उद्योग पर्व · अध्याय 17
अगस्त्य द्वारा नहुष के पतन का वृत्तान्त
जब इन्द्र और लोकपाल नहुष के विनाश का उपाय सोच रहे थे, तभी महर्षि अगस्त्य प्रकट होकर इन्द्र को बधाई देते हैं कि नहुष स्वर्ग के राज्य से गिर गया है। इन्द्र से सम्मान पाकर वे बताते हैं कि नहुष को ढोने वाले ऋषियों ने उससे पूछा कि गौओं के प्रोक्षण के वैदिक मन्त्र प्रमाण हैं या नहीं; नहुष ने उन्हें नकार दिया और अगस्त्य के सिर को पैर से छुआ, तब अगस्त्य ने उसे शाप दिया कि वह दस हज़ार वर्षों तक विशाल सर्प बनकर पृथ्वी पर भटकेगा, जब तक अपने वंश के युधिष्ठिर से उसकी भेंट न हो। नहुष के पतन पर देवता, ऋषि और सभी प्राणी हर्ष मनाते हैं।
शल्य उवाच
श्लोक 1 (5.17.1)
अथ संचिन्तयानस्य देवराजस्य धीमतः । नहुषस्य वधोपायं लोकपालैः सदैवतैः ॥
atha saṃcintayānasya devarājasya dhīmataḥ | nahuṣasya vadhopāyaṃ lokapālaiḥ sadaivataiḥ
तब बुद्धिमान् देवराज जब लोकपालों और देवताओं के साथ नहुष के वध का उपाय सोच रहे थे,
श्लोक 2 (5.17.2)
तपस्वी तत्र भगवानगस्त्यः प्रत्यदृश्यत । सोऽब्रवीदर्च्य देवेन्द्रं दिष्ट्या वै वर्धते भवान् ॥
tapasvī tatra bhagavānagastyaḥ pratyadṛśyata | so'bravīdarcya devendraṃ diṣṭyā vai vardhate bhavān
तभी वहाँ तपस्वी भगवान् अगस्त्य दिखाई दिए। उन्होंने देवेन्द्र का सत्कार करके कहा — "सौभाग्य से आपका अभ्युदय हो रहा है —"
अगस्त्य उवाच
श्लोक 3 (5.17.3)
विश्वरूपविनाशेन वृत्रासुरवधेन च । दिष्ट्याद्य नहुषो भ्रष्टो देवराज्यात्पुरन्दर ॥
viśvarūpavināśena vṛtrāsuravadhena ca | diṣṭyādya nahuṣo bhraṣṭo devarājyātpurandara
विश्वरूप के विनाश और वृत्रासुर के वध से। और हे पुरन्दर! सौभाग्य से आज नहुष देवराज्य से भ्रष्ट हो गया है।
श्लोक 4 (5.17.4)
दिष्ट्या हतारिं पश्यामि भवन्तं वलसूदन ॥
diṣṭyā hatāriṃ paśyāmi bhavantaṃ valasūdana
हे वलसूदन! सौभाग्य से मैं आपको शत्रुओं का संहार कर चुका देख रहा हूँ।
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (5.17.5)
स्वागतं ते महर्षेऽस्तु प्रीतोऽहं दर्शनात्तत । पाद्यमाचमनीयं च गामर्घ्यं च प्रतीच्छ मे ॥
svāgataṃ te maharṣe'stu prīto'haṃ darśanāttata | pādyamācamanīyaṃ ca gāmarghyaṃ ca pratīccha me
हे महर्षे! आपका स्वागत है; हे तात, आपके दर्शन से मैं प्रसन्न हूँ। मुझसे पाद्य, आचमनीय, गौ और अर्घ्य ग्रहण कीजिए।
शल्य उवाच
श्लोक 6 (5.17.6)
पूजितं चोपविष्टं तमासने मुनिसत्तमम् । पर्यपृच्छत देवेशः प्रहृष्टो ब्राह्मणर्षभम् ॥
pūjitaṃ copaviṣṭaṃ tamāsane munisattamam | paryapṛcchata deveśaḥ prahṛṣṭo brāhmaṇarṣabham
जब वे मुनिश्रेष्ठ पूजित होकर आसन पर बैठ गए, तब प्रसन्न देवेश्वर ने उन ब्राह्मणश्रेष्ठ से पूछा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 7 (5.17.7)
श्रोतुमिच्छामि भगवन्कथ्यमानं द्विजोत्तम । परिभ्रष्टः कथं स्वर्गान्नहुषः पापनिश्चयः ॥
śrotumicchāmi bhagavankathyamānaṃ dvijottama | paribhraṣṭaḥ kathaṃ svargānnahuṣaḥ pāpaniścayaḥ
भगवन्, द्विजश्रेष्ठ! मैं आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि पाप का निश्चय करने वाला नहुष स्वर्ग से कैसे भ्रष्ट हुआ?
