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उद्योग पर्व · अध्याय 175

शाल्व द्वारा अम्बा का परित्याग

सत्यवती, मन्त्रियों और पुरोहितों की सहमति से भीष्म अम्बा को जाने देते हैं और वह शाल्वराज के पास पहुँचती है। शाल्व यह कहकर उसे अस्वीकार कर देता है कि जिस स्त्री को भीष्म हर ले गए, उसे वह पत्नी नहीं बना सकता। अम्बा विनती करती है कि उसे बलपूर्वक ले जाया गया था और उसने किसी अन्य पुरुष का कभी चिन्तन नहीं किया, परन्तु भीष्म से डरा हुआ शाल्व उसे लौटा देता है। निराश होकर नगर से निकलती अम्बा भीष्म, अपने पिता, शाल्व और स्वयं को दोष देती है, तप या युद्ध से भीष्म से प्रतिशोध लेने का निश्चय करती है और एक आश्रम में शरण लेती है, जहाँ वह शैखावत्य मुनि आदि तपस्वियों से तपस्वी जीवन अपनाने की अनुमति माँगती है।

अध्याय 174अध्याय-सूचीअध्याय 176

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (5.175.1)

ततोऽहं समनुज्ञाप्य कालीं गन्धवतीं तदा । मन्त्रिणश्चर्त्विजश्चैव तथैव च पुरोहितान् । समनुज्ञासिषं कन्यामम्बां ज्येष्ठां नराधिप ॥

tato'haṃ samanujñāpya kālīṃ gandhavatīṃ tadā | mantriṇaścartvijaścaiva tathaiva ca purohitān | samanujñāsiṣaṃ kanyāmambāṃ jyeṣṭhāṃ narādhipa

हे नरेश्वर, तब मैंने काली गन्धवती (सत्यवती), मन्त्रियों, ऋत्विजों और पुरोहितों की अनुमति लेकर सबसे बड़ी कन्या अम्बा को जाने की अनुमति दे दी।

श्लोक 2 (5.175.2)

अनुज्ञाता ययौ सा तु कन्या साल्वपतेः पुरम् । वृद्धैर्द्विजातिभिर्गुप्ता धात्र्या चानुगता तदा ॥

anujñātā yayau sā tu kanyā sālvapateḥ puram | vṛddhairdvijātibhirguptā dhātryā cānugatā tadā

अनुमति पाकर वह कन्या वृद्ध ब्राह्मणों की रक्षा में और अपनी धाय के साथ शाल्वराज के नगर को चली गई।

श्लोक 3 (5.175.3)

अतीत्य च तमध्वानमाससाद नराधिपम् । सा तमासाद्य राजानं साल्वं वचनमब्रवीत् ॥

atītya ca tamadhvānamāsasāda narādhipam | sā tamāsādya rājānaṃ sālvaṃ vacanamabravīt

वह मार्ग पार करके वह राजा के पास पहुँची, और शाल्वराज के पास जाकर उसने यह कहा —

अम्बोवाच

श्लोक 4 (5.175.4)

आगताहं महाबाहो त्वामुद्दिश्य महामते । अभिनन्दस्व मां राजन्सदा प्रियहिते रताम् ॥

āgatāhaṃ mahābāho tvāmuddiśya mahāmate | abhinandasva māṃ rājansadā priyahite ratām

हे महाबाहो, हे महामते, मैं आपके लिए ही आई हूँ। हे राजन्, मेरा अभिनन्दन कीजिए, मैं सदा आपके प्रिय और हित में लगी रहने वाली हूँ।

श्लोक 5 (5.175.5)

प्रतिपादय मां राजन्धर्मादींश्चर धर्मतः । त्वं हि मे मनसा ध्यातस्त्वया चाप्युपमन्त्रिता ॥

pratipādaya māṃ rājandharmādīṃścara dharmataḥ | tvaṃ hi me manasā dhyātastvayā cāpyupamantritā

