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उद्योग पर्व · अध्याय 11

नहुष का स्वर्ग के राजा पद पर अभिषेक

शल्य युधिष्ठिर को इन्द्र की कथा आगे सुनाते हैं। इन्द्र के लुप्त हो जाने पर देवता और ऋषि राजा नहुष से स्वर्ग का राज्य सँभालने को कहते हैं; जब वे अपनी दुर्बलता बताते हैं, तो वे उन्हें यह वर देते हैं कि वे जिस प्राणी को देखेंगे उसका तेज हर लेंगे, और उनका अभिषेक हो जाता है। राजा बनकर नहुष भोग-विलास में डूब जाते हैं और शची को देखकर माँग करते हैं कि इन्द्र की पटरानी उनके पास आए। शची बृहस्पति की शरण लेती हैं, जो उन्हें इन्द्र के शीघ्र लौटने का आश्वासन देते हैं; यह जानकर नहुष क्रोधित हो उठते हैं।

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शल्य उवाच

श्लोक 1 (5.11.1)

ऋषयोऽथाब्रुवन्सर्वे देवाश्च त्रिदिवेश्वराः । अयं वै नहुषः श्रीमान्देवराज्येऽभिषिच्यताम् ॥

ṛṣayo'thābruvansarve devāśca tridiveśvarāḥ | ayaṃ vai nahuṣaḥ śrīmāndevarājye'bhiṣicyatām

तब सभी ऋषियों और स्वर्ग के स्वामी देवताओं ने कहा — "इन श्रीमान नहुष का देवताओं के राजा के पद पर अभिषेक किया जाए।"

श्लोक 2 (5.11.2)

तेजस्वी च यशस्वी च धार्मिकश्चैव नित्यदा । ते गत्वा त्वब्रुवन्सर्वे राजा नो भव पार्थिव ॥

tejasvī ca yaśasvī ca dhārmikaścaiva nityadā | te gatvā tvabruvansarve rājā no bhava pārthiva

"वे तेजस्वी, यशस्वी और सदा धर्मपरायण हैं।" फिर उन सबने उनके पास जाकर कहा — "हे पृथ्वीपति, आप हमारे राजा बनिए।"

श्लोक 3 (5.11.3)

स तानुवाच नहुषो देवानृषिगणांस्तथा । पितृभिः सहितान्राजन्परीप्सन्हितमात्मनः ॥

sa tānuvāca nahuṣo devānṛṣigaṇāṃstathā | pitṛbhiḥ sahitānrājanparīpsanhitamātmanaḥ

हे राजन्, अपना हित चाहते हुए नहुष ने पितरों सहित आए देवताओं और ऋषि-समूहों से कहा —

नहुष उवाच

श्लोक 4 (5.11.4)

दुर्बलोऽहं न मे शक्तिर्भवतां परिपालने । बलवाञ्ज्ञायतां कश्चिद्बलं शक्रे हि नित्यदा ॥

durbalo'haṃ na me śaktirbhavatāṃ paripālane | balavāñjñāyatāṃ kaścidbalaṃ śakre hi nityadā

मैं दुर्बल हूँ; आप सबकी रक्षा करने की शक्ति मुझमें नहीं है। किसी बलवान को खोजिए, क्योंकि बल तो सदा इन्द्र में ही रहा है।

शल्य उवाच

श्लोक 5 (5.11.5)

तमब्रुवन्पुनः सर्वे देवा ऋषिपुरोगमाः । अस्माकं तपसा युक्तः पाहि राज्यं त्रिविष्टपे ॥

tamabruvanpunaḥ sarve devā ṛṣipurogamāḥ | asmākaṃ tapasā yuktaḥ pāhi rājyaṃ triviṣṭape

तब ऋषियों को आगे रखकर सभी देवताओं ने उनसे फिर कहा — "हमारे तप के बल से युक्त होकर आप स्वर्ग के राज्य का पालन कीजिए।

देवा ऊचुः

श्लोक 6 (5.11.6)

परस्परभयं घोरमस्माकं हि न संशयः । अभिषिच्यस्व राजेन्द्र भव राजा त्रिविष्टपे ॥

parasparabhayaṃ ghoramasmākaṃ hi na saṃśayaḥ | abhiṣicyasva rājendra bhava rājā triviṣṭape

इसमें संदेह नहीं कि हम सबको एक-दूसरे से घोर भय हो गया है। हे राजेन्द्र, अभिषेक स्वीकार कीजिए और स्वर्ग के राजा बनिए।

श्लोक 7 (5.11.7)

देवदानवयक्षाणामृषीणां रक्षसां तथा । पितृगन्धर्वभूतानां चक्षुर्विषयवर्तिनाम् ॥

devadānavayakṣāṇāmṛṣīṇāṃ rakṣasāṃ tathā | pitṛgandharvabhūtānāṃ cakṣurviṣayavartinām

देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत — जो भी आपकी दृष्टि के सामने आएगा —

श्लोक 8 (5.11.8)

