उद्योग पर्व · अध्याय 193
कौरव महारथियों द्वारा पाण्डव-सेना के संहार की अवधि
प्रभात होने पर दुर्योधन सारी सेना के बीच भीष्म से पूछता है कि वे, द्रोण, कृप, कर्ण और अश्वत्थामा कितने समय में पाण्डव-सेना का संहार कर सकते हैं। भीष्म प्रतिदिन दस हज़ार योद्धाओं और एक हज़ार रथियों का भाग निश्चित करके एक मास बताते हैं; द्रोण भी एक मास, कृप दो मास, अश्वत्थामा दस रातें और कर्ण पाँच रातें बताते हैं। भीष्म कर्ण पर हँसते हैं और कहते हैं कि वह ऐसा तभी तक कह रहा है जब तक युद्ध में कृष्ण सहित अर्जुन से उसका सामना नहीं हुआ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.193.1)
प्रभातायां तु शर्वर्यां पुनरेव सुतस्तव । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य पितामहमपृच्छत ॥
prabhātāyāṃ tu śarvaryāṃ punareva sutastava | madhye sarvasya sainyasya pitāmahamapṛcchata
रात बीतने पर जब सवेरा हुआ, तब आपके पुत्र ने सारी सेना के बीच फिर से पितामह से प्रश्न किया।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (5.193.2)
पाण्डवेयस्य गाङ्गेय यदेतत्सैन्यमुद्यतम् । प्रभूतनरनागाश्वं महारथसमाकुलम् ॥
pāṇḍaveyasya gāṅgeya yadetatsainyamudyatam | prabhūtanaranāgāśvaṃ mahārathasamākulam
"हे गङ्गानन्दन, पाण्डवों की यह सेना जो युद्ध के लिए तैयार खड़ी है, जिसमें असंख्य मनुष्य, हाथी और घोड़े हैं और जो महारथियों से भरी हुई है,
श्लोक 3 (5.193.3)
भीमार्जुनप्रभृतिभिर्महेष्वासैर्महाबलैः । लोकपालसमैर्गुप्तं धृष्टद्युम्नपुरोगमैः ॥
bhīmārjunaprabhṛtibhirmaheṣvāsairmahābalaiḥ | lokapālasamairguptaṃ dhṛṣṭadyumnapurogamaiḥ
जिसकी रक्षा भीम और अर्जुन आदि लोकपालों के समान महाबली महाधनुर्धर करते हैं, और जिसके अगुआ धृष्टद्युम्न हैं,
श्लोक 4 (5.193.4)
अप्रधृष्यमनावार्यमुद्धूतमिव सागरम् । सेनासागरमक्षोभ्यमपि देवैर्महाहवे ॥
apradhṛṣyamanāvāryamuddhūtamiva sāgaram | senāsāgaramakṣobhyamapi devairmahāhave
जो उमड़ते हुए समुद्र के समान अजेय और अनिवार्य है, ऐसा सेना-रूपी सागर जिसे महायुद्ध में देवता भी क्षुब्ध नहीं कर सकते,
श्लोक 5 (5.193.5)
केन कालेन गाङ्गेय क्षपयेथा महाद्युते । आचार्यो वा महेष्वासः कृपो वाऽऽशु महाबलः ॥
kena kālena gāṅgeya kṣapayethā mahādyute | ācāryo vā maheṣvāsaḥ kṛpo vā''śu mahābalaḥ
हे महातेजस्वी गङ्गापुत्र, आप उसे कितने समय में नष्ट कर सकते हैं? और महाधनुर्धर आचार्य, या महाबली कृप,
श्लोक 6 (5.193.6)
कर्णो वा समरश्लाघी द्रौणिर्वा द्विजसत्तमः । दिव्यास्त्रविदुषः सर्वे भवन्तो हि बले मम ॥
karṇo vā samaraślāghī drauṇirvā dvijasattamaḥ | divyāstraviduṣaḥ sarve bhavanto hi bale mama
या युद्ध की प्रशंसा करने वाला कर्ण, या ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोणपुत्र? क्योंकि मेरी सेना में आप सभी दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं।
श्लोक 7 (5.193.7)
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे । हृदि नित्यं महाबाहो वक्तुमर्हसि तन्मम ॥
