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उद्योग पर्व · अध्याय 15

नहुष द्वारा ऋषियों को वाहन में जोतना

इन्द्र शची से कहते हैं कि यह बल प्रयोग का समय नहीं है और उन्हें एक गुप्त उपाय बताते हैं: वे नहुष से ऋषियों द्वारा वहन किए जाने वाले वाहन पर अपने पास आने को कहें। प्रसन्न नहुष अपने बल की डींग मारता है और सप्तर्षियों तथा ब्रह्मर्षियों को अपने वाहन में जोत देता है। समय समाप्त होता देखकर शची बृहस्पति से इन्द्र को खोजने की प्रार्थना करती हैं; बृहस्पति उन्हें आश्वासन देते हैं कि नहुष का विनाश निश्चित है और अग्नि में हवन करते हैं। अग्नि सारे संसार में खोज करते हैं, पर जल में प्रवेश करने का साहस नहीं करते, क्योंकि वे स्वयं जल से उत्पन्न हुए हैं।

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

शल्य उवाच

श्लोक 1 (5.15.1)

एवमुक्तः स भगवाञ्शच्या तां पुनरब्रवीत् । विक्रमस्य न कालोऽयं नहुषो बलवत्तरः ॥

evamuktaḥ sa bhagavāñśacyā tāṃ punarabravīt | vikramasya na kālo'yaṃ nahuṣo balavattaraḥ

शची के ऐसा कहने पर भगवान इन्द्र ने उनसे फिर कहा — "यह पराक्रम दिखाने का समय नहीं है; नहुष अधिक बलवान है।

इन्द्र उवाच

श्लोक 2 (5.15.2)

विवर्द्धितश्च ऋषिभिर्हव्यकव्यैश्च भामिनि । नीतिमत्र विधास्यामि देवि तां कर्तुमर्हसि ॥

vivarddhitaśca ṛṣibhirhavyakavyaiśca bhāmini | nītimatra vidhāsyāmi devi tāṃ kartumarhasi

हे भामिनि, ऋषियों ने हव्य और कव्य देकर उसे बढ़ाया है। मैं इस विषय में एक नीति बनाता हूँ; हे देवि, तुम्हें उसे पूरा करना होगा।

श्लोक 3 (5.15.3)

गुह्यं चैतत्त्वया कार्यं नाख्यातव्यं शुभे क्वचित् । गत्वा नहुषमेकान्ते ब्रवीहि च सुमध्यमे ॥

guhyaṃ caitattvayā kāryaṃ nākhyātavyaṃ śubhe kvacit | gatvā nahuṣamekānte bravīhi ca sumadhyame

हे शुभे, यह बात तुम गुप्त रखना; किसी से मत कहना। हे सुमध्यमे, एकान्त में नहुष के पास जाकर कहना —

श्लोक 4 (5.15.4)

ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते । एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति तं वद ॥

ṛṣiyānena divyena māmupaihi jagatpate | evaṃ tava vaśe prītā bhaviṣyāmīti taṃ vada

"हे जगत्पते, ऋषियों द्वारा वहन किए जाने वाले दिव्य वाहन पर मेरे पास आइए; तब मैं प्रसन्न होकर आपके वश में हो जाऊँगी" — उससे यही कहना।

शल्य उवाच

श्लोक 5 (5.15.5)

इत्युक्ता देवराजेन पत्नी सा कमलेक्षणा । एवमस्त्वित्यथोक्त्वा तु जगाम नहुषं प्रति ॥

ityuktā devarājena patnī sā kamalekṣaṇā | evamastvityathoktvā tu jagāma nahuṣaṃ prati

देवराज के ऐसा कहने पर उनकी कमलनयनी पत्नी "ऐसा ही हो" कहकर नहुष के पास गईं।

श्लोक 6 (5.15.6)

नहुषस्तां ततो दृष्ट्वा सस्मितो वाक्यमब्रवीत् । स्वागतं ते वरारोहे किं करोमि शुचिस्मिते ॥

nahuṣastāṃ tato dṛṣṭvā sasmito vākyamabravīt | svāgataṃ te varārohe kiṃ karomi śucismite

उन्हें देखकर नहुष मुस्कराते हुए बोला — "हे सुन्दरी, तुम्हारा स्वागत है। हे मधुर मुस्कान वाली, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

नहुष उवाच

श्लोक 7 (5.15.7)