हे राजन्, मुझे स्वीकार कीजिए और धर्म आदि का धर्मपूर्वक आचरण कीजिए; क्योंकि मैंने मन से आपका ही ध्यान किया है, और आपने भी मुझसे प्रणय-निवेदन किया था।

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (5.175.6)

तामब्रवीत्साल्वपतिः स्मयन्निव विशांपते । त्वयाऽन्यपूर्वया नाहं भार्यार्थी वरवर्णिनि ॥

tāmabravītsālvapatiḥ smayanniva viśāṃpate | tvayā'nyapūrvayā nāhaṃ bhāryārthī varavarṇini

हे प्रजापालक, शाल्वराज ने मानो मुस्कराते हुए उससे कहा — "हे सुन्दरी, जो पहले किसी दूसरे की हो चुकी है, उसे मैं पत्नी नहीं बनाना चाहता।"

साल्व उवाच

श्लोक 7 (5.175.7)

गच्छ भद्रे पुनस्तत्र सकाशं भीष्मकस्य वै । नाहमिच्छामि भीष्मेण गृहीतां त्वां प्रसह्य वै ॥

gaccha bhadre punastatra sakāśaṃ bhīṣmakasya vai | nāhamicchāmi bhīṣmeṇa gṛhītāṃ tvāṃ prasahya vai

हे भद्रे, तुम फिर वहीं भीष्म के पास लौट जाओ। भीष्म जिसे बलपूर्वक पकड़ ले गया, उस तुमको मैं नहीं चाहता।

श्लोक 8 (5.175.8)

त्वं हि भीष्मेण निर्जित्य नीता प्रीतिमती तदा । परामृश्य महायुद्धे निर्जित्य पृथिवीपतीन् ॥

tvaṃ hi bhīṣmeṇa nirjitya nītā prītimatī tadā | parāmṛśya mahāyuddhe nirjitya pṛthivīpatīn

क्योंकि भीष्म ने महायुद्ध में राजाओं को जीतकर तुम्हें पकड़ा और जीतकर ले गया, और तब तुम प्रसन्नतापूर्वक उसके साथ गई थीं।

श्लोक 9 (5.175.9)

नाहं त्वय्यन्यपूर्वायां भार्यार्थी वरवर्णिनि । कथमस्मद्विधो राजा परपूर्वां प्रवेशयेत् ॥

nāhaṃ tvayyanyapūrvāyāṃ bhāryārthī varavarṇini | kathamasmadvidho rājā parapūrvāṃ praveśayet

हे सुन्दरी, जो पहले दूसरे की हो चुकी है, ऐसी तुमको मैं पत्नी नहीं बनाना चाहता। मेरे जैसा राजा दूसरे की हो चुकी स्त्री को अपने घर में कैसे ला सकता है —

श्लोक 10 (5.175.10)

नारीं विदितविज्ञानः परेषां धर्ममादिशन् । यथेष्टं गम्यतां भद्रे मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ॥

nārīṃ viditavijñānaḥ pareṣāṃ dharmamādiśan | yatheṣṭaṃ gamyatāṃ bhadre mā tvāṃ kālo'tyagādayam

मैं जो ज्ञानवान् हूँ और दूसरों को धर्म का उपदेश देता हूँ? हे भद्रे, जहाँ इच्छा हो वहाँ चली जाओ; यह समय तुम्हारे हाथ से न निकल जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 11 (5.175.11)

अम्बा तमब्रवीद्राजन्ननङ्गशरपीडिता । नैवं वद महीपाल नैतदेवं कथंचन ॥

ambā tamabravīdrājannanaṅgaśarapīḍitā | naivaṃ vada mahīpāla naitadevaṃ kathaṃcana

हे राजन्, कामदेव के बाणों से पीड़ित अम्बा ने उससे कहा — "हे महीपाल, ऐसा मत कहिए; यह बात किसी प्रकार भी ऐसी नहीं है।"

अम्बोवाच

श्लोक 12 (5.175.12)

