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उद्योग पर्व · अध्याय 194

युधिष्ठिर को अर्जुन का उत्तर

युधिष्ठिर गुप्तचरों से जानते हैं कि भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा और कर्ण ने दुर्योधन से क्या प्रतिज्ञाएँ की हैं, और अर्जुन से पूछते हैं कि वह कितने समय में शत्रुओं का नाश कर सकता है। अर्जुन कृष्ण की ओर देखकर कहते हैं कि वासुदेव की सहायता से वे पल भर में तीनों लोकों का नाश कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास पशुपति का वह भयंकर अस्त्र है जिसे कौरव-पक्ष के नायक नहीं जानते; पर साधारण मनुष्यों को दिव्यास्त्रों से मारना उचित नहीं, अतः वे धर्मयुद्ध से ही जीतेंगे। वे अपने पक्ष के महाबली सहायकों के नाम गिनाते हैं और युधिष्ठिर को याद दिलाते हैं कि उनका क्रोध जिस पर पड़े वह नष्ट हो जाता है।

अध्याय 193अध्याय-सूचीअध्याय 195

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.194.1)

एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयः सर्वान्भ्रातॄनुपह्वरे । आहूय भरतश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ॥

etacchrutvā tu kaunteyaḥ sarvānbhrātṝnupahvare | āhūya bharataśreṣṭha idaṃ vacanamabravīt

हे भरतश्रेष्ठ, यह सुनकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों को एकान्त में बुलाया और यह बात कही —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (5.194.2)

धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु ये चारपुरुषा मम । ते प्रवृत्तिं प्रयच्छन्ति ममेमां व्युषितां निशाम् ॥

dhārtarāṣṭrasya sainyeṣu ye cārapuruṣā mama | te pravṛttiṃ prayacchanti mamemāṃ vyuṣitāṃ niśām

"धृतराष्ट्रपुत्र की सेनाओं में मेरे जो गुप्तचर हैं, उन्होंने आज रात बीतते ही प्रभात में मुझे समाचार दिया है।

श्लोक 3 (5.194.3)

दुर्योधनः किलापृच्छदापगेयं महाव्रतम् । केन कालेन पाण्डूनां हन्याः सैन्यमिति प्रभो ॥

duryodhanaḥ kilāpṛcchadāpageyaṃ mahāvratam | kena kālena pāṇḍūnāṃ hanyāḥ sainyamiti prabho

कहते हैं, दुर्योधन ने महाव्रती गङ्गापुत्र से पूछा, "प्रभो, आप पाण्डवों की सेना को कितने समय में मार सकते हैं?"

श्लोक 4 (5.194.4)

मासेनेति च तेनोक्तो धार्तराष्ट्रः सुदुर्मतिः । तावता चापि कालेन द्रोणोऽपि प्रतिजज्ञिवान् ॥

māseneti ca tenokto dhārtarāṣṭraḥ sudurmatiḥ | tāvatā cāpi kālena droṇo'pi pratijajñivān

उस अत्यन्त दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र को उत्तर मिला, "एक मास में"; और द्रोण ने भी उतने ही समय की प्रतिज्ञा की।

श्लोक 5 (5.194.5)

गौतमो द्विगुणं कालमुक्तवानिति नः श्रुतम् । द्रौणिस्तु दशरात्रेण प्रतिजज्ञे महास्त्रवित् ॥

gautamo dviguṇaṃ kālamuktavāniti naḥ śrutam | drauṇistu daśarātreṇa pratijajñe mahāstravit

हमने सुना है कि गौतम कृप ने उससे दुगुना समय बताया, और महान् अस्त्रों के ज्ञाता द्रोणपुत्र ने दस रातों की प्रतिज्ञा की।

श्लोक 6 (5.194.6)

तथा दिव्यास्त्रवित्कर्णः संपृष्टः कुरुसंसदि । पञ्चभिर्दिवसैर्हन्तुं ससैन्यं प्रतिजज्ञिवान् ॥

tathā divyāstravitkarṇaḥ saṃpṛṣṭaḥ kurusaṃsadi | pañcabhirdivasairhantuṃ sasainyaṃ pratijajñivān

और दिव्यास्त्रों के ज्ञाता कर्ण ने कौरव-सभा में पूछे जाने पर पाँच दिनों में सेना सहित संहार करने की प्रतिज्ञा की।

श्लोक 7 (5.194.7)

