उद्योग पर्व · अध्याय 12
बृहस्पति का शची को सौंपने से इनकार
देवता क्रुद्ध नहुष से पराई स्त्री की कामना छोड़ने की विनती करते हैं; वह उत्तर देता है कि स्वयं इन्द्र ने अहल्या का शील भंग किया था और अनेक क्रूर कर्म किए थे, तब देवता इन्द्राणी को उसके पास लाने को मान जाते हैं। जब वे बृहस्पति से उसे सौंपने को कहते हैं, तो शची रक्षा की याचना करती हैं और बृहस्पति शरणागत को त्यागने वाले की दुर्गति के विषय में ब्रह्मा के श्लोक सुनाकर इनकार कर देते हैं। उनकी सलाह पर देवता शची को नहुष के पास जाकर कुछ समय माँगने के लिए मनाते हैं, और वे हर्षित राजा के पास पहुँचती हैं।
शल्य उवाच
श्लोक 1 (5.12.1)
क्रुद्धं तु नहुषं दृष्ट्वा देवा ऋषिपुरोगमाः । अब्रुवन्देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम् ॥
kruddhaṃ tu nahuṣaṃ dṛṣṭvā devā ṛṣipurogamāḥ | abruvandevarājānaṃ nahuṣaṃ ghoradarśanam
नहुष को क्रुद्ध देखकर ऋषियों को आगे रखकर देवताओं ने भयंकर दिखने वाले देवराज नहुष से कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 2 (5.12.2)
देवराज जहि क्रोधं त्वयि क्रुद्धे जगद्विभो । त्रस्तं सासुरगन्धर्वं सकिंनरमहोरगम् ॥
devarāja jahi krodhaṃ tvayi kruddhe jagadvibho | trastaṃ sāsuragandharvaṃ sakiṃnaramahoragam
हे देवराज, क्रोध त्याग दीजिए। हे जगत्प्रभो, आपके क्रुद्ध होने पर असुरों, गन्धर्वों, किन्नरों और महानागों सहित सारा जगत् भयभीत है।
श्लोक 3 (5.12.3)
जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधाः । परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर ॥
jahi krodhamimaṃ sādho na kupyanti bhavadvidhāḥ | parasya patnī sā devī prasīdasva sureśvara
हे साधो, यह क्रोध छोड़ दीजिए; आप जैसे लोग क्रोध नहीं करते। वह देवी पराई पत्नी है। हे सुरेश्वर, प्रसन्न होइए।
श्लोक 4 (5.12.4)
निवर्तय मनः पापात्परदाराभिमर्शनात् । देवराजोऽसि भद्रं ते प्रजा धर्मेण पालय ॥
nivartaya manaḥ pāpātparadārābhimarśanāt | devarājo'si bhadraṃ te prajā dharmeṇa pālaya
पराई स्त्री के स्पर्श के पाप से अपना मन लौटा लीजिए। आप देवराज हैं, आपका कल्याण हो; धर्म से प्रजा का पालन कीजिए।
शल्य उवाच
श्लोक 5 (5.12.5)
एवमुक्तो न जग्राह तद्वचः काममोहितः । अथ देवानुवाचेदमिन्द्रं प्रति सुराधिपः ॥
evamukto na jagrāha tadvacaḥ kāmamohitaḥ | atha devānuvācedamindraṃ prati surādhipaḥ
ऐसा कहे जाने पर भी काम से मोहित उस देवराज ने उनकी बात नहीं मानी। तब उसने इन्द्र के विषय में देवताओं से यह कहा —
नहुष उवाच
श्लोक 6 (5.12.6)
अहल्या धर्षिता पूर्वमृषिपत्नी यशस्विनी । जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स वः किं न निवारितः ॥
ahalyā dharṣitā pūrvamṛṣipatnī yaśasvinī | jīvato bharturindreṇa sa vaḥ kiṃ na nivāritaḥ
पहले इन्द्र ने ऋषि की यशस्विनी पत्नी अहल्या का, उसके पति के जीवित रहते, शील भंग किया था। तब आपने उसे क्यों नहीं रोका?
श्लोक 7 (5.12.7)
बहूनि च नृशंसानि कृतानीन्द्रेण वै पुरा । वैधर्म्याण्युपधाश्चैव स वः किं न निवारितः ॥
bahūni ca nṛśaṃsāni kṛtānīndreṇa vai purā | vaidharmyāṇyupadhāścaiva sa vaḥ kiṃ na nivāritaḥ
इन्द्र ने पहले बहुत-से क्रूर कर्म, अधर्म के काम और छल-कपट भी किए थे। तब आपने उसे क्यों नहीं रोका?
