उद्योग पर्व · अध्याय 22
धृतराष्ट्र द्वारा संजय को पाण्डवों के पास भेजना
धृतराष्ट्र संजय से उपप्लव्य जाकर पाण्डवों का अभिवादन करने को कहते हैं। वे पाण्डवों के निर्दोष आचरण की प्रशंसा करते हैं, वैर का दोष केवल दुर्योधन और कर्ण पर डालते हैं, और बढ़ते भय के साथ पाण्डव-पक्ष की शक्ति गिनाते हैं — अर्जुन और श्रीकृष्ण, भीम, दोनों माद्रीपुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, केकय भाई, पाण्ड्य राजा, सात्यकि, और श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध। सबसे अधिक वे तपस्वी युधिष्ठिर के क्रोध से डरते हैं। वे संजय को सबका कुशल पूछने और ऐसी बात कहने को भेजते हैं जिससे शान्ति बनी रहे और युद्ध न भड़के।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.22.1)
प्राप्तानाहुः सञ्जय पाण्डुपुत्रा- । नुपप्लव्ये तान्विजानीहि गत्वा । अजातशत्रुं च सभाजयेथा । दिष्ट्या वनाद्ग्राममुपस्थितस्त्वम् ॥
prāptānāhuḥ sañjaya pāṇḍuputrā- | nupaplavye tānvijānīhi gatvā | ajātaśatruṃ ca sabhājayethā | diṣṭyā vanādgrāmamupasthitastvam
हे संजय, सुना है कि पाण्डुपुत्र उपप्लव्य आ पहुँचे हैं। वहाँ जाकर उनका हाल जानो। अजातशत्रु युधिष्ठिर का सम्मानपूर्वक अभिवादन करना और कहना — "सौभाग्य है कि तुम वन से निकलकर बस्ती में आ गए हो।"
श्लोक 2 (5.22.2)
सर्वान्वदेः सञ्जय स्वस्तिमन्तः । कृच्छ्रं वासमतदर्हा निरुष्य । तेषां शान्तिर्विद्यतेऽस्मासु शीघ्रं । मिथ्यापेतानामुपकारिणां सताम् ॥
sarvānvadeḥ sañjaya svastimantaḥ | kṛcchraṃ vāsamatadarhā niruṣya | teṣāṃ śāntirvidyate'smāsu śīghraṃ | mithyāpetānāmupakāriṇāṃ satām
हे संजय, सबसे कहना कि हम कुशल से हैं। वे उस कठिन वनवास के योग्य नहीं थे, फिर भी उसे बिताकर भी, निष्कपट और उपकार करने वाले उन सज्जनों के मन में हमारे प्रति शीघ्र ही शान्ति है।
श्लोक 3 (5.22.3)
नाहं क्वचित्सञ्जय पाण्डवानां । मिथ्यावृत्तिं कांचन जात्वपश्यम् । सर्वां श्रियं ह्यात्मवीर्येण लब्धां । पर्याकार्षुः पाण्डवा मह्यमेव ॥
nāhaṃ kvacitsañjaya pāṇḍavānāṃ | mithyāvṛttiṃ kāṃcana jātvapaśyam | sarvāṃ śriyaṃ hyātmavīryeṇa labdhāṃ | paryākārṣuḥ pāṇḍavā mahyameva
हे संजय, मैंने कभी भी पाण्डवों का कोई कपटपूर्ण आचरण नहीं देखा। अपने पराक्रम से जो भी लक्ष्मी उन्होंने पाई, वह सब पाण्डवों ने लाकर मुझे ही सौंप दी।
श्लोक 4 (5.22.4)
दोषं ह्येषां नाध्यगच्छं परीच्छ- । न्सूक्ष्मं कंचिद्येन गर्हेय पार्थान् । धर्मार्थाभ्यां कर्म कुर्वन्ति नित्यं । सुखप्रिये नानुरुध्यन्ति कामात् ॥
