उद्योग पर्व · अध्याय 13
इन्द्र का प्रायश्चित्त और शची की रात्रि-उपासना
नहुष शची से उसे स्वीकार करने का आग्रह करता है, और शची उससे समय ले लेती हैं: यदि इन्द्र का पता न चला तो वे उसके पास आ जाएँगी। देवता विष्णु के पास जाते हैं, जो बताते हैं कि अश्वमेध द्वारा उनकी आराधना करके इन्द्र ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाएँगे और नहुष अपने ही कर्मों से नष्ट होगा। यज्ञ होता है और ब्रह्महत्या वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों में बाँट दी जाती है, पर वरदान से मिले नहुष के बल को देखकर इन्द्र फिर छिप जाते हैं। शोकाकुल शची रात्रि देवी की उपासना करती हैं और उपश्रुति से इन्द्र का स्थान दिखाने की प्रार्थना करती हैं।
शल्य उवाच
श्लोक 1 (5.13.1)
अथ तामब्रवीद्दृष्ट्वा नहुषो देवराट् तदा । त्रयाणामपि लोकानामहमिन्द्रः शुचिस्मिते ॥
atha tāmabravīddṛṣṭvā nahuṣo devarāṭ tadā | trayāṇāmapi lokānāmahamindraḥ śucismite
तब उन्हें देखकर देवराज नहुष ने कहा — "हे मधुर मुस्कान वाली, मैं तीनों लोकों का इन्द्र हूँ।
श्लोक 2 (5.13.2)
भजस्व मां वरारोहे पतित्वे वरवर्णिनि । एवमुक्ता तु सा देवी नहुषेण पतिव्रता ॥
bhajasva māṃ varārohe patitve varavarṇini | evamuktā tu sā devī nahuṣeṇa pativratā
हे सुन्दरी, हे उत्तम वर्ण वाली, मुझे पति के रूप में स्वीकार करो।" नहुष के ऐसा कहने पर वह पतिव्रता देवी
श्लोक 3 (5.13.3)
प्रावेपत भयोद्विग्ना प्रवाते कदली यथा । प्रणम्य सा हि ब्रह्माणं शिरसा तु कृताञ्जलिः ॥
prāvepata bhayodvignā pravāte kadalī yathā | praṇamya sā hi brahmāṇaṃ śirasā tu kṛtāñjaliḥ
भय से व्याकुल होकर आँधी में केले के पेड़ की तरह काँपने लगीं। हाथ जोड़कर ब्रह्मा को सिर से प्रणाम करके
श्लोक 4 (5.13.4)
देवराजमथोवाच नहुषं घोरदर्शनम् । कालमिच्छाम्यहं लब्धुं त्वत्तः कंचित्सुरेश्वर ॥
devarājamathovāca nahuṣaṃ ghoradarśanam | kālamicchāmyahaṃ labdhuṃ tvattaḥ kaṃcitsureśvara
उन्होंने भयंकर दिखने वाले देवराज नहुष से कहा — "हे सुरेश्वर, मैं आपसे कुछ समय चाहती हूँ।
इन्द्राण्युवाच
श्लोक 5 (5.13.5)
न हि विज्ञायते शक्रः किं वा प्राप्तः क्व वा गतः । तत्त्वमेतत्तु विज्ञाय यदि न ज्ञायते प्रभो ॥
na hi vijñāyate śakraḥ kiṃ vā prāptaḥ kva vā gataḥ | tattvametattu vijñāya yadi na jñāyate prabho
किसी को पता नहीं कि इन्द्र का क्या हुआ या वे कहाँ चले गए। हे प्रभो, इसकी सच्चाई जानने का प्रयत्न करने पर भी यदि उनका पता न चले,
शल्य उवाच
श्लोक 6 (5.13.6)
ततोऽहं त्वामुपस्थास्ये सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । एवमुक्तः स इन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत् ॥