etadicchāmyahaṃ jñātuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me | hṛdi nityaṃ mahābāho vaktumarhasi tanmama
मैं यही जानना चाहता हूँ; मेरे हृदय में इसकी बड़ी उत्सुकता सदा बनी रहती है। हे महाबाहु, आप मुझे यह बताइए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (5.193.8)
अनुरूपं कुरुश्रेष्ठ त्वय्येतत्पृथिवीपते । बलाबलममित्राणां तेषां यदिह पृच्छसि ॥
anurūpaṃ kuruśreṣṭha tvayyetatpṛthivīpate | balābalamamitrāṇāṃ teṣāṃ yadiha pṛcchasi
"हे कुरुश्रेष्ठ, हे पृथ्वीपति, यह तुम्हारे योग्य ही है कि तुम यहाँ शत्रुओं के बल और दुर्बलता के विषय में पूछ रहे हो।
श्लोक 9 (5.193.9)
शृणु राजन्मम रणे या शक्तिः परमा भवेत् । शस्त्रवीर्ये रणे यच्च भुजयोश्च महाभुज ॥
śṛṇu rājanmama raṇe yā śaktiḥ paramā bhavet | śastravīrye raṇe yacca bhujayośca mahābhuja
हे राजन्, हे महाबाहु, सुनो कि युद्ध में मेरी परम शक्ति क्या होगी — रणभूमि में मेरे शस्त्रों का पराक्रम और मेरी भुजाओं का बल।
श्लोक 10 (5.193.10)
आर्जवेनैव युद्धेन योद्धव्य इतरो जनः । मायायुद्धेन मायावी इत्येतद्धर्मनिश्चयः ॥
ārjavenaiva yuddhena yoddhavya itaro janaḥ | māyāyuddhena māyāvī ityetaddharmaniścayaḥ
साधारण मनुष्य से सीधे युद्ध द्वारा लड़ना चाहिए और मायावी से माया-युद्ध द्वारा — यही धर्म का निश्चय है।
श्लोक 11 (5.193.11)
हन्यामहं महाभाग पाण्डवानामनीकिनीम् । दिवसे दिवसे कृत्वा भागान्भागान्निजान्मम ॥
hanyāmahaṃ mahābhāga pāṇḍavānāmanīkinīm | divase divase kṛtvā bhāgānbhāgānnijānmama
हे महाभाग, मैं दिन-प्रतिदिन अपने भाग निश्चित करके पाण्डवों की सेना का संहार कर सकता हूँ।
श्लोक 12 (5.193.12)
योधानां दशसाहस्रं कृत्वा भागं महाद्युते । सहस्रं रथिनामेकमेष भागो मतो मम ॥
yodhānāṃ daśasāhasraṃ kṛtvā bhāgaṃ mahādyute | sahasraṃ rathināmekameṣa bhāgo mato mama
हे महातेजस्वी, दस हज़ार योद्धा और एक हज़ार रथी — इसे मैं एक भाग मानता हूँ।
श्लोक 13 (5.193.13)
अनेनाहं विधानेन सन्नद्धः सततोत्थितः । क्षपयेयं महत्सैन्यं कालेनानेन भारत ॥
anenāhaṃ vidhānena sannaddhaḥ satatotthitaḥ | kṣapayeyaṃ mahatsainyaṃ kālenānena bhārata
हे भारत, इस विधि से कवच धारण करके और सदा तत्पर रहकर मैं उस विशाल सेना को इतने समय में नष्ट कर सकता हूँ।
श्लोक 14 (5.193.14)
मुञ्चेयं यदि वास्त्राणि महान्ति समरे स्थितः । शतसाहस्रघातीनि हन्यां मासेन भारत ॥
muñceyaṃ yadi vāstrāṇi mahānti samare sthitaḥ | śatasāhasraghātīni hanyāṃ māsena bhārata
और हे भारत, यदि मैं युद्ध में खड़ा होकर लाखों का संहार करने वाले अपने महान् अस्त्र छोड़ूँ, तो एक मास में उन्हें मार डालूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (5.193.15)
श्रुत्वा भीष्मस्य तद्वाक्यं राजा दुर्योधनस्ततः । पर्यपृच्छत राजेन्द्र द्रोणमङ्गिरसां वरम् ॥
śrutvā bhīṣmasya tadvākyaṃ rājā duryodhanastataḥ | paryapṛcchata rājendra droṇamaṅgirasāṃ varam