doṣaṃ hyeṣāṃ nādhyagacchaṃ parīccha- | nsūkṣmaṃ kaṃcidyena garheya pārthān | dharmārthābhyāṃ karma kurvanti nityaṃ | sukhapriye nānurudhyanti kāmāt
खोजने पर भी मुझे उनमें कोई सूक्ष्म-सा भी दोष नहीं मिला जिसके लिए मैं पार्थों की निन्दा करूँ। वे सदा धर्म और अर्थ के लिए कर्म करते हैं; कामना के वश होकर सुख और प्रिय वस्तुओं के पीछे नहीं भागते।
श्लोक 5 (5.22.5)
घर्मं शीतं क्षुत्पिपासे तथैव । निद्रां तन्द्रीं क्रोधहर्षौ प्रमादम् । धृत्या चैव प्रज्ञया चाभिभूय । धर्मार्थयोगान्प्रयतन्ति पार्थाः ॥
gharmaṃ śītaṃ kṣutpipāse tathaiva | nidrāṃ tandrīṃ krodhaharṣau pramādam | dhṛtyā caiva prajñayā cābhibhūya | dharmārthayogānprayatanti pārthāḥ
गर्मी और सर्दी, भूख और प्यास, नींद, आलस्य, क्रोध, हर्ष और प्रमाद — इन सबको पार्थ धैर्य और बुद्धि से जीतकर धर्म और अर्थ के मेल के लिए प्रयत्न करते हैं।
श्लोक 6 (5.22.6)
त्यजन्ति मित्रेषु धनानि काले । न संवासाज्जीर्यति मैत्रमेषाम् । यथार्हमानार्थकरा हि पार्था- । स्तेषां द्वेष्टा नास्त्याजमीढस्य पक्षे । अन्यत्र पापाद्विषमान्मन्दबुद्धे- । र्दुर्योधनात्क्षुद्रतराच्च कर्णात् ॥
tyajanti mitreṣu dhanāni kāle | na saṃvāsājjīryati maitrameṣām | yathārhamānārthakarā hi pārthā- | steṣāṃ dveṣṭā nāstyājamīḍhasya pakṣe | anyatra pāpādviṣamānmandabuddhe- | rduryodhanātkṣudratarācca karṇāt
वे उचित समय पर मित्रों के लिए धन त्याग देते हैं, और बहुत साथ रहने से भी उनकी मित्रता पुरानी नहीं पड़ती। पार्थ हर किसी को उसकी योग्यता के अनुसार सम्मान और धन देते हैं। अजमीढवंशी (मेरे) पक्ष में उनसे द्वेष करने वाला कोई नहीं — सिवाय पापी, कुटिल, मन्दबुद्धि दुर्योधन और उससे भी ओछे कर्ण के।
श्लोक 7 (5.22.7)
पुत्रो मह्यं मृत्युवशं जगाम । दुर्योधनः सञ्जय रागबुद्धिः । तेषां हीमौ हीनसुखप्रियाणां । महात्मनां संजनयतो हि तेजः ॥
putro mahyaṃ mṛtyuvaśaṃ jagāma | duryodhanaḥ sañjaya rāgabuddhiḥ | teṣāṃ hīmau hīnasukhapriyāṇāṃ | mahātmanāṃ saṃjanayato hi tejaḥ
हे संजय, आसक्ति से अंधी बुद्धि वाला मेरा पुत्र दुर्योधन मृत्यु के वश में जा पड़ा है। ये दोनों ही सुख और भोगों को त्याग चुके उन महात्माओं के क्रोध की आग भड़काते हैं।
श्लोक 8 (5.22.8)
उत्थानवीर्यः सुखमेधमानो । दुर्योधनः सुकृतं मन्यते तत् । तेषां भागं यच्च मन्येत बालः । शक्यं हर्तुं जीवतां पाण्डवानाम् ॥
utthānavīryaḥ sukhamedhamāno | duryodhanaḥ sukṛtaṃ manyate tat | teṣāṃ bhāgaṃ yacca manyeta bālaḥ | śakyaṃ hartuṃ jīvatāṃ pāṇḍavānām
