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उद्योग पर्व · अध्याय 18

इन्द्र की वापसी और शल्य का वचन

गन्धर्वों और अप्सराओं से स्तुति पाते हुए इन्द्र अग्नि, बृहस्पति, यम, वरुण और कुबेर के साथ ऐरावत पर स्वर्ग लौटते हैं, इन्द्राणी से मिलते हैं और फिर से शासन करने लगते हैं; वे महर्षि अङ्गिरा को वर देते हैं कि अथर्ववेद के साथ उनका नाम जुड़ेगा। शल्य युधिष्ठिर को इसका तात्पर्य समझाते हैं: जैसे इन्द्र ने दुःख सहकर और छिपकर रहने के बाद अपना सिंहासन फिर पाया, वैसे ही पाण्डव भी अपना राज्य पुनः प्राप्त करेंगे; वे इस कथा को सुनने का पुण्य भी बताते हैं। युधिष्ठिर शल्य से अनुरोध करते हैं कि कर्ण का सारथि बनने पर वे अर्जुन की प्रशंसा करके कर्ण का तेज नष्ट करें; शल्य स्वीकार करते हैं और अपनी सेना के साथ दुर्योधन के पास चले जाते हैं।

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शल्य उवाच

श्लोक 1 (5.18.1)

ततः शक्रः स्तूयमानो गन्धर्वाप्सरसां गणैः । ऐरावतं समारुह्य द्विपेन्द्रं लक्षणैर्युतम् ॥

tataḥ śakraḥ stūyamāno gandharvāpsarasāṃ gaṇaiḥ | airāvataṃ samāruhya dvipendraṃ lakṣaṇairyutam

तब गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों से स्तुति पाते हुए शक्र शुभ लक्षणों से युक्त गजराज ऐरावत पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 2 (5.18.2)

पावकः सुमहातेजा महर्षिश्च बृहस्पतिः । यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च धनेश्वरः ॥

pāvakaḥ sumahātejā maharṣiśca bṛhaspatiḥ | yamaśca varuṇaścaiva kuberaśca dhaneśvaraḥ

महातेजस्वी अग्नि, महर्षि बृहस्पति, यम, वरुण और धनपति कुबेर —

श्लोक 3 (5.18.3)

सर्वैर्देवैः परिवृतः शक्रो वृत्रनिषूदनः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च यातस्त्रिभुवनं प्रभुः ॥

sarvairdevaiḥ parivṛtaḥ śakro vṛtraniṣūdanaḥ | gandharvairapsarobhiśca yātastribhuvanaṃ prabhuḥ

इन सब देवताओं से घिरे हुए वृत्रनाशक प्रभु शक्र गन्धर्वों और अप्सराओं के साथ त्रिभुवन (स्वर्ग) को गए।

श्लोक 4 (5.18.4)

स समेत्य महेन्द्राण्या देवराजः शतक्रतुः । मुदा परमया युक्तः पालयामास देवराट् ॥

sa sametya mahendrāṇyā devarājaḥ śatakratuḥ | mudā paramayā yuktaḥ pālayāmāsa devarāṭ

इन्द्राणी से मिलकर देवराज शतक्रतु परम आनन्द से युक्त होकर देवताओं के सम्राट् के रूप में शासन करने लगे।

श्लोक 5 (5.18.5)

ततः स भगवांस्तत्र अङ्गिराः समदृश्यत । अथर्ववेदमन्त्रैश्च देवेन्द्रं समपूजयत् ॥

tataḥ sa bhagavāṃstatra aṅgirāḥ samadṛśyata | atharvavedamantraiśca devendraṃ samapūjayat

तब वहाँ भगवान् अङ्गिरा प्रकट हुए और उन्होंने अथर्ववेद के मन्त्रों से देवेन्द्र का पूजन किया।

श्लोक 6 (5.18.6)

ततस्तु भगवानिन्द्रः संहृष्टः समपद्यत । वरं च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा ॥

tatastu bhagavānindraḥ saṃhṛṣṭaḥ samapadyata | varaṃ ca pradadau tasmai atharvāṅgirase tadā

इससे भगवान् इन्द्र अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने अथर्वाङ्गिरा को वर दिया।

इन्द्र उवाच

श्लोक 7 (5.18.7)

अथर्वाङ्गिरसं नाम वेदेऽस्मिन्वै भविष्यति । उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागं च लप्स्यसे ॥

atharvāṅgirasaṃ nāma vede'sminvai bhaviṣyati | udāharaṇametaddhi yajñabhāgaṃ ca lapsyase

इस वेद में तुम्हारा नाम अथर्वाङ्गिरस होगा; यही इसका प्रमाण होगा, और तुम्हें यज्ञ में भाग भी मिलेगा।

शल्य उवाच

श्लोक 8 (5.18.8)