नास्मि प्रीतिमती नीता भीष्मेणामित्रकर्शन । बलान्नीतास्मि रुदती विद्राव्य पृथिवीपतीन् ॥

nāsmi prītimatī nītā bhīṣmeṇāmitrakarśana | balānnītāsmi rudatī vidrāvya pṛthivīpatīn

हे शत्रुनाशक, मैं भीष्म के साथ प्रसन्नता से नहीं गई थी। राजाओं को भगाकर वह मुझे रोती हुई को बलपूर्वक ले गया था।

श्लोक 13 (5.175.13)

भजस्व मां साल्वपते भक्तां बालामनागसम् । भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते ॥

bhajasva māṃ sālvapate bhaktāṃ bālāmanāgasam | bhaktānāṃ hi parityāgo na dharmeṣu praśasyate

हे शाल्वराज, मुझ निर्दोष, आपके प्रति अनुरक्त बाला को स्वीकार कीजिए; क्योंकि अनुरक्तों का त्याग किसी भी धर्म में प्रशंसनीय नहीं माना गया है।

श्लोक 14 (5.175.14)

साहमामन्त्र्य गाङ्गेयं समरेष्वनिवर्तिनम् । अनुज्ञाता च तेनैव ततोऽहं भृशमागता ॥

sāhamāmantrya gāṅgeyaṃ samareṣvanivartinam | anujñātā ca tenaiva tato'haṃ bhṛśamāgatā

युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले गङ्गापुत्र भीष्म से विदा लेकर और उन्हीं की अनुमति पाकर मैं बड़ी शीघ्रता से यहाँ आई हूँ।

श्लोक 15 (5.175.15)

न स भीष्मो महाबाहुर्मामिच्छति विशांपते । भ्रातृहेतोः समारम्भो भीष्मस्येति श्रुतं मया ॥

na sa bhīṣmo mahābāhurmāmicchati viśāṃpate | bhrātṛhetoḥ samārambho bhīṣmasyeti śrutaṃ mayā

हे प्रजापालक, वे महाबाहु भीष्म मुझे नहीं चाहते। मैंने सुना है कि भीष्म का यह सारा उपक्रम अपने भाई के लिए था।

श्लोक 16 (5.175.16)

भगिन्यौ मम ये नीते अम्बिकाम्बालिके नृप । प्रादाद्विचित्रवीर्याय गाङ्गेयो हि यवीयसे ॥

bhaginyau mama ye nīte ambikāmbālike nṛpa | prādādvicitravīryāya gāṅgeyo hi yavīyase

हे राजन्, मेरी जो दो बहनें अम्बिका और अम्बालिका साथ ले जाई गई थीं, उन्हें गङ्गापुत्र ने अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य को दे दिया है।

श्लोक 17 (5.175.17)

यथा साल्वपते नान्यं वरं यामि कथंचन । त्वामृते पुरुषव्याघ्र तथा मूर्धानमालभे ॥

yathā sālvapate nānyaṃ varaṃ yāmi kathaṃcana | tvāmṛte puruṣavyāghra tathā mūrdhānamālabhe

हे शाल्वराज, हे पुरुषसिंह, जैसे मैं आपके सिवा किसी अन्य को किसी प्रकार भी पति नहीं बनाना चाहती, वैसे ही मैं अपने सिर की शपथ लेती हूँ।

श्लोक 18 (5.175.18)

न चान्यपूर्वा राजेन्द्र त्वामहं समुपस्थिता । सत्यं ब्रवीमि साल्वैतत्सत्येनात्मानमालभे ॥

na cānyapūrvā rājendra tvāmahaṃ samupasthitā | satyaṃ bravīmi sālvaitatsatyenātmānamālabhe

हे राजेन्द्र, मैं किसी दूसरे की होकर आपके पास नहीं आई हूँ। हे शाल्व, मैं यह सत्य कहती हूँ; सत्य की ही मैं अपने ऊपर शपथ लेती हूँ।

श्लोक 19 (5.175.19)