सुख में फलता-फूलता दुर्योधन अपने उद्यम और पराक्रम को ही ठीक समझता है; और वह मूर्ख सोचता है कि पाण्डवों के जीते-जी उनका भाग छीना जा सकता है।
श्लोक 9 (5.22.9)
यस्यार्जुनः पदवीं केशवश्च । वृकोदरः सात्यकोऽजातशत्रोः । माद्रीपुत्रौ सृञ्जयाश्चापि यान्ति । पुरा युद्धात्साधु तस्य प्रदानम् ॥
yasyārjunaḥ padavīṃ keśavaśca | vṛkodaraḥ sātyako'jātaśatroḥ | mādrīputrau sṛñjayāścāpi yānti | purā yuddhātsādhu tasya pradānam
जिस अजातशत्रु के मार्ग पर अर्जुन और केशव, वृकोदर और सात्यकि, दोनों माद्रीपुत्र और सृंजय चलते हैं, उसे युद्ध से पहले ही उसका भाग दे देना उचित है।
श्लोक 10 (5.22.10)
स ह्येवैकः पृथिवीं सव्यसाची । गाण्डीवधन्वा प्रणुदेद्रथस्थः । तथा जिष्णुः केशवोऽप्यप्रधृष्यो । लोकत्रयस्याधिपतिर्महात्मा ॥
sa hyevaikaḥ pṛthivīṃ savyasācī | gāṇḍīvadhanvā praṇudedrathasthaḥ | tathā jiṣṇuḥ keśavo'pyapradhṛṣyo | lokatrayasyādhipatirmahātmā
गाण्डीवधारी सव्यसाची अर्जुन अकेले ही रथ पर खड़े होकर सारी पृथ्वी को उलट सकते हैं। और सदा विजयी, तीनों लोकों के स्वामी महात्मा केशव भी अजेय हैं।
श्लोक 11 (5.22.11)
तिष्ठेत कस्तस्य मर्त्यः पुरस्ता- । द्यः सर्वलोकेषु वरेण्य एकः । पर्जन्यघोषान्प्रवपञ्शरौघा- । न्पतङ्गसङ्घानिव शीघ्रवेगान् ॥
tiṣṭheta kastasya martyaḥ purastā- | dyaḥ sarvalokeṣu vareṇya ekaḥ | parjanyaghoṣānpravapañśaraughā- | npataṅgasaṅghāniva śīghravegān
जो सब लोकों में एकमात्र श्रेष्ठ है, वह जब बादलों की तरह गरजते और टिड्डी-दलों की तरह तेज़ उड़ते बाणों की झड़ी लगाता है, तब कौन मनुष्य उसके सामने टिक सकता है?
श्लोक 12 (5.22.12)
दिशं ह्युदीचीमपि चोत्तरान्कुरून् । गाण्डीवधन्वैकरथो जिगाय । धनं चैषामाहरत्सव्यसाची । सेनानुगान्द्रविडांश्चैव चक्रे ॥
diśaṃ hyudīcīmapi cottarānkurūn | gāṇḍīvadhanvaikaratho jigāya | dhanaṃ caiṣāmāharatsavyasācī | senānugāndraviḍāṃścaiva cakre
गाण्डीवधारी ने अकेले एक रथ से उत्तर दिशा और उत्तरकुरु देश को भी जीत लिया। सव्यसाची उनका धन ले आए और द्रविड़ों को अपनी सेना का अनुगामी बना लिया।
श्लोक 13 (5.22.13)
यश्चैव देवान्खाण्डवे सव्यसाची । गाण्डीवधन्वा प्रजिगाय सेन्द्रान् । उपाहरत्पाण्डवो जातवेदसे । यशो मानं वर्धयन्पाण्डवानाम् ॥
yaścaiva devānkhāṇḍave savyasācī | gāṇḍīvadhanvā prajigāya sendrān | upāharatpāṇḍavo jātavedase | yaśo mānaṃ vardhayanpāṇḍavānām
और खाण्डव वन में गाण्डीवधारी सव्यसाची ने इन्द्र सहित देवताओं को हराया और पाण्डवों का यश और मान बढ़ाते हुए वह वन अग्निदेव को भेंट कर दिया।
श्लोक 14 (5.22.14)
