उद्योग पर्व · अध्याय 16
अग्नि द्वारा कमलनाल में इन्द्र की खोज
बृहस्पति स्तोत्र द्वारा अग्नि की स्तुति करते हैं, और बल पाकर अग्नि जल में खोजते हुए इन्द्र को अणुमात्र रूप में कमल के तन्तु के भीतर छिपा पाते हैं। बृहस्पति और ऋषि स्तुति करके इन्द्र को फिर से पूर्ण बल में लौटाते हैं और उन्हें बताते हैं कि मनुष्य राजा नहुष कैसे देवराज बना और अब महर्षियों से अपनी सवारी ढुलवाता है। कुबेर, यम, सोम और वरुण वहाँ आते हैं; इन्द्र भाग देने का वचन देकर नहुष के विरुद्ध उनकी सहायता पाते हैं, अग्नि को महायज्ञों में अपने साथ संयुक्त भाग देते हैं, और कुबेर, यम तथा वरुण को क्रमशः धन, पितरों और जल का अधिपति बनाते हैं।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 1 (5.16.1)
त्वमग्रे सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् । त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि साक्षिवत् ॥
tvamagre sarvadevānāṃ mukhaṃ tvamasi havyavāṭ | tvamantaḥ sarvabhūtānāṃ gūḍhaścarasi sākṣivat
हे हव्यवाहन! तुम सब देवताओं में अग्रणी हो और उनके मुख हो। तुम सब प्राणियों के भीतर छिपकर साक्षी की भाँति विचरते हो।
श्लोक 2 (5.16.2)
त्वामाहुरेकं कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः । त्वया त्यक्तं जगच्चेदं सद्यो नश्येद्धुताशन ॥
tvāmāhurekaṃ kavayastvāmāhustrividhaṃ punaḥ | tvayā tyaktaṃ jagaccedaṃ sadyo naśyeddhutāśana
ज्ञानी कवि तुम्हें एक भी कहते हैं और फिर तीन प्रकार का भी। हे हुताशन! तुम्हारे त्याग देने पर यह जगत् तत्काल नष्ट हो जाए।
श्लोक 3 (5.16.3)
कृत्वा तुभ्यं नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् । गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ॥
kṛtvā tubhyaṃ namo viprāḥ svakarmavijitāṃ gatim | gacchanti saha patnībhiḥ sutairapi ca śāśvatīm
तुम्हें नमस्कार करके ब्राह्मण अपनी पत्नियों और पुत्रों के साथ अपने कर्मों से अर्जित सनातन गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 4 (5.16.4)
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हविः । यजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरैः ॥
tvamevāgne havyavāhastvameva paramaṃ haviḥ | yajanti satraistvāmeva yajñaiśca paramādhvaraiḥ
हे अग्ने! तुम ही हवि को वहन करने वाले हो और तुम ही परम हवि हो। लोग सत्रों और श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा तुम्हारा ही यजन करते हैं।
श्लोक 5 (5.16.5)
सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान्हव्यवाह । प्राप्ते काले पचसि पुनः समिद्धः । त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- । स्त्वमेवाग्रे भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥
sṛṣṭvā lokāṃstrīnimānhavyavāha | prāpte kāle pacasi punaḥ samiddhaḥ | tvaṃ sarvasya bhuvanasya prasūti- | stvamevāgre bhavasi punaḥ pratiṣṭhā