tato'haṃ tvāmupasthāsye satyametadbravīmi te | evamuktaḥ sa indrāṇyā nahuṣaḥ prītimānabhūt
तो मैं आपके पास आ जाऊँगी; यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।" इन्द्राणी के ऐसा कहने पर नहुष प्रसन्न हो गया।
नहुष उवाच
श्लोक 7 (5.13.7)
एवं भवतु सुश्रोणि यथा मामिह भाषसे । ज्ञात्वा चागमनं कार्यं सत्यमेतदनुस्मरेः ॥
evaṃ bhavatu suśroṇi yathā māmiha bhāṣase | jñātvā cāgamanaṃ kāryaṃ satyametadanusmareḥ
हे सुन्दरी, जैसा तुम मुझसे कह रही हो, वैसा ही हो। पता लगा लेने पर तुम्हें आना होगा — इस सत्य वचन को स्मरण रखना।
शल्य उवाच
श्लोक 8 (5.13.8)
नहुषेण विसृष्टा च निश्चक्राम ततः शुभा । बृहस्पतिनिकेतं च सा जगाम यशस्विनी ॥
nahuṣeṇa visṛṣṭā ca niścakrāma tataḥ śubhā | bṛhaspatiniketaṃ ca sā jagāma yaśasvinī
नहुष से विदा पाकर वह कल्याणी वहाँ से निकलीं और वह यशस्विनी बृहस्पति के घर गईं।
श्लोक 9 (5.13.9)
तस्याः संश्रुत्य च वचो देवाश्चाग्निपुरोगमाः । चिन्तयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं राजसत्तम ॥
tasyāḥ saṃśrutya ca vaco devāścāgnipurogamāḥ | cintayāmāsurekāgrāḥ śakrārthaṃ rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, उनकी बात सुनकर अग्नि को आगे रखकर देवता एकाग्र होकर इन्द्र के लिए विचार करने लगे।
श्लोक 10 (5.13.10)
देवदेवेन संगम्य विष्णुना प्रभविष्णुना । ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः ॥
devadevena saṃgamya viṣṇunā prabhaviṣṇunā | ūcuścainaṃ samudvignā vākyaṃ vākyaviśāradāḥ
देवाधिदेव, प्रभावशाली विष्णु से मिलकर वाणी में कुशल देवताओं ने व्याकुल होकर उनसे कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 11 (5.13.11)
ब्रह्मवध्याभिभूतो वै शक्रः सुरगणेश्वरः । गतिश्च नस्त्वं देवेश पूर्वजो जगतः प्रभुः ॥
brahmavadhyābhibhūto vai śakraḥ suragaṇeśvaraḥ | gatiśca nastvaṃ deveśa pūrvajo jagataḥ prabhuḥ
देवगणों के स्वामी इन्द्र ब्रह्महत्या से ग्रस्त हैं। हे देवेश, आप ही हमारी गति हैं; आप जगत् के आदि-पुरुष और उसके प्रभु हैं।
श्लोक 12 (5.13.12)
रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् । त्वद्वीर्यनिहते वृत्रे वासवो ब्रह्महत्यया ॥
rakṣārthaṃ sarvabhūtānāṃ viṣṇutvamupajagmivān | tvadvīryanihate vṛtre vāsavo brahmahatyayā
सब प्राणियों की रक्षा के लिए आपने विष्णु-रूप धारण किया। आपके पराक्रम से वृत्र के मारे जाने पर इन्द्र ब्रह्महत्या से
शल्य उवाच
श्लोक 13 (5.13.13)
वृतः सुरगणश्रेष्ठ मोक्षं तस्य विनिर्दिश । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत् ॥