भजस्व मां विशालाक्ष स्वयं कन्यामुपस्थिताम् । अनन्यपूर्वां राजेन्द्र त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणीम् ॥

bhajasva māṃ viśālākṣa svayaṃ kanyāmupasthitām | ananyapūrvāṃ rājendra tvatprasādābhikāṅkṣiṇīm

हे विशालनयन राजेन्द्र, मुझ कन्या को स्वीकार कीजिए, जो स्वयं आपके पास आई है, जो किसी अन्य की नहीं हुई और जो आपकी कृपा की आकांक्षा करती है।

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (5.175.20)

तामेवं भाषमाणां तु साल्वः काशिपतेः सुताम् । अत्यजद्भरतश्रेष्ठ जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥

tāmevaṃ bhāṣamāṇāṃ tu sālvaḥ kāśipateḥ sutām | atyajadbharataśreṣṭha jīrṇāṃ tvacamivoragaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, काशिराज की पुत्री के इस प्रकार कहते रहने पर भी शाल्व ने उसे वैसे ही त्याग दिया जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल त्याग देता है।

श्लोक 21 (5.175.21)

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानस्तया नृपः । नाश्रद्दधत्साल्वपतिः कन्यायां भरतर्षभ ॥

evaṃ bahuvidhairvākyairyācyamānastayā nṛpaḥ | nāśraddadhatsālvapatiḥ kanyāyāṃ bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, उसके अनेक प्रकार के वचनों से याचना किए जाने पर भी शाल्वराज ने उस कन्या पर विश्वास नहीं किया।

श्लोक 22 (5.175.22)

ततः सा मन्युनाऽऽविष्टा ज्येष्ठा काशिपतेः सुता । अब्रवीत्साश्रुनयना बाष्पविप्लुतया गिरा ॥

tataḥ sā manyunā''viṣṭā jyeṣṭhā kāśipateḥ sutā | abravītsāśrunayanā bāṣpaviplutayā girā

तब क्रोध से भरी काशिराज की सबसे बड़ी पुत्री आँखों में आँसू भरकर आँसुओं से रुँधे स्वर में बोली —

अम्बोवाच

श्लोक 23 (5.175.23)

त्वया त्यक्ता गमिष्यामि यत्र तत्र विशांपते । तत्र मे गतयः सन्तु सन्तः सत्यं यथा ध्रुवम् ॥

tvayā tyaktā gamiṣyāmi yatra tatra viśāṃpate | tatra me gatayaḥ santu santaḥ satyaṃ yathā dhruvam

हे प्रजापालक, आपके द्वारा त्यागी जाकर मैं जहाँ-तहाँ चली जाऊँगी; और जैसे सत्य अटल है, वैसे ही वहाँ सज्जन मेरा आश्रय हों।

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (5.175.24)

एवं तां भाषमाणां तु कन्यां साल्वपतिस्तदा । परितत्याज कौरव्य करुणं परिदेवतीम् ॥

evaṃ tāṃ bhāṣamāṇāṃ tu kanyāṃ sālvapatistadā | paritatyāja kauravya karuṇaṃ paridevatīm

हे कौरव्य, इस प्रकार करुण विलाप करती हुई उस कन्या को शाल्वराज ने तब त्याग दिया।

श्लोक 25 (5.175.25)

गच्छ गच्छेति तां साल्वः पुनः पुनरभाषत । बिभेमि भीष्मात्सुश्रोणि त्वं च भीष्मपरिग्रहः ॥

gaccha gaccheti tāṃ sālvaḥ punaḥ punarabhāṣata | bibhemi bhīṣmātsuśroṇi tvaṃ ca bhīṣmaparigrahaḥ

शाल्व ने उससे बार-बार कहा — "जाओ, जाओ! हे सुन्दरी, मैं भीष्म से डरता हूँ, और तुम भीष्म की ग्रहण की हुई हो।"

श्लोक 26 (5.175.26)

एवमुक्ता तु सा तेन साल्वेनादीर्घदर्शिना । निश्चक्राम पुराद्दीना रुदती कुररी यथा ॥

evamuktā tu sā tena sālvenādīrghadarśinā | niścakrāma purāddīnā rudatī kurarī yathā