हे हव्यवाह! इन तीनों लोकों की सृष्टि करके समय आने पर तुम प्रज्वलित होकर फिर उन्हें भस्म कर देते हो। तुम सम्पूर्ण भुवन के उत्पत्ति-स्थान हो, और आरम्भ में फिर तुम ही उसके आधार बनते हो।
श्लोक 6 (5.16.6)
त्वामग्ने जलदानाहुर्विद्युतश्च मनीषिणः । वहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ॥
tvāmagne jaladānāhurvidyutaśca manīṣiṇaḥ | vahanti sarvabhūtāni tvatto niṣkramya hetayaḥ
हे अग्ने! मनीषी तुम्हें ही मेघ और विद्युत् कहते हैं। तुमसे निकलकर तुम्हारी ज्वालाएँ सब प्राणियों को वहन करती हैं।
श्लोक 7 (5.16.7)
त्वय्यापो निहिताः सर्वास्त्वयि सर्वमिदं जगत् । न तेऽस्त्यविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु पावक ॥
tvayyāpo nihitāḥ sarvāstvayi sarvamidaṃ jagat | na te'styaviditaṃ kiṃcittriṣu lokeṣu pāvaka
सारे जल तुममें स्थित हैं, यह सम्पूर्ण जगत् तुममें है। हे पावक! तीनों लोकों में तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।
श्लोक 8 (5.16.8)
स्वयोनिं भजते सर्वो विशस्वापोऽविशङ्कितः । अहं त्वां वर्धयिष्यामि ब्राह्मैर्मन्त्रैः सनातनैः ॥
svayoniṃ bhajate sarvo viśasvāpo'viśaṅkitaḥ | ahaṃ tvāṃ vardhayiṣyāmi brāhmairmantraiḥ sanātanaiḥ
सब कोई अपने उत्पत्ति-स्थान का ही आश्रय लेते हैं; तुम निःशंक होकर जल में प्रवेश करो। मैं सनातन वैदिक मन्त्रों से तुम्हारी वृद्धि करूँगा।
शल्य उवाच
श्लोक 9 (5.16.9)
एवं स्तुतो हव्यवाट् स भगवान्कविरुत्तमः । बृहस्पतिमथोवाच प्रीतिमान्वाक्यमुत्तमम् । दर्शयिष्यामि ते शक्रं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
evaṃ stuto havyavāṭ sa bhagavānkaviruttamaḥ | bṛhaspatimathovāca prītimānvākyamuttamam | darśayiṣyāmi te śakraṃ satyametadbravīmi te
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर कविश्रेष्ठ भगवान् हव्यवाहन प्रसन्न होकर बृहस्पति से यह उत्तम वचन बोले — "मैं तुम्हें शक्र के दर्शन कराऊँगा, यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।"
श्लोक 10 (5.16.10)
प्रविश्यापस्ततो वह्निः ससमुद्राः सपल्वलाः । आससाद सरस्तच्च गूढो यत्र शतक्रतुः ॥
praviśyāpastato vahniḥ sasamudrāḥ sapalvalāḥ | āsasāda sarastacca gūḍho yatra śatakratuḥ
तब अग्नि समुद्रों और सरोवरों सहित जलों में प्रविष्ट हुए और उस सरोवर तक पहुँचे जहाँ शतक्रतु इन्द्र छिपे हुए थे।
श्लोक 11 (5.16.11)
अथ तत्रापि पद्मानि विचिन्वन्भरतर्षभ । अपश्यत्स तु देवेन्द्रं बिसमध्यगतं तदा ॥
atha tatrāpi padmāni vicinvanbharatarṣabha | apaśyatsa tu devendraṃ bisamadhyagataṃ tadā
हे भरतश्रेष्ठ! वहाँ कमलों के बीच खोजते हुए उन्होंने देवराज को कमलनाल के भीतर स्थित देखा।
श्लोक 12 (5.16.12)
आगत्य च ततस्तूर्णं तमाचष्ट बृहस्पतेः । अणुमात्रेण वपुषा पद्मतन्त्वाश्रितं प्रभुम् ॥
āgatya ca tatastūrṇaṃ tamācaṣṭa bṛhaspateḥ | aṇumātreṇa vapuṣā padmatantvāśritaṃ prabhum