गदाभृतां नास्ति समोऽत्र भीमा- । द्धस्त्यारोहो नास्ति समश्च तस्य । रथेऽर्जुनादाहुरहीनमेनं । बाह्वोर्बलेनायुतनागवीर्यम् ॥
gadābhṛtāṃ nāsti samo'tra bhīmā- | ddhastyāroho nāsti samaśca tasya | rathe'rjunādāhurahīnamenaṃ | bāhvorbalenāyutanāgavīryam
गदाधारियों में यहाँ भीम के समान कोई नहीं, और न हाथी की सवारी में कोई उनकी बराबरी का है। रथ-युद्ध में लोग उन्हें अर्जुन से कम नहीं बताते, और भुजाओं के बल में उनमें दस हज़ार हाथियों की शक्ति है।
श्लोक 15 (5.22.15)
सुशिक्षितः कृतवैरस्तरस्वी । दहेत्क्षुद्रांस्तरसा धार्तराष्ट्रान् । सदाऽत्यमर्षी न बलात्स शक्यो । युद्धे जेतुं वासवेनापि साक्षात् ॥
suśikṣitaḥ kṛtavairastarasvī | dahetkṣudrāṃstarasā dhārtarāṣṭrān | sadā'tyamarṣī na balātsa śakyo | yuddhe jetuṃ vāsavenāpi sākṣāt
सुशिक्षित, वेगवान् और वैर से भरे हुए वे धृतराष्ट्र के ओछे पुत्रों को शीघ्र ही भस्म कर देंगे। सदा अत्यन्त क्रोधी उन भीम को युद्ध में बल से स्वयं इन्द्र भी नहीं जीत सकते।
श्लोक 16 (5.22.16)
सुतेजसौ बलिनौ शीघ्रहस्तौ । सुशिक्षितौ भ्रातरौ फाल्गुनेन । श्येनौ यथा पक्षिपूगान्रुजन्तौ । माद्रीपुत्रौ शेषयेतां न शत्रून् ॥
sutejasau balinau śīghrahastau | suśikṣitau bhrātarau phālgunena | śyenau yathā pakṣipūgānrujantau | mādrīputrau śeṣayetāṃ na śatrūn
तेजस्वी, बलवान् और फुर्तीले हाथों वाले, अपने भाई फाल्गुन से सुशिक्षित दोनों माद्रीपुत्र पक्षियों के झुंड को चीरते दो बाज़ों की तरह किसी शत्रु को जीवित नहीं छोड़ेंगे।
श्लोक 17 (5.22.17)
एतद्बलं पूर्णमस्माकमेवं । यत्सत्यं तान्प्राप्य नास्तीति मन्ये । तेषां मध्ये वर्तमानस्तरस्वी । धृष्टद्युम्नः पाण्डवानामिहैकः ॥
etadbalaṃ pūrṇamasmākamevaṃ | yatsatyaṃ tānprāpya nāstīti manye | teṣāṃ madhye vartamānastarasvī | dhṛṣṭadyumnaḥ pāṇḍavānāmihaikaḥ
मेरे विचार से हमारी यह पूरी सेना उनसे भिड़ते ही सचमुच कुछ नहीं रह जाती। उनके बीच वेगवान् धृष्टद्युम्न हैं, जो पाण्डवों के पक्ष में अद्वितीय हैं,
श्लोक 18 (5.22.18)
सहामात्यः सोमकानां प्रबर्हः । सन्त्यक्तात्मा पाण्डवार्थे श्रुतो मे । अजातशत्रुं प्रसहेत कोऽन्यो । येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः ॥
sahāmātyaḥ somakānāṃ prabarhaḥ | santyaktātmā pāṇḍavārthe śruto me | ajātaśatruṃ prasaheta ko'nyo | yeṣāṃ sa syādagraṇīrvṛṣṇisiṃhaḥ
सोमकों के प्रधान, जिन्होंने — जैसा मैंने सुना है — मन्त्रियों सहित पाण्डवों के लिए अपने प्राणों का मोह छोड़ दिया है। जिनके अगुवा वृष्णिसिंह श्रीकृष्ण हों, उन अजातशत्रु का सामना और कौन कर सकता है?