vṛtaḥ suragaṇaśreṣṭha mokṣaṃ tasya vinirdiśa | teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā devānāṃ viṣṇurabravīt
घिर गए हैं। हे सुरश्रेष्ठ, उनकी मुक्ति का उपाय बताइए।" देवताओं का यह वचन सुनकर विष्णु बोले —
विष्णुरुवाच
श्लोक 14 (5.13.14)
मामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि वज्रिणम् । पुण्येन हयमेधेन मामिष्ट्वा पाकशासनः ॥
māmeva yajatāṃ śakraḥ pāvayiṣyāmi vajriṇam | puṇyena hayamedhena māmiṣṭvā pākaśāsanaḥ
इन्द्र केवल मेरा ही यजन करें; मैं उस वज्रधारी को पवित्र कर दूँगा। पवित्र अश्वमेध से मेरा यजन करके पाकशासन इन्द्र
श्लोक 15 (5.13.15)
पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः । स्वकर्मभिश्च नहुषो नाशं यास्यति दुर्मतिः ॥
punareṣyati devānāmindratvamakutobhayaḥ | svakarmabhiśca nahuṣo nāśaṃ yāsyati durmatiḥ
निर्भय होकर फिर देवताओं का इन्द्रत्व प्राप्त करेंगे। और दुर्बुद्धि नहुष अपने ही कर्मों से नष्ट हो जाएगा।
शल्य उवाच
श्लोक 16 (5.13.16)
किंचित्कालमिदं देवा मर्षयध्वमतन्द्रिताः । श्रुत्वा विष्णोः शुभां सत्यां वाणीं ताममृतोपमाम् ॥
kiṃcitkālamidaṃ devā marṣayadhvamatandritāḥ | śrutvā viṣṇoḥ śubhāṃ satyāṃ vāṇīṃ tāmamṛtopamām
"हे देवताओ, सावधान रहकर कुछ समय तक इसे सह लो।" विष्णु की वह शुभ, सत्य और अमृत-जैसी वाणी सुनकर
श्लोक 17 (5.13.17)
ततः सर्वे सुरगणाः सोपाध्यायाः सहर्षिभिः । यत्र शक्रो भयोद्विग्नस्तं देशमुपचक्रमुः ॥
tataḥ sarve suragaṇāḥ sopādhyāyāḥ saharṣibhiḥ | yatra śakro bhayodvignastaṃ deśamupacakramuḥ
सब देवगण अपने उपाध्याय और ऋषियों के साथ उस स्थान पर गए जहाँ भय से व्याकुल इन्द्र छिपे थे।
श्लोक 18 (5.13.18)
तत्राश्वमेधः सुमहान्महेन्द्रस्य महात्मनः । ववृते पावनार्थं वै ब्रह्महत्यापहो नृप ॥
tatrāśvamedhaḥ sumahānmahendrasya mahātmanaḥ | vavṛte pāvanārthaṃ vai brahmahatyāpaho nṛpa
हे राजन्, वहाँ महात्मा महेन्द्र की शुद्धि के लिए ब्रह्महत्या को दूर करने वाला एक महान् अश्वमेध यज्ञ हुआ।
श्लोक 19 (5.13.19)
विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च । पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैव युधिष्ठिर ॥
vibhajya brahmahatyāṃ tu vṛkṣeṣu ca nadīṣu ca | parvateṣu pṛthivyāṃ ca strīṣu caiva yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, ब्रह्महत्या को वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों में बाँटकर,
श्लोक 20 (5.13.20)
संविभज्य च भूतेषु विसृज्य च सुरेश्वरः । विज्वरो धूतपाप्मा च वासवोऽभवदात्मवान् ॥
saṃvibhajya ca bhūteṣu visṛjya ca sureśvaraḥ | vijvaro dhūtapāpmā ca vāsavo'bhavadātmavān
