उद्योग पर्व · अध्याय 192
शिखण्डी का पुरुषत्व और कुबेर का स्थूण को शाप
भीष्म कथा आगे सुनाते हैं। यक्ष स्थूण कुछ समय के लिए शिखण्डिनी को अपना पुरुषत्व देने और उसका स्त्रीत्व धारण करने को राज़ी हो जाता है, और दोनों अपने लिंग बदल लेते हैं। द्रुपद दशार्णराज को बताते हैं कि उनकी संतान पुत्र है; हेमवर्मा युद्ध की धमकी देता है, युवतियों से शिखण्डी की परीक्षा करवाता है, उसे पुरुष पाकर संतुष्ट होकर लौट जाता है। कुबेर, यह जानकर कि स्थूण लज्जा के कारण उनके सामने नहीं आता, उसे शाप देते हैं कि वह शिखण्डी की मृत्यु तक स्त्री ही रहेगा; पुरुषत्व लौटाने ईमानदारी से आए शिखण्डी को स्थूण घर भेज देता है, और भीष्म बताते हैं कि वे शिखण्डी पर कभी प्रहार नहीं करेंगे, क्योंकि वह स्त्री के रूप में जन्मा था और पहले अम्बा था।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (5.192.1)
शिखण्डिवाक्यं श्रुत्वाऽथ स यक्षो भरतर्षभ । प्रोवाच मनसा चिन्त्य दैवेनोपनिपीडितः ॥
śikhaṇḍivākyaṃ śrutvā'tha sa yakṣo bharatarṣabha | provāca manasā cintya daivenopanipīḍitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, शिखण्डी की बात सुनकर उस यक्ष ने मन में विचार किया और दैव से प्रेरित होकर बोला।
श्लोक 2 (5.192.2)
भवितव्यं तथा तद्धि मम दुःखाय कौरव । भद्रे कामं करिष्यामि समयं तु निबोध मे ॥
bhavitavyaṃ tathā taddhi mama duḥkhāya kaurava | bhadre kāmaṃ kariṣyāmi samayaṃ tu nibodha me
हे कौरव, ऐसा होना ही था, और वह मेरे दुःख के लिए हुआ। (यक्ष ने कहा —) "भद्रे, मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, पर मेरी शर्त सुन लो।
स्थूणाकर्ण उवाच
श्लोक 3 (5.192.3)
स्वं ते पुंस्त्वं प्रदास्यामि स्त्रीत्वं धारयिताऽस्मि ते । किंचित्कालं तु ते दास्ये पुल्लिङ्गं स्वमिदं तव । आगन्तव्यं त्वया काले सत्यं चैव वदस्व मे ॥
svaṃ te puṃstvaṃ pradāsyāmi strītvaṃ dhārayitā'smi te | kiṃcitkālaṃ tu te dāsye pulliṅgaṃ svamidaṃ tava | āgantavyaṃ tvayā kāle satyaṃ caiva vadasva me
मैं तुम्हें अपना पुरुषत्व दूँगा और तुम्हारा स्त्रीत्व धारण करूँगा। कुछ समय के लिए मैं तुम्हें अपना यह पुरुष-रूप दूँगा, पर समय आने पर तुम्हें लौटकर आना होगा। मुझसे यह सच्चा वचन दो।
श्लोक 4 (5.192.4)
प्रभुः संकल्पसिद्धोऽस्मि कामचारी विहंगमः । मत्प्रसादात्पुरं चैव त्राहि बन्धूंश्च केवलम् ॥
prabhuḥ saṃkalpasiddho'smi kāmacārī vihaṃgamaḥ | matprasādātpuraṃ caiva trāhi bandhūṃśca kevalam
मैं समर्थ हूँ, मेरे संकल्प सिद्ध होते हैं; मैं इच्छानुसार विचरता हूँ और आकाश में चलता हूँ। मेरी कृपा से तुम अपने नगर और अपने सारे बन्धुओं की रक्षा करो।
श्लोक 5 (5.192.5)
स्त्रीलिङ्गं धारयिष्यामि तवेदं पार्थिवात्मजे । सत्यं मे प्रतिजानीहि करिष्यामि प्रियं तव ॥
strīliṅgaṃ dhārayiṣyāmi tavedaṃ pārthivātmaje | satyaṃ me pratijānīhi kariṣyāmi priyaṃ tava
हे राजकुमारी, मैं तुम्हारा यह स्त्रीत्व धारण करूँगा। मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा करो, तो मैं तुम्हारा मनचाहा कर दूँगा।"
शिखण्ड्युवाच
श्लोक 6 (5.192.6)
प्रतिदास्यामि भगवन्पुंलिङ्गं तव सुव्रत । किंचित्कालान्तरं स्त्रीत्वं धारयस्व निशाचर ॥
pratidāsyāmi bhagavanpuṃliṅgaṃ tava suvrata | kiṃcitkālāntaraṃ strītvaṃ dhārayasva niśācara
"हे भगवन्, हे सुव्रत, मैं आपका पुरुषत्व आपको लौटा दूँगा। हे निशाचर, कुछ समय के लिए आप स्त्रीत्व धारण कीजिए।
श्लोक 7 (5.192.7)