श्लोक 19 (5.22.19)
सहोषितश्चरितार्थो वयस्थो । मात्स्येयानामधिपो वै विराटः । स वै सपुत्रः पाण्डवार्थे च शश्व- । द्युधिष्ठिरे भक्त इति श्रुतं मे ॥
sahoṣitaścaritārtho vayastho | mātsyeyānāmadhipo vai virāṭaḥ | sa vai saputraḥ pāṇḍavārthe ca śaśva- | dyudhiṣṭhire bhakta iti śrutaṃ me
मत्स्यों के स्वामी, प्रौढ़ अवस्था वाले विराट, जिनके साथ वे रहे और जिनका काम उन्होंने सिद्ध किया, अपने पुत्रों सहित पाण्डवों के लिए सदा युधिष्ठिर के भक्त हैं — ऐसा मैंने सुना है।
श्लोक 20 (5.22.20)
अवरुद्धा रथिनः केकयेभ्यो । महेष्वासा भ्रातरः पञ्च सन्ति । केकयेभ्यो राज्यमाकाङ्क्षमाणा । युद्धार्थिनश्चानुवसन्ति पार्थान् ॥
avaruddhā rathinaḥ kekayebhyo | maheṣvāsā bhrātaraḥ pañca santi | kekayebhyo rājyamākāṅkṣamāṇā | yuddhārthinaścānuvasanti pārthān
केकयों द्वारा निकाले गए पाँच भाई, जो रथी और महान् धनुर्धर हैं, वहाँ हैं; केकयों से अपना राज्य वापस चाहते हुए वे युद्ध की इच्छा से पार्थों के साथ रह रहे हैं।
श्लोक 21 (5.22.21)
सर्वांश्च वीरान्पृथिवीपतीनां । समागतान्पाण्डवार्थे निविष्टान् । शूरानहं भक्तिमतः शृणोमि । प्रीत्या युक्तान्संश्रितान्धर्मराजम् ॥
sarvāṃśca vīrānpṛthivīpatīnāṃ | samāgatānpāṇḍavārthe niviṣṭān | śūrānahaṃ bhaktimataḥ śṛṇomi | prītyā yuktānsaṃśritāndharmarājam
और मैं सुनता हूँ कि पृथ्वी के राजाओं में जितने वीर हैं, सब इकट्ठे होकर पाण्डवों के पक्ष में डटे हैं — वे शूरवीर, भक्ति से भरे, प्रेमपूर्वक धर्मराज के आश्रित हो गए हैं।
श्लोक 22 (5.22.22)
गिर्याश्रया दुर्गनिवासिनश्च । योधाः पृथिव्यां कुलजातिशुद्धाः । म्लेच्छाश्च नानायुधवीर्यवन्तः । समागताः पाण्डवार्थे निविष्टाः ॥
giryāśrayā durganivāsinaśca | yodhāḥ pṛthivyāṃ kulajātiśuddhāḥ | mlecchāśca nānāyudhavīryavantaḥ | samāgatāḥ pāṇḍavārthe niviṣṭāḥ
पर्वतों और दुर्गों में रहने वाले योद्धा, पृथ्वी भर के कुल और जाति से शुद्ध वीर, और नाना प्रकार के शस्त्रों में पराक्रमी म्लेच्छ भी इकट्ठे होकर पाण्डवों के पक्ष में डटे हैं।
श्लोक 23 (5.22.23)
पाण्ड्यश्च राजा समितीन्द्रकल्पो । योधप्रवीरैर्बहुभिः समेतः । समागतः पाण्डवार्थे महात्मा । लोकप्रवीरोऽप्रतिवीर्यतेजाः ॥
pāṇḍyaśca rājā samitīndrakalpo | yodhapravīrairbahubhiḥ sametaḥ | samāgataḥ pāṇḍavārthe mahātmā | lokapravīro'prativīryatejāḥ
और युद्ध में इन्द्र के समान पाण्ड्य राजा भी बहुत-से श्रेष्ठ योद्धाओं के साथ पाण्डवों के लिए आए हैं — वे महात्मा, लोकविख्यात वीर, अनुपम पराक्रम और तेज वाले हैं।
श्लोक 24 (5.22.24)
अस्त्रं द्रोणादर्जुनाद्वासुदेवा- । त्कृपाद्भीष्माद्येन कृतं शृणोमि । यं तं कार्ष्णिप्रतिममाहुरेकं । स सात्यकिः पाण्डवार्थे निविष्टः ॥
astraṃ droṇādarjunādvāsudevā- | tkṛpādbhīṣmādyena kṛtaṃ śṛṇomi | yaṃ taṃ kārṣṇipratimamāhurekaṃ | sa sātyakiḥ pāṇḍavārthe niviṣṭaḥ
