उद्योग पर्व · अध्याय 19
दोनों पक्षों की सेनाओं का एकत्र होना
अनेक राजा अपनी सेनाएँ लेकर युधिष्ठिर के पास आते हैं: चमचमाती सेना के साथ युयुधान (सात्यकि), चेदिराज धृष्टकेतु, मगधराज जयत्सेन, पाण्ड्य नरेश, पाँचों केकय भाई, द्रुपद और विराट — और इस प्रकार सात अक्षौहिणियाँ एकत्र हो जाती हैं। भगदत्त, भूरिश्रवा, शल्य, कृतवर्मा, जयद्रथ, काम्बोजराज सुदक्षिण, माहिष्मती के नील, अवन्ती के दोनों राजा तथा अन्य राजा दुर्योधन के लिए ग्यारह अक्षौहिणियाँ लाते हैं, जो इतनी विशाल हैं कि हस्तिनापुर में उनके लिए स्थान नहीं रहता और वे पञ्चनद से यामुन पर्वत तक के प्रदेश में फैल जाती हैं। कौरवों के पास भेजा गया द्रुपद का पुरोहित इस सेना को देखता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.19.1)
युयुधानस्ततो वीरः सात्वतानां महारथः । महता चतुरङ्गेण बलेनागाद्युधिष्ठिरम् ॥
yuyudhānastato vīraḥ sātvatānāṃ mahārathaḥ | mahatā caturaṅgeṇa balenāgādyudhiṣṭhiram
तब सात्वतों के महारथी वीर युयुधान (सात्यकि) विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ युधिष्ठिर के पास आए।
श्लोक 2 (5.19.2)
तस्य योधा महावीर्या नानादेशसमागताः । नानाप्रहरणा वीराः शोभयांचक्रिरे बलम् ॥
tasya yodhā mahāvīryā nānādeśasamāgatāḥ | nānāpraharaṇā vīrāḥ śobhayāṃcakrire balam
अनेक देशों से आए हुए, नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले उसके महापराक्रमी वीर योद्धा उस सेना की शोभा बढ़ा रहे थे।
श्लोक 3 (5.19.3)
परश्वथैर्भिण्डिपालैः शूलतोमरमुद्गरैः । परिघैर्यष्टिभिः पाशैः करवालैश्च निर्मलैः ॥
paraśvathairbhiṇḍipālaiḥ śūlatomaramudgaraiḥ | parighairyaṣṭibhiḥ pāśaiḥ karavālaiśca nirmalaiḥ
फरसों और भिन्दिपालों से, शूल, तोमर और मुद्गरों से, परिघों, लाठियों, पाशों और निर्मल तलवारों से,
श्लोक 4 (5.19.4)
खड्गकार्मुकनिर्यूहैः शरैश्च विविधैरपि । तैलधौतैः प्रकाशद्भिस्तदशोभत वै बलम् ॥
khaḍgakārmukaniryūhaiḥ śaraiśca vividhairapi | tailadhautaiḥ prakāśadbhistadaśobhata vai balam
खड्गों, धनुषों और शिरस्त्राणों से तथा तेल से धोकर चमकाए गए अनेक प्रकार के बाणों से वह सेना सुशोभित हो रही थी।
श्लोक 5 (5.19.5)
तस्य मेघप्रकाशस्य सौवर्णैः शोभितस्य च । बभूव रूपं सैन्यस्य मेघस्येव सविद्युतः ॥
tasya meghaprakāśasya sauvarṇaiḥ śobhitasya ca | babhūva rūpaṃ sainyasya meghasyeva savidyutaḥ
मेघ के समान श्याम और सुवर्ण से सुशोभित उस सेना का रूप बिजली से युक्त मेघ के समान था।
श्लोक 6 (5.19.6)
अक्षौहिणी तु सा सेना तदा यौधिष्ठिरं बलम् । प्रविश्यान्तर्दधे राजन्सागरं कुनदी यथा ॥
akṣauhiṇī tu sā senā tadā yaudhiṣṭhiraṃ balam | praviśyāntardadhe rājansāgaraṃ kunadī yathā
हे राजन्! वह सेना एक अक्षौहिणी थी; युधिष्ठिर की सेना में प्रवेश करके वह उसमें वैसे ही विलीन हो गई जैसे छोटी नदी समुद्र में।
श्लोक 7 (5.19.7)
तथैवाक्षौहिणीं गृह्य चेदीनामृषभो बली । धृष्टकेतुरुपागच्छत्पाण्डवानमितौजसः ॥