प्रतियाते दशार्णे तु पार्थिवे हेमवर्मणि । कन्यैव हि भविष्यामि पुरुषस्त्वं भविष्यसि ॥
pratiyāte daśārṇe tu pārthive hemavarmaṇi | kanyaiva hi bhaviṣyāmi puruṣastvaṃ bhaviṣyasi
जब दशार्णराज हेमवर्मा लौट जाएँगे, तब मैं फिर कन्या ही हो जाऊँगी और आप पुरुष हो जाएँगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (5.192.8)
इत्युक्त्वा समयं तत्र चक्राते तावुभौ नृप । अन्योन्यस्यानभिद्रोहे तौ संक्रामयतां ततः ॥
ityuktvā samayaṃ tatra cakrāte tāvubhau nṛpa | anyonyasyānabhidrohe tau saṃkrāmayatāṃ tataḥ
हे राजन्, यह कहकर दोनों ने वहाँ परस्पर द्रोह न करने की शर्त बाँधी और फिर एक-दूसरे में अपने लिंग बदल लिए।
श्लोक 9 (5.192.9)
स्त्रीलिङ्गं धारयामास स्थूणो यक्षोऽथ भारत । यक्षरूपं च तद्दीप्तं शिखण्डी प्रत्यपद्यत ॥
strīliṅgaṃ dhārayāmāsa sthūṇo yakṣo'tha bhārata | yakṣarūpaṃ ca taddīptaṃ śikhaṇḍī pratyapadyata
हे भारत, तब यक्ष स्थूण ने स्त्री-लिंग धारण कर लिया और शिखण्डी ने यक्ष का वह तेजस्वी रूप पा लिया।
श्लोक 10 (5.192.10)
ततः शिखण्डी पाञ्चाल्यः पुंस्त्वमासाद्य पार्थिव । विवेश नगरं हृष्टः पितरं च समासदत् ॥
tataḥ śikhaṇḍī pāñcālyaḥ puṃstvamāsādya pārthiva | viveśa nagaraṃ hṛṣṭaḥ pitaraṃ ca samāsadat
हे राजन्, तब पाञ्चालपुत्र शिखण्डी पुरुषत्व पाकर प्रसन्न मन से नगर में आया और अपने पिता के पास पहुँचा।
श्लोक 11 (5.192.11)
यथावृत्तं तु तत्सर्वमाचख्यौ द्रुपदस्य तत् । मातुश्च रहिते राजन्प्रसादं यक्षजं तदा । द्रुपदस्तस्य तच्छ्रुत्वा हर्षमाहारयत्परम् ॥
yathāvṛttaṃ tu tatsarvamācakhyau drupadasya tat | mātuśca rahite rājanprasādaṃ yakṣajaṃ tadā | drupadastasya tacchrutvā harṣamāhārayatparam
उसने जो कुछ हुआ था वह सब ज्यों-का-त्यों द्रुपद को बता दिया, और हे राजन्, एकान्त में माता को भी यक्ष की कृपा का हाल सुनाया। उससे यह सुनकर द्रुपद को अत्यन्त हर्ष हुआ।
श्लोक 12 (5.192.12)
सभार्यस्तच्च सस्मार महेश्वरवचस्तदा । ततः संप्रेषयामास दशार्णाधिपतेर्नृपः ॥
sabhāryastacca sasmāra maheśvaravacastadā | tataḥ saṃpreṣayāmāsa daśārṇādhipaternṛpaḥ
तब पत्नी सहित उन्हें महेश्वर का वचन स्मरण हो आया। फिर राजा ने दशार्णराज के पास सन्देश भेजा —
श्लोक 13 (5.192.13)
पुरुषोऽयं मम सुतः श्रद्धत्तां मे भवानिति । अथ दाशार्णको राजा सहसाभ्यागमत्तदा ॥
puruṣo'yaṃ mama sutaḥ śraddhattāṃ me bhavāniti | atha dāśārṇako rājā sahasābhyāgamattadā
"मेरा यह पुत्र पुरुष है, आप मेरी बात पर विश्वास कीजिए।" तब दशार्णराज तुरन्त
श्लोक 14 (5.192.14)
पाञ्चालराजं द्रुपदं दुःखशोकसमन्वितः । ततः काम्पिल्यमासाद्य दशार्णाधिपतिस्ततः ॥
pāñcālarājaṃ drupadaṃ duḥkhaśokasamanvitaḥ | tataḥ kāmpilyamāsādya daśārṇādhipatistataḥ
दुःख और शोक से भरकर पाञ्चालराज द्रुपद पर चढ़ आया। फिर काम्पिल्य पहुँचकर दशार्णराज ने
श्लोक 15 (5.192.15)
प्रेषयामास सत्कृत्य दूतं ब्रह्मविदां वरम् । ब्रूहि मद्वचनाद्दूत पाञ्चाल्यं तं नृपाधमम् ॥
preṣayāmāsa satkṛtya dūtaṃ brahmavidāṃ varam | brūhi madvacanāddūta pāñcālyaṃ taṃ nṛpādhamam
आदर के साथ ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ एक दूत भेजा — "दूत, मेरी ओर से उस नीच राजा पाञ्चाल से कहना —
श्लोक 16 (5.192.16)
यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे वृतवानसि दुर्मते । फलं तस्यावलेपस्य द्रक्ष्यस्यद्य न संशयः ॥