जिन सात्यकि ने — जैसा मैं सुनता हूँ — द्रोण, अर्जुन, वासुदेव, कृप और भीष्म से अस्त्रविद्या सीखी है, और जिन्हें लोग श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के समान बताते हैं, वे भी पाण्डवों के पक्ष में डटे हैं।
श्लोक 25 (5.22.25)
उपाश्रिताश्चेदिकरूशकाश्च । सर्वोद्योगैर्भूमिपालाः समेताः । तेषां मध्ये सूर्यमिवातपन्तं । श्रिया वृतं चेदिपतिं ज्वलन्तम् ॥
upāśritāścedikarūśakāśca | sarvodyogairbhūmipālāḥ sametāḥ | teṣāṃ madhye sūryamivātapantaṃ | śriyā vṛtaṃ cedipatiṃ jvalantam
चेदि और करूषक उनके आश्रित हुए हैं — सारी तैयारी के साथ इकट्ठे हुए राजा। उनके बीच तपते सूर्य के समान, शोभा से घिरे, दमकते हुए चेदिराज थे —
श्लोक 26 (5.22.26)
अस्तम्भनीयं युधि मन्यमानं । ज्यां कर्षतां श्रेष्ठतमं पृथिव्याम् । सर्वोत्साहं क्षत्रियाणां निहत्य । प्रसह्य कृष्णस्तरसा संममर्द ॥
astambhanīyaṃ yudhi manyamānaṃ | jyāṃ karṣatāṃ śreṣṭhatamaṃ pṛthivyām | sarvotsāhaṃ kṣatriyāṇāṃ nihatya | prasahya kṛṣṇastarasā saṃmamarda
जिन्हें युद्ध में अजेय माना जाता था और जो पृथ्वी पर धनुष की डोरी खींचने वालों में सर्वश्रेष्ठ थे। फिर भी श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों के सारे उत्साह को कुचलकर बलपूर्वक उन्हें मसल डाला।
श्लोक 27 (5.22.27)
यशोमानौ वर्धयन्पाण्डवानां । पुराऽभिनच्छिशुपालं समीक्ष्य । यस्य सर्वे वर्धयन्ति स्म मानं । करूशराजप्रमुखा नरेन्द्राः ॥
yaśomānau vardhayanpāṇḍavānāṃ | purā'bhinacchiśupālaṃ samīkṣya | yasya sarve vardhayanti sma mānaṃ | karūśarājapramukhā narendrāḥ
पहले पाण्डवों का यश और मान बढ़ाते हुए उन्होंने सोच-विचारकर शिशुपाल को मार गिराया था — वही शिशुपाल, जिसका मान करूषराज आदि सभी राजा बढ़ाया करते थे।
श्लोक 28 (5.22.28)
तमसह्यं केशवं तत्र मत्वा । सुग्रीवयुक्तेन रथेन कृष्णम् । संप्राद्रवंश्चेदिपतिं विहाय । सिंहं दृष्ट्वा क्षुद्रमृगा इवान्ये ॥
tamasahyaṃ keśavaṃ tatra matvā | sugrīvayuktena rathena kṛṣṇam | saṃprādravaṃścedipatiṃ vihāya | siṃhaṃ dṛṣṭvā kṣudramṛgā ivānye
सुग्रीव नामक घोड़े से जुते रथ पर बैठे केशव श्रीकृष्ण को वहाँ असह्य जानकर दूसरे राजा चेदिराज को छोड़कर भाग गए, जैसे सिंह को देखकर छोटे मृग भाग जाते हैं।
श्लोक 29 (5.22.29)
यस्तं प्रतीपस्तरसा प्रत्युदीया- । दाशंसमानो द्वैरथे वासुदेवम् । सोऽशेत कृष्णेन हतः परासु- । र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ॥
yastaṃ pratīpastarasā pratyudīyā- | dāśaṃsamāno dvairathe vāsudevam | so'śeta kṛṣṇena hataḥ parāsu- | rvātenevonmathitaḥ karṇikāraḥ
और जो उनके विरुद्ध वेग से आगे बढ़ा, द्वन्द्वयुद्ध में वासुदेव को जीतने की आशा रखते हुए, वह श्रीकृष्ण के हाथों मारा जाकर निष्प्राण पड़ा रहा, जैसे आँधी से उखड़ा कर्णिकार का वृक्ष।
श्लोक 30 (5.22.30)
