उद्योग पर्व · अध्याय 20
कौरव-सभा में द्रुपद के पुरोहित का वक्तव्य
द्रुपद का पुरोहित हस्तिनापुर पहुँचता है और धृतराष्ट्र, भीष्म तथा विदुर उसका सत्कार करते हैं। एकत्र सेनानायकों के बीच वह कहता है कि धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों का पैतृक धन पर समान अधिकार है, और पाण्डवों पर हुए अन्यायों का स्मरण कराता है — उनके प्राण लेने के प्रयत्न, छल से छीना गया राज्य, सभा में अपमान और तेरह वर्षों का वनवास — फिर भी वे शान्ति ही चाहते हैं। वह चेतावनी देता है कि सात अक्षौहिणियाँ युधिष्ठिर की आज्ञा की प्रतीक्षा में हैं और अर्जुन तथा श्रीकृष्ण किसी भी सेना से बढ़कर हैं, और कौरवों से आग्रह करता है कि समय निकलने से पहले वे पाण्डवों को उनका भाग दे दें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.20.1)
स च कौरव्यमासाद्य द्रुपदस्य पुरोहितः । सत्कृतो धृतराष्ट्रेण भीष्मेण विदुरेण च ॥
sa ca kauravyamāsādya drupadasya purohitaḥ | satkṛto dhṛtarāṣṭreṇa bhīṣmeṇa vidureṇa ca
द्रुपद का पुरोहित कौरवों के पास पहुँचा, और धृतराष्ट्र, भीष्म तथा विदुर ने उसका सत्कार किया।
श्लोक 2 (5.20.2)
सर्वकौशल्यमुक्त्वाऽऽदौ पृष्ट्वा चैवमनामयम् । सर्वसेनाप्रणेतॄणां मध्ये वाक्यमुवाच ह ॥
sarvakauśalyamuktvā''dau pṛṣṭvā caivamanāmayam | sarvasenāpraṇetṝṇāṃ madhye vākyamuvāca ha
पहले सबका कुशल-समाचार कहकर और उनका आरोग्य पूछकर उसने सब सेनानायकों के बीच यह वचन कहा —
पुरोहित उवाच
श्लोक 3 (5.20.3)
सर्वैर्भवद्भिर्विदितो राजधर्मः सनातनः । वाक्योपादानहेतोस्तु वक्ष्यामि विदिते सति ॥
sarvairbhavadbhirvidito rājadharmaḥ sanātanaḥ | vākyopādānahetostu vakṣyāmi vidite sati
राजाओं का सनातन धर्म आप सबको विदित है। फिर भी, विदित होते हुए भी, आपसे उत्तर पाने के उद्देश्य से मैं कुछ कहूँगा।
श्लोक 4 (5.20.4)
धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च सुतावेकस्य विश्रुतौ । तयोः समानं द्रविणं पैतृकं नात्र संशयः ॥
dhṛtarāṣṭraśca pāṇḍuśca sutāvekasya viśrutau | tayoḥ samānaṃ draviṇaṃ paitṛkaṃ nātra saṃśayaḥ
धृतराष्ट्र और पाण्डु एक ही पिता के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। पैतृक धन में उन दोनों का समान भाग है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 5 (5.20.5)
धृतराष्ट्रस्य ये पुत्राः प्राप्तं तैः पैतृकं वसु । पाण्डुपुत्राः कथं नाम न प्राप्ताः पैतृकं वसु ॥
dhṛtarāṣṭrasya ye putrāḥ prāptaṃ taiḥ paitṛkaṃ vasu | pāṇḍuputrāḥ kathaṃ nāma na prāptāḥ paitṛkaṃ vasu
धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पैतृक धन पा लिया है; फिर पाण्डु के पुत्रों ने पैतृक धन क्यों नहीं पाया?