फिर उन्होंने शीघ्र लौटकर बृहस्पति को बताया कि प्रभु अणुमात्र शरीर धारण करके कमल के तन्तु का आश्रय लिए हुए हैं।
श्लोक 13 (5.16.13)
गत्वा देवर्षिगन्धर्वैः सहितोऽथ बृहस्पतिः । पुराणैः कर्मभिर्देवं तुष्टाव बलसूदनम् ॥
gatvā devarṣigandharvaiḥ sahito'tha bṛhaspatiḥ | purāṇaiḥ karmabhirdevaṃ tuṣṭāva balasūdanam
तब बृहस्पति देवर्षियों और गन्धर्वों के साथ वहाँ गए और बल नामक असुर को मारने वाले उन देव की, उनके प्राचीन कर्मों का बखान करते हुए, स्तुति करने लगे।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 14 (5.16.14)
महाऽसुरो हतः शक्र नमुचिर्दारुणस्त्वया । शम्बरश्च बलश्चैव तथोभौ घोरविक्रमौ ॥
mahā'suro hataḥ śakra namucirdāruṇastvayā | śambaraśca balaścaiva tathobhau ghoravikramau
हे शक्र! तुमने भयंकर महादैत्य नमुचि को मारा, और घोर पराक्रम वाले शम्बर और बल दोनों को भी।
श्लोक 15 (5.16.15)
शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाञ्शत्रून्निषूदय । उत्तिष्ठ शक्र संपश्य देवर्षींश्च समागतान् ॥
śatakrato vivardhasva sarvāñśatrūnniṣūdaya | uttiṣṭha śakra saṃpaśya devarṣīṃśca samāgatān
हे शतक्रतो! बढ़ो और सब शत्रुओं का संहार करो। हे शक्र! उठो और यहाँ एकत्र हुए देवर्षियों को देखो।
श्लोक 16 (5.16.16)
महेन्द्र दानवान्हत्वा लोकास्त्रातास्त्वया विभो । अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजोऽतिबृंहितम् । त्वया वृत्रो हतः पूर्वं देवराज जगत्पते ॥
mahendra dānavānhatvā lokāstrātāstvayā vibho | apāṃ phenaṃ samāsādya viṣṇutejo'tibṛṃhitam | tvayā vṛtro hataḥ pūrvaṃ devarāja jagatpate
हे महेन्द्र! हे विभो! दानवों को मारकर तुमने लोकों की रक्षा की। हे देवराज, हे जगत्पते! विष्णु के तेज से अत्यन्त बढ़ाए हुए जल के फेन को लेकर तुमने पूर्वकाल में वृत्र का वध किया था।
श्लोक 17 (5.16.17)
त्वं सर्वभूतेषु शरण्य ईड्य- । स्त्वया समं विद्यते नेह भूतम् । त्वया धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र । त्वं देवानां महिमानं चकर्थ ॥
tvaṃ sarvabhūteṣu śaraṇya īḍya- | stvayā samaṃ vidyate neha bhūtam | tvayā dhāryante sarvabhūtāni śakra | tvaṃ devānāṃ mahimānaṃ cakartha
तुम सब प्राणियों के शरणदाता और स्तुत्य हो; यहाँ तुम्हारे समान कोई प्राणी नहीं है। हे शक्र! सब प्राणियों को तुम ही धारण करते हो; देवताओं की महिमा तुमने ही स्थापित की है।
शल्य उवाच
श्लोक 18 (5.16.18)
पाहि सर्वांश्च लोकांश्च महेन्द्र बलमाप्नुहि । एवं संस्तूयमानश्च सोऽवर्धत शनैः शनैः ॥
pāhi sarvāṃśca lokāṃśca mahendra balamāpnuhi | evaṃ saṃstūyamānaśca so'vardhata śanaiḥ śanaiḥ
"हे महेन्द्र! सब लोकों की रक्षा करो और बल प्राप्त करो।" इस प्रकार स्तुति किए जाने पर वे धीरे-धीरे बढ़ने लगे।
श्लोक 19 (5.16.19)
स्वं चैव वपुरास्थाय बभूव स बलान्वितः । अब्रवीच्च गुरुं देवो बृहस्पतिमवस्थितम् ॥