tathaivākṣauhiṇīṃ gṛhya cedīnāmṛṣabho balī | dhṛṣṭaketurupāgacchatpāṇḍavānamitaujasaḥ
इसी प्रकार चेदियों में श्रेष्ठ बलवान् धृष्टकेतु एक अक्षौहिणी लेकर अमित तेजस्वी पाण्डवों के पास आए।
श्लोक 8 (5.19.8)
मागधश्च जयत्सेनो जारासन्धिर्महाबलः । अक्षौहिण्यैव सैन्यस्य धर्मराजमुपागमत् ॥
māgadhaśca jayatseno jārāsandhirmahābalaḥ | akṣauhiṇyaiva sainyasya dharmarājamupāgamat
मगधराज महाबली जरासन्धपुत्र जयत्सेन भी एक अक्षौहिणी सेना के साथ धर्मराज के पास आए।
श्लोक 9 (5.19.9)
तथैव पाण्ड्यो राजेन्द्र सागरानूपवासिभिः । वृतो बहुविधैर्योधैर्युधिष्ठिरमुपागमत् ॥
tathaiva pāṇḍyo rājendra sāgarānūpavāsibhiḥ | vṛto bahuvidhairyodhairyudhiṣṭhiramupāgamat
हे राजेन्द्र! इसी प्रकार पाण्ड्य नरेश समुद्रतटवर्ती प्रदेशों में रहने वाले अनेक प्रकार के योद्धाओं से घिरे हुए युधिष्ठिर के पास आए।
श्लोक 10 (5.19.10)
तस्य सैन्यमतीवासीत्तस्मिन्बलसमागमे । प्रेक्षणीयतरं राजन्सुवेषं बलवत्तदा ॥
tasya sainyamatīvāsīttasminbalasamāgame | prekṣaṇīyataraṃ rājansuveṣaṃ balavattadā
हे राजन्! उस सेना-समागम में उनकी सेना अत्यन्त दर्शनीय, सुन्दर वेशभूषा वाली और बलशाली थी।
श्लोक 11 (5.19.11)
केकयाश्च नरव्याघ्राः सोदराः पञ्च पार्थिवाः । संहर्षयन्तः कौन्तेयानक्षौहिण्या समागताः ॥
kekayāśca naravyāghrāḥ sodarāḥ pañca pārthivāḥ | saṃharṣayantaḥ kaunteyānakṣauhiṇyā samāgatāḥ
और पुरुषसिंह केकय — पाँच सहोदर राजा — एक अक्षौहिणी के साथ कुन्तीपुत्रों को हर्षित करते हुए आ पहुँचे।
श्लोक 12 (5.19.12)
द्रुपदस्याप्यभूत्सेना नानादेशसमागतैः । शोभिता पुरुषैः शूरैः पुत्रैश्चास्य महारथैः ॥
drupadasyāpyabhūtsenā nānādeśasamāgataiḥ | śobhitā puruṣaiḥ śūraiḥ putraiścāsya mahārathaiḥ
द्रुपद की सेना भी अनेक देशों से आए हुए शूरवीर पुरुषों और उनके महारथी पुत्रों से सुशोभित थी।
श्लोक 13 (5.19.13)
तथैव राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः । पार्वतीयैर्महीपालैः सहितः पाण्डवानयात् ॥
tathaiva rājā matsyānāṃ virāṭo vāhinīpatiḥ | pārvatīyairmahīpālaiḥ sahitaḥ pāṇḍavānayāt
इसी प्रकार मत्स्यराज सेनापति विराट पर्वतीय राजाओं के साथ पाण्डवों के पास आए।
श्लोक 14 (5.19.14)
इतश्चेतश्च पाण्डूनां समाजग्मुर्महात्मनाम् । अक्षौहिण्यस्तु सप्तैव विविधध्वजसङ्कुलाः ॥
itaścetaśca pāṇḍūnāṃ samājagmurmahātmanām | akṣauhiṇyastu saptaiva vividhadhvajasaṅkulāḥ
इधर-उधर से महात्मा पाण्डवों के लिए नाना प्रकार की ध्वजाओं से भरी कुल सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गईं।
श्लोक 15 (5.19.15)
युयुत्समानाः कुरुभिः पाण्डवान्समहर्षयन् । तथैव धार्तराष्ट्रस्य हर्षं समभिवर्धयन् ॥
yuyutsamānāḥ kurubhiḥ pāṇḍavānsamaharṣayan | tathaiva dhārtarāṣṭrasya harṣaṃ samabhivardhayan
कौरवों से युद्ध के लिए उत्सुक उन सेनाओं ने पाण्डवों को हर्षित किया। इसी प्रकार धृतराष्ट्र-पुत्र का हर्ष बढ़ाते हुए
