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उद्योग पर्व · अध्याय 14

उपश्रुति द्वारा शची को इन्द्र के दर्शन

शची के सत्य और पातिव्रत्य से प्रसन्न होकर उपश्रुति देवी देह धारण करके प्रकट होती हैं और उन्हें हिमालय के पार, समुद्र लाँघकर एक महाद्वीप के विशाल सरोवर तक ले जाती हैं। वहाँ वे एक विशाल कमल की नाल में प्रवेश करती हैं और उसके तन्तु में सूक्ष्म रूप से छिपे इन्द्र को पाती हैं। शची इन्द्र की स्तुति करती हैं, नहुष की धमकियों का वृत्तान्त सुनाती हैं और उनसे प्रकट होकर नहुष का वध करने और फिर से स्वर्ग का शासन सँभालने की प्रार्थना करती हैं।

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शल्य उवाच

श्लोक 1 (5.14.1)

अथैनां रूपिणी साध्वीमुपातिष्ठदुपश्रुतिः । तां वयोरूपसंपन्नां दृष्ट्वा देवीमुपस्थिताम् ॥

athaināṃ rūpiṇī sādhvīmupātiṣṭhadupaśrutiḥ | tāṃ vayorūpasaṃpannāṃ dṛṣṭvā devīmupasthitām

तब उपश्रुति देह धारण करके उस साध्वी के पास उपस्थित हुईं। यौवन और रूप से सम्पन्न उस देवी को सामने खड़ी देखकर

श्लोक 2 (5.14.2)

इन्द्राणी संप्रहृष्टात्मा संपूज्यैनामथाब्रवीत् । इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं का त्वं ब्रूहि वरानने ॥

indrāṇī saṃprahṛṣṭātmā saṃpūjyaināmathābravīt | icchāmi tvāmahaṃ jñātuṃ kā tvaṃ brūhi varānane

इन्द्राणी ने प्रसन्न मन से उनका पूजन किया और कहा — "मैं आपको जानना चाहती हूँ। हे सुमुखि, बताइए, आप कौन हैं?"

उपश्रुतिरुवाच

श्लोक 3 (5.14.3)

उपश्रुतिरहं देवि तवान्तिकमुपागता । दर्शनं चैव संप्राप्ता तव सत्येन भामिनि ॥

upaśrutirahaṃ devi tavāntikamupāgatā | darśanaṃ caiva saṃprāptā tava satyena bhāmini

हे देवि, मैं उपश्रुति हूँ और तुम्हारे पास आई हूँ। हे भामिनि, तुम्हारे सत्य के कारण ही मैंने तुम्हें दर्शन दिया है।

श्लोक 4 (5.14.4)

पतिव्रता च युक्ता च यमेन नियमेन च । दर्शयिष्यामि ते शक्रं देवं वृत्रनिषूदनम् ॥

pativratā ca yuktā ca yamena niyamena ca | darśayiṣyāmi te śakraṃ devaṃ vṛtraniṣūdanam

तुम पतिव्रता हो और यम-नियम से युक्त हो। मैं तुम्हें वृत्रासुर का वध करने वाले देव इन्द्र के दर्शन कराऊँगी।

शल्य उवाच

श्लोक 5 (5.14.5)

क्षिप्रमन्वेहि भद्रं ते द्रक्ष्यसे सुरसत्तमम् । ततस्तां प्रस्थितां देवीमिन्द्राणी सा समन्वगात् ॥

kṣipramanvehi bhadraṃ te drakṣyase surasattamam | tatastāṃ prasthitāṃ devīmindrāṇī sā samanvagāt

"शीघ्र मेरे पीछे आओ; तुम्हारा कल्याण हो; तुम देवश्रेष्ठ के दर्शन करोगी।" तब जाती हुई उस देवी के पीछे-पीछे इन्द्राणी भी चल पड़ीं।

श्लोक 6 (5.14.6)

देवारण्यान्यतिक्रम्य पर्वतांश्च बहूंस्ततः । हिमवन्तमतिक्रम्य उत्तरं पार्श्वमागमत् ॥

devāraṇyānyatikramya parvatāṃśca bahūṃstataḥ | himavantamatikramya uttaraṃ pārśvamāgamat

देवताओं के वनों और अनेक पर्वतों को पार करके, हिमालय को लाँघकर वे उसके उत्तरी भाग में पहुँचीं।

श्लोक 7 (5.14.7)

समुद्रं च समासाद्य बहुयोजनविस्तृतम् । आससाद महाद्वीपं नानाद्रुमलतावृतम् ॥

samudraṃ ca samāsādya bahuyojanavistṛtam | āsasāda mahādvīpaṃ nānādrumalatāvṛtam

अनेक योजन विस्तृत समुद्र के पास पहुँचकर वे नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से ढके एक महाद्वीप पर पहुँचीं।

श्लोक 8 (5.14.8)

तत्रापश्यत्सरो दिव्यं नानाशकुनिभिर्वृतम् । शतयोजनविस्तीर्णं तावदेवायतं शुभम् ॥

tatrāpaśyatsaro divyaṃ nānāśakunibhirvṛtam | śatayojanavistīrṇaṃ tāvadevāyataṃ śubham

वहाँ उन्होंने नाना प्रकार के पक्षियों से भरा एक दिव्य, सुन्दर सरोवर देखा, जो सौ योजन चौड़ा और उतना ही लंबा था।

श्लोक 9 (5.14.9)