svaṃ caiva vapurāsthāya babhūva sa balānvitaḥ | abravīcca guruṃ devo bṛhaspatimavasthitam
अपना स्वरूप फिर से धारण करके वे बलवान् हो गए, और उन देव ने सामने खड़े अपने गुरु बृहस्पति से कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 20 (5.16.20)
किं कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्ट्रो महासुरः । वृत्रश्च सुमहाकायो यो वै लोकाननाशयत् ॥
kiṃ kāryamavaśiṣṭaṃ vo hatastvāṣṭro mahāsuraḥ | vṛtraśca sumahākāyo yo vai lokānanāśayat
अब आप लोगों का कौन-सा कार्य शेष है? त्वष्टा का पुत्र महादैत्य मारा जा चुका है, और वह विशालकाय वृत्र भी, जो लोकों का नाश कर रहा था।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 21 (5.16.21)
मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा । देवराज्यमनुप्राप्तः सर्वान्नो बाधते भृशम् ॥
mānuṣo nahuṣo rājā devarṣigaṇatejasā | devarājyamanuprāptaḥ sarvānno bādhate bhṛśam
मनुष्य राजा नहुष देवताओं और ऋषिगणों के तेज से देवराज्य पा गया है, और हम सबको बहुत पीड़ा दे रहा है।
इन्द्र उवाच
श्लोक 22 (5.16.22)
कथं च नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम् । तपसा केन वा युक्तः किंवीर्यो वा बृहस्पते । तत्सर्वं कथय त्वं मे यथेन्द्रत्वमुपेयिवान् ॥
kathaṃ ca nahuṣo rājyaṃ devānāṃ prāpa durlabham | tapasā kena vā yuktaḥ kiṃvīryo vā bṛhaspate | tatsarvaṃ kathaya tvaṃ me yathendratvamupeyivān
नहुष ने देवताओं का वह दुर्लभ राज्य कैसे प्राप्त किया? हे बृहस्पते! वह किस तप से युक्त था, अथवा उसका पराक्रम कैसा था? वह इन्द्रपद तक कैसे पहुँचा, यह सब मुझे बताइए।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 23 (5.16.23)
त्वयि प्रनष्टे देवेश विश्वं प्रव्यथितं जगत् । परस्परभयोद्विग्नं बभूवार्तमराजकम् ॥
tvayi pranaṣṭe deveśa viśvaṃ pravyathitaṃ jagat | parasparabhayodvignaṃ babhūvārtamarājakam
हे देवेश! तुम्हारे लुप्त हो जाने पर सारा जगत् व्याकुल हो उठा। राजा के बिना वह पीड़ित हो गया और सब प्राणी एक-दूसरे के भय से उद्विग्न रहने लगे।
श्लोक 24 (5.16.24)
ततो देवैः सगन्धर्वैः सर्षिसङ्घैः सपावकैः । मानुषो नहुषो राजा देवराज्येऽभिषेचितः ॥
tato devaiḥ sagandharvaiḥ sarṣisaṅghaiḥ sapāvakaiḥ | mānuṣo nahuṣo rājā devarājye'bhiṣecitaḥ
तब देवताओं ने गन्धर्वों, ऋषिसमूहों और अग्नि के साथ मिलकर मनुष्य राजा नहुष का देवराज्य पर अभिषेक कर दिया।
श्लोक 25 (5.16.25)
देवा भीताः शक्रमकामयन्त । त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत् । तदा देवाः पितरोऽथर्षयश्च । गन्धर्वमुख्याश्च समेत्य सर्वे ॥
devā bhītāḥ śakramakāmayanta | tvayā tyaktaṃ mahadaindraṃ padaṃ tat | tadā devāḥ pitaro'tharṣayaśca | gandharvamukhyāśca sametya sarve
देवता भयभीत थे और शक्र को चाहते थे, क्योंकि तुमने इन्द्र का वह महान् पद त्याग दिया था। तब देवता, पितर, ऋषि और प्रमुख गन्धर्व सब एकत्र हुए।