उस अदूरदर्शी शाल्व के ऐसा कहने पर वह दुःखी होकर कुररी पक्षी की भाँति रोती हुई नगर से निकल पड़ी।

श्लोक 27 (5.175.27)

निष्क्रामन्ती तु नगराच्चिन्तयामास दुःखिता । पृथिव्यां नास्ति युवतिर्विषमस्थतरा मया ॥

niṣkrāmantī tu nagarāccintayāmāsa duḥkhitā | pṛthivyāṃ nāsti yuvatirviṣamasthatarā mayā

नगर से निकलते हुए उसने दुःखी होकर सोचा — "पृथ्वी पर मुझसे अधिक विषम स्थिति में पड़ी कोई युवती नहीं है।"

श्लोक 28 (5.175.28)

बन्धुभिर्विप्रहीणास्मि साल्वेन च निराकृता । न च शक्यं पुनर्गन्तुं मया वारणसाह्वयम् ॥

bandhubhirviprahīṇāsmi sālvena ca nirākṛtā | na ca śakyaṃ punargantuṃ mayā vāraṇasāhvayam

मैं अपने बन्धुओं से बिछुड़ गई हूँ और शाल्व ने भी मुझे ठुकरा दिया है; और मैं फिर हस्तिनापुर भी नहीं लौट सकती,

श्लोक 29 (5.175.29)

अनुज्ञाता तु भीष्मेण साल्वमुद्दिश्य कारणम् । किं नु गर्हाम्यथात्मानमथ भीष्मं दुरासदम् ॥

anujñātā tu bhīṣmeṇa sālvamuddiśya kāraṇam | kiṃ nu garhāmyathātmānamatha bhīṣmaṃ durāsadam

क्योंकि भीष्म ने शाल्व के कारण ही मुझे जाने की अनुमति दी थी। अब मैं किसकी निन्दा करूँ — अपनी, या दुर्जय भीष्म की,

श्लोक 30 (5.175.30)

अथवा पितरं मूढं यो मेऽकार्षीत्स्वयंवरम् । मयाऽयं स्वकृतो दोषो याऽहं भीष्मरथात्तदा ॥

athavā pitaraṃ mūḍhaṃ yo me'kārṣītsvayaṃvaram | mayā'yaṃ svakṛto doṣo yā'haṃ bhīṣmarathāttadā

या अपने मूर्ख पिता की, जिन्होंने मेरा स्वयंवर रचाया? यह दोष मेरा अपना किया हुआ है, क्योंकि जब वह भीषण युद्ध छिड़ा,

श्लोक 31 (5.175.31)

प्रवृत्ते दारुणे युद्धे साल्वार्थं नापतं पुरा । तस्येयं फलनिर्वृत्तिर्यदापन्नाऽस्मि मूढवत् ॥

pravṛtte dāruṇe yuddhe sālvārthaṃ nāpataṃ purā | tasyeyaṃ phalanirvṛttiryadāpannā'smi mūḍhavat

तब मैं शाल्व के लिए भीष्म के रथ से कूद नहीं पड़ी। यह उसी का फल है कि मैं मूर्ख की भाँति इस विपत्ति में पड़ गई हूँ।

श्लोक 32 (5.175.32)

धिग्भीष्मं धिक्च मे मन्दं पितरं मूढचेतसम् । येनाहं वीर्यशुल्केन पण्यस्त्रीव प्रचोदिता ॥

dhigbhīṣmaṃ dhikca me mandaṃ pitaraṃ mūḍhacetasam | yenāhaṃ vīryaśulkena paṇyastrīva pracoditā

धिक्कार है भीष्म को, और धिक्कार है मेरे मन्दबुद्धि, मूढ़ पिता को, जिन्होंने पराक्रम के शुल्क पर मुझे बिकाऊ स्त्री की भाँति आगे कर दिया!