तत्र दिव्यानि पद्मानि पञ्चवर्णानि भारत । षट्पदैरुपगीतानि प्रफुल्लानि सहस्रशः ॥

tatra divyāni padmāni pañcavarṇāni bhārata | ṣaṭpadairupagītāni praphullāni sahasraśaḥ

हे भारत, उसमें पाँच रंगों के हजारों दिव्य कमल खिले थे, जिन पर भौंरे गुंजार कर रहे थे।

श्लोक 10 (5.14.10)

सरसस्तस्य मध्ये तु पद्मिनी महती शुभा । गौरेणोन्नतनालेन पद्मेन महता वृता ॥

sarasastasya madhye tu padminī mahatī śubhā | gaureṇonnatanālena padmena mahatā vṛtā

उस सरोवर के बीच में एक विशाल, सुन्दर कमलिनी थी, जो ऊँची नाल वाले एक बड़े श्वेत कमल से युक्त थी।

श्लोक 11 (5.14.11)

पद्मस्य भित्त्वा नालं च विवेश सहिता तया । बिसतन्तुप्रविष्टं च तत्रापश्यच्छतक्रतुम् ॥

padmasya bhittvā nālaṃ ca viveśa sahitā tayā | bisatantupraviṣṭaṃ ca tatrāpaśyacchatakratum

कमल की नाल को भेदकर वे उपश्रुति के साथ उसमें प्रविष्ट हुईं और वहाँ उन्होंने कमलनाल के तन्तु में समाए हुए शतक्रतु इन्द्र को देखा।

श्लोक 12 (5.14.12)

तं दृष्ट्वा च सुसूक्ष्मेण रूपेणावस्थितं प्रभुम् । सूक्ष्मरूपधरा देवी बभूवोपश्रुतिश्च सा ॥

taṃ dṛṣṭvā ca susūkṣmeṇa rūpeṇāvasthitaṃ prabhum | sūkṣmarūpadharā devī babhūvopaśrutiśca sā

प्रभु को अत्यन्त सूक्ष्म रूप में स्थित देखकर देवी और उपश्रुति ने भी सूक्ष्म रूप धारण कर लिया।

श्लोक 13 (5.14.13)

इन्द्रं तुष्टाव चेन्द्राणी विश्रुतैः पूर्वकर्मभिः । स्तूयमानस्ततो देवः शचीमाह पुरन्दरः ॥

indraṃ tuṣṭāva cendrāṇī viśrutaiḥ pūrvakarmabhiḥ | stūyamānastato devaḥ śacīmāha purandaraḥ

इन्द्राणी ने उनके प्रसिद्ध पूर्वकर्मों का बखान करके इन्द्र की स्तुति की। स्तुति किए जाने पर पुरन्दर देव ने शची से कहा —

श्लोक 14 (5.14.14)

किमर्थमसि संप्राप्ता विज्ञातश्च कथं त्वहम् । ततः सा कथयामास नहुषस्य विचेष्टितम् ॥

kimarthamasi saṃprāptā vijñātaśca kathaṃ tvaham | tataḥ sā kathayāmāsa nahuṣasya viceṣṭitam

"तुम किसलिए आई हो, और तुमने मुझे कैसे जाना?" तब उन्होंने नहुष की करतूतों का वर्णन किया।

इन्द्राण्युवाच

श्लोक 15 (5.14.15)

इन्द्रत्वं त्रिषु लोकेषु प्राप्य वीर्यसमन्वितः । दर्पाविष्टश्च दुष्टात्मा मामुवाच शतक्रतो ॥

indratvaṃ triṣu lokeṣu prāpya vīryasamanvitaḥ | darpāviṣṭaśca duṣṭātmā māmuvāca śatakrato

हे शतक्रतो, तीनों लोकों में इन्द्र-पद पाकर बल से भरे, घमण्ड में चूर उस दुष्टात्मा ने मुझसे कहा —

श्लोक 16 (5.14.16)

उपतिष्ठेति स क्रूरः कालं च कृतवान्मम । यदि न त्रास्यसि विभो करिष्यति स मां वशे ॥

upatiṣṭheti sa krūraḥ kālaṃ ca kṛtavānmama | yadi na trāsyasi vibho kariṣyati sa māṃ vaśe

"मेरी सेवा में आओ" — उस क्रूर ने कहा, और मेरे लिए समय-सीमा निश्चित कर दी। हे प्रभो, यदि आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे तो वह मुझे अपने वश में कर लेगा।

श्लोक 17 (5.14.17)

एतेन चाहं संप्राप्ता द्रुतं शक्र तवान्तिकम् । जहि रौद्रं महाबाहो नहुषं पापनिश्चयम् ॥

etena cāhaṃ saṃprāptā drutaṃ śakra tavāntikam | jahi raudraṃ mahābāho nahuṣaṃ pāpaniścayam

इसी कारण, हे शक्र, मैं शीघ्रता से आपके पास आई हूँ। हे महाबाहो, पाप का निश्चय किए हुए उस भयंकर नहुष को मार डालिए।

श्लोक 18 (5.14.18)

प्रकाशयस्व चात्मानं दैत्यदानवसूदन । तेजः समाप्नुहि विभो देवराज्यं प्रशाधि च ॥

prakāśayasva cātmānaṃ daityadānavasūdana | tejaḥ samāpnuhi vibho devarājyaṃ praśādhi ca

हे दैत्य-दानवों का संहार करने वाले, अपने को प्रकट कीजिए। हे प्रभो, अपना तेज फिर से प्राप्त कीजिए और देवताओं के राज्य का शासन कीजिए।

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