श्लोक 16 (5.19.16)
भगदत्तो महीपालः सेनामक्षौहिणीं ददौ । तस्य चीनैः किरातैश्च काञ्चनैरिव संवृतम् ॥
bhagadatto mahīpālaḥ senāmakṣauhiṇīṃ dadau | tasya cīnaiḥ kirātaiśca kāñcanairiva saṃvṛtam
राजा भगदत्त ने एक अक्षौहिणी सेना दी। सोने के समान चमकते चीनों और किरातों से भरी हुई उनकी सेना
श्लोक 17 (5.19.17)
बभौ बलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा । तथा भूरिश्रवाः शूरः शल्यश्च कुरुनन्दन ॥
babhau balamanādhṛṣyaṃ karṇikāravanaṃ yathā | tathā bhūriśravāḥ śūraḥ śalyaśca kurunandana
कर्णिकार-वन के समान दुर्धर्ष दिखाई देती थी। हे कुरुनन्दन! इसी प्रकार शूरवीर भूरिश्रवा और शल्य
श्लोक 18 (5.19.18)
दुर्योधनमुपायातावक्षौहिण्या पृथक्पृथक् । कृतवर्मा च हार्दिक्यो भोजान्धकुकुरैः सह ॥
duryodhanamupāyātāvakṣauhiṇyā pṛthakpṛthak | kṛtavarmā ca hārdikyo bhojāndhakukuraiḥ saha
अलग-अलग एक-एक अक्षौहिणी लेकर दुर्योधन के पास आए। और हृदिकपुत्र कृतवर्मा भोज, अन्धक और कुकुर वीरों के साथ
श्लोक 19 (5.19.19)
अक्षौहिण्यैव सेनाया दुर्योधनमुपागमत् । तस्य तैः पुरुषव्याघ्रैर्वनमालाधरैर्बलम् ॥
akṣauhiṇyaiva senāyā duryodhanamupāgamat | tasya taiḥ puruṣavyāghrairvanamālādharairbalam
एक अक्षौहिणी सेना लेकर दुर्योधन के पास आए। वनमाला धारण किए हुए उन पुरुषसिंहों से उनकी सेना
श्लोक 20 (5.19.20)
अशोभत यथा मत्तैर्वनं प्रक्रीडितैर्गजैः । जयद्रथमुखाश्चान्ये सिन्धुसौवीरवासिनः ॥
aśobhata yathā mattairvanaṃ prakrīḍitairgajaiḥ | jayadrathamukhāścānye sindhusauvīravāsinaḥ
क्रीड़ा करते मतवाले हाथियों से भरे वन के समान शोभा पा रही थी। जयद्रथ आदि सिन्धु और सौवीर देश के निवासी अन्य
श्लोक 21 (5.19.21)
आजग्मुः पृथिवीपालाः कम्पयन्त इवाचलान् । तेषामक्षौहिणी सेना बहुला विबभौ तदा ॥
ājagmuḥ pṛthivīpālāḥ kampayanta ivācalān | teṣāmakṣauhiṇī senā bahulā vibabhau tadā
राजा भी मानो पर्वतों को कँपाते हुए आए। उनकी विशाल अक्षौहिणी सेना उस समय ऐसी शोभा पा रही थी
श्लोक 22 (5.19.22)
विधूयमानो वातेन बहुरूप इवाम्बुदः । सुदक्षिणश्च काम्बोजो यवनैश्च शकैस्तथा ॥
vidhūyamāno vātena bahurūpa ivāmbudaḥ | sudakṣiṇaśca kāmbojo yavanaiśca śakaistathā
जैसे वायु से उड़ाया जाता हुआ अनेक रूपों वाला मेघ। और काम्बोजराज सुदक्षिण यवनों और शकों के साथ
श्लोक 23 (5.19.23)
उपाजगाम कौरव्यमक्षौहिण्या विशांपते । तस्य सेनासमावायः शलभानामिवाबभौ ॥
upājagāma kauravyamakṣauhiṇyā viśāṃpate | tasya senāsamāvāyaḥ śalabhānāmivābabhau
हे प्रजानाथ! एक अक्षौहिणी लेकर कौरव (दुर्योधन) के पास आए। उनकी सेना का जमघट टिड्डियों के दल के समान दिखाई देता था,
श्लोक 24 (5.19.24)
स च संप्राप्य कौरव्यं तत्रैवान्तर्दधे तदा । तथा महिष्मतीवासी नीलो नीलायुधैः सह ॥
sa ca saṃprāpya kauravyaṃ tatraivāntardadhe tadā | tathā mahiṣmatīvāsī nīlo nīlāyudhaiḥ saha