अगस्त्य उवाच
श्लोक 8 (5.17.8)
शृणु शक्र प्रियं वाक्यं यथा राजा दुरात्मवान् । स्वर्गाद्भ्रष्टो दुराचारो नहुषो बलदर्पितः ॥
śṛṇu śakra priyaṃ vākyaṃ yathā rājā durātmavān | svargādbhraṣṭo durācāro nahuṣo baladarpitaḥ
हे शक्र! वह प्रिय वृत्तान्त सुनो कि दुष्टात्मा, दुराचारी और बल के घमण्ड में चूर राजा नहुष स्वर्ग से कैसे गिरा।
श्लोक 9 (5.17.9)
श्रमार्ताश्च वहन्तस्तं नहुषं पापकारिणम् । देवर्षयो महाभागास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥
śramārtāśca vahantastaṃ nahuṣaṃ pāpakāriṇam | devarṣayo mahābhāgāstathā brahmarṣayo'malāḥ
पापकर्मी नहुष को ढोते-ढोते थके हुए महाभाग देवर्षि और निर्मल ब्रह्मर्षि
श्लोक 10 (5.17.10)
पप्रच्छुर्नहुषं देवं संशयं जयतां वर । य इमे ब्रह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम् ॥
papracchurnahuṣaṃ devaṃ saṃśayaṃ jayatāṃ vara | ya ime brahmaṇā proktā mantrā vai prokṣaṇe gavām
— हे विजेताओं में श्रेष्ठ! — देवपद पर बैठे नहुष से एक संशय पूछने लगे — "ब्रह्मा ने गौओं के प्रोक्षण के लिए जो ये मन्त्र कहे हैं,
श्लोक 11 (5.17.11)
एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव । नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतनः ॥
ete pramāṇaṃ bhavata utāho neti vāsava | nahuṣo neti tānāha tamasā mūḍhacetanaḥ
हे वासव! वे आपके लिए प्रमाण हैं या नहीं?" तमोगुण से मूढ़ बुद्धि वाले नहुष ने उनसे कहा — "नहीं।"
ऋषय ऊचुः
श्लोक 12 (5.17.12)
अधर्मे संप्रवृत्तस्त्वं धर्मं न प्रतिपद्यसे । प्रमाणमेतदस्माकं पूर्वं प्रोक्तं महर्षिभिः ॥
adharme saṃpravṛttastvaṃ dharmaṃ na pratipadyase | pramāṇametadasmākaṃ pūrvaṃ proktaṃ maharṣibhiḥ
तुम अधर्म में प्रवृत्त हो गए हो और धर्म को स्वीकार नहीं करते। हमारे लिए यह प्रमाण है, जिसे पूर्वकाल में महर्षियों ने कहा था।
अगस्त्य उवाच
श्लोक 13 (5.17.13)
ततो विवदमानः स मुनिभिः सह वासव । अथ मामस्पृशन्मूर्ध्नि पादेनाधर्मपीडितः ॥
tato vivadamānaḥ sa munibhiḥ saha vāsava | atha māmaspṛśanmūrdhni pādenādharmapīḍitaḥ
हे वासव! तब मुनियों के साथ विवाद करते हुए अधर्म से ग्रस्त उसने अपने पैर से मेरे सिर का स्पर्श किया।
श्लोक 14 (5.17.14)
तेनाभूद्धततेजाश्च निःश्रीकश्च महीपतिः । ततस्तं तमसाविग्नमवोचं भृशपीडितम् ॥
tenābhūddhatatejāśca niḥśrīkaśca mahīpatiḥ | tatastaṃ tamasāvignamavocaṃ bhṛśapīḍitam
उससे वह राजा तेजहीन और श्रीहीन हो गया। तब तमोगुण से उद्विग्न और अत्यन्त पीड़ित उससे मैंने कहा —
श्लोक 15 (5.17.15)
यस्मात्पूर्वैः कृतं राजन्ब्रह्मर्षिभिरनुष्ठितम् । अदृष्टं दूषयसि मे यच्च मूर्ध्न्यस्पृशः पदा ॥
yasmātpūrvaiḥ kṛtaṃ rājanbrahmarṣibhiranuṣṭhitam | adṛṣṭaṃ dūṣayasi me yacca mūrdhnyaspṛśaḥ padā
"हे राजन्! पूर्वजों द्वारा स्थापित और ब्रह्मर्षियों द्वारा आचरित अदृष्ट (शास्त्रीय) प्रमाण को तुम दूषित करते हो, और तुमने मेरे सिर को पैर से छुआ है,
श्लोक 16 (5.17.16)
यच्चापि त्वमृषीन्मूढ ब्रह्मकल्पान्दुरासदान् ॥
yaccāpi tvamṛṣīnmūḍha brahmakalpāndurāsadān
और हे मूढ़! ब्रह्मा के समान दुर्धर्ष ऋषियों को भी
श्लोक 17 (5.17.17)