yanme kanyāṃ svakanyārthe vṛtavānasi durmate | phalaṃ tasyāvalepasya drakṣyasyadya na saṃśayaḥ
'हे दुर्बुद्धि, तुमने अपनी कन्या के लिए मेरी कन्या का वरण किया, इसलिए उस घमण्ड का फल तुम आज ही देखोगे, इसमें संशय नहीं।'"
श्लोक 17 (5.192.17)
एवमुक्तश्च तेनासौ ब्राह्मणो राजसत्तम । दूतः प्रयातो नगरं दाशार्णनृपचोदितः ॥
evamuktaśca tenāsau brāhmaṇo rājasattama | dūtaḥ prayāto nagaraṃ dāśārṇanṛpacoditaḥ
हे नृपश्रेष्ठ, उसके ऐसा कहने पर दशार्णराज का भेजा हुआ वह ब्राह्मण दूत नगर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 18 (5.192.18)
तत आसादयामास पुरोधा द्रुपदं पुरे । तस्मै पाञ्चालको राजा गामर्घ्यं च सुसत्कृतम् ॥
tata āsādayāmāsa purodhā drupadaṃ pure | tasmai pāñcālako rājā gāmarghyaṃ ca susatkṛtam
तब वह पुरोहित नगर में द्रुपद के पास पहुँचा। पाञ्चालराज ने बड़े आदर के साथ उसे गौ और अर्घ्य
श्लोक 19 (5.192.19)
प्रापयामास राजेन्द्र सह तेन शिखण्डिना । तां पूजां नाभ्यनन्दत्स वाक्यं चेदमुवाच ह ॥
prāpayāmāsa rājendra saha tena śikhaṇḍinā | tāṃ pūjāṃ nābhyanandatsa vākyaṃ cedamuvāca ha
शिखण्डी के साथ अर्पित किए, हे राजेन्द्र। पर उसने उस पूजा का स्वागत नहीं किया और यह बात कही —
श्लोक 20 (5.192.20)
यदुक्तं तेन वीरेण राज्ञा काञ्चनवर्मणा । यत्तेऽहमधमाचार दुहित्राऽस्म्यभिवञ्चितः ॥
yaduktaṃ tena vīreṇa rājñā kāñcanavarmaṇā | yatte'hamadhamācāra duhitrā'smyabhivañcitaḥ
वह सन्देश जो उस वीर राजा काञ्चनवर्मा ने दिया था — "हे नीच आचरण वाले, तुमने अपनी पुत्री के द्वारा मुझे छला है,
श्लोक 21 (5.192.21)
तस्य पापस्य करणात्फलं प्राप्नुहि दुर्मते । देहि युद्धं नरपते ममाद्य रणमूर्धनि ॥
tasya pāpasya karaṇātphalaṃ prāpnuhi durmate | dehi yuddhaṃ narapate mamādya raṇamūrdhani
इसलिए हे दुर्बुद्धि, उस पाप-कर्म का फल भोगो। हे नरपति, आज रणभूमि के अग्रभाग में मुझसे युद्ध करो;
श्लोक 22 (5.192.22)
उद्धरिष्यामि ते सद्यः सामात्यसुतबान्धवम् । तदुपालम्भसंयुक्तं श्रावितः किल पार्थिवः ॥
uddhariṣyāmi te sadyaḥ sāmātyasutabāndhavam | tadupālambhasaṃyuktaṃ śrāvitaḥ kila pārthivaḥ
मैं तुम्हें मन्त्रियों, पुत्रों और बन्धुओं सहित तुरन्त उखाड़ फेंकूँगा।" कहते हैं, राजा द्रुपद को यह उलाहनों भरा सन्देश
श्लोक 23 (5.192.23)
दशार्णपतिना चोक्तो मन्त्रिमध्ये पुरोधसा । अभवद्भरतश्रेष्ठ द्रुपदः प्रणयानतः ॥
daśārṇapatinā cokto mantrimadhye purodhasā | abhavadbharataśreṣṭha drupadaḥ praṇayānataḥ
दशार्णराज की ओर से उस पुरोहित ने मन्त्रियों के बीच सुनाया। हे भरतश्रेष्ठ, सम्बन्ध के स्नेह से द्रुपद विनम्र हो गए और बोले —
श्लोक 24 (5.192.24)
यदाह मां भवान्ब्रह्मन्संबन्धिवचनाद्वचः । अस्योत्तरं प्रतिवचो दूतो राज्ञे वदिष्यति ॥
yadāha māṃ bhavānbrahmansaṃbandhivacanādvacaḥ | asyottaraṃ prativaco dūto rājñe vadiṣyati
"हे ब्राह्मण, आपने मेरे सम्बन्धी का सन्देश बनकर मुझसे जो बात कही है, उसका उत्तर मेरा दूत राजा को देगा।"
श्लोक 25 (5.192.25)
ततः संप्रेषयामास द्रुपदोऽपि महात्मने । हिरण्यवर्मणे दूतं ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥
tataḥ saṃpreṣayāmāsa drupado'pi mahātmane | hiraṇyavarmaṇe dūtaṃ brāhmaṇaṃ vedapāragam
तब द्रुपद ने भी महात्मा हिरण्यवर्मा के पास वेदों के पारगामी एक ब्राह्मण दूत को भेजा।
श्लोक 26 (5.192.26)
तमागम्य तु राजानं दशार्णाधिपतिं तदा । तद्वाक्यमाददे राजन्यदुक्तं द्रुपदेन ह ॥