तेज आदास्यसे पश्यन्बलवांश्च भविष्यसि । धर्मं पुरस्कृत्य सदा सर्वलोकाधिपो भव ॥

teja ādāsyase paśyanbalavāṃśca bhaviṣyasi | dharmaṃ puraskṛtya sadā sarvalokādhipo bhava

उसे देखते ही आप उसका तेज ग्रहण कर लेंगे और बलवान हो जाएँगे। सदा धर्म को आगे रखकर आप सब लोकों के अधिपति बनिए।

श्लोक 9 (5.11.9)

ब्रह्मर्षींश्चापि देवांश्च गोपायस्व त्रिविष्टपे ॥

brahmarṣīṃścāpi devāṃśca gopāyasva triviṣṭape

और स्वर्ग में ब्रह्मर्षियों तथा देवताओं की रक्षा कीजिए।

शल्य उवाच

श्लोक 10 (5.11.10)

अभिषिक्तः स राजेन्द्र ततो राजा त्रिविष्टपे ॥

abhiṣiktaḥ sa rājendra tato rājā triviṣṭape

हे राजेन्द्र, तब उनका अभिषेक हुआ और वे स्वर्ग के राजा बन गए।

श्लोक 11 (5.11.11)

धर्मं पुरस्कृत्य तदा सर्वलोकाधिपोऽभवत् । सुदुर्लभं वरं लब्ध्वा प्राप्य राज्यं त्रिविष्टपे ॥

dharmaṃ puraskṛtya tadā sarvalokādhipo'bhavat | sudurlabhaṃ varaṃ labdhvā prāpya rājyaṃ triviṣṭape

धर्म को आगे रखकर वे तब सब लोकों के अधिपति हो गए। किन्तु अत्यन्त दुर्लभ वर पाकर और स्वर्ग का राज्य प्राप्त करके

श्लोक 12 (5.11.12)

धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत । देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च ॥

dharmātmā satataṃ bhūtvā kāmātmā samapadyata | devodyāneṣu sarveṣu nandanopavaneṣu ca

जो सदा धर्मात्मा रहे थे, वे कामासक्त हो गए। देवताओं के सब उद्यानों में, नन्दन वन के उपवनों में,

श्लोक 13 (5.11.13)

कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते । सह्ये महेन्द्रे मलये समुद्रेषु सरित्सु च ॥

kailāse himavatpṛṣṭhe mandare śvetaparvate | sahye mahendre malaye samudreṣu saritsu ca

कैलास पर, हिमालय के शिखरों पर, मन्दर और श्वेत पर्वत पर, सह्य, महेन्द्र और मलय पर्वतों पर, समुद्रों और नदियों के तटों पर,

श्लोक 14 (5.11.14)

अप्सरोभिः परिवृतो देवकन्यासमावृतः । नहुषो देवराजोऽथ क्रीडन्बहुविधं तदा ॥

apsarobhiḥ parivṛto devakanyāsamāvṛtaḥ | nahuṣo devarājo'tha krīḍanbahuvidhaṃ tadā

अप्सराओं से घिरे और देवकन्याओं से सेवित, देवराज बने नहुष तब अनेक प्रकार से क्रीड़ा करने लगे,

श्लोक 15 (5.11.15)

शृण्वन्दिव्या बहुविधाः कथाः श्रुतिमनोहराः । वादित्राणि च सर्वाणि गीतं च मधुरस्वनम् ॥

śṛṇvandivyā bahuvidhāḥ kathāḥ śrutimanoharāḥ | vāditrāṇi ca sarvāṇi gītaṃ ca madhurasvanam

कानों को मोहने वाली अनेक प्रकार की दिव्य कथाएँ, सब प्रकार के वाद्य और मधुर स्वर वाले गीत सुनते हुए।

श्लोक 16 (5.11.16)

विश्वावसुर्नारदश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः । ऋतवः षट्च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिताः ॥

viśvāvasurnāradaśca gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | ṛtavaḥ ṣaṭca devendraṃ mūrtimanta upasthitāḥ

विश्वावसु और नारद, गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह, तथा देह धारण किए हुए छहों ऋतुएँ देवराज की सेवा में उपस्थित रहती थीं।

श्लोक 17 (5.11.17)

मारुतः सुरभिर्वाति मनोज्ञः सत्वशीतलः । एवं विक्रीडतस्तस्य नहुषस्य दुरात्मनः ॥

mārutaḥ surabhirvāti manojñaḥ satvaśītalaḥ | evaṃ vikrīḍatastasya nahuṣasya durātmanaḥ

सुगन्धित, मनोहर और शीतल वायु बहती थी। इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए उस दुष्टात्मा नहुष की

श्लोक 18 (5.11.18)

संप्राप्ता दर्शनं देवी शक्रस्य महिषी प्रिया । स तां संदृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वान्सभासदः ॥

saṃprāptā darśanaṃ devī śakrasya mahiṣī priyā | sa tāṃ saṃdṛśya duṣṭātmā prāha sarvānsabhāsadaḥ