उसे प्राणियों में बाँटकर और त्यागकर देवराज इन्द्र ज्वर-रहित, पाप-मुक्त और आत्मवान् हो गए।
श्लोक 21 (5.13.21)
अकम्प्यं नहुषं स्थानाद्दृष्ट्वा बलनिषूदनः । तेजोघ्नं सर्वभूतानां वरदानाच्च दुःसहम् ॥
akampyaṃ nahuṣaṃ sthānāddṛṣṭvā balaniṣūdanaḥ | tejoghnaṃ sarvabhūtānāṃ varadānācca duḥsaham
पर बल का संहार करने वाले इन्द्र ने देखा कि नहुष अपने स्थान से अडिग है, सब प्राणियों का तेज हर लेता है और वरदान के कारण असह्य है।
श्लोक 22 (5.13.22)
ततः शचीपतिर्देवः पुनरेव व्यनश्यत । अदृश्यः सर्वभूतानां कालाकाङ्क्षी चचार ह ॥
tataḥ śacīpatirdevaḥ punareva vyanaśyata | adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ kālākāṅkṣī cacāra ha
इसलिए शचीपति देव फिर से अदृश्य हो गए और समय की प्रतीक्षा करते हुए सब प्राणियों से छिपकर विचरने लगे।
श्लोक 23 (5.13.23)
प्रनष्टे तु ततः शक्रे शची शोकसमन्विता । हा शक्रेति तदा देवी विललाप सुदुःखिता ॥
pranaṣṭe tu tataḥ śakre śacī śokasamanvitā | hā śakreti tadā devī vilalāpa suduḥkhitā
इन्द्र के फिर से लुप्त हो जाने पर शोक में डूबी देवी शची अत्यन्त दुःखी होकर "हा शक्र!" कहकर विलाप करने लगीं।
इन्द्राण्युवाच
श्लोक 24 (5.13.24)
यदि दत्तं यदि हुतं गुरवस्तोषिता यदि । एकभर्तृत्वमेवास्तु सत्यं यद्यस्ति वा मयि ॥
yadi dattaṃ yadi hutaṃ guravastoṣitā yadi | ekabhartṛtvamevāstu satyaṃ yadyasti vā mayi
यदि मैंने दान दिया है, यदि हवन किया है, यदि गुरुजनों को संतुष्ट किया है, और यदि मुझमें कुछ भी सत्य है, तो मैं एक ही पति की पत्नी बनी रहूँ।
श्लोक 25 (5.13.25)
पुण्यां चेमामहं दिव्यां प्रवृत्तामुत्तरायणे । देवीं रात्रिं नमस्यामि सिध्यतां मे मनोरथः ॥
puṇyāṃ cemāmahaṃ divyāṃ pravṛttāmuttarāyaṇe | devīṃ rātriṃ namasyāmi sidhyatāṃ me manorathaḥ
उत्तरायण में आरम्भ हुई इस पवित्र, दिव्य रात्रि देवी को मैं नमस्कार करती हूँ। मेरा मनोरथ सिद्ध हो।
शल्य उवाच
श्लोक 26 (5.13.26)
प्रयता च निशां देवीमुपातिष्ठत तत्र सा । पतिव्रतात्वात्सत्येन सोपश्रुतिमथाकरोत् ॥
prayatā ca niśāṃ devīmupātiṣṭhata tatra sā | pativratātvātsatyena sopaśrutimathākarot
शुद्ध और संयत होकर उन्होंने वहाँ रात्रि देवी की उपासना की, और अपने पातिव्रत्य के सत्य के बल से उपश्रुति देवी का आवाहन किया।
श्लोक 27 (5.13.27)
यत्रास्ते देवराजोऽसौ तं देशं दर्शयस्व मे । इत्याहोपश्रुतिं देवीं सत्यं सत्येन दृश्यताम् ॥
yatrāste devarājo'sau taṃ deśaṃ darśayasva me | ityāhopaśrutiṃ devīṃ satyaṃ satyena dṛśyatām
उन्होंने उपश्रुति देवी से कहा — "जहाँ वे देवराज हैं, वह स्थान मुझे दिखाइए। सत्य के द्वारा सत्य का दर्शन हो।"