tamāgamya tu rājānaṃ daśārṇādhipatiṃ tadā | tadvākyamādade rājanyaduktaṃ drupadena ha
हे राजन्, उसने दशार्णराज के पास जाकर द्रुपद का कहा हुआ सन्देश सुनाया —
श्लोक 27 (5.192.27)
आगमः क्रियतां व्यक्तः कुमारोऽयं सुतो मम । मिथ्यैतदुक्तं केनापि तदश्रद्धेयमित्युत ॥
āgamaḥ kriyatāṃ vyaktaḥ kumāro'yaṃ suto mama | mithyaitaduktaṃ kenāpi tadaśraddheyamityuta
"स्पष्ट परीक्षा कर ली जाए; यह कुमार मेरा पुत्र है। किसी ने यह झूठ कहा है, इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 28 (5.192.28)
ततः स राजा द्रुपदस्य श्रुत्वा । विमर्शयुक्तो युवतीर्वरिष्ठाः । संप्रेषयामास सुचारुरूपाः । शिखण्डिनं स्त्रीपुमान्वेति वेत्तुम् ॥
tataḥ sa rājā drupadasya śrutvā | vimarśayukto yuvatīrvariṣṭhāḥ | saṃpreṣayāmāsa sucārurūpāḥ | śikhaṇḍinaṃ strīpumānveti vettum
तब द्रुपद की बात सुनकर संशय में पड़े राजा ने यह जानने के लिए कि शिखण्डी स्त्री है या पुरुष, अत्यन्त सुन्दर श्रेष्ठ युवतियाँ भेजीं।
श्लोक 29 (5.192.29)
ताः प्रेषितास्तत्त्वभावं विदित्वा । प्रीत्या राज्ञे तच्छशंसुर्हि सर्वम् । शिखण्डिनं पुरुषं कौरवेन्द्र । दाशार्णराजाय महानुभावम् ॥
tāḥ preṣitāstattvabhāvaṃ viditvā | prītyā rājñe tacchaśaṃsurhi sarvam | śikhaṇḍinaṃ puruṣaṃ kauravendra | dāśārṇarājāya mahānubhāvam
भेजी गई युवतियों ने सच्चाई जान ली और प्रसन्न होकर राजा को सब कुछ बता दिया; हे कुरुराज, उन्होंने महाप्रतापी दशार्णराज से कहा कि शिखण्डी पुरुष है।
श्लोक 30 (5.192.30)
ततः कृत्वा तु राजा स आगमं प्रीतिमानथ । संबन्धिना समागम्य हृष्टो वासमुवास ह ॥
tataḥ kṛtvā tu rājā sa āgamaṃ prītimānatha | saṃbandhinā samāgamya hṛṣṭo vāsamuvāsa ha
परीक्षा कर लेने पर राजा प्रसन्न हुआ। वह अपने सम्बन्धी से मिला और हर्षपूर्वक वहाँ ठहरा।
श्लोक 31 (5.192.31)
शिखण्डिने च मुदितः प्रादाद्वित्तं जनेश्वरः । हस्तिनोऽश्वांश्च गाश्चैव दासीर्बहुशतास्तथा । पूजितश्च प्रतिययौ निर्भर्त्स्य तनयां किल ॥
śikhaṇḍine ca muditaḥ prādādvittaṃ janeśvaraḥ | hastino'śvāṃśca gāścaiva dāsīrbahuśatāstathā | pūjitaśca pratiyayau nirbhartsya tanayāṃ kila
प्रसन्न होकर उस नरेश ने शिखण्डी को धन दिया — हाथी, घोड़े, गौएँ और सैकड़ों दासियाँ। फिर सम्मानित होकर, कहते हैं, अपनी पुत्री को डाँटकर वह लौट गया।
श्लोक 32 (5.192.32)
विनीतकिल्विषे प्रीते हेमवर्मणि पार्थिवे । प्रतियाते दशार्णे तु हृष्टरूपा शिखण्डिनी ॥
vinītakilviṣe prīte hemavarmaṇi pārthive | pratiyāte daśārṇe tu hṛṣṭarūpā śikhaṇḍinī
जब दशार्णराज हेमवर्मा का रोष दूर हो गया और वे प्रसन्न होकर लौट गए, तब शिखण्डिनी आनन्दित हुई।
श्लोक 33 (5.192.33)
कस्यचित्त्वथ कालस्य कुबेरो नरवाहनः । लोकयात्रां प्रकुर्वाणः स्थूणस्यागान्निवेशनम् ॥
kasyacittvatha kālasya kubero naravāhanaḥ | lokayātrāṃ prakurvāṇaḥ sthūṇasyāgānniveśanam
कुछ समय बाद नरवाहन कुबेर लोक-यात्रा करते हुए स्थूण के निवास पर आए।
श्लोक 34 (5.192.34)
स तद्गृहस्योपरि वर्तमान । आलोकयामास धनाधिगोप्ता । स्थूणस्य यक्षस्य विवेश वेश्म । स्वलंकृतं माल्यगुणैर्विचित्रैः ॥
sa tadgṛhasyopari vartamāna | ālokayāmāsa dhanādhigoptā | sthūṇasya yakṣasya viveśa veśma | svalaṃkṛtaṃ mālyaguṇairvicitraiḥ
उस घर के ऊपर ठहरकर धन के रक्षक कुबेर ने उसे देखा और यक्ष स्थूण के भवन में प्रवेश किया, जो रंग-बिरंगी मालाओं की लड़ियों से भली-भाँति सजा था,
श्लोक 35 (5.192.35)