भक्तं मां भज कल्याणि किमिच्छसि मनस्विनि । तव कल्याणि यत्कार्यं तत्करिष्ये सुमध्यमे ॥

bhaktaṃ māṃ bhaja kalyāṇi kimicchasi manasvini | tava kalyāṇi yatkāryaṃ tatkariṣye sumadhyame

हे कल्याणी, मुझ अनुरागी को स्वीकार करो। हे मनस्विनी, तुम क्या चाहती हो? हे कल्याणी, हे सुमध्यमे, तुम्हारा जो भी काम हो, मैं करूँगा।

श्लोक 8 (5.15.8)

न च व्रीडा त्वया कार्या सुश्रोणि मयि विश्वसेः । सत्येन वै शपे देवि करिष्ये वचनं तव ॥

na ca vrīḍā tvayā kāryā suśroṇi mayi viśvaseḥ | satyena vai śape devi kariṣye vacanaṃ tava

हे सुश्रोणि, संकोच मत करो; मुझ पर विश्वास रखो। हे देवि, मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारा कहना पूरा करूँगा।

इन्द्राण्युवाच

श्लोक 9 (5.15.9)

यो मे कृतस्त्वया कालस्तमाकाङ्क्षे जगत्पते । ततस्त्वमेव भर्ता मे भविष्यसि सुराधिप ॥

yo me kṛtastvayā kālastamākāṅkṣe jagatpate | tatastvameva bhartā me bhaviṣyasi surādhipa

हे जगत्पते, आपने मुझे जो समय दिया है, मैं उसकी प्रतीक्षा कर रही हूँ। उसके बाद, हे सुराधिप, आप ही मेरे पति होंगे।

श्लोक 10 (5.15.10)

कार्यं च हृदि मे यत्तद्देवराजावधारय । वक्ष्यामि यदि मे राजन्प्रियमेतत्करिष्यसि ॥

kāryaṃ ca hṛdi me yattaddevarājāvadhāraya | vakṣyāmi yadi me rājanpriyametatkariṣyasi

हे देवराज, मेरे मन में एक इच्छा है; उसे सुनिए। हे राजन्, यदि आप मेरा यह प्रिय कार्य करेंगे तो मैं कहूँगी —

श्लोक 11 (5.15.11)

वाक्यं प्रणयसंयुक्तं ततः स्यां वशगा तव । इन्द्रस्य वाजिनो वाहा हस्तिनोऽथ रथास्तथा ॥

vākyaṃ praṇayasaṃyuktaṃ tataḥ syāṃ vaśagā tava | indrasya vājino vāhā hastino'tha rathāstathā

यह प्रेम से भरी विनती है; तब मैं आपके वश में हो जाऊँगी। इन्द्र के वाहन घोड़े, हाथी और रथ थे।

श्लोक 12 (5.15.12)

इच्छाम्यहमथापूर्वं वाहनं ते सुराधिप । यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य न सुराणां न रक्षसाम् ॥

icchāmyahamathāpūrvaṃ vāhanaṃ te surādhipa | yanna viṣṇorna rudrasya na surāṇāṃ na rakṣasām

हे सुराधिप, मैं आपके लिए ऐसा अपूर्व वाहन चाहती हूँ जो न विष्णु के पास हो, न रुद्र के, न देवताओं के और न राक्षसों के।

श्लोक 13 (5.15.13)

वहन्तु त्वां महाभागा ऋषयः सङ्गता विभो । सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम रोचते ॥

vahantu tvāṃ mahābhāgā ṛṣayaḥ saṅgatā vibho | sarve śibikayā rājannetaddhi mama rocate

हे प्रभो, हे राजन्, सब महाभाग ऋषि मिलकर आपको पालकी में वहन करें — यही मुझे अच्छा लगता है।

श्लोक 14 (5.15.14)

नासुरेषु न देवेषु तुल्यो भवितुमर्हसि । सर्वेषां तेज आदत्से स्वेन वीर्येण दर्शनात् ॥

nāsureṣu na deveṣu tulyo bhavitumarhasi | sarveṣāṃ teja ādatse svena vīryeṇa darśanāt

आपको असुरों या देवताओं में किसी के समान मात्र नहीं होना चाहिए। आप अपने पराक्रम से, केवल दृष्टि डालकर, सबका तेज हर लेते हैं।

श्लोक 15 (5.15.15)