और कौरव के पास पहुँचकर वह वहीं उसकी सेना में विलीन हो गई। इसी प्रकार माहिष्मती-निवासी नील नीले आयुधों वाले योद्धाओं के साथ
श्लोक 25 (5.19.25)
महीपालो महावीर्यैर्दक्षिणापथवासिभिः । आवन्त्यौ च महीपालौ महाबलसुसंवृतौ ॥
mahīpālo mahāvīryairdakṣiṇāpathavāsibhiḥ | āvantyau ca mahīpālau mahābalasusaṃvṛtau
— वह राजा दक्षिणापथ के महापराक्रमी योद्धाओं के साथ आया। और अवन्ती के दोनों राजा, विशाल सेना से घिरे हुए,
श्लोक 26 (5.19.26)
पृथगक्षौहिणीभ्यां तावभियातौ सुयोधनम् । ततस्ततस्तु सर्वेषां भूमिपानां महात्मनाम् ॥
pṛthagakṣauhiṇībhyāṃ tāvabhiyātau suyodhanam | tatastatastu sarveṣāṃ bhūmipānāṃ mahātmanām
अलग-अलग अक्षौहिणी लेकर सुयोधन के पास आए। फिर जहाँ-तहाँ से सब महात्मा राजाओं की
श्लोक 27 (5.19.27)
तिस्रोऽन्याः समवर्तन्त वाहिन्यो भरतर्षभ । एवमेकादशावृत्ताः सेना दुर्योधनस्य ताः ॥
tisro'nyāḥ samavartanta vāhinyo bharatarṣabha | evamekādaśāvṛttāḥ senā duryodhanasya tāḥ
तीन और सेनाएँ आ जुटीं, हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार दुर्योधन की वे ग्यारह सेनाएँ एकत्र हुईं,
श्लोक 28 (5.19.28)
युयुत्समानाः कौन्तेयान्नानाध्वजसमाकुलाः । न हास्तिनपुरे राजन्नवकाशोऽभवत्तदा ॥
yuyutsamānāḥ kaunteyānnānādhvajasamākulāḥ | na hāstinapure rājannavakāśo'bhavattadā
जो नाना प्रकार की ध्वजाओं से भरी थीं और कुन्तीपुत्रों से युद्ध के लिए उत्सुक थीं। हे राजन्! उस समय हस्तिनापुर में
श्लोक 29 (5.19.29)
राज्ञां स्वबलमुख्यानां प्राधान्येनापि भारत । ततः पञ्चनदं चैव कृत्स्नं च कुरुजाङ्गलम् ॥
rājñāṃ svabalamukhyānāṃ prādhānyenāpi bhārata | tataḥ pañcanadaṃ caiva kṛtsnaṃ ca kurujāṅgalam
अपनी-अपनी सेनाओं के प्रधान राजाओं के लिए भी, हे भारत, स्थान नहीं रहा। तब सम्पूर्ण पञ्चनद और कुरुजाङ्गल,
श्लोक 30 (5.19.30)
तथा रोहितकारण्यं मरुभूमिश्च केवला । अहिच्छत्रं कालकूटं गङ्गाकूलं च भारत ॥
tathā rohitakāraṇyaṃ marubhūmiśca kevalā | ahicchatraṃ kālakūṭaṃ gaṅgākūlaṃ ca bhārata
रोहितक वन और समूची मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट और गङ्गा का तट, हे भारत,
श्लोक 31 (5.19.31)
वारणं वाटधानं च यामुनश्चैव पर्वतः । एष देशः सुविस्तीर्णः प्रभूतधनधान्यवान् ॥
vāraṇaṃ vāṭadhānaṃ ca yāmunaścaiva parvataḥ | eṣa deśaḥ suvistīrṇaḥ prabhūtadhanadhānyavān
वारण, वाटधान और यामुन पर्वत — यह विस्तृत प्रदेश, जो प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न था,
श्लोक 32 (5.19.32)
बभूव कौरवेयाणां बलेनातीव संवृतः । तत्र सैन्यं तथा युक्तं ददर्श स पुरोहितः ॥
babhūva kauraveyāṇāṃ balenātīva saṃvṛtaḥ | tatra sainyaṃ tathā yuktaṃ dadarśa sa purohitaḥ
कौरवों की सेना से पूरी तरह भर गया। वहाँ उस पुरोहित ने उस प्रकार सजी हुई सेना को देखा —
श्लोक 33 (5.19.33)
यः स पाञ्चालराजेन प्रेषितः कौरवान्प्रति ॥
yaḥ sa pāñcālarājena preṣitaḥ kauravānprati
वही पुरोहित, जिसे पाञ्चालराज ने कौरवों के पास भेजा था।