लाजैश्च गन्धैश्च तथा वितानै- । रभ्यर्चितं धूपनधूपितं च । ध्वजैः पताकाभिरलंकृतं च । भक्ष्यान्नपेयामिषदत्तमोदम् ॥
lājaiśca gandhaiśca tathā vitānai- | rabhyarcitaṃ dhūpanadhūpitaṃ ca | dhvajaiḥ patākābhiralaṃkṛtaṃ ca | bhakṣyānnapeyāmiṣadattamodam
जो लाजा, सुगन्धियों और चँदोवों से पूजित था, धूप से सुवासित था, ध्वजाओं और पताकाओं से अलंकृत था, और भक्ष्य, अन्न, पेय तथा मांस के दान से आनन्द दे रहा था।
श्लोक 36 (5.192.36)
तत्स्थानं तस्य दृष्ट्वा तु सर्वतः समलंकृतम् । मणिरत्नसुवर्णानां मालाभिः परिपूरितम् ॥
tatsthānaṃ tasya dṛṣṭvā tu sarvataḥ samalaṃkṛtam | maṇiratnasuvarṇānāṃ mālābhiḥ paripūritam
उसके उस स्थान को चारों ओर से सजा हुआ और मणि, रत्न तथा सुवर्ण की मालाओं से भरा हुआ देखकर,
श्लोक 37 (5.192.37)
नानाकुसुमगन्धाढ्यं सिक्तसंमृष्टशोभितम् । अथाब्रवीद्यक्षपतिस्तान्यक्षाननुगांस्तदा ॥
nānākusumagandhāḍhyaṃ siktasaṃmṛṣṭaśobhitam | athābravīdyakṣapatistānyakṣānanugāṃstadā
अनेक प्रकार के फूलों की सुगन्ध से भरा, छिड़काव और सफ़ाई से चमकता हुआ देखकर, यक्षराज ने तब अपने अनुचर यक्षों से कहा —
श्लोक 38 (5.192.38)
स्वलंकृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमाः । नोपसर्पति मां चैव कस्मादद्य स मन्दधीः ॥
svalaṃkṛtamidaṃ veśma sthūṇasyāmitavikramāḥ | nopasarpati māṃ caiva kasmādadya sa mandadhīḥ
"हे अपार पराक्रमी यक्षो, स्थूण का यह भवन तो भली-भाँति सजा है; फिर वह मन्दबुद्धि आज मेरे पास क्यों नहीं आता?
श्लोक 39 (5.192.39)
यस्माज्जानन्स मन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति । तस्मात्तस्मै महादण्डो धार्यः स्यादिति मे मतिः ॥
yasmājjānansa mandātmā māmasau nopasarpati | tasmāttasmai mahādaṇḍo dhāryaḥ syāditi me matiḥ
वह मूर्ख जान-बूझकर मेरे पास नहीं आता, इसलिए उसे कठोर दण्ड मिलना चाहिए — ऐसा मेरा विचार है।"
यक्षा ऊचुः
श्लोक 40 (5.192.40)
द्रुपदस्य सुता राजन्राज्ञो जाता शिखण्डिनी । तस्या निमित्ते कस्मिंश्चित्प्रादात्पुरुषलक्षणम् ॥
drupadasya sutā rājanrājño jātā śikhaṇḍinī | tasyā nimitte kasmiṃścitprādātpuruṣalakṣaṇam
"हे राजन्, राजा द्रुपद के यहाँ शिखण्डिनी नाम की पुत्री उत्पन्न हुई थी। किसी कारण से उसके निमित्त स्थूण ने उसे अपना पुरुष-लक्षण दे दिया।
श्लोक 41 (5.192.41)
अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूता तिष्ठते गृहे । नोपसर्पति तेनासौ सव्रीडः स्त्रीसरूपवान् ॥
agrahīllakṣaṇaṃ strīṇāṃ strībhūtā tiṣṭhate gṛhe | nopasarpati tenāsau savrīḍaḥ strīsarūpavān
उसने स्त्री के लक्षण ग्रहण कर लिए हैं और स्त्री बनकर घर में रहता है। स्त्री का रूप होने से लज्जित है, इसी कारण वह आपके पास नहीं आता।
श्लोक 42 (5.192.42)
एतस्मात्कारणाद्राजन्स्थूणो न त्वाऽद्य सर्पति । श्रुत्वा कुरु यथान्यायं विमानमिह तिष्ठताम् ॥
etasmātkāraṇādrājansthūṇo na tvā'dya sarpati | śrutvā kuru yathānyāyaṃ vimānamiha tiṣṭhatām
हे राजन्, इसी कारण स्थूण आज आपके पास नहीं आता। यह सुनकर जो न्यायोचित हो वह कीजिए। आपका विमान यहीं रुके।"
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (5.192.43)
आनीयतां स्थूण इति ततो यक्षाधिपोऽब्रवीत् । कर्तास्मि निग्रहं तस्य प्रत्युवाच पुनः पुनः ॥
ānīyatāṃ sthūṇa iti tato yakṣādhipo'bravīt | kartāsmi nigrahaṃ tasya pratyuvāca punaḥ punaḥ
तब यक्षराज ने कहा, "स्थूण को यहाँ लाया जाए।" और वे बार-बार कहते रहे, "मैं उसे दण्ड दूँगा।"