श्लोक 8 (5.12.8)
उपतिष्ठतु देवी मामेतदस्या हितं परम् । युष्माकं च सदा देवाः शिवमेवं भविष्यति ॥
upatiṣṭhatu devī māmetadasyā hitaṃ param | yuṣmākaṃ ca sadā devāḥ śivamevaṃ bhaviṣyati
देवी मेरी सेवा में आए; इसी में उसका परम हित है। और हे देवताओ, इसी से आपका भी सदा कल्याण होगा।
देवा ऊचुः
श्लोक 9 (5.12.9)
इन्द्राणीमानयिष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते । जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर ॥
indrāṇīmānayiṣyāmo yathecchasi divaspate | jahi krodhamimaṃ vīra prīto bhava sureśvara
हे स्वर्गपति, जैसा आप चाहते हैं, हम इन्द्राणी को ले आएँगे। हे वीर, यह क्रोध छोड़िए; हे सुरेश्वर, प्रसन्न होइए।
शल्य उवाच
श्लोक 10 (5.12.10)
इत्युक्त्वा तं तदा देवा ऋषिभिः सह भारत । जग्मुर्बृहस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वचः ॥
ityuktvā taṃ tadā devā ṛṣibhiḥ saha bhārata | jagmurbṛhaspatiṃ vaktumindrāṇīṃ cāśubhaṃ vacaḥ
हे भारत, उससे ऐसा कहकर देवता ऋषियों के साथ बृहस्पति से और इन्द्राणी से वह अशुभ बात कहने गए।
देवा ऊचुः
श्लोक 11 (5.12.11)
जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि । दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम ॥
jānīmaḥ śaraṇaṃ prāptāmindrāṇīṃ tava veśmani | dattābhayāṃ ca viprendra tvayā devarṣisattama
हे विप्रेन्द्र, हे देवर्षिश्रेष्ठ, हम जानते हैं कि इन्द्राणी आपके घर शरण लेने आई है और आपने उसे अभय दिया है।
श्लोक 12 (5.12.12)
ते त्वां देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च महाद्युते । प्रसादयन्ति चेन्द्राणी नहुषाय प्रदीयताम् ॥
te tvāṃ devāḥ sagandharvā ṛṣayaśca mahādyute | prasādayanti cendrāṇī nahuṣāya pradīyatām
हे महातेजस्वी, ये देवता, गन्धर्व और ऋषि आपसे विनती करते हैं कि इन्द्राणी नहुष को सौंप दी जाए।
श्लोक 13 (5.12.13)
इन्द्राद्विशिष्टो नहुषो देवराजो महाद्युतिः । वृणोत्विमं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी ॥
indrādviśiṣṭo nahuṣo devarājo mahādyutiḥ | vṛṇotvimaṃ varārohā bhartṛtve varavarṇinī
महातेजस्वी देवराज नहुष इन्द्र से भी बढ़कर हैं। यह सुन्दरी, उत्तम वर्ण वाली देवी उन्हें पति के रूप में वरण करे।
शल्य उवाच
श्लोक 14 (5.12.14)
एवमुक्ते तु सा देवी बाष्पमुत्सृज्य सस्वनम् । उवाच रुदती दीना बृहस्पतिमिदं वचः ॥
evamukte tu sā devī bāṣpamutsṛjya sasvanam | uvāca rudatī dīnā bṛhaspatimidaṃ vacaḥ
ऐसा कहे जाने पर देवी आँसू बहाती हुई, ऊँचे स्वर में रोती और दीन होकर बृहस्पति से यह वचन बोलीं —
इन्द्राण्युवाच
श्लोक 15 (5.12.15)
नाहमिच्छामि नहुषं पतिं देवर्षिसत्तम । शरणागतास्मि ते ब्रह्मंस्त्रायस्व महतो भयात् ॥
nāhamicchāmi nahuṣaṃ patiṃ devarṣisattama | śaraṇāgatāsmi te brahmaṃstrāyasva mahato bhayāt
हे देवर्षिश्रेष्ठ, मैं नहुष को पति नहीं बनाना चाहती। हे ब्रह्मन्, मैं आपकी शरण में आई हूँ; इस महान् भय से मेरी रक्षा कीजिए।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 16 (5.12.16)
शरणागतं न त्यजेयमिन्द्राणि मम निश्चयः । धर्मज्ञां सत्यशीलां च न त्यजेयमनिन्दिते ॥
śaraṇāgataṃ na tyajeyamindrāṇi mama niścayaḥ | dharmajñāṃ satyaśīlāṃ ca na tyajeyamanindite
हे इन्द्राणी, शरण में आए हुए का मैं त्याग नहीं करूँगा — यह मेरा निश्चय है। तुम धर्म को जानने वाली और सत्यशील हो; हे अनिन्दिते, मैं तुम्हें नहीं त्यागूँगा।
