊँचे स्वर में रोती और आँसू बहाती हुई,
श्लोक 28 (5.176.28)
अब्रवीत्पितरं मातुः सा तदा होत्रवाहनम् । अभिवादयित्वा शिरसा गमिष्ये तव शासनात् ॥
abravītpitaraṃ mātuḥ sā tadā hotravāhanam | abhivādayitvā śirasā gamiṣye tava śāsanāt
उसने अपनी माता के पिता होत्रवाहन से कहा — "आपको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं आपकी आज्ञा से जाऊँगी।
अम्बोवाच
श्लोक 29 (5.176.29)
अपि नामाद्य पश्येयमार्यं तं लोकविश्रुतम् । कथं च तीव्रं दुःखं मे नाशयिष्यति भार्गवः । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं यथा यास्यामि तत्र वै ॥
api nāmādya paśyeyamāryaṃ taṃ lokaviśrutam | kathaṃ ca tīvraṃ duḥkhaṃ me nāśayiṣyati bhārgavaḥ | etadicchāmyahaṃ jñātuṃ yathā yāsyāmi tatra vai
क्या मैं आज ही उन लोकविख्यात आर्य के दर्शन कर पाऊँगी? और भार्गव मेरा यह तीव्र दुःख कैसे नष्ट करेंगे? मैं यह जानना चाहती हूँ, और यह भी कि मैं वहाँ कैसे जाऊँगी।"
होत्रवाहन उवाच
श्लोक 30 (5.176.30)
रामं द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने । उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसन्धं महाबलम् ॥
rāmaṃ drakṣyasi bhadre tvaṃ jāmadagnyaṃ mahāvane | ugre tapasi vartantaṃ satyasandhaṃ mahābalam
हे भद्रे, तुम महावन में जमदग्नि-पुत्र राम को देखोगी, जो उग्र तपस्या में लगे हैं, सत्यप्रतिज्ञ और महाबली हैं।
श्लोक 31 (5.176.31)
महेन्द्रं वै गिरिश्रेष्ठं रामो नित्यमुपास्ति ह । ऋषयो वेदविद्वांसो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥
mahendraṃ vai giriśreṣṭhaṃ rāmo nityamupāsti ha | ṛṣayo vedavidvāṃso gandharvāpsarasastathā
राम सदा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र पर रहते हैं; वहाँ वेदज्ञ ऋषि, गन्धर्व और अप्सराएँ भी रहते हैं।
श्लोक 32 (5.176.32)
तत्र गच्छस्व भद्रं ते ब्रूयाश्चैनं वचो मम । अभिवाद्य च तं मूर्ध्ना तपोवृद्धं दृढव्रतम् ॥
tatra gacchasva bhadraṃ te brūyāścainaṃ vaco mama | abhivādya ca taṃ mūrdhnā tapovṛddhaṃ dṛḍhavratam
तुम्हारा कल्याण हो, वहाँ जाओ और तप में बढ़े-चढ़े, दृढ़व्रती उन मुनि को सिर झुकाकर प्रणाम करके मेरा सन्देश कहना।
श्लोक 33 (5.176.33)
ब्रूयाश्चैनं पुनर्भद्रे यत्ते कार्यं मनीषितम् । मयि संकीर्तिते रामः सर्वं तत्ते करिष्यति ॥
brūyāścainaṃ punarbhadre yatte kāryaṃ manīṣitam | mayi saṃkīrtite rāmaḥ sarvaṃ tatte kariṣyati
हे भद्रे, फिर तुम उनसे अपना मनचाहा कार्य कहना। मेरा नाम लेने पर राम तुम्हारा सब कार्य कर देंगे।
श्लोक 34 (5.176.34)
मम रामः सखा वत्से प्रीतियुक्तः सुहृच्च मे । जमदग्निसुतो वीरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
mama rāmaḥ sakhā vatse prītiyuktaḥ suhṛcca me | jamadagnisuto vīraḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
बेटी, जमदग्नि-पुत्र वीर राम, जो सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं, मेरे स्नेही सखा और हितैषी हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 35 (5.176.35)