न ते प्रमुखतः स्थातुं कश्चिच्छक्नोति वीर्यवान् ॥

na te pramukhataḥ sthātuṃ kaścicchaknoti vīryavān

कोई भी बलवान आपके सामने खड़ा नहीं रह सकता।

शल्य उवाच

श्लोक 16 (5.15.16)

एवमुक्तस्तु नहुषः प्राहृष्यत तदा किल । उवाच वचनं चापि सुरेन्द्रस्तामनिन्दिताम् ॥

evamuktastu nahuṣaḥ prāhṛṣyata tadā kila | uvāca vacanaṃ cāpi surendrastāmaninditām

ऐसा कहे जाने पर, कहते हैं, नहुष उस समय बहुत प्रसन्न हुआ, और उस देवराज ने उस अनिन्दिता से यह वचन कहा —

नहुष उवाच

श्लोक 17 (5.15.17)

अपूर्वं वाहनमिदं त्वयोक्तं वरवर्णिनि । दृढं मे रुचिरं देवि त्वद्वशोऽस्मि वरानने ॥

apūrvaṃ vāhanamidaṃ tvayoktaṃ varavarṇini | dṛḍhaṃ me ruciraṃ devi tvadvaśo'smi varānane

हे वरवर्णिनी, तुमने यह अपूर्व वाहन बताया है। हे देवि, यह मुझे बहुत अच्छा लगा; हे सुमुखि, मैं तुम्हारे वश में हूँ।

श्लोक 18 (5.15.18)

न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन् । अहं तपस्वी बलवान्भूतभव्यभवत्प्रभुः ॥

na hyalpavīryo bhavati yo vāhānkurute munīn | ahaṃ tapasvī balavānbhūtabhavyabhavatprabhuḥ

जो मुनियों को अपना वाहन बनाता है, वह अल्प पराक्रम वाला नहीं होता। मैं तपस्वी, बलवान और भूत, भविष्य तथा वर्तमान का स्वामी हूँ।

श्लोक 19 (5.15.19)

मयि क्रुद्धे जगन्न स्यान्मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । देवदानवगन्धर्वाः किन्नरोरगराक्षसाः ॥

mayi kruddhe jaganna syānmayi sarvaṃ pratiṣṭhitam | devadānavagandharvāḥ kinnaroragarākṣasāḥ

मेरे क्रुद्ध होने पर जगत् नहीं रहेगा; सब कुछ मुझमें ही स्थित है। देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग और राक्षस —

श्लोक 20 (5.15.20)

न मे क्रुद्धस्य पर्याप्ताः सर्वे लोकाः शुचिस्मिते । चक्षुषा यं प्रपश्यामि तस्य तेजो हराम्यहम् ॥

na me kruddhasya paryāptāḥ sarve lokāḥ śucismite | cakṣuṣā yaṃ prapaśyāmi tasya tejo harāmyaham

हे शुचिस्मिते, सारे लोक मिलकर भी मेरे क्रोध के आगे नहीं ठहर सकते। मैं जिस पर भी दृष्टि डालता हूँ, उसका तेज हर लेता हूँ।

श्लोक 21 (5.15.21)

अहमिन्द्रोऽस्मि देवानां लोकानां च महेश्वरः । मयि हव्यं च कव्यं च लोकाश्चैव सनातनाः । तस्मात्ते वचनं देवि करिष्यामि न संशयः ॥

ahamindro'smi devānāṃ lokānāṃ ca maheśvaraḥ | mayi havyaṃ ca kavyaṃ ca lokāścaiva sanātanāḥ | tasmātte vacanaṃ devi kariṣyāmi na saṃśayaḥ

मैं देवताओं का इन्द्र और लोकों का महेश्वर हूँ। हव्य, कव्य और सनातन लोक — सब मुझमें स्थित हैं। इसलिए, हे देवि, मैं निःसंदेह तुम्हारा कहना पूरा करूँगा।

श्लोक 22 (5.15.22)

सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे ब्रह्मर्षयस्तथा । पश्य माहात्म्ययोगं मे ऋद्धिं च वरवर्णिनि ॥

saptarṣayo māṃ vakṣyanti sarve brahmarṣayastathā | paśya māhātmyayogaṃ me ṛddhiṃ ca varavarṇini

सप्तर्षि और सब ब्रह्मर्षि मुझे वहन करेंगे। हे वरवर्णिनी, मेरी महिमा और मेरा वैभव देखो।