श्लोक 44 (5.192.44)
सोऽभ्यगच्छत यक्षेन्द्रमाहूतः पृथिवीपते । स्त्रीसरूपो महाराज तस्थौ व्रीडासमन्वितः ॥
so'bhyagacchata yakṣendramāhūtaḥ pṛthivīpate | strīsarūpo mahārāja tasthau vrīḍāsamanvitaḥ
हे पृथ्वीपति, बुलाए जाने पर वह यक्षराज के पास आया और हे महाराज, स्त्री-रूप में लज्जा से भरा हुआ खड़ा रहा।
श्लोक 45 (5.192.45)
तं शशापाथ संक्रुद्धो धनदः कुरुनन्दन । एवमेव भवत्वद्य स्त्रीत्वं पापस्य गुह्यकाः ॥
taṃ śaśāpātha saṃkruddho dhanadaḥ kurunandana | evameva bhavatvadya strītvaṃ pāpasya guhyakāḥ
हे कुरुनन्दन, तब क्रुद्ध होकर धनद कुबेर ने उसे शाप दिया — "हे गुह्यको, इस पापी का स्त्रीत्व आज से ऐसा ही बना रहे।"
श्लोक 46 (5.192.46)
ततोऽब्रवीद्यक्षपतिर्महात्मा । यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान् । शिखण्डिनो लक्षणं पापबुद्धे । स्त्रीलक्षणं चाग्रहीः पापकर्मन् ॥
tato'bravīdyakṣapatirmahātmā | yasmādadāstvavamanyeha yakṣān | śikhaṇḍino lakṣaṇaṃ pāpabuddhe | strīlakṣaṇaṃ cāgrahīḥ pāpakarman
फिर महात्मा यक्षराज ने कहा — "हे पापबुद्धि, हे पापकर्मा, तुमने यक्षों का अपमान करके शिखण्डी को अपना पुरुष-लक्षण दे दिया और स्त्री का लक्षण ग्रहण कर लिया;
कुबेर उवाच
श्लोक 47 (5.192.47)
अप्रवृत्तं सुदुर्बुद्धे यस्मादेतत्त्वया कृतम् । तस्मादद्य प्रभृत्येव स्त्री त्वं सा पुरुषस्तथा ॥
apravṛttaṃ sudurbuddhe yasmādetattvayā kṛtam | tasmādadya prabhṛtyeva strī tvaṃ sā puruṣastathā
हे अत्यन्त दुर्बुद्धि, तुमने ऐसा काम किया है जो पहले कभी नहीं हुआ, इसलिए आज से तुम स्त्री रहोगे और वह पुरुष।"
भीष्म उवाच
श्लोक 48 (5.192.48)
ततः प्रसादयामासुर्यक्षा वैश्रवणं किल । स्थूणस्यार्थे कुरुष्वान्तं शापस्येति पुनः पुनः ॥
tataḥ prasādayāmāsuryakṣā vaiśravaṇaṃ kila | sthūṇasyārthe kuruṣvāntaṃ śāpasyeti punaḥ punaḥ
कहते हैं, तब यक्षों ने वैश्रवण को मनाना आरम्भ किया और बार-बार कहा, "स्थूण के लिए इस शाप की अवधि निश्चित कर दीजिए।"
श्लोक 49 (5.192.49)
ततो महात्मा यक्षेन्द्रः प्रत्युवाचानुगामिनः । सर्वान्यक्षगणांस्तात शापस्यान्तचिकीर्षया ॥
tato mahātmā yakṣendraḥ pratyuvācānugāminaḥ | sarvānyakṣagaṇāṃstāta śāpasyāntacikīrṣayā
हे तात, तब महात्मा यक्षराज ने शाप का अन्त करने की इच्छा से अपने सब अनुचर यक्षगणों को उत्तर दिया —
श्लोक 50 (5.192.50)
शिखण्डिनि हते यक्षाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यते । स्थूणो यक्षो निरुद्वेगो भवत्विति महामनाः ॥
śikhaṇḍini hate yakṣāḥ svaṃ rūpaṃ pratipatsyate | sthūṇo yakṣo nirudvego bhavatviti mahāmanāḥ
"हे यक्षो, शिखण्डी के मारे जाने पर यह अपना रूप फिर पा लेगा। यक्ष स्थूण निश्चिन्त रहे।" ऐसा उस महामना ने कहा।
श्लोक 51 (5.192.51)
इत्युक्त्वा भगवान्देवो यक्षराजः सुपूजितः । प्रययौ सहितः सर्वैर्निमेषान्तरचारिभिः ॥
ityuktvā bhagavāndevo yakṣarājaḥ supūjitaḥ | prayayau sahitaḥ sarvairnimeṣāntaracāribhiḥ
यह कहकर भली-भाँति पूजित भगवान् यक्षराज पलक झपकते चलने वाले अपने सब अनुचरों के साथ चले गए।
श्लोक 52 (5.192.52)
स्थूणस्तु शापं संप्राप्य तत्रैव न्यवसत्तदा । समये चागमत्तूर्णं शिखण्डी तं क्षपाचरम् ॥
sthūṇastu śāpaṃ saṃprāpya tatraiva nyavasattadā | samaye cāgamattūrṇaṃ śikhaṇḍī taṃ kṣapācaram
शाप पाकर स्थूण वहीं रहने लगा। नियत समय पर शिखण्डी शीघ्र ही उस निशाचर के पास आया।
श्लोक 53 (5.192.53)