श्लोक 17 (5.12.17)
नाकार्यं कर्तुमिच्छामि ब्राह्मणः सन्विशेषतः । श्रुतधर्मा सत्यशीलो जानन्धर्मानुशासनम् ॥
nākāryaṃ kartumicchāmi brāhmaṇaḥ sanviśeṣataḥ | śrutadharmā satyaśīlo jānandharmānuśāsanam
मैं अनुचित कर्म नहीं करना चाहता, विशेषकर इसलिए कि मैं ब्राह्मण हूँ, धर्म का श्रवण कर चुका हूँ, सत्यशील हूँ और धर्म का अनुशासन जानता हूँ।
श्लोक 18 (5.12.18)
नाहमेतत्करिष्यामि गच्छध्वं वै सुरोत्तमाः । अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं ब्रह्मणा श्रूयतामिदम् ॥
nāhametatkariṣyāmi gacchadhvaṃ vai surottamāḥ | asmiṃścārthe purā gītaṃ brahmaṇā śrūyatāmidam
मैं यह नहीं करूँगा; हे श्रेष्ठ देवताओ, आप लौट जाइए। इस विषय में ब्रह्मा ने प्राचीन काल में जो गाया था, उसे सुनिए —
श्लोक 19 (5.12.19)
न तस्य बीजं रोहति रोहकाले । न तस्य वर्षं वर्षति वर्षकाले । भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे । न स त्रातारं लभते त्राणमिच्छन् ॥
na tasya bījaṃ rohati rohakāle | na tasya varṣaṃ varṣati varṣakāle | bhītaṃ prapannaṃ pradadāti śatrave | na sa trātāraṃ labhate trāṇamicchan
जो डरे हुए शरणागत को शत्रु के हाथ सौंप देता है, उसका बीज उगने के समय नहीं उगता, उसके लिए वर्षा ऋतु में वर्षा नहीं होती, और जब वह स्वयं रक्षा चाहता है तो उसे कोई रक्षक नहीं मिलता।
श्लोक 20 (5.12.20)
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेताः । स्वर्गाल्लोकाद्भ्रश्यति नष्टचेष्टः । भीतं प्रपन्नं प्रददाति यो वै । न तस्य हव्यं प्रतिगृह्णन्ति देवाः ॥
moghamannaṃ vindati cāpyacetāḥ | svargāllokādbhraśyati naṣṭaceṣṭaḥ | bhītaṃ prapannaṃ pradadāti yo vai | na tasya havyaṃ pratigṛhṇanti devāḥ
वह मूढ़ व्यर्थ ही अन्न पाता है; उसकी चेष्टाएँ निष्फल हो जाती हैं और वह स्वर्गलोक से गिर जाता है। जो डरे हुए शरणागत को सौंप देता है, उसका हव्य देवता स्वीकार नहीं करते।
श्लोक 21 (5.12.21)
प्रमीयते चास्य प्रजा ह्यकाले । सदा विवासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे । सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥
pramīyate cāsya prajā hyakāle | sadā vivāsaṃ pitaro'sya kurvate | bhītaṃ prapannaṃ pradadāti śatrave | sendrā devāḥ praharantyasya vajram
उसकी संतान असमय मर जाती है; उसके पितर सदा उससे दूर रहते हैं। जो डरे हुए शरणागत को शत्रु के हाथ सौंप देता है, इन्द्र सहित देवता उस पर वज्र का प्रहार करते हैं।
श्लोक 22 (5.12.22)
एतदेवं विजानन्वै न दास्यामि शचीमिमाम् । इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रियाम् ॥
etadevaṃ vijānanvai na dāsyāmi śacīmimām | indrāṇīṃ viśrutāṃ loke śakrasya mahiṣīṃ priyām
यह जानते हुए मैं इस शची को नहीं सौंपूँगा — इन्द्राणी को, जो लोक में विख्यात और इन्द्र की प्रिय पटरानी है।
श्लोक 23 (5.12.23)
अस्या हितं भवेद्यच्च मम चापि हितं भवेत् । क्रियतां तत्सुरश्रेष्ठा नहि दास्याम्यहं शचीम् ॥
asyā hitaṃ bhavedyacca mama cāpi hitaṃ bhavet | kriyatāṃ tatsuraśreṣṭhā nahi dāsyāmyahaṃ śacīm
हे सुरश्रेष्ठो, जिसमें इसका हित हो और मेरा भी हित हो, वही कीजिए; पर मैं शची को नहीं सौंपूँगा।
शल्य उवाच
श्लोक 24 (5.12.24)
अथ देवाः सगन्धर्वा गुरुमाहुरिदं वचः । कथं सुनीतं नु भवेन्मन्त्रयस्व बृहस्पते ॥