शल्य उवाच

श्लोक 23 (5.15.23)

एवमुक्त्वा तु तां देवीं विसृज्य च वराननाम् । अथ संचिन्त्य नहुषो बलवीर्येण भारत ॥

evamuktvā tu tāṃ devīṃ visṛjya ca varānanām | atha saṃcintya nahuṣo balavīryeṇa bhārata

हे भारत, उस सुमुखी देवी से ऐसा कहकर और उसे विदा करके नहुष ने अपने बल और पराक्रम के घमण्ड में विचार किया,

श्लोक 24 (5.15.24)

विसृज्य सुप्रतीकं च नागमैरावतं तथा । हंसयुक्तं विमानं च हरियुक्तं तथा रथम् ॥

visṛjya supratīkaṃ ca nāgamairāvataṃ tathā | haṃsayuktaṃ vimānaṃ ca hariyuktaṃ tathā ratham

और सुप्रतीक तथा ऐरावत हाथियों को, हंसों से जुते विमान को और हरे घोड़ों से जुते रथ को छोड़कर,

श्लोक 25 (5.15.25)

स तु दर्पेण महता परिभूय महामुनीन् । विमाने योजयित्वा च ऋषीन्नियममास्थितान् ॥

sa tu darpeṇa mahatā paribhūya mahāmunīn | vimāne yojayitvā ca ṛṣīnniyamamāsthitān

अत्यन्त घमण्ड में उसने महामुनियों का तिरस्कार किया और नियमों का पालन करने वाले ऋषियों को अपने विमान में जोत दिया।

श्लोक 26 (5.15.26)

अब्रह्मण्यो बलोपेतो मत्तो मदबलेन च । कामवृत्तः स दुष्टात्मा वाहयामास तानृषीन् ॥

abrahmaṇyo balopeto matto madabalena ca | kāmavṛttaḥ sa duṣṭātmā vāhayāmāsa tānṛṣīn

ब्राह्मणों का द्रोही, बल से युक्त, मद और बल से मतवाला, कामाचारी वह दुष्टात्मा उन ऋषियों से अपना वहन कराने लगा।

श्लोक 27 (5.15.27)

नहुषेण विसृष्टा च बृहस्पतिमथाब्रवीत् । समयोऽल्पावशेषो मे नहुषेणेह यः कृतः ॥

nahuṣeṇa visṛṣṭā ca bṛhaspatimathābravīt | samayo'lpāvaśeṣo me nahuṣeṇeha yaḥ kṛtaḥ

नहुष से विदा पाकर इन्द्राणी ने बृहस्पति से कहा — "नहुष ने यहाँ मेरे लिए जो समय निश्चित किया था, उसमें थोड़ा ही बाकी है।

श्लोक 28 (5.15.28)

शक्रं मृगय शीघ्रं त्वं भक्तायाः कुरु मे दयाम् । बाढमित्येव भगवान्बृहस्पतिरुवाच ताम् ॥

śakraṃ mṛgaya śīghraṃ tvaṃ bhaktāyāḥ kuru me dayām | bāḍhamityeva bhagavānbṛhaspatiruvāca tām

शीघ्र इन्द्र को खोजिए; मुझ भक्त पर दया कीजिए।" भगवान बृहस्पति ने उनसे कहा — "बहुत अच्छा।"

बृहस्पतिरुवाच

श्लोक 29 (5.15.29)

न भेतव्यं त्वया देवि नहुषाद्दुष्टचेतसः । न ह्येष स्थास्यति चिरं गत एष नराधमः ॥

na bhetavyaṃ tvayā devi nahuṣādduṣṭacetasaḥ | na hyeṣa sthāsyati ciraṃ gata eṣa narādhamaḥ

हे देवि, तुम दुष्ट-चित्त नहुष से मत डरो। वह अधिक समय नहीं टिकेगा; वह नराधम गया ही समझो।

श्लोक 30 (5.15.30)

अधर्मज्ञो महर्षीणां वाहनाच्च हतः शुभे । इष्टिं चाहं करिष्यामि विनाशायास्य दुर्मतेः ॥

adharmajño maharṣīṇāṃ vāhanācca hataḥ śubhe | iṣṭiṃ cāhaṃ kariṣyāmi vināśāyāsya durmateḥ