वाहान्कृत्वा वाहयसि तेन स्वर्गाद्धतप्रभः । ध्वंस पाप परिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीतले ॥
vāhānkṛtvā vāhayasi tena svargāddhataprabhaḥ | dhvaṃsa pāpa paribhraṣṭaḥ kṣīṇapuṇyo mahītale
तुमने वाहन बनाकर उनसे अपनी सवारी ढुलवाई है — इसलिए हे पापी! तेजहीन होकर स्वर्ग से गिरो। भ्रष्ट और क्षीणपुण्य होकर पृथ्वी पर
श्लोक 18 (5.17.18)
दशवर्षसहस्राणि सर्परूपधरो महान् । विचरिष्यसि पूर्णेषु पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥
daśavarṣasahasrāṇi sarparūpadharo mahān | vicariṣyasi pūrṇeṣu punaḥ svargamavāpsyasi
तुम दस हज़ार वर्षों तक विशाल सर्प का रूप धारण करके विचरोगे; उनके पूरे होने पर तुम फिर स्वर्ग प्राप्त करोगे।
श्लोक 19 (5.17.19)
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं नाम तव वंशसमुद्भवम् । निहतो ब्रह्मशापेन प्रपद्यस्व त्रिविष्टपम् ॥
dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraṃ nāma tava vaṃśasamudbhavam | nihato brahmaśāpena prapadyasva triviṣṭapam
ब्राह्मण के शाप से गिराए गए तुम, अपने वंश में उत्पन्न युधिष्ठिर नामक पुरुष के दर्शन करके फिर स्वर्ग को प्राप्त होगे।"
श्लोक 20 (5.17.20)
एवं भ्रष्टो दुरात्मा स देवराज्यादरिन्दम । दिष्ट्या वर्धामहे शक्र हतो ब्रह्मर्षिकण्टकः ॥
evaṃ bhraṣṭo durātmā sa devarājyādarindama | diṣṭyā vardhāmahe śakra hato brahmarṣikaṇṭakaḥ
हे शत्रुदमन! इस प्रकार वह दुष्टात्मा देवराज्य से भ्रष्ट हो गया। हे शक्र! सौभाग्य से हमारा अभ्युदय हुआ है; ब्रह्मर्षियों का कण्टक नष्ट हो गया।
श्लोक 21 (5.17.21)
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्शचीपते । जितेन्द्रियो जितामित्रः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥
triviṣṭapaṃ prapadyasva pāhi lokāñśacīpate | jitendriyo jitāmitraḥ stūyamāno maharṣibhiḥ
हे शचीपते! जितेन्द्रिय और शत्रुविजयी होकर, महर्षियों से स्तुति पाते हुए, तुम स्वर्ग में जाओ और लोकों की रक्षा करो।
शल्य उवाच
श्लोक 22 (5.17.22)
ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृताः । पितरश्चैव यक्षाश्च भुजगा राक्षसास्तथा ॥
tato devā bhṛśaṃ tuṣṭā maharṣigaṇasaṃvṛtāḥ | pitaraścaiva yakṣāśca bhujagā rākṣasāstathā
तब अत्यन्त प्रसन्न देवता, महर्षिगणों से घिरे हुए, तथा पितर, यक्ष, नाग और राक्षस,
श्लोक 23 (5.17.23)
गन्धर्वा देवकन्याश्च सर्वे चाप्सरसां गणाः । सरांसि सरितः शैलाः सागराश्च विशांपते ॥
gandharvā devakanyāśca sarve cāpsarasāṃ gaṇāḥ | sarāṃsi saritaḥ śailāḥ sāgarāśca viśāṃpate
गन्धर्व, देवकन्याएँ, अप्सराओं के सब समूह, सरोवर, नदियाँ, पर्वत और सागर — हे प्रजानाथ! —
श्लोक 24 (5.17.24)
उपागम्याब्रुवन्सर्वे दिष्ट्या वर्धसि शत्रुहन् । हतश्च नहुषः पापो दिष्ट्यागस्त्येन धीमता । दिष्ट्या पापसमाचारः कृतः सर्पो महीतले ॥
upāgamyābruvansarve diṣṭyā vardhasi śatruhan | hataśca nahuṣaḥ pāpo diṣṭyāgastyena dhīmatā | diṣṭyā pāpasamācāraḥ kṛtaḥ sarpo mahītale
सब उनके पास आकर बोले — "हे शत्रुसूदन! सौभाग्य से आपका अभ्युदय हो रहा है। सौभाग्य से बुद्धिमान् अगस्त्य ने पापी नहुष को मार गिराया; सौभाग्य से उस पापाचारी को पृथ्वी पर सर्प बना दिया गया।"