एवं ब्रुवति कन्यां तु पार्थिवे होत्रवाहने । अकृतव्रणः प्रादुरासीद्रामस्यानुचरः प्रियः ॥
evaṃ bruvati kanyāṃ tu pārthive hotravāhane | akṛtavraṇaḥ prādurāsīdrāmasyānucaraḥ priyaḥ
राजा होत्रवाहन जब कन्या से इस प्रकार कह रहे थे, तभी परशुराम के प्रिय अनुचर अकृतव्रण वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 36 (5.176.36)
ततस्ते मुनयः सर्वे समुत्तस्थुः सहस्रशः । स च राजा वयोवृद्धः सृञ्जयो होत्रवाहनः ॥
tataste munayaḥ sarve samuttasthuḥ sahasraśaḥ | sa ca rājā vayovṛddhaḥ sṛñjayo hotravāhanaḥ
तब सभी मुनि, जो हजारों की संख्या में थे, उठ खड़े हुए; और वृद्ध राजा सृंजयवंशी होत्रवाहन भी उठे।
श्लोक 37 (5.176.37)
ततो दृष्ट्वा कृतातिथ्यमन्योन्यं ते वनौकसः । सहिता भरतश्रेष्ठ निषेदुः परिवार्य तम् ॥
tato dṛṣṭvā kṛtātithyamanyonyaṃ te vanaukasaḥ | sahitā bharataśreṣṭha niṣeduḥ parivārya tam
हे भरतश्रेष्ठ, फिर एक-दूसरे से मिलकर और आतिथ्य-सत्कार करके वे वनवासी एक साथ उन्हें घेरकर बैठ गए।
श्लोक 38 (5.176.38)
ततस्ते कथयामासुः कथास्तास्ता मनोरमाः । धन्या दिव्याश्च राजेन्द्र प्रीतिहर्षमुदा युताः ॥
tataste kathayāmāsuḥ kathāstāstā manoramāḥ | dhanyā divyāśca rājendra prītiharṣamudā yutāḥ
हे राजेन्द्र, फिर वे प्रेम, हर्ष और आनन्द से भरी अनेक मनोरम, पुण्यमयी और दिव्य कथाएँ कहने लगे।
श्लोक 39 (5.176.39)
ततः कथान्ते राजर्षिर्महात्मा होत्रवाहनः । रामं श्रेष्ठं महर्षीणामपृच्छदकृतव्रणम् ॥
tataḥ kathānte rājarṣirmahātmā hotravāhanaḥ | rāmaṃ śreṣṭhaṃ maharṣīṇāmapṛcchadakṛtavraṇam
फिर कथा के अन्त में महात्मा राजर्षि होत्रवाहन ने अकृतव्रण से महर्षियों में श्रेष्ठ राम के विषय में पूछा—
होत्रवाहन उवाच
श्लोक 40 (5.176.40)
क्व संप्रति महाबाहो जामदग्न्यः प्रतापवान् । अकृतव्रण शक्यो वै द्रष्टुं वेदविदां वर ॥
kva saṃprati mahābāho jāmadagnyaḥ pratāpavān | akṛtavraṇa śakyo vai draṣṭuṃ vedavidāṃ vara
"हे महाबाहो, प्रतापी जामदग्न्य इस समय कहाँ हैं? हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ अकृतव्रण, क्या उनके दर्शन हो सकते हैं?"
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 41 (5.176.41)
भवन्तमेव सततं रामः कीर्तयति प्रभो । सृञ्जयो मे प्रियसखो राजर्षिरिति पार्थिव ॥
bhavantameva satataṃ rāmaḥ kīrtayati prabho | sṛñjayo me priyasakho rājarṣiriti pārthiva
हे प्रभो, हे राजन्, राम निरन्तर आपकी ही चर्चा करते रहते हैं — "राजर्षि सृंजय मेरे प्रिय सखा हैं।"
श्लोक 42 (5.176.42)
इह रामः प्रभाते श्वो भवितेति मतिर्मम । द्रष्टास्येनमिहायान्तं तव दर्शनकाङ्क्षया ॥
iha rāmaḥ prabhāte śvo bhaviteti matirmama | draṣṭāsyenamihāyāntaṃ tava darśanakāṅkṣayā
मेरा विचार है कि कल प्रातःकाल राम यहाँ होंगे। आप उन्हें आपसे मिलने की इच्छा से यहाँ आते देखेंगे।
श्लोक 43 (5.176.43)
इयं च कन्या राजर्षे किमर्थं वनमागता । कस्य चेयं तव च का भवतीच्छामि वेदितुम् ॥