तस्मादहमपीच्छामि श्रोतुमर्जुन ते वचः । कालेन कियता शत्रून्क्षपयेरिति फाल्गुन ॥

tasmādahamapīcchāmi śrotumarjuna te vacaḥ | kālena kiyatā śatrūnkṣapayeriti phālguna

इसलिए हे अर्जुन, मैं भी तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ — हे फाल्गुन, तुम युद्ध में कितने समय में शत्रुओं का नाश कर सकते हो?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (5.194.8)

एवमुक्तो गुडाकेशः पार्थिवेन धनञ्जयः । वासुदेवं समीक्ष्येदं वचनं प्रत्यभाषत ॥

evamukto guḍākeśaḥ pārthivena dhanañjayaḥ | vāsudevaṃ samīkṣyedaṃ vacanaṃ pratyabhāṣata

राजा के ऐसा कहने पर गुडाकेश धनञ्जय ने वासुदेव की ओर देखकर यह उत्तर दिया —

अर्जुन उवाच

श्लोक 9 (5.194.9)

सर्व एते महात्मानः कृतास्त्राश्चित्रयोधिनः । असंशयं महाराज हन्युरेव न संशयः ॥

sarva ete mahātmānaḥ kṛtāstrāścitrayodhinaḥ | asaṃśayaṃ mahārāja hanyureva na saṃśayaḥ

"हे महाराज, ये सभी महात्मा अस्त्रों में निपुण और विचित्र रीति से युद्ध करने वाले हैं; निःसन्देह वे संहार कर सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 10 (5.194.10)

अपैतु ते मनस्तापो यथा सत्यं ब्रवीम्यहम् । हन्यामेकरथेनैव वासुदेवसहायवान् ॥

apaitu te manastāpo yathā satyaṃ bravīmyaham | hanyāmekarathenaiva vāsudevasahāyavān

पर आपके मन का सन्ताप दूर हो जाए; मैं आपसे सच कहता हूँ। वासुदेव की सहायता से मैं एक ही रथ के बल पर

श्लोक 11 (5.194.11)

सामरानपि लोकांस्त्रीन्सर्वान्स्थावरजङ्गमान् । भूतं भव्यं भविष्यं च निमेषादिति मे मतिः ॥

sāmarānapi lokāṃstrīnsarvānsthāvarajaṅgamān | bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaṃ ca nimeṣāditi me matiḥ

देवताओं सहित तीनों लोकों को, समस्त चर-अचर को, भूत, वर्तमान और भविष्य को पलक झपकते नष्ट कर सकता हूँ — ऐसा मेरा विश्वास है।

श्लोक 12 (5.194.12)

यावदिच्छेद्धरिरयं तावदस्ति न चान्यथा । यत्तद्धोरं पशुपतिः प्रादादस्त्रं महन्मम । कैराते द्वन्द्वयुद्धे तु तदिदं मयि वर्तते ॥

yāvadiccheddharirayaṃ tāvadasti na cānyathā | yattaddhoraṃ paśupatiḥ prādādastraṃ mahanmama | kairāte dvandvayuddhe tu tadidaṃ mayi vartate

जब तक ये श्रीहरि चाहें, तभी तक यह सब है, अन्यथा नहीं। किरात-रूपधारी के साथ हुए द्वन्द्वयुद्ध में पशुपति ने मुझे जो वह भयंकर महान् अस्त्र दिया था, वह मुझमें विद्यमान है।

श्लोक 13 (5.194.13)

यद्युगान्ते पशुपतिः सर्वभूतानि संहरन् । प्रयुङ्क्ते पुरुषव्याघ्र तदिदं मयि वर्तते ॥

yadyugānte paśupatiḥ sarvabhūtāni saṃharan | prayuṅkte puruṣavyāghra tadidaṃ mayi vartate

हे पुरुषसिंह, युग के अन्त में सब प्राणियों का संहार करते हुए पशुपति जिस अस्त्र का प्रयोग करते हैं, वह मुझमें विद्यमान है।

श्लोक 14 (5.194.14)

तन्न जानाति गाङ्गेयो न द्रोणो न च गौतमः । न च द्रोणसुतो राजन्कुत एव तु सूतजः ॥

tanna jānāti gāṅgeyo na droṇo na ca gautamaḥ | na ca droṇasuto rājankuta eva tu sūtajaḥ

हे राजन्, उसे न गङ्गापुत्र जानते हैं, न द्रोण, न गौतम, न द्रोणपुत्र; फिर सूतपुत्र तो कैसे जानेगा?