श्लोक 33 (5.175.33)

धिङ्मां धिक्साल्वराजानं धिग्धातारमथापि वा । येषां दुर्नीतभावेन प्राप्तास्म्यापदमुत्तमाम् ॥

dhiṅmāṃ dhiksālvarājānaṃ dhigdhātāramathāpi vā | yeṣāṃ durnītabhāvena prāptāsmyāpadamuttamām

धिक्कार है मुझे, धिक्कार है शाल्वराज को, और धिक्कार है विधाता को भी, जिनके दुर्व्यवहार से मैं इस घोर विपत्ति में पड़ी हूँ!

श्लोक 34 (5.175.34)

सर्वथा भागधेयानि स्वानि प्राप्नोति मानवः । अनयस्यास्य तु मुखं भीष्मः शान्तनवो मम ॥

sarvathā bhāgadheyāni svāni prāpnoti mānavaḥ | anayasyāsya tu mukhaṃ bhīṣmaḥ śāntanavo mama

मनुष्य हर प्रकार से अपने भाग्य का ही फल पाता है; परन्तु मेरी इस विपत्ति का मूल शान्तनुपुत्र भीष्म है।

श्लोक 35 (5.175.35)

सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि सांप्रतम् । तपसा वा युधा वापि दुःखहेतुः स मे मतः ॥

sā bhīṣme pratikartavyamahaṃ paśyāmi sāṃpratam | tapasā vā yudhā vāpi duḥkhahetuḥ sa me mataḥ

इसलिए अब मुझे यही उचित दिखता है कि तप से या युद्ध से भीष्म से बदला लूँ; मेरे मत में वही मेरे दुःख का कारण है।

श्लोक 36 (5.175.36)

को नु भीष्मं युधा जेतुमुत्सहेत महीपतिः । एवं सा परिनिश्चित्य जगाम नगराद्बहिः ॥

ko nu bhīṣmaṃ yudhā jetumutsaheta mahīpatiḥ | evaṃ sā pariniścitya jagāma nagarādbahiḥ

"परन्तु कौन-सा राजा युद्ध में भीष्म को जीतने का साहस करेगा?" ऐसा निश्चय करके वह नगर से बाहर चली गई

श्लोक 37 (5.175.37)

आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् । ततस्तामवसद्रात्रिं तापसैः परिवारिता ॥

āśramaṃ puṇyaśīlānāṃ tāpasānāṃ mahātmanām | tatastāmavasadrātriṃ tāpasaiḥ parivāritā

और पुण्यशील महात्मा तपस्वियों के आश्रम में पहुँची। वहाँ उसने तपस्वियों से घिरी रहकर वह रात बिताई।

श्लोक 38 (5.175.38)

आचख्यौ च यथावृत्तं सर्वमात्मनि भारत । विस्तरेण महाबाहो निखिलेन शुचिस्मिता । हरणं च विसर्गं च साल्वेन च विसर्जनम् ॥

ācakhyau ca yathāvṛttaṃ sarvamātmani bhārata | vistareṇa mahābāho nikhilena śucismitā | haraṇaṃ ca visargaṃ ca sālvena ca visarjanam

हे भारत, हे महाबाहो, उस मधुर मुस्कान वाली कन्या ने अपने साथ जो कुछ हुआ था, वह सब विस्तार से और पूरा-पूरा कह सुनाया — अपना हरण, भीष्म द्वारा छोड़ा जाना और शाल्व द्वारा लौटा दिया जाना।

श्लोक 39 (5.175.39)

ततस्तत्र महानासीद्ब्राह्मणः संशितव्रतः । शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरुः ॥

tatastatra mahānāsīdbrāhmaṇaḥ saṃśitavrataḥ | śaikhāvatyastapovṛddhaḥ śāstre cāraṇyake guruḥ

वहाँ कठोर व्रतों वाले एक महान् ब्राह्मण शैखावत्य रहते थे, जो तप में बढ़े-चढ़े और शास्त्रों तथा आरण्यकों के आचार्य थे।