श्लोक 6 (5.20.6)
वनं गतैः पाण्डवेयैर्विदितं वः पुरा यथा । न प्राप्तं पैतृकं द्रव्यं धृतराष्ट्रेण यद्धृतम् ॥
vanaṃ gataiḥ pāṇḍaveyairviditaṃ vaḥ purā yathā | na prāptaṃ paitṛkaṃ dravyaṃ dhṛtarāṣṭreṇa yaddhṛtam
आप जानते हैं कि पहले जब पाण्डव वन को गए, तब उन्हें वह पैतृक सम्पत्ति नहीं मिली, जिसे धृतराष्ट्र ने हथिया लिया था।
श्लोक 7 (5.20.7)
प्राणान्तिकैरप्युपायैः प्रयतद्भिरनेकशः । शेषवन्तो न शकिता नेतुं वै यमसादनम् ॥
prāṇāntikairapyupāyaiḥ prayatadbhiranekaśaḥ | śeṣavanto na śakitā netuṃ vai yamasādanam
प्राण लेने वाले उपायों से भी अनेक बार प्रयत्न करके वे उन्हें यमलोक नहीं भेज सके, क्योंकि उनकी आयु शेष थी।
श्लोक 8 (5.20.8)
पुनश्च वर्धितं राज्यं स्वबलेन महात्मभिः । छद्मनाऽपहृतं क्षुद्रैर्धार्तराष्ट्रैः ससौबलैः ॥
punaśca vardhitaṃ rājyaṃ svabalena mahātmabhiḥ | chadmanā'pahṛtaṃ kṣudrairdhārtarāṣṭraiḥ sasaubalaiḥ
फिर उन महात्माओं ने अपने बल से जो राज्य बढ़ाया था, उसे नीच धार्तराष्ट्रों ने सुबलपुत्र (शकुनि) के साथ मिलकर छल से हर लिया।
श्लोक 9 (5.20.9)
तदप्यनुमतं कर्म यथा युक्तमनेन वै । वासिताश्च महारण्ये वर्षाणीह त्रयोदश ॥
tadapyanumataṃ karma yathā yuktamanena vai | vāsitāśca mahāraṇye varṣāṇīha trayodaśa
उस कर्म का भी इन्होंने मानो उचित समझकर अनुमोदन किया, और उन्हें तेरह वर्षों तक महावन में रहना पड़ा।
श्लोक 10 (5.20.10)
सभायां क्लेशितैर्वीरैः सहभार्यैस्तथा भृशम् । अरण्ये विविधाः क्लेशाः संप्राप्तास्तैः सुदारुणाः ॥
sabhāyāṃ kleśitairvīraiḥ sahabhāryaistathā bhṛśam | araṇye vividhāḥ kleśāḥ saṃprāptāstaiḥ sudāruṇāḥ
सभा में उन वीरों को उनकी पत्नी सहित घोर अपमान सहना पड़ा, और वन में उन्होंने अनेक भयंकर कष्ट झेले।
श्लोक 11 (5.20.11)
तथा विराटनगरे योन्यन्तरगतैरिव । प्राप्तः परमसंक्लेशो यथा पापैर्महात्मभिः ॥
tathā virāṭanagare yonyantaragatairiva | prāptaḥ paramasaṃkleśo yathā pāpairmahātmabhiḥ
इसी प्रकार विराटनगर में, मानो किसी दूसरी योनि में चले गए हों, उन महात्माओं ने पापियों की भाँति घोर कष्ट भोगा।
श्लोक 12 (5.20.12)
ते सर्वं पृष्ठतः कृत्वा तत्पूर्वं कर्म किल्विषम् । साम्नैव कुरुभिः सन्धिमिच्छन्ति कुरुपुङ्गवाः ॥
te sarvaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā tatpūrvaṃ karma kilviṣam | sāmnaiva kurubhiḥ sandhimicchanti kurupuṅgavāḥ
फिर भी वे कुरुश्रेष्ठ उस सारे पुराने अन्याय को पीछे छोड़कर कौरवों के साथ शान्तिपूर्वक ही सन्धि चाहते हैं।
श्लोक 13 (5.20.13)
तेषां च वृत्तमाज्ञाय वृत्तं दुर्योधनस्य च । अनुनेतुमिहार्हन्ति धार्तराष्ट्रं सुहृज्जनाः ॥
teṣāṃ ca vṛttamājñāya vṛttaṃ duryodhanasya ca | anunetumihārhanti dhārtarāṣṭraṃ suhṛjjanāḥ
उनका आचरण और दुर्योधन का आचरण भी जानकर, यहाँ उपस्थित हितैषियों को धृतराष्ट्र-पुत्र को समझा-बुझाकर मना लेना चाहिए।