atha devāḥ sagandharvā gurumāhuridaṃ vacaḥ | kathaṃ sunītaṃ nu bhavenmantrayasva bṛhaspate
तब गन्धर्वों सहित देवताओं ने अपने गुरु से यह कहा — "हे बृहस्पति, यह कार्य किस प्रकार ठीक से हो सकता है? हमें सलाह दीजिए।"
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 25 (5.12.25)
नहुषं याचतां देवी किंचित्कालान्तरं शुभा । इन्द्राणीहितमेतद्धि तथाऽस्माकं भविष्यति ॥
nahuṣaṃ yācatāṃ devī kiṃcitkālāntaraṃ śubhā | indrāṇīhitametaddhi tathā'smākaṃ bhaviṣyati
कल्याणी देवी नहुष से कुछ समय की मोहलत माँगे। इसी में इन्द्राणी का हित है और हमारा भी।
श्लोक 26 (5.12.26)
बहुविघ्नः सुराः कालः कालः कालं नयिष्यति । गर्वितो बलवांश्चापि नहुषो वरसंश्रयात् ॥
bahuvighnaḥ surāḥ kālaḥ kālaḥ kālaṃ nayiṣyati | garvito balavāṃścāpi nahuṣo varasaṃśrayāt
हे देवताओ, समय अनेक विघ्नों से भरा होता है; समय ही समय को आगे ले जाएगा। नहुष वरदान के बल पर घमण्डी और बलवान है।
शल्य उवाच
श्लोक 27 (5.12.27)
ततस्तेन तथोक्ते तु प्रीता देवास्तथाब्रुवन् । ब्रह्मन्साध्विदमुक्तं ते हितं सर्वं दिवौकसाम् ॥
tatastena tathokte tu prītā devāstathābruvan | brahmansādhvidamuktaṃ te hitaṃ sarvaṃ divaukasām
उनके ऐसा कहने पर देवता प्रसन्न होकर बोले — "हे ब्रह्मन्, आपने यह अच्छी बात कही है; यह सब स्वर्गवासियों के लिए हितकर है।
श्लोक 28 (5.12.28)
एवमेतद्द्विजश्रेष्ठ देवी चेयं प्रसाद्यताम् । ततः समस्ता इन्द्राणीं देवाश्चाग्निपुरोगमाः ॥
evametaddvijaśreṣṭha devī ceyaṃ prasādyatām | tataḥ samastā indrāṇīṃ devāścāgnipurogamāḥ
हे द्विजश्रेष्ठ, ऐसा ही हो; इस देवी को मना लिया जाए।" तब अग्नि को आगे रखकर सब देवताओं ने इन्द्राणी से
श्लोक 29 (5.12.29)
ऊचुर्वचनमव्यग्रा लोकानां हितकाम्यया ॥
ūcurvacanamavyagrā lokānāṃ hitakāmyayā
लोकों के हित की कामना से शान्त भाव से यह वचन कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 30 (5.12.30)
त्वया जगदिदं सर्वं धृतं स्थावरजङ्गमम् । एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति ॥
tvayā jagadidaṃ sarvaṃ dhṛtaṃ sthāvarajaṅgamam | ekapatnyasi satyā ca gacchasva nahuṣaṃ prati
यह सारा चर-अचर जगत् आपके द्वारा धारण किया गया है। आप एकपत्नी और सत्यनिष्ठ हैं; नहुष के पास जाइए।
श्लोक 31 (5.12.31)
क्षिप्रं त्वामभिकामश्च विनशिष्यति पापकृत् । नहुषो देवि शक्रश्च सुरैश्वर्यमवाप्स्यति ॥
kṣipraṃ tvāmabhikāmaśca vinaśiṣyati pāpakṛt | nahuṣo devi śakraśca suraiśvaryamavāpsyati
हे देवि, आपकी कामना करने वाला वह पापी शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा और इन्द्र फिर से देवताओं का ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे।
शल्य उवाच
श्लोक 32 (5.12.32)
एवं विनिश्चयं कृत्वा इन्द्राणी कार्यसिद्धये । अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम् ॥
evaṃ viniścayaṃ kṛtvā indrāṇī kāryasiddhaye | abhyagacchata savrīḍā nahuṣaṃ ghoradarśanam
ऐसा निश्चय करके कार्य की सिद्धि के लिए इन्द्राणी लज्जा के साथ भयंकर दिखने वाले नहुष के पास गईं।
श्लोक 33 (5.12.33)
दृष्ट्वा तां नहुषश्चापि वयोरूपसमन्विताम् । समहृष्यत दुष्टात्मा कामोपहतचेतनः ॥
dṛṣṭvā tāṃ nahuṣaścāpi vayorūpasamanvitām | samahṛṣyata duṣṭātmā kāmopahatacetanaḥ
यौवन और रूप से सम्पन्न उन्हें देखकर काम से हतबुद्धि हुआ दुष्टात्मा नहुष भी अत्यन्त हर्षित हुआ।