श्लोक 26 (5.16.26)
गत्वाऽब्रुवन्नहुषं तत्र शक्र । त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता । तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त । आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम् ॥
gatvā'bruvannahuṣaṃ tatra śakra | tvaṃ no rājā bhava bhuvanasya goptā | tānabravīnnahuṣo nāsmi śakta | āpyāyadhvaṃ tapasā tejasā mām
हे शक्र! उन्होंने वहाँ नहुष के पास जाकर कहा — "तुम हमारे राजा बनो, लोक के रक्षक बनो।" नहुष ने उनसे कहा — "मैं समर्थ नहीं हूँ। आप लोग अपने तप और तेज से मुझे बल प्रदान करें।"
श्लोक 27 (5.16.27)
एवमुक्तैर्वर्द्धितश्चापि देवै । राजाऽभवन्नहुषो घोरवीर्यः । त्रैलोक्ये च प्राप्य राज्यं महर्षी- । न्कृत्वा वाहान्याति लोकान्दुरात्मा ॥
evamuktairvarddhitaścāpi devai | rājā'bhavannahuṣo ghoravīryaḥ | trailokye ca prāpya rājyaṃ maharṣī- | nkṛtvā vāhānyāti lokāndurātmā
ऐसा कहने पर देवताओं ने उसे बल दिया और नहुष घोर पराक्रम वाला राजा बन गया। त्रिलोकी का राज्य पाकर वह दुष्टात्मा महर्षियों को अपना वाहन बनाकर लोकों में विचरता है।
श्लोक 28 (5.16.28)
तेजोहरं दृष्टिविषं सुघोरं । मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित् । देवाश्च सर्वे नहुषं भृशार्ता । न पश्यन्ते गूढरूपाश्चरन्तः ॥
tejoharaṃ dṛṣṭiviṣaṃ sughoraṃ | mā tvaṃ paśyernahuṣaṃ vai kadācit | devāśca sarve nahuṣaṃ bhṛśārtā | na paśyante gūḍharūpāścarantaḥ
वह तेज हर लेने वाला है, उसकी दृष्टि में विष है, वह अत्यन्त भयंकर है — तुम कभी भी नहुष की ओर मत देखना। सभी देवता अत्यन्त पीड़ित होकर गुप्त रूप में विचरते हैं और नहुष की ओर नहीं देखते।
शल्य उवाच
श्लोक 29 (5.16.29)
एवं वदत्यङ्गिरसां वरिष्ठे । बृहस्पतौ लोकपालः कुबेरः । वैवस्वतश्चैव यमः पुराणो । देवश्च सोमो वरुणश्चाजगाम ॥
evaṃ vadatyaṅgirasāṃ variṣṭhe | bṛhaspatau lokapālaḥ kuberaḥ | vaivasvataścaiva yamaḥ purāṇo | devaśca somo varuṇaścājagāma
जब अङ्गिरावंशियों में श्रेष्ठ बृहस्पति इस प्रकार कह रहे थे, तभी लोकपाल कुबेर, विवस्वान् के पुत्र पुरातन यम, देव सोम और वरुण वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 30 (5.16.30)
ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु- । र्दिष्ट्या त्वाष्ट्रो निहतश्चैव वृत्रः । दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च । पश्यामो वै निहतारिं च शक्र ॥
te vai samāgamya mahendramūcu- | rdiṣṭyā tvāṣṭro nihataścaiva vṛtraḥ | diṣṭyā ca tvāṃ kuśalinamakṣataṃ ca | paśyāmo vai nihatāriṃ ca śakra
वे सब एकत्र होकर महेन्द्र से बोले — "सौभाग्य से त्वष्टा का पुत्र और वृत्र भी मारे गए। हे शक्र! सौभाग्य से हम तुम्हें सकुशल, अक्षत और शत्रुओं को मार चुका देख रहे हैं।"
श्लोक 31 (5.16.31)
स तान्यथावच्च हि लोकपाला- । न्समेत्य वै प्रीतमना महेन्द्रः । उवाच चैनान्प्रतिभाष्य शक्रः । संचोदयिष्यन्नहुषस्यान्तरेण ॥
