उद्योग पर्व · अध्याय 195
कौरव-सेना का कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान
प्रभात होने पर दुर्योधन के पक्ष के राजा पवित्र होकर, मालाएँ पहनकर और युद्ध में स्वर्ग जीतने के संकल्प के साथ पाण्डवों के विरुद्ध निकल पड़ते हैं; वे तीन दलों में चलते हैं — द्रोण के नेतृत्व में, भीष्म आदि महारथियों के साथ, और भाइयों से घिरे दुर्योधन के साथ। वे कुरुक्षेत्र के पश्चिमी भाग में डेरा डालते हैं, जहाँ दुर्योधन दूसरे हस्तिनापुर जैसा शिविर बनवाता है, राजाओं के लिए भी वैसे ही दुर्ग बनवाता है और सारी सेना तथा उसके अनुचरों के भोजन की व्यवस्था करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.195.1)
ततः प्रभाते विमले धार्तराष्ट्रेण चोदिताः । दुर्योधनेन राजानः प्रययुः पाण्डवान्प्रति ॥
tataḥ prabhāte vimale dhārtarāṣṭreṇa coditāḥ | duryodhanena rājānaḥ prayayuḥ pāṇḍavānprati
तब निर्मल प्रभात होने पर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन की प्रेरणा से राजा पाण्डवों की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (5.195.2)
आप्लाव्य शुचयः सर्वे स्रग्विणः शुक्लवाससः । गृहीतशस्त्रा ध्वजिनः स्वस्ति वाच्य हुताग्नयः ॥
āplāvya śucayaḥ sarve sragviṇaḥ śuklavāsasaḥ | gṛhītaśastrā dhvajinaḥ svasti vācya hutāgnayaḥ
वे स्नान करके पवित्र थे, सभी मालाएँ और श्वेत वस्त्र धारण किए थे, हाथों में शस्त्र और ध्वज लिए थे; उन्होंने स्वस्तिवाचन कराया था और अग्नि में आहुतियाँ दी थीं।
श्लोक 3 (5.195.3)
सर्वे ब्रह्मविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः । सर्वे कामकृतश्चैव सर्वे चाहवलक्षणाः ॥
sarve brahmavidaḥ śūrāḥ sarve sucaritavratāḥ | sarve kāmakṛtaścaiva sarve cāhavalakṣaṇāḥ
सभी ब्रह्मज्ञानी और शूरवीर थे, सभी उत्तम व्रतों का पालन करने वाले थे, सभी अपना अभीष्ट सिद्ध करने वाले थे, और सभी युद्ध के लक्षणों से युक्त थे।
श्लोक 4 (5.195.4)
आहवेषु पराँल्लोकाञ्जिगीषन्तो महाबलाः । एकाग्रमनसः सर्वे श्रद्दधानाः परस्परम् ॥
āhaveṣu parām̐llokāñjigīṣanto mahābalāḥ | ekāgramanasaḥ sarve śraddadhānāḥ parasparam
युद्ध के द्वारा उत्तम लोकों को जीतने की इच्छा रखने वाले वे सभी महाबली एकाग्रचित्त थे और एक-दूसरे पर विश्वास करते थे।
श्लोक 5 (5.195.5)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केकया बाह्लिकैः सह । प्रययुः सर्व एवैते भारद्वाजपुरोगमाः ॥
vindānuvindāvāvantyau kekayā bāhlikaiḥ saha | prayayuḥ sarva evaite bhāradvājapurogamāḥ
अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, तथा बाह्लिकों के साथ केकय — ये सब भरद्वाजपुत्र द्रोण को आगे करके चल पड़े।
श्लोक 6 (5.195.6)
अश्वत्थामा शान्तनवः सैन्धवोऽथ जयद्रथः । दाक्षिणात्याः प्रतीच्याश्च पार्वतीयाश्च ये नृपाः ॥
aśvatthāmā śāntanavaḥ saindhavo'tha jayadrathaḥ | dākṣiṇātyāḥ pratīcyāśca pārvatīyāśca ye nṛpāḥ
अश्वत्थामा, शान्तनुपुत्र भीष्म, सिन्धुराज जयद्रथ, और दक्षिण, पश्चिम तथा पर्वतीय प्रदेशों के राजा;
श्लोक 7 (5.195.7)
गान्धारराजः शकुनिः प्राच्योदीच्याश्च सर्वशः । शकाः किराता यवनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥
gāndhārarājaḥ śakuniḥ prācyodīcyāśca sarvaśaḥ | śakāḥ kirātā yavanāḥ śibayo'tha vasātayaḥ
गान्धारराज शकुनि, सब पूर्वी और उत्तरी लोग, शक, किरात, यवन, शिबि और वसाति —
श्लोक 8 (5.195.8)
स्वैः स्वैरनीकैः सहिताः परिवार्य महारथम् । एते महारथाः सर्वे द्वितीये निर्ययुर्बले ॥
svaiḥ svairanīkaiḥ sahitāḥ parivārya mahāratham | ete mahārathāḥ sarve dvitīye niryayurbale
अपनी-अपनी सेनाओं के साथ उस महारथी को घेरकर ये सब महारथी दूसरे दल में निकले।
श्लोक 9 (5.195.9)
कृतवर्मा सहानीकस्त्रिगर्तश्च महारथः । दुर्योधनश्च नृपतिर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥
kṛtavarmā sahānīkastrigartaśca mahārathaḥ | duryodhanaśca nṛpatirbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ
अपनी सेना सहित कृतवर्मा, त्रिगर्त का महारथी राजा, और भाइयों से घिरे हुए राजा दुर्योधन;
श्लोक 10 (5.195.10)
शलो भूरिश्रवाः शल्यः कौसल्योऽथ बृहद्रथः । एते पश्चादनुगता धार्तराष्ट्रपुरोगमाः ॥
śalo bhūriśravāḥ śalyaḥ kausalyo'tha bṛhadrathaḥ | ete paścādanugatā dhārtarāṣṭrapurogamāḥ
शल, भूरिश्रवा, शल्य और कोसलराज बृहद्रथ — ये धृतराष्ट्रपुत्र को आगे करके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 11 (5.195.11)
ते समेत्य यथान्यायं धार्तराष्ट्रा महाबलाः । कुरुक्षेत्रस्य पश्चार्धे व्यवातिष्ठन्त दंशिताः ॥
te sametya yathānyāyaṃ dhārtarāṣṭrā mahābalāḥ | kurukṣetrasya paścārdhe vyavātiṣṭhanta daṃśitāḥ
यथाविधि एकत्र होकर धृतराष्ट्र-पक्ष के वे महाबली योद्धा कवच पहनकर कुरुक्षेत्र के पश्चिमी भाग में डट गए।
श्लोक 12 (5.195.12)
दुर्योधनस्तु शिबिरं कारयामास भारत । यथैव हास्तिनपुरं द्वितीयं समलंकृतम् ॥
duryodhanastu śibiraṃ kārayāmāsa bhārata | yathaiva hāstinapuraṃ dvitīyaṃ samalaṃkṛtam
हे भारत, दुर्योधन ने अपना शिविर ऐसा बनवाया जो दूसरे हस्तिनापुर के समान ही सजा हुआ था।
श्लोक 13 (5.195.13)
न विशेषं विजानन्ति पुरस्य शिबिरस्य वा । कुशला अपि राजेन्द्र नरा नगरवासिनः ॥
na viśeṣaṃ vijānanti purasya śibirasya vā | kuśalā api rājendra narā nagaravāsinaḥ
हे राजेन्द्र, नगर में रहने वाले कुशल लोग भी नगर और शिविर में कोई अन्तर नहीं पहचान पाते थे।
श्लोक 14 (5.195.14)
तादृशान्येव दुर्गाणि राज्ञामपि महीपतिः । कारयामास कौरव्यः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tādṛśānyeva durgāṇi rājñāmapi mahīpatiḥ | kārayāmāsa kauravyaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
कुरुवंशी राजा ने दूसरे राजाओं के लिए भी वैसे ही सैकड़ों-हज़ारों दुर्ग बनवाए।
श्लोक 15 (5.195.15)
पञ्चयोजनमुत्सृज्य मण्डलं तद्रणाजिरम् । सेनानिवेशास्ते राजन्नाविशञ्छतसङ्घशः ॥
pañcayojanamutsṛjya maṇḍalaṃ tadraṇājiram | senāniveśāste rājannāviśañchatasaṅghaśaḥ
हे राजन्, पाँच योजन का घेरा रणभूमि के लिए छोड़कर सैनिक सैकड़ों टोलियों में अपने पड़ावों में जा बसे।
श्लोक 16 (5.195.16)
तत्र ते पृथिवीपाला यथोत्साहं यथाबलम् । विविशुः शिबिराण्यत्र द्रव्यवन्ति सहस्रशः ॥
tatra te pṛthivīpālā yathotsāhaṃ yathābalam | viviśuḥ śibirāṇyatra dravyavanti sahasraśaḥ
वहाँ राजाओं ने अपने-अपने उत्साह और बल के अनुसार साधन-सम्पन्न हज़ारों शिविरों में प्रवेश किया।
श्लोक 17 (5.195.17)
तेषां दुर्योधनो राजा ससैन्यानां महात्मनाम् । व्यादिदेश स बाह्यानां भक्ष्यभोज्यमनुत्तमम् ॥
teṣāṃ duryodhano rājā sasainyānāṃ mahātmanām | vyādideśa sa bāhyānāṃ bhakṣyabhojyamanuttamam
राजा दुर्योधन ने उन महात्मा राजाओं, उनकी सेनाओं और सेना से बाहर के लोगों के लिए उत्तम भोजन-सामग्री देने की आज्ञा दी —
श्लोक 18 (5.195.18)
सनागाश्वमनुष्याणां ये च शिल्पोपजीविनः । ये चान्येऽनुगतास्तत्र सूतमागधबन्दिनः ॥
sanāgāśvamanuṣyāṇāṃ ye ca śilpopajīvinaḥ | ye cānye'nugatāstatra sūtamāgadhabandinaḥ
हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के लिए, शिल्प से जीविका चलाने वालों के लिए, और साथ आए अन्य सब लोगों — सूत, मागध और बन्दीजनों — के लिए,
श्लोक 19 (5.195.19)
वणिजो गणिकाश्चारा ये चैव प्रेक्षका जनाः । सर्वांस्तान्कौरवो राजा विधिवत्प्रत्यवैक्षत ॥
vaṇijo gaṇikāścārā ye caiva prekṣakā janāḥ | sarvāṃstānkauravo rājā vidhivatpratyavaikṣata
व्यापारियों, गणिकाओं, गुप्तचरों और जो दर्शक बनकर आए थे उन सबके लिए। कौरवराज ने इन सबकी विधिवत् देखभाल की।