एवं संपूज्य भगवानथर्वाङ्गिरसं तदा । व्यसर्जयन्महाराज देवराजः शतक्रतुः ॥

evaṃ saṃpūjya bhagavānatharvāṅgirasaṃ tadā | vyasarjayanmahārāja devarājaḥ śatakratuḥ

हे महाराज! इस प्रकार अथर्वाङ्गिरा का सम्मान करके भगवान् देवराज शतक्रतु ने उन्हें विदा किया।

श्लोक 9 (5.18.9)

संपूज्य सर्वांस्त्रिदशानृषींश्चापि तपोधनान् । इन्द्रः प्रमुदितो राजन्धर्मेणापालयत्प्रजाः ॥

saṃpūjya sarvāṃstridaśānṛṣīṃścāpi tapodhanān | indraḥ pramudito rājandharmeṇāpālayatprajāḥ

हे राजन्! सब देवताओं और तपोधन ऋषियों का सत्कार करके प्रसन्न इन्द्र धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने लगे।

श्लोक 10 (5.18.10)

एवं दुःखमनुप्राप्तमिन्द्रेण सह भार्यया । अज्ञातवासश्च कृतः शत्रूणां वधकाङ्क्षया ॥

evaṃ duḥkhamanuprāptamindreṇa saha bhāryayā | ajñātavāsaśca kṛtaḥ śatrūṇāṃ vadhakāṅkṣayā

इस प्रकार इन्द्र ने भी अपनी पत्नी के साथ दुःख पाया था और शत्रुओं के वध की इच्छा से अज्ञातवास किया था।

श्लोक 11 (5.18.11)

नात्र मन्युस्त्वया कार्यो यत्क्लिष्टोऽसि महावने । द्रौपद्या सह राजेन्द्र भ्रातृभिश्च महात्मभिः ॥

nātra manyustvayā kāryo yatkliṣṭo'si mahāvane | draupadyā saha rājendra bhrātṛbhiśca mahātmabhiḥ

हे राजेन्द्र! द्रौपदी और अपने महात्मा भाइयों के साथ तुमने महावन में जो कष्ट उठाया, उसके लिए दुःख मत करो।

श्लोक 12 (5.18.12)

एवं त्वमपि राजेन्द्र राज्यं प्राप्स्यसि भारत । वृत्रं हत्वा यथा प्राप्तः शक्रः कौरवनन्दन ॥

evaṃ tvamapi rājendra rājyaṃ prāpsyasi bhārata | vṛtraṃ hatvā yathā prāptaḥ śakraḥ kauravanandana

हे राजेन्द्र, हे भारत, हे कुरुनन्दन! जैसे वृत्र को मारकर शक्र ने अपना राज्य पाया, वैसे ही तुम भी अपना राज्य प्राप्त करोगे।

श्लोक 13 (5.18.13)

दुराचारश्च नहुषो ब्रह्मद्विट् पापचेतनः । अगस्त्यशापाभिहतो विनष्टः शाश्वतीः समाः ॥

durācāraśca nahuṣo brahmadviṭ pāpacetanaḥ | agastyaśāpābhihato vinaṣṭaḥ śāśvatīḥ samāḥ

दुराचारी, ब्राह्मणद्वेषी, पापबुद्धि नहुष अगस्त्य के शाप से आहत होकर अनन्त वर्षों के लिए नष्ट हो गया।

श्लोक 14 (5.18.14)

एवं तव दुरात्मानः शत्रवः शत्रुसूदन । क्षिप्रं नाशं गमिष्यन्ति कर्णदुर्योधनादयः ॥

evaṃ tava durātmānaḥ śatravaḥ śatrusūdana | kṣipraṃ nāśaṃ gamiṣyanti karṇaduryodhanādayaḥ

हे शत्रुसूदन! इसी प्रकार कर्ण, दुर्योधन आदि तुम्हारे दुष्टात्मा शत्रु शीघ्र ही नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 15 (5.18.15)

ततः सागरपर्यन्तां भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् । भ्रातृभिः सहितो वीर द्रौपद्या च सहानया ॥

tataḥ sāgaraparyantāṃ bhokṣyase medinīmimām | bhrātṛbhiḥ sahito vīra draupadyā ca sahānayā

हे वीर! तब तुम अपने भाइयों और इस द्रौपदी के साथ समुद्रपर्यन्त इस पृथ्वी का उपभोग करोगे।

श्लोक 16 (5.18.16)

उपाख्यानमिदं शक्रविजयं वेदसंमितम् । राज्ञा व्यूढेष्वनीकेषु श्रोतव्यं जयमिच्छता ॥

upākhyānamidaṃ śakravijayaṃ vedasaṃmitam | rājñā vyūḍheṣvanīkeṣu śrotavyaṃ jayamicchatā

शक्र की विजय का यह उपाख्यान वेद के समान है। विजय चाहने वाले राजा को सेनाओं का व्यूह रच लिए जाने पर इसे सुनना चाहिए।

श्लोक 17 (5.18.17)