पराक्रमं मे यदवेदयन्त । तेषामर्थे सञ्जय केशवस्य । अनुस्मरंस्तस्य कर्माणि विष्णो- । र्गावल्गणे नाधिगच्छामि शान्तिम् ॥
parākramaṃ me yadavedayanta | teṣāmarthe sañjaya keśavasya | anusmaraṃstasya karmāṇi viṣṇo- | rgāvalgaṇe nādhigacchāmi śāntim
हे गावल्गणि संजय, उनके लिए केशव ने जो पराक्रम दिखाया और जिसकी सूचना मुझे दी गई, विष्णुरूप उन केशव के उन कर्मों को याद करके मुझे शान्ति नहीं मिलती।
श्लोक 31 (5.22.31)
न जातु ताञ्छत्रुरन्यः सहेत । येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः । प्रवेपते मे हृदयं भयेन । श्रुत्वा कृष्णावेकरथे समेतौ ॥
na jātu tāñchatruranyaḥ saheta | yeṣāṃ sa syādagraṇīrvṛṣṇisiṃhaḥ | pravepate me hṛdayaṃ bhayena | śrutvā kṛṣṇāvekarathe sametau
जिनके अगुवा वृष्णिसिंह श्रीकृष्ण हों, उनका सामना कोई दूसरा शत्रु कभी नहीं कर सकता। जब मैं सुनता हूँ कि दोनों कृष्ण — श्रीकृष्ण और अर्जुन — एक ही रथ पर साथ हैं, तो मेरा हृदय भय से काँप उठता है।
श्लोक 32 (5.22.32)
न चेद्गच्छेत्सङ्गरं मन्दबुद्धि- । स्ताभ्यां लभेच्छर्म तदा सुतो मे । नो चेत्कुरून्सञ्जय निर्दहेता- । मिन्द्राविष्णू दैत्यसेनां यथैव ॥
na cedgacchetsaṅgaraṃ mandabuddhi- | stābhyāṃ labheccharma tadā suto me | no cetkurūnsañjaya nirdahetā- | mindrāviṣṇū daityasenāṃ yathaiva
यदि मेरा मन्दबुद्धि पुत्र युद्ध में न जाए, तो उन दोनों से उसका कल्याण हो सकता है; नहीं तो, हे संजय, वे दोनों कौरवों को वैसे ही भस्म कर देंगे जैसे इन्द्र और विष्णु ने दैत्यों की सेना को किया था।
श्लोक 33 (5.22.33)
मते हि मे शक्रसमो धनञ्जयः । सनातनो वृष्णिवीरश्च विष्णुः । धर्मारामो ह्रीनिषेवस्तरस्वी । कुन्तीपुत्रः पाण्डवोऽजातशत्रुः ॥
mate hi me śakrasamo dhanañjayaḥ | sanātano vṛṣṇivīraśca viṣṇuḥ | dharmārāmo hrīniṣevastarasvī | kuntīputraḥ pāṇḍavo'jātaśatruḥ
क्योंकि मेरे मत में धनंजय इन्द्र के समान हैं और वृष्णिवीर श्रीकृष्ण सनातन विष्णु हैं। और कुन्तीपुत्र पाण्डव अजातशत्रु धर्म में रमने वाले, लज्जाशील और वेगवान् हैं;
श्लोक 34 (5.22.34)
दुर्योधनेन निकृतो मनस्वी । नो चेत्क्रुद्धः प्रदहेद्धार्तराष्ट्रान् । नाहं तथा ह्यर्जुनाद्वासुदेवा- । द्भीमाद्वाऽहं यमयोर्वा बिभेमि ॥
duryodhanena nikṛto manasvī | no cetkruddhaḥ pradaheddhārtarāṣṭrān | nāhaṃ tathā hyarjunādvāsudevā- | dbhīmādvā'haṃ yamayorvā bibhemi
दुर्योधन ने उन मनस्वी को छला है — यदि वे इतने सहनशील न होते, तो क्रोध में धृतराष्ट्र के पुत्रों को भस्म कर देते। मैं अर्जुन, वासुदेव, भीम या नकुल-सहदेव से उतना नहीं डरता,
श्लोक 35 (5.22.35)
यथा राज्ञः क्रोधदीप्तस्य सूत । मन्योरहं भीततरः सदैव । महातपा ब्रह्मचर्येण युक्तः । सङ्कल्पोऽयं मानसस्तस्य सिद्ध्येत् ॥
yathā rājñaḥ krodhadīptasya sūta | manyorahaṃ bhītataraḥ sadaiva | mahātapā brahmacaryeṇa yuktaḥ | saṅkalpo'yaṃ mānasastasya siddhyet