iyaṃ ca kanyā rājarṣe kimarthaṃ vanamāgatā | kasya ceyaṃ tava ca kā bhavatīcchāmi veditum
हे राजर्षे, यह कन्या किसलिए वन में आई है? यह किसकी पुत्री है और आपकी क्या लगती है? मैं यह जानना चाहता हूँ।
होत्रवाहन उवाच
श्लोक 44 (5.176.44)
दौहित्रीयं मम विभो काशिराजसुता प्रिया । ज्येष्ठा स्वयंवरे तस्थौ भगिनीभ्यां सहानघ ॥
dauhitrīyaṃ mama vibho kāśirājasutā priyā | jyeṣṭhā svayaṃvare tasthau bhaginībhyāṃ sahānagha
हे विभो, यह मेरी दौहित्री (नातिन) है, काशिराज की प्रिय पुत्री। हे निष्पाप, यह सबसे बड़ी है और अपनी दो बहनों के साथ स्वयंवर में खड़ी हुई थी।
श्लोक 45 (5.176.45)
इयमम्बेति विख्याता ज्येष्ठा काशिपतेः सुता । अम्बिकाम्बालिके कन्ये कनीयस्यौ तपोधन ॥
iyamambeti vikhyātā jyeṣṭhā kāśipateḥ sutā | ambikāmbālike kanye kanīyasyau tapodhana
हे तपोधन, यह काशिराज की ज्येष्ठ पुत्री है, जो अम्बा नाम से विख्यात है; अम्बिका और अम्बालिका इसकी छोटी बहनें हैं।
श्लोक 46 (5.176.46)
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां ततोऽभवत् । कन्यानिमित्तं विप्रर्षे तत्रासीदुत्सवो महान् ॥
sametaṃ pārthivaṃ kṣatraṃ kāśipuryāṃ tato'bhavat | kanyānimittaṃ viprarṣe tatrāsīdutsavo mahān
हे विप्रर्षे, तब काशीपुरी में क्षत्रिय राजा एकत्र हुए, और कन्याओं के कारण वहाँ बड़ा उत्सव हुआ।
श्लोक 47 (5.176.47)
ततः किल महावीर्यो भीष्मः शान्तनवो नृपान् । अधिक्षिप्य महातेजास्तिस्त्रः कन्या जहार ताः ॥
tataḥ kila mahāvīryo bhīṣmaḥ śāntanavo nṛpān | adhikṣipya mahātejāstistraḥ kanyā jahāra tāḥ
कहते हैं, तब महापराक्रमी, महातेजस्वी शान्तनुपुत्र भीष्म राजाओं का तिरस्कार करके उन तीनों कन्याओं को हर ले गए।
श्लोक 48 (5.176.48)
निर्जित्य पृथिवीपालानथ भीष्मो गजाह्वयम् । आजगाम विशुद्धात्मा कन्याभिः सह भारतः ॥
nirjitya pṛthivīpālānatha bhīṣmo gajāhvayam | ājagāma viśuddhātmā kanyābhiḥ saha bhārataḥ
पृथ्वी के राजाओं को जीतकर शुद्धात्मा भरतवंशी भीष्म उन कन्याओं के साथ हस्तिनापुर आ गए।
श्लोक 49 (5.176.49)
सत्यवत्यै निवेद्याथ विवाहं समनन्तरम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य समाज्ञापयत प्रभुः ॥
satyavatyai nivedyātha vivāhaṃ samanantaram | bhrāturvicitravīryasya samājñāpayata prabhuḥ
सत्यवती को सूचित करके उन प्रभु ने तुरन्त ही अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह की आज्ञा दी।
श्लोक 50 (5.176.50)
तं तु वैवाहिकं दृष्ट्वा कन्येयं समुपार्जितम् । अब्रवीत्तत्र गाङ्गेयं मन्त्रिमध्ये द्विजर्षभ ॥
taṃ tu vaivāhikaṃ dṛṣṭvā kanyeyaṃ samupārjitam | abravīttatra gāṅgeyaṃ mantrimadhye dvijarṣabha
हे द्विजश्रेष्ठ, विवाह की तैयारी होती देखकर इस कन्या ने वहाँ मन्त्रियों के बीच गंगापुत्र से कहा—
श्लोक 51 (5.176.51)
मया साल्वपतिर्वीरो मनसाऽभिवृतः पतिः । न मामर्हसि धर्मज्ञ दातुं भ्रात्रेऽन्यमानसाम् ॥
mayā sālvapatirvīro manasā'bhivṛtaḥ patiḥ | na māmarhasi dharmajña dātuṃ bhrātre'nyamānasām