तस्मात्संश्रावयामि त्वां विजयं जयतां वर । संस्तूयमाना वर्धन्ते महात्मानो युधिष्ठिर ॥

tasmātsaṃśrāvayāmi tvāṃ vijayaṃ jayatāṃ vara | saṃstūyamānā vardhante mahātmāno yudhiṣṭhira

हे विजयी पुरुषों में श्रेष्ठ! इसीलिए मैंने तुम्हें यह विजय-कथा सुनाई है। हे युधिष्ठिर! महात्मा पुरुष स्तुति पाकर बढ़ते हैं।

श्लोक 18 (5.18.18)

क्षत्रियाणामभावोऽयं युधिष्ठिर महात्मनाम् । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च । सङ्ग्रामे संक्षयो घोरो भविष्यत्यचिरादिव ॥

kṣatriyāṇāmabhāvo'yaṃ yudhiṣṭhira mahātmanām | duryodhanāparādhena bhīmārjunabalena ca | saṅgrāme saṃkṣayo ghoro bhaviṣyatyacirādiva

हे युधिष्ठिर! दुर्योधन के अपराध से और भीम तथा अर्जुन के बल से महात्मा क्षत्रियों का यह विनाश — युद्ध में भयंकर संहार — शीघ्र ही होने वाला है।

श्लोक 19 (5.18.19)

आख्यानमिन्द्रविजयं य इदं नियतः पठेत् । धूतपाप्मा जितस्वर्गः परत्रेह च मोदते ॥

ākhyānamindravijayaṃ ya idaṃ niyataḥ paṭhet | dhūtapāpmā jitasvargaḥ paratreha ca modate

जो संयमी पुरुष इन्द्र की विजय के इस आख्यान का पाठ करता है, वह पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को जीत लेता है और इस लोक तथा परलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 20 (5.18.20)

न चारिजं भयं तस्य नापुत्रो वा भवेन्नरः । नापदं प्राप्नुयात्कांचिद्दीर्घमायुश्च विन्दति । सर्वत्र जयमाप्नोति न कदाचित्पराजयम् ॥

na cārijaṃ bhayaṃ tasya nāputro vā bhavennaraḥ | nāpadaṃ prāpnuyātkāṃciddīrghamāyuśca vindati | sarvatra jayamāpnoti na kadācitparājayam

उसे शत्रुओं से भय नहीं होता, न वह पुत्रहीन होता है; उस पर कोई विपत्ति नहीं आती और वह दीर्घ आयु पाता है। वह सर्वत्र विजय पाता है, कभी पराजय नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (5.18.21)

एवमाश्वासितो राजा शल्येन भरतर्षभ । पूजयामास विधिवच्छल्यं धर्मभृतां वरः ॥

evamāśvāsito rājā śalyena bharatarṣabha | pūjayāmāsa vidhivacchalyaṃ dharmabhṛtāṃ varaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! शल्य से इस प्रकार आश्वासन पाकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक शल्य का सम्मान किया।

श्लोक 22 (5.18.22)

श्रुत्वा तु शल्यवचनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रत्युवाच महाबाहुर्मद्रराजमिदं वचः ॥

śrutvā tu śalyavacanaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | pratyuvāca mahābāhurmadrarājamidaṃ vacaḥ

शल्य के वचन सुनकर महाबाहु कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने मद्रराज को यह उत्तर दिया —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 23 (5.18.23)

भवान्कर्णस्य सारथ्यं करिष्यति न संशयः । तत्र तेजोवधः कार्यः कर्णस्यार्जुनसंस्तवैः ॥

bhavānkarṇasya sārathyaṃ kariṣyati na saṃśayaḥ | tatra tejovadhaḥ kāryaḥ karṇasyārjunasaṃstavaiḥ

आप कर्ण का सारथ्य करेंगे, इसमें संशय नहीं है। उस समय अर्जुन की प्रशंसा करके आपको कर्ण का तेज नष्ट करना होगा।

शल्य उवाच

श्लोक 24 (5.18.24)

एवमेतत्करिष्यामि यथा मां संप्रभाषसे । यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत्करिष्याम्यहं तव ॥

evametatkariṣyāmi yathā māṃ saṃprabhāṣase | yaccānyadapi śakṣyāmi tatkariṣyāmyahaṃ tava

जैसा आप मुझसे कहते हैं, मैं वैसा ही करूँगा; और जो कुछ और भी मुझसे बन पड़ेगा, वह भी आपके लिए करूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (5.18.25)

ततस्त्वामन्त्र्य कौन्तेयाञ्छल्यो मद्राधिपस्तदा । जगाम सबलः श्रीमान्दुर्योधनमरिन्दम ॥

tatastvāmantrya kaunteyāñchalyo madrādhipastadā | jagāma sabalaḥ śrīmānduryodhanamarindama

हे अरिन्दम! तब श्रीमान् मद्रराज शल्य कुन्तीपुत्रों से विदा लेकर अपनी सेना के साथ दुर्योधन के पास चले गए।

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