दृष्टि इन्द्र की प्रिय पटरानी देवी पर पड़ी। उन्हें देखकर उस दुष्टात्मा ने सब सभासदों से कहा —

नहुष उवाच

श्लोक 19 (5.11.19)

इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति । अहमिन्द्रोऽस्मि देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥

indrasya mahiṣī devī kasmānmāṃ nopatiṣṭhati | ahamindro'smi devānāṃ lokānāṃ ca tatheśvaraḥ

इन्द्र की पटरानी देवी मेरी सेवा में क्यों नहीं आती? मैं ही देवताओं का इन्द्र हूँ और लोकों का स्वामी भी।

शल्य उवाच

श्लोक 20 (5.11.20)

आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह ॥

āgacchatu śacī mahyaṃ kṣipramadya niveśanam | tacchrutvā durmanā devī bṛhaspatimuvāca ha

"शची आज ही शीघ्र मेरे भवन में आए।" यह सुनकर दुःखी मन से देवी ने बृहस्पति से कहा —

इन्द्राण्युवाच

श्लोक 21 (5.11.21)

रक्ष मां नहुषाद्ब्रह्मंस्त्वामस्मि शरणं गता । सर्वलक्षणसंपन्नां ब्रह्मंस्त्वं मां प्रभाषसे ॥

rakṣa māṃ nahuṣādbrahmaṃstvāmasmi śaraṇaṃ gatā | sarvalakṣaṇasaṃpannāṃ brahmaṃstvaṃ māṃ prabhāṣase

हे ब्रह्मन्, नहुष से मेरी रक्षा कीजिए; मैं आपकी शरण में आई हूँ। हे ब्रह्मन्, आपने मुझसे कहा था कि मैं सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न हूँ,

श्लोक 22 (5.11.22)

देवराजस्य दयितामत्यन्तं सुखभागिनीम् । अवैधव्येन युक्तां चाप्येकपत्नीं पतिव्रताम् ॥

devarājasya dayitāmatyantaṃ sukhabhāginīm | avaidhavyena yuktāṃ cāpyekapatnīṃ pativratām

देवराज की प्रियतमा, अपार सुख की भागिनी, कभी विधवा न होने वाली, एक ही पति वाली पतिव्रता।

श्लोक 23 (5.11.23)

उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम् । नोक्तपूर्वं च भगवन्मृषा ते किंचिदीश्वर ॥

uktavānasi māṃ pūrvamṛtāṃ tāṃ kuru vai giram | noktapūrvaṃ ca bhagavanmṛṣā te kiṃcidīśvara

आपने पहले मुझसे ऐसा कहा था; अपनी उस वाणी को सत्य कीजिए। हे भगवन्, हे स्वामी, आपने पहले कभी कुछ भी असत्य नहीं कहा।

शल्य उवाच

श्लोक 24 (5.11.24)

तस्मादेतद्भवेत्सत्यं त्वयोक्तं द्विजसत्तम । बृहस्पतिरथोवाच इन्द्राणीं भयमोहिताम् ॥

tasmādetadbhavetsatyaṃ tvayoktaṃ dvijasattama | bṛhaspatirathovāca indrāṇīṃ bhayamohitām

"इसलिए हे द्विजश्रेष्ठ, आपका कहा हुआ वह वचन सत्य हो।" तब बृहस्पति ने भय से व्याकुल इन्द्राणी से कहा —

बृहस्पतिरुवाच

श्लोक 25 (5.11.25)

यदुक्तासि मया देवि सत्यं तद्भविता ध्रुवम् । द्रक्ष्यसे देवराजं तमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम् ॥

yaduktāsi mayā devi satyaṃ tadbhavitā dhruvam | drakṣyase devarājaṃ tamindraṃ śīghramihāgatam

हे देवि, मैंने तुमसे जो कहा है, वह निश्चय ही सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्र को यहाँ लौटा हुआ देखोगी।

श्लोक 26 (5.11.26)

न भेतव्यं च नहुषात्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । समानयिष्ये शक्रेण नचिराद्भवतीमहम् ॥

na bhetavyaṃ ca nahuṣātsatyametadbravīmi te | samānayiṣye śakreṇa nacirādbhavatīmaham

नहुष से मत डरो; मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ। मैं शीघ्र ही तुम्हें इन्द्र से फिर मिला दूँगा।

शल्य उवाच

श्लोक 27 (5.11.27)

अथ शुश्राव नहुष इन्द्राणीं शरणं गताम् । बृहस्पतेरङ्गिरसश्चुक्रोध स नृपस्तदा ॥

atha śuśrāva nahuṣa indrāṇīṃ śaraṇaṃ gatām | bṛhaspateraṅgirasaścukrodha sa nṛpastadā

तब नहुष ने सुना कि इन्द्राणी अंगिरा के पुत्र बृहस्पति की शरण में गई है, और वह राजा क्रोधित हो उठा।

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