हे राजेन्द्र, भीष्म की वह बात सुनकर राजा दुर्योधन ने फिर अङ्गिरावंशियों में श्रेष्ठ द्रोण से पूछा —
श्लोक 16 (5.193.16)
आचार्य केन कालेन पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् । निहन्या इति तं द्रोणः प्रत्युवाच हसन्निव ॥
ācārya kena kālena pāṇḍuputrasya sainikān | nihanyā iti taṃ droṇaḥ pratyuvāca hasanniva
"आचार्य, आप पाण्डुपुत्र के सैनिकों को कितने समय में मार सकते हैं?" तब द्रोण ने मुस्कराते हुए-से उसे उत्तर दिया —
द्रोण उवाच
श्लोक 17 (5.193.17)
स्थविरोऽस्मि महाबाहो मन्दप्राणविचेष्टितः । शस्त्राग्निना निर्दहेयं पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
sthaviro'smi mahābāho mandaprāṇaviceṣṭitaḥ | śastrāgninā nirdaheyaṃ pāṇḍavānāmanīkinīm
"हे महाबाहु, मैं वृद्ध हूँ, मेरे प्राण और चेष्टाएँ मन्द पड़ गई हैं। फिर भी मैं अपने शस्त्रों की आग से पाण्डवों की सेना को भस्म कर सकता हूँ
श्लोक 18 (5.193.18)
यथा भीष्मः शान्तनवो मासेनेति मतिर्मम । एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम् ॥
yathā bhīṣmaḥ śāntanavo māseneti matirmama | eṣā me paramā śaktiretanme paramaṃ balam
शान्तनुपुत्र भीष्म की ही भाँति एक मास में — ऐसा मेरा विचार है। यही मेरी परम शक्ति है, यही मेरा परम बल है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (5.193.19)
द्वाभ्यामेव तु मासाभ्यां कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् । द्रौणिस्तु दशरात्रेण प्रतिजज्ञे बलक्षयम् । कर्णस्तु पञ्चरात्रेण प्रतिजज्ञे महास्त्रवित् ॥
dvābhyāmeva tu māsābhyāṃ kṛpaḥ śāradvato'bravīt | drauṇistu daśarātreṇa pratijajñe balakṣayam | karṇastu pañcarātreṇa pratijajñe mahāstravit
शरद्वान् के पुत्र कृप ने दो मास बताए। द्रोणपुत्र ने दस रातों में सेना के संहार की प्रतिज्ञा की, और महान् अस्त्रों के ज्ञाता कर्ण ने पाँच रातों में।
श्लोक 20 (5.193.20)
तच्छ्रुत्वा सूतपुत्रस्य वाक्यं सागरगासुतः । जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमुवाच ह ॥
tacchrutvā sūtaputrasya vākyaṃ sāgaragāsutaḥ | jahāsa sasvanaṃ hāsaṃ vākyaṃ cedamuvāca ha
सूतपुत्र की वह बात सुनकर सागर में मिलने वाली गङ्गा के पुत्र भीष्म ठहाका मारकर हँसे और यह बोले —
भीष्म उवाच
श्लोक 21 (5.193.21)
न हि यावद्रणे पार्थं बाणशङ्खधनुर्धरम् । वासुदेवसमायुक्तं रथेनायान्तमाहवे ॥
na hi yāvadraṇe pārthaṃ bāṇaśaṅkhadhanurdharam | vāsudevasamāyuktaṃ rathenāyāntamāhave
"जब तक तुम्हारा सामना युद्ध में बाण, शंख और धनुष धारण किए, वासुदेव के साथ रथ पर चढ़कर आते हुए पार्थ से नहीं हुआ,
श्लोक 22 (5.193.22)
समागच्छसि राधेय तेनैवमभिमन्यसे । शक्यमेवं च भूयश्च त्वया वक्तुं यथेष्टतः ॥
samāgacchasi rādheya tenaivamabhimanyase | śakyamevaṃ ca bhūyaśca tvayā vaktuṃ yatheṣṭataḥ
तभी तक, हे राधापुत्र, तुम ऐसा सोचते हो। तुम चाहो तो यह, और इससे भी अधिक, जितना मन करे कह सकते हो।"