श्लोक 40 (5.175.40)

आर्तां तामाह स मुनिः शैखावत्यो महातपाः । निःश्वसन्तीं सतीं बालां दुःखशोकपरायणाम् ॥

ārtāṃ tāmāha sa muniḥ śaikhāvatyo mahātapāḥ | niḥśvasantīṃ satīṃ bālāṃ duḥkhaśokaparāyaṇām

महातपस्वी मुनि शैखावत्य ने उस दुःखी, लम्बी साँसें लेती, दुःख और शोक में डूबी साध्वी बाला से कहा —

शैखावत्य उवाच

श्लोक 41 (5.175.41)

एवं गते तु किं भद्रे शक्यं कर्तुं तपस्विभिः । आश्रमस्थैर्महाभागे तपोयुक्तैर्महात्मभिः ॥

evaṃ gate tu kiṃ bhadre śakyaṃ kartuṃ tapasvibhiḥ | āśramasthairmahābhāge tapoyuktairmahātmabhiḥ

हे भद्रे, हे महाभागे, ऐसी स्थिति में आश्रम में रहने वाले, तप में लगे हम महात्मा तपस्वी क्या कर सकते हैं?

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (5.175.42)

सा त्वेनमब्रवीद्राजन्क्रियतां मदनुग्रहः । प्राव्राज्यमहमिच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ॥

sā tvenamabravīdrājankriyatāṃ madanugrahaḥ | prāvrājyamahamicchāmi tapastapsyāmi duścaram

हे राजन्, उसने उनसे कहा — "मुझ पर यह अनुग्रह कीजिए। मैं संन्यास लेना चाहती हूँ; मैं कठोर तपस्या करूँगी।"

अम्बोवाच

श्लोक 43 (5.175.43)

मयैव यानि कर्माणि पूर्वदेहे तु मूढया । कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत्फलं ध्रुवम् ॥

mayaiva yāni karmāṇi pūrvadehe tu mūḍhayā | kṛtāni nūnaṃ pāpāni teṣāmetatphalaṃ dhruvam

निश्चय ही मैंने अपनी मूर्खता से पूर्व जन्म में जो पाप कर्म किए थे, यह उन्हीं का अटल फल है।

श्लोक 44 (5.175.44)

नोत्सहे तु पुनर्गन्तुं स्वजनं प्रति तापसाः । प्रत्याख्याता निरानन्दा साल्वेन च निराकृता ॥

notsahe tu punargantuṃ svajanaṃ prati tāpasāḥ | pratyākhyātā nirānandā sālvena ca nirākṛtā

हे तपस्वियो, ठुकराई हुई, आनन्दहीन और शाल्व द्वारा तिरस्कृत मैं फिर अपने स्वजनों के पास जाने का साहस नहीं कर सकती।

श्लोक 45 (5.175.45)

उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषाः । युष्माभिर्देवसंकाशैः कृपा भवतु वो मयि ॥

upadiṣṭamihecchāmi tāpasyaṃ vītakalmaṣāḥ | yuṣmābhirdevasaṃkāśaiḥ kṛpā bhavatu vo mayi

हे निष्पाप तपस्वियो, मैं चाहती हूँ कि देवताओं के समान आप लोग यहीं मुझे तपस्वी जीवन का उपदेश दें। मुझ पर आपकी कृपा हो।

भीष्म उवाच

श्लोक 46 (5.175.46)

स तामाश्वासयत्कन्यां दृष्टान्तागमहेतुभिः । सान्त्वयामास कार्यं च प्रतिजज्ञे द्विजैः सह ॥

sa tāmāśvāsayatkanyāṃ dṛṣṭāntāgamahetubhiḥ | sāntvayāmāsa kāryaṃ ca pratijajñe dvijaiḥ saha

उन्होंने दृष्टान्तों, शास्त्रवचनों और युक्तियों से उस कन्या को धीरज बँधाया, सान्त्वना दी और अन्य ब्राह्मणों के साथ उसका कार्य करने की प्रतिज्ञा की।

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