"मैंने मन ही मन वीर शाल्वराज को पति के रूप में वर लिया है। हे धर्मज्ञ, जिसका मन किसी और में लगा हो, ऐसी मुझे आप अपने भाई को न दें।"
श्लोक 52 (5.176.52)
तच्छ्रुत्वा वचनं भीष्मः संमन्त्र्य सह मन्त्रिभिः । निश्चित्य विससर्जेमां सत्यवत्या मते स्थितः ॥
tacchrutvā vacanaṃ bhīṣmaḥ saṃmantrya saha mantribhiḥ | niścitya visasarjemāṃ satyavatyā mate sthitaḥ
यह बात सुनकर भीष्म ने अपने मन्त्रियों से मन्त्रणा की और निश्चय करके, सत्यवती की सम्मति मानकर, इसे विदा कर दिया।
श्लोक 53 (5.176.53)
अनुज्ञाता तु भीष्मेण साल्वं सौभपतिं ततः । कन्येयं मुदिता तत्र काले वचनमब्रवीत् ॥
anujñātā tu bhīṣmeṇa sālvaṃ saubhapatiṃ tataḥ | kanyeyaṃ muditā tatra kāle vacanamabravīt
भीष्म से अनुमति पाकर इस कन्या ने प्रसन्न होकर उस समय सौभपति शाल्व से यह बात कही—
श्लोक 54 (5.176.54)
विसर्जितास्मि भीष्मेण धर्मं मां प्रतिपादय । मनसाभिवृतः पूर्वं मया त्वं पार्थिवर्षभ ॥
visarjitāsmi bhīṣmeṇa dharmaṃ māṃ pratipādaya | manasābhivṛtaḥ pūrvaṃ mayā tvaṃ pārthivarṣabha
"भीष्म ने मुझे विदा कर दिया है; धर्मपूर्वक मुझे स्वीकार कीजिए। हे नृपश्रेष्ठ, मैंने पहले ही मन से आपको वर लिया था।"
श्लोक 55 (5.176.55)
प्रत्याचख्यौ च साल्वोऽस्याश्चारित्रस्याभिशङ्कितः । सेयं तपोवनं प्राप्ता तापस्येऽभिरता भृशम् ॥
pratyācakhyau ca sālvo'syāścāritrasyābhiśaṅkitaḥ | seyaṃ tapovanaṃ prāptā tāpasye'bhiratā bhṛśam
परन्तु शाल्व ने इसके चरित्र पर शंका करके इसे ठुकरा दिया। इसलिए यह तपोवन में आ गई है और तपस्या में पूरी तरह लगी हुई है।
श्लोक 56 (5.176.56)
मया च प्रत्यभिज्ञाता वंशस्य परिकीर्तनात् । अस्य दुःखस्य चोत्पत्तिं भीष्ममेवेह मन्यते ॥
mayā ca pratyabhijñātā vaṃśasya parikīrtanāt | asya duḥkhasya cotpattiṃ bhīṣmameveha manyate
इसके वंश का परिचय सुनकर मैंने इसे पहचाना। यह मानती है कि इस दुःख का कारण केवल भीष्म ही हैं।
अम्बोवाच
श्लोक 57 (5.176.57)
भगवन्नेवमेवेह यथाह पृथिवीपतिः । शरीरकर्ता मातुर्मे सृञ्जयो होत्रवाहनः ॥
bhagavannevameveha yathāha pṛthivīpatiḥ | śarīrakartā māturme sṛñjayo hotravāhanaḥ
भगवन्, जैसा पृथ्वीपति ने कहा है, बात वैसी ही है। सृंजय होत्रवाहन मेरी माता के जन्मदाता हैं।
श्लोक 58 (5.176.58)
न ह्युत्सहे स्वनगरं प्रतियातुं तपोधन । अपमानभयाच्चैव व्रीडया च महामुने ॥
na hyutsahe svanagaraṃ pratiyātuṃ tapodhana | apamānabhayāccaiva vrīḍayā ca mahāmune
हे तपोधन, हे महामुने, अपमान के भय से और लज्जा के कारण मैं अपने नगर लौटने का साहस नहीं कर सकती।
श्लोक 59 (5.176.59)
यत्तु मां भगवान्रामो वक्ष्यति द्विजसत्तम । तन्मे कार्यतमं कार्यमिति मे भगवन्मतिः ॥
yattu māṃ bhagavānrāmo vakṣyati dvijasattama | tanme kāryatamaṃ kāryamiti me bhagavanmatiḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, भगवान राम मुझसे जो कहेंगे, वही मेरा सबसे बड़ा कर्तव्य होगा — भगवन्, यही मेरा निश्चय है।