सोऽभिगम्याब्रवीद्वाक्यं प्राप्तोऽस्मि भगवन्निति । तमब्रवीत्ततः स्थूणः प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ॥
so'bhigamyābravīdvākyaṃ prāpto'smi bhagavanniti | tamabravīttataḥ sthūṇaḥ prīto'smīti punaḥ punaḥ
उसके पास जाकर उसने कहा, "भगवन्, मैं आ गया हूँ।" तब स्थूण ने उससे बार-बार कहा, "मैं प्रसन्न हूँ।"
श्लोक 54 (5.192.54)
आर्जवेनागतं दृष्ट्वा राजपुत्रं शिखण्डिनम् । सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने ॥
ārjavenāgataṃ dṛṣṭvā rājaputraṃ śikhaṇḍinam | sarvameva yathāvṛttamācacakṣe śikhaṇḍine
राजकुमार शिखण्डी को सच्चाई से लौट आया देखकर उसने शिखण्डी को सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया।
श्लोक 55 (5.192.55)
शप्तो वैश्रवणेनाहं त्वत्कृते पार्थिवात्मज । गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान्यथासुखम् ॥
śapto vaiśravaṇenāhaṃ tvatkṛte pārthivātmaja | gacchedānīṃ yathākāmaṃ cara lokānyathāsukham
"हे राजकुमार, तुम्हारे कारण वैश्रवण ने मुझे शाप दे दिया है। अब तुम अपनी इच्छा से जाओ और सुखपूर्वक लोकों में विचरो।
श्लोक 56 (5.192.56)
दिष्टमेतत्पुरा मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् । गमनं तव चेतो हि पौलस्त्यस्य च दर्शनम् ॥
diṣṭametatpurā manye na śakyamativartitum | gamanaṃ tava ceto hi paulastyasya ca darśanam
मैं समझता हूँ, यह पहले से ही विधि का विधान था, जिसे टाला नहीं जा सकता था — तुम्हारा यहाँ आना और पौलस्त्य कुबेर का दर्शन।"
श्लोक 57 (5.192.57)
एवमुक्तः शिखण्डी तु स्थूणयक्षेण भारत । प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महतावृतः ॥
evamuktaḥ śikhaṇḍī tu sthūṇayakṣeṇa bhārata | pratyājagāma nagaraṃ harṣeṇa mahatāvṛtaḥ
हे भारत, यक्ष स्थूण के ऐसा कहने पर शिखण्डी अत्यन्त हर्ष से भरा हुआ नगर लौट आया।
श्लोक 58 (5.192.58)
पूजयामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महाधनैः । द्विजातीन्देवताश्चैव चैत्यानथ चतुष्पथान् ॥
pūjayāmāsa vividhairgandhamālyairmahādhanaiḥ | dvijātīndevatāścaiva caityānatha catuṣpathān
उसने अनेक प्रकार के गन्ध, मालाओं और बहुमूल्य वस्तुओं से ब्राह्मणों, देवताओं, चैत्य-वृक्षों और चौराहों की पूजा की।
श्लोक 59 (5.192.59)
द्रुपदः सह पुत्रेण सिद्धार्थेन शिखण्डिना । मुदं च परमां लेभे पाञ्चाल्यः सह बान्धवैः ॥
drupadaḥ saha putreṇa siddhārthena śikhaṇḍinā | mudaṃ ca paramāṃ lebhe pāñcālyaḥ saha bāndhavaiḥ
पाञ्चालराज द्रुपद अपने सफल-मनोरथ पुत्र शिखण्डी और बन्धु-बान्धवों के साथ परम आनन्दित हुए।
श्लोक 60 (5.192.60)
शिष्यार्थं प्रददौ चाथ द्रोणाय कुरुपुङ्गव । शिखण्डिनं महाराज पुत्रं स्त्रीपूर्विणं तथा ॥
śiṣyārthaṃ pradadau cātha droṇāya kurupuṅgava | śikhaṇḍinaṃ mahārāja putraṃ strīpūrviṇaṃ tathā
हे कुरुश्रेष्ठ, हे महाराज, फिर उन्होंने अपने उस पुत्र शिखण्डी को, जो पहले स्त्री था, शिष्य बनाने के लिए द्रोण को सौंप दिया।
श्लोक 61 (5.192.61)
प्रतिपेदे चतुष्पादं धनुर्वेदं नृपात्मजः । शिखण्डी सह युष्माभिर्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥
pratipede catuṣpādaṃ dhanurvedaṃ nṛpātmajaḥ | śikhaṇḍī saha yuṣmābhirdhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ
राजकुमार शिखण्डी ने तुम सबके साथ, और पृषतवंशी धृष्टद्युम्न के साथ, चार अंगों वाला धनुर्वेद प्राप्त किया।
श्लोक 62 (5.192.62)