जितना, हे सूत, मैं क्रोध से जलते हुए राजा युधिष्ठिर के रोष से सदा भयभीत रहता हूँ। वे महान् तपस्वी और ब्रह्मचर्य से युक्त हैं; उनके मन का संकल्प अवश्य पूरा होगा।
श्लोक 36 (5.22.36)
तस्य क्रोधं सञ्जयाहं समीक्ष्य । स्थाने जानन्भृशमस्म्यद्य भीतः । स गच्छ शीघ्रं प्रहितो रथेन । पाञ्चालराजस्य चमूनिवेशनम् ॥
tasya krodhaṃ sañjayāhaṃ samīkṣya | sthāne jānanbhṛśamasmyadya bhītaḥ | sa gaccha śīghraṃ prahito rathena | pāñcālarājasya camūniveśanam
हे संजय, उनके क्रोध को देखकर और उसे उचित जानकर मैं आज अत्यन्त भयभीत हूँ। इसलिए मेरे भेजे हुए तुम रथ पर शीघ्र पांचालराज की सेना के पड़ाव में जाओ।
श्लोक 37 (5.22.37)
अजातशत्रुं कुशलं स्म पृच्छेः । पुनः पुनः प्रीतियुक्तं वदेस्त्वम् । जनार्दनं चापि समेत्य तात । महामात्रं वीर्यवतामुदारम् ॥
ajātaśatruṃ kuśalaṃ sma pṛccheḥ | punaḥ punaḥ prītiyuktaṃ vadestvam | janārdanaṃ cāpi sametya tāta | mahāmātraṃ vīryavatāmudāram
अजातशत्रु से उनका कुशल पूछना और बार-बार प्रेमपूर्वक बात करना। और हे तात, वीरों में श्रेष्ठ, उदार, महाभाग जनार्दन से मिलकर —
श्लोक 38 (5.22.38)
अनामयं मद्वचनेन पृच्छे- । र्धृतराष्ट्रः पाण्डवैः शान्तिमीप्सुः । न तस्य किंचिद्वचनं न कुर्यात् । कुन्तीपुत्रो वासुदेवस्य सूत ॥
anāmayaṃ madvacanena pṛcche- | rdhṛtarāṣṭraḥ pāṇḍavaiḥ śāntimīpsuḥ | na tasya kiṃcidvacanaṃ na kuryāt | kuntīputro vāsudevasya sūta
मेरी ओर से उनका कुशल पूछना और कहना कि धृतराष्ट्र पाण्डवों से शान्ति चाहते हैं। हे सूत, वासुदेव की कोई भी बात ऐसी नहीं जिसे कुन्तीपुत्र न मानें।
श्लोक 39 (5.22.39)
प्रियश्चैषामात्मसमश्च कृष्णो । विद्वांश्चैषां कर्मणि नित्ययुक्तः । समानीतान्पाण्डवान्सृञ्जयांश्च । जनार्दनं युयुधानं विराटम् ॥
priyaścaiṣāmātmasamaśca kṛṣṇo | vidvāṃścaiṣāṃ karmaṇi nityayuktaḥ | samānītānpāṇḍavānsṛñjayāṃśca | janārdanaṃ yuyudhānaṃ virāṭam
श्रीकृष्ण उन्हें प्रिय हैं, अपने ही समान हैं; वे विद्वान् हैं और सदा उनके कार्यों में लगे रहते हैं। वहाँ इकट्ठे हुए पाण्डवों और सृंजयों से, जनार्दन, युयुधान और विराट से —
श्लोक 40 (5.22.40)
अनामयं मद्वचनेन पृच्छेः । सर्वांस्तथा द्रौपदेयांश्च पञ्च । यद्यत्तत्र प्राप्तकालं परेभ्य- । स्त्वं मन्येथा भारतानां हितं च । तत्तद्भाषेथाः सञ्जय राजमध्ये । न मूर्च्छयेद्यन्न च युद्धहेतुः ॥
anāmayaṃ madvacanena pṛccheḥ | sarvāṃstathā draupadeyāṃśca pañca | yadyattatra prāptakālaṃ parebhya- | stvaṃ manyethā bhāratānāṃ hitaṃ ca | tattadbhāṣethāḥ sañjaya rājamadhye | na mūrcchayedyanna ca yuddhahetuḥ
सबसे, और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों से भी, मेरी ओर से कुशल पूछना। वहाँ तुम्हें जो-जो बात समयोचित और भरतवंशियों के हित की लगे, हे संजय, राजाओं के बीच वही-वही कहना — ऐसी बात जो क्रोध न भड़काए और युद्ध का कारण न बने।