श्लोक 14 (5.20.14)
न हि ते विग्रहं वीराः कुर्वन्ति कुरुभिः सह । अविनाशेन लोकस्य काङ्क्षन्ते पाण्डवाः स्वकम् ॥
na hi te vigrahaṃ vīrāḥ kurvanti kurubhiḥ saha | avināśena lokasya kāṅkṣante pāṇḍavāḥ svakam
क्योंकि वे वीर पाण्डव कौरवों से युद्ध नहीं चाहते; वे लोक का विनाश किए बिना अपना भाग चाहते हैं।
श्लोक 15 (5.20.15)
यश्चापि धार्तराष्ट्रस्य हेतुः स्याद्विग्रहं प्रति । स च हेतुर्न मन्तव्यो बलीयांसस्तथा हि ते ॥
yaścāpi dhārtarāṣṭrasya hetuḥ syādvigrahaṃ prati | sa ca heturna mantavyo balīyāṃsastathā hi te
धृतराष्ट्र-पुत्र युद्ध के लिए जो भी कारण माने, उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे (पाण्डव) अधिक बलवान् हैं।
श्लोक 16 (5.20.16)
अक्षौहिण्यश्च सप्तैव धर्मपुत्रस्य सङ्गताः । युयुत्समानाः कुरुभिः प्रतीक्षन्तेऽस्य शासनम् ॥
akṣauhiṇyaśca saptaiva dharmaputrasya saṅgatāḥ | yuyutsamānāḥ kurubhiḥ pratīkṣante'sya śāsanam
धर्मपुत्र के लिए सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो चुकी हैं, जो कौरवों से युद्ध के लिए उत्सुक होकर उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही हैं।
श्लोक 17 (5.20.17)
अपरे पुरुषव्याघ्राः सहस्राक्षौहिणीसमाः । सात्यकिर्भीमसेनश्च यमौ च सुमहाबलौ ॥
apare puruṣavyāghrāḥ sahasrākṣauhiṇīsamāḥ | sātyakirbhīmasenaśca yamau ca sumahābalau
इनके अतिरिक्त अन्य पुरुषसिंह भी हैं, जो सहस्र अक्षौहिणियों के बराबर हैं — सात्यकि, भीमसेन और महाबली नकुल-सहदेव।
श्लोक 18 (5.20.18)
एकादशैताः पृतना एकतश्च समागताः । एकतश्च महाबाहुर्बहुरूपी धनञ्जयः ॥
ekādaśaitāḥ pṛtanā ekataśca samāgatāḥ | ekataśca mahābāhurbahurūpī dhanañjayaḥ
एक ओर ये ग्यारह सेनाएँ एकत्र हैं, और दूसरी ओर बहुरूपी महाबाहु धनञ्जय।
श्लोक 19 (5.20.19)
यथा किरीटी सर्वाभ्यः सेनाभ्यो व्यतिरिच्यते । एवमेव महाबाहुर्वासुदेवो महाद्युतिः ॥
yathā kirīṭī sarvābhyaḥ senābhyo vyatiricyate | evameva mahābāhurvāsudevo mahādyutiḥ
जैसे किरीटी अर्जुन सारी सेनाओं से बढ़कर हैं, वैसे ही महातेजस्वी महाबाहु वासुदेव भी हैं।
श्लोक 20 (5.20.20)
बहुलत्वं च सेनानां विक्रमं च किरीटिनः । बुद्धिमत्त्वं च कृष्णस्य बुद्ध्वा युध्येत को नरः ॥
bahulatvaṃ ca senānāṃ vikramaṃ ca kirīṭinaḥ | buddhimattvaṃ ca kṛṣṇasya buddhvā yudhyeta ko naraḥ
सेनाओं की विशालता, किरीटी का पराक्रम और श्रीकृष्ण की बुद्धिमत्ता को जानकर कौन मनुष्य युद्ध करेगा?
श्लोक 21 (5.20.21)
ते भवन्तो यथाधर्मं यथासमयमेव च । प्रयच्छन्तु प्रदातव्यं मा वः कालोऽत्यगादयम् ॥
te bhavanto yathādharmaṃ yathāsamayameva ca | prayacchantu pradātavyaṃ mā vaḥ kālo'tyagādayam
अतः आप लोग धर्म के अनुसार और प्रतिज्ञा के अनुसार, जो देना उचित है, वह दे दें। यह समय आपके हाथ से निकल न जाए।