मम त्वेतच्चरास्तात यथावत्प्रत्यवेदयन् । जडान्धबधिराकारा ये मुक्ता द्रुपदे मया ॥
mama tvetaccarāstāta yathāvatpratyavedayan | jaḍāndhabadhirākārā ye muktā drupade mayā
हे तात, यह सब मेरे गुप्तचरों ने मुझे ठीक-ठीक बताया था, जिन्हें मैंने जड़, अन्धे और बहरे का वेश देकर द्रुपद के यहाँ छोड़ रखा था।
श्लोक 63 (5.192.63)
एवमेष महाराज स्त्री पुमान्द्रुपदात्मजः । स संभूतः कुरुश्रेष्ठ शिखण्डी रथसत्तमः ॥
evameṣa mahārāja strī pumāndrupadātmajaḥ | sa saṃbhūtaḥ kuruśreṣṭha śikhaṇḍī rathasattamaḥ
हे महाराज, हे कुरुश्रेष्ठ, इस प्रकार द्रुपद का यह पुत्र, जो स्त्री भी था और पुरुष भी, रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी के रूप में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 64 (5.192.64)
ज्येष्ठा काशिपतेः कन्या अम्बा नामेति विश्रुता । द्रुपदस्य कुले जाता शिखण्डी भरतर्षभ ॥
jyeṣṭhā kāśipateḥ kanyā ambā nāmeti viśrutā | drupadasya kule jātā śikhaṇḍī bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, काशिराज की जो ज्येष्ठ कन्या अम्बा नाम से प्रसिद्ध थी, वही द्रुपद के कुल में शिखण्डी बनकर जन्मी है।
श्लोक 65 (5.192.65)
नाहमेनं धनुष्पाणिं युयुत्सुं समुपस्थितम् । मुहूर्तमपि पश्येयं प्रहरेयं न चाप्युत ॥
nāhamenaṃ dhanuṣpāṇiṃ yuyutsuṃ samupasthitam | muhūrtamapi paśyeyaṃ prahareyaṃ na cāpyuta
जब वह हाथ में धनुष लेकर युद्ध की इच्छा से मेरे सामने आएगा, तब मैं उसे एक क्षण के लिए भी नहीं देखूँगा और न उस पर प्रहार करूँगा।
श्लोक 66 (5.192.66)
व्रतमेतन्मम सदा पृथिव्यामपि विश्रुतम् । स्त्रियां स्त्रीपूर्वके चैव स्त्रीनाम्नि स्त्रीसरूपिणि ॥
vratametanmama sadā pṛthivyāmapi viśrutam | striyāṃ strīpūrvake caiva strīnāmni strīsarūpiṇi
मेरा यह व्रत सदा से है और पृथ्वी भर में प्रसिद्ध है कि स्त्री पर, जो पहले स्त्री रहा हो उस पर, स्त्री-नाम वाले पर और स्त्री-जैसे रूप वाले पर
श्लोक 67 (5.192.67)
न मुञ्चेयमहं बाणमिति कौरवनन्दन । न हन्यामहमेतेन कारणेन शिखण्डिनम् ॥
na muñceyamahaṃ bāṇamiti kauravanandana | na hanyāmahametena kāraṇena śikhaṇḍinam
मैं बाण नहीं छोड़ूँगा, हे कौरवनन्दन। इसी कारण मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा।
श्लोक 68 (5.192.68)
एतत्तत्त्वमहं वेद जन्म तात शिखण्डिनः । ततो नैनं हनिष्यामि समरेष्वाततायिनम् ॥
etattattvamahaṃ veda janma tāta śikhaṇḍinaḥ | tato nainaṃ haniṣyāmi samareṣvātatāyinam
हे तात, मैं शिखण्डी के जन्म का यह रहस्य जानता हूँ। इसलिए युद्ध में शस्त्र उठाकर आक्रमण करने पर भी मैं उसे नहीं मारूँगा।
श्लोक 69 (5.192.69)
यदि भीष्मः स्त्रियं हन्यात्सन्तः कुर्युर्विगर्हणम् । नैनं तस्माद्धनिष्यामि दृष्ट्वापि समरे स्थितम् ॥
yadi bhīṣmaḥ striyaṃ hanyātsantaḥ kuryurvigarhaṇam | nainaṃ tasmāddhaniṣyāmi dṛṣṭvāpi samare sthitam
यदि भीष्म किसी स्त्री को मारे, तो सज्जन उसकी निन्दा करेंगे। इसलिए उसे रणभूमि में खड़ा देखकर भी मैं उसे नहीं मारूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 70 (5.192.70)
एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यो राजा दुर्योधनस्तदा । मुहूर्तमिव स ध्यात्वा भीष्मे युक्तममन्यत ॥
etacchrutvā tu kauravyo rājā duryodhanastadā | muhūrtamiva sa dhyātvā bhīṣme yuktamamanyata
यह सुनकर कुरुवंशी राजा दुर्योधन ने क्षण भर विचार किया और भीष्म के लिए यह उचित ही माना।