हे शुभे, वह धर्म को नहीं जानता; महर्षियों से अपना वहन कराने के कारण वह मारा जा चुका है। और मैं उस दुर्बुद्धि के विनाश के लिए एक इष्टि करूँगा।

शल्य उवाच

श्लोक 31 (5.15.31)

शक्रं चाधिगमिष्यामि माभैस्त्वं भद्रमस्तु ते । ततः प्रज्वाल्य विधिवज्जुहाव परमं हविः ॥

śakraṃ cādhigamiṣyāmi mābhaistvaṃ bhadramastu te | tataḥ prajvālya vidhivajjuhāva paramaṃ haviḥ

"और मैं इन्द्र को खोज निकालूँगा। डरो मत; तुम्हारा कल्याण हो।" तब विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित करके उत्तम हवि की आहुति दी

श्लोक 32 (5.15.32)

बृहस्पतिर्महातेजा देवराजोपलब्धये । हुत्वाऽग्निं सोऽब्रवीद्राजञ्छक्रमन्विष्यतामिति ॥

bṛhaspatirmahātejā devarājopalabdhaye | hutvā'gniṃ so'bravīdrājañchakramanviṣyatāmiti

महातेजस्वी बृहस्पति ने, देवराज को पाने के लिए। हे राजन्, अग्नि में आहुति देकर उन्होंने कहा — "इन्द्र को खोजा जाए।"

श्लोक 33 (5.15.33)

तस्माच्च भगवान्देवः स्वयमेव हुताशनः । स्त्रीवेषमद्भुतं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥

tasmācca bhagavāndevaḥ svayameva hutāśanaḥ | strīveṣamadbhutaṃ kṛtvā tatraivāntaradhīyata

उस अग्नि से स्वयं भगवान अग्निदेव ने अद्भुत स्त्री-वेश धारण किया और वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 34 (5.15.34)

स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतांश्च वनानि च । पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचित्याथ मनोगतिः । निमेषान्तरमात्रेण बृहस्पतिमुपागमत् ॥

sa diśaḥ pradiśaścaiva parvatāṃśca vanāni ca | pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca vicityātha manogatiḥ | nimeṣāntaramātreṇa bṛhaspatimupāgamat

मन के समान वेग वाले उन्होंने दिशाओं, उपदिशाओं, पर्वतों, वनों, पृथ्वी और आकाश में खोज की, और पलक झपकते ही बृहस्पति के पास लौट आए।

अग्निरुवाच

श्लोक 35 (5.15.35)

बृहस्पते न पश्यामि देवराजमिह क्वचित् । आपः शेषाः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् ॥

bṛhaspate na paśyāmi devarājamiha kvacit | āpaḥ śeṣāḥ sadā cāpaḥ praveṣṭuṃ notsahāmyaham

हे बृहस्पति, मुझे देवराज कहीं दिखाई नहीं देते। केवल जल बाकी है, और जल में प्रवेश करने का साहस मुझे कभी नहीं होता।

श्लोक 36 (5.15.36)

न मे तत्र गतिर्ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते । तमब्रवीद्देवगुरुरपो विश महाद्युते ॥

na me tatra gatirbrahmankimanyatkaravāṇi te | tamabravīddevagururapo viśa mahādyute

"हे ब्रह्मन्, वहाँ मेरी गति नहीं है; मैं आपके लिए और क्या करूँ?" देवगुरु ने उनसे कहा — "हे महातेजस्वी, जल में प्रवेश करो।"

श्लोक 37 (5.15.37)

नापः प्रवेष्टुं शक्ष्यामि क्षयो मेऽत्र भविष्यति । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु महाद्युते ॥

nāpaḥ praveṣṭuṃ śakṣyāmi kṣayo me'tra bhaviṣyati | śaraṇaṃ tvāṃ prapanno'smi svasti te'stu mahādyute

मैं जल में प्रवेश नहीं कर सकता; वहाँ मेरा नाश हो जाएगा। मैं आपकी शरण में आया हूँ; हे महातेजस्वी, आपका कल्याण हो।

श्लोक 38 (5.15.38)

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥

adbhyo'gnirbrahmataḥ kṣatramaśmano lohamutthitam | teṣāṃ sarvatragaṃ tejaḥ svāsu yoniṣu śāmyati

जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा उत्पन्न हुआ है। उनका सर्वत्र व्याप्त तेज अपने ही उत्पत्ति-स्थानों में शान्त हो जाता है।

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