श्लोक 15 (5.194.15)

न तु युक्तं रणे हन्तुं दिव्यैरस्त्रैः पृथग्जनम् । आर्जवेनैव युद्धेन विजेष्यामो वयं परान् ॥

na tu yuktaṃ raṇe hantuṃ divyairastraiḥ pṛthagjanam | ārjavenaiva yuddhena vijeṣyāmo vayaṃ parān

पर युद्ध में साधारण मनुष्यों को दिव्यास्त्रों से मारना उचित नहीं। हम सीधे धर्मयुद्ध से ही शत्रुओं को जीतेंगे।

श्लोक 16 (5.194.16)

तथेमे पुरुषव्याघ्राः सहायास्तव पार्थिव । सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥

tatheme puruṣavyāghrāḥ sahāyāstava pārthiva | sarve divyāstravidvāṃsaḥ sarve yuddhābhikāṅkṣiṇaḥ

और हे राजन्, ये पुरुषसिंह, जो आपके सहायक हैं, सभी दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं और सभी युद्ध के इच्छुक हैं।

श्लोक 17 (5.194.17)

वेदान्तावभृथस्नाताः सर्व एतेऽपराजिताः । निहन्युः समरे सेनां देवानामपि पाण्डव ॥

vedāntāvabhṛthasnātāḥ sarva ete'parājitāḥ | nihanyuḥ samare senāṃ devānāmapi pāṇḍava

सभी ने वेदाध्ययन की समाप्ति पर अवभृथ-स्नान किया है और सभी अपराजित हैं। हे पाण्डुनन्दन, वे युद्ध में देवताओं की सेना का भी संहार कर सकते हैं —

श्लोक 18 (5.194.18)

शिखण्डी युयुधानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । भीमसेनो यमौ चोभौ युधामन्यूत्तमौजसौ ॥

śikhaṇḍī yuyudhānaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | bhīmaseno yamau cobhau yudhāmanyūttamaujasau

शिखण्डी, युयुधान, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न, भीमसेन, दोनों जुड़वाँ भाई (नकुल-सहदेव), युधामन्यु और उत्तमौजा,

श्लोक 19 (5.194.19)

विराटद्रुपदौ चोभौ भीष्मद्रोणसमौ युधि । शङ्खश्चैव महाबाहुर्हैडिम्बश्च महाबलः ॥

virāṭadrupadau cobhau bhīṣmadroṇasamau yudhi | śaṅkhaścaiva mahābāhurhaiḍimbaśca mahābalaḥ

युद्ध में भीष्म और द्रोण के समान विराट और द्रुपद, महाबाहु शंख, और महाबली हैडिम्ब (घटोत्कच),

श्लोक 20 (5.194.20)

पुत्रोऽस्याञ्जनपर्वा तु महाबलपराक्रमः । शैनेयश्च महाबाहुः सहायो रणकोविदः ॥

putro'syāñjanaparvā tu mahābalaparākramaḥ | śaineyaśca mahābāhuḥ sahāyo raṇakovidaḥ

उसका पुत्र महाबली और पराक्रमी अञ्जनपर्वा, और युद्धकुशल सहायक महाबाहु शैनेय (सात्यकि),

श्लोक 21 (5.194.21)

अभिमन्युश्च बलवान्द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः । स्वयं चापि समर्थोऽसि त्रैलोक्योत्सादनेऽपि च ॥

abhimanyuśca balavāndraupadyāḥ pañca cātmajāḥ | svayaṃ cāpi samartho'si trailokyotsādane'pi ca

बलवान् अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र। और आप स्वयं भी तीनों लोकों का विनाश करने में समर्थ हैं।

श्लोक 22 (5.194.22)

क्रोधाद्यं पुरुषं पश्येस्तथा शक्रसमद्युते । स क्षिप्रं न भवेद्व्यक्तमिति त्वां वेद्मि कौरव ॥

krodhādyaṃ puruṣaṃ paśyestathā śakrasamadyute | sa kṣipraṃ na bhavedvyaktamiti tvāṃ vedmi kaurava

हे इन्द्र के समान तेजस्वी, आप क्रोध से जिस पुरुष की ओर देख लें, वह निश्चय ही तुरन्त नष्ट हो जाए — हे कौरव, मैं आपको ऐसा ही जानता हूँ।"

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