sa tānyathāvacca hi lokapālā- | nsametya vai prītamanā mahendraḥ | uvāca cainānpratibhāṣya śakraḥ | saṃcodayiṣyannahuṣasyāntareṇa
महेन्द्र प्रसन्नचित्त होकर उन लोकपालों से यथोचित रीति से मिले, और शक्र ने उन्हें उत्तर देते हुए, नहुष में भेद डालने के लिए उन्हें प्रेरित करने की इच्छा से कहा —
श्लोक 32 (5.16.32)
राजा देवानां नहुषो घोररूप- । स्तत्र साह्यं दीयतां मे भवद्भिः । ते चाब्रुवन्नहुषो घोररूपो । दृष्टीविषस्तस्य बिभीम ईश ॥
rājā devānāṃ nahuṣo ghorarūpa- | statra sāhyaṃ dīyatāṃ me bhavadbhiḥ | te cābruvannahuṣo ghorarūpo | dṛṣṭīviṣastasya bibhīma īśa
"देवताओं का राजा नहुष भयंकर रूप वाला है; इस विषय में आप लोग मेरी सहायता करें।" वे बोले — "नहुष भयंकर रूप वाला है, उसकी दृष्टि में विष है; हे ईश! हम उससे डरते हैं।
श्लोक 33 (5.16.33)
त्वं चेद्राजानं नहुषं पराजये- । स्ततो वयं भागमर्हाम शक्र । इन्द्रोऽब्रवीद्भवतु भवानपां पति- । र्यमः कुबेरश्च मयाभिषेकम् ॥
tvaṃ cedrājānaṃ nahuṣaṃ parājaye- | stato vayaṃ bhāgamarhāma śakra | indro'bravīdbhavatu bhavānapāṃ pati- | ryamaḥ kuberaśca mayābhiṣekam
हे शक्र! यदि तुम राजा नहुष को परास्त कर दो, तो हम भाग पाने के अधिकारी हैं।" इन्द्र ने कहा — "ऐसा ही हो; आप जल के स्वामी हों, और यम तथा कुबेर मुझसे अभिषेक
श्लोक 34 (5.16.34)
संप्राप्नुवन्त्वद्य सहैव तेन । रिपुं जयामो नहुषं घोरदृष्टिम् । ततः शक्रं ज्वलनोऽप्याह भागं । प्रयच्छ मह्यं तव साह्यं करिष्ये । तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि । चेन्द्राग्न्योर्वै भाग एको महाक्रतौ ॥
saṃprāpnuvantvadya sahaiva tena | ripuṃ jayāmo nahuṣaṃ ghoradṛṣṭim | tataḥ śakraṃ jvalano'pyāha bhāgaṃ | prayaccha mahyaṃ tava sāhyaṃ kariṣye | tamāha śakro bhavitāgne tavāpi | cendrāgnyorvai bhāga eko mahākratau
आज ही उसके साथ प्राप्त करें। आइए, हम भयंकर दृष्टि वाले शत्रु नहुष को जीतें।" तब अग्नि ने भी शक्र से कहा — "मुझे भी भाग दो, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।" शक्र ने उनसे कहा — "हे अग्ने! तुम्हारा भी भाग होगा; महायज्ञ में इन्द्र और अग्नि का एक संयुक्त भाग होगा।"
श्लोक 35 (5.16.35)
एवं संचिन्त्य भगवान्महेन्द्रः पाकशासनः । कुबेरं सर्वयक्षाणां धनानां च प्रभुं तथा ॥
evaṃ saṃcintya bhagavānmahendraḥ pākaśāsanaḥ | kuberaṃ sarvayakṣāṇāṃ dhanānāṃ ca prabhuṃ tathā
ऐसा विचार करके पाकशासन भगवान् महेन्द्र ने कुबेर को सब यक्षों और धन का स्वामी बनाया,
श्लोक 36 (5.16.36)
वैवस्वतं पितॄणां च वरुणं चाप्यपां तथा । आधिपत्यं ददौ शक्रः सत्कृत्य वरदस्तथा ॥
vaivasvataṃ pitṝṇāṃ ca varuṇaṃ cāpyapāṃ tathā | ādhipatyaṃ dadau śakraḥ satkṛtya varadastathā
तथा वरदाता शक्र ने सत्कारपूर्वक विवस्वान् के पुत्र यम को पितरों का और वरुण को जल का आधिपत्य प्रदान किया।