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उद्योग पर्व · अध्याय 23

उपप्लव्य में संजय और युधिष्ठिर के प्रश्न

संजय उपप्लव्य पहुँचकर युधिष्ठिर का अभिवादन करते हैं और पाण्डवों तथा द्रौपदी के विषय में धृतराष्ट्र के कुशल-प्रश्न सुनाते हैं। युधिष्ठिर उनका स्वागत करके बदले में भीष्म, धृतराष्ट्र, बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, युयुत्सु, कर्ण और कुरुकुल की स्त्रियों का कुशल पूछते हैं, और यह भी कि ब्राह्मणों की जीविका और उन्हें दिए गए उनके दानों का आदर होता है या नहीं। वे पूछते हैं कि क्या कौरव अर्जुन, भीम, सहदेव और नकुल के पराक्रम तथा द्वैतवन में हुई रक्षा को याद करते हैं, और अन्त में कहते हैं कि यदि दुर्योधन को जीता न जा सके तो केवल एक सत्कर्म से सुख नहीं मिल सकता।

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.23.1)

राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रस्य सञ्जयः । उपप्लाव्यं ययौ द्रष्टुं पाण्डवानमितौजसः ॥

rājñastu vacanaṃ śrutvā dhṛtarāṣṭrasya sañjayaḥ | upaplāvyaṃ yayau draṣṭuṃ pāṇḍavānamitaujasaḥ

राजा धृतराष्ट्र की बात सुनकर संजय अपार तेज वाले पाण्डवों से मिलने उपप्लव्य गए।

श्लोक 2 (5.23.2)

स तु राजानमासाद्य कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । अभिवाद्य ततः पूर्वं सूतपुत्रोऽभ्यभाषत ॥

sa tu rājānamāsādya kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | abhivādya tataḥ pūrvaṃ sūtaputro'bhyabhāṣata

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर के पास पहुँचकर सूतपुत्र संजय ने पहले उनका अभिवादन किया और फिर बोले।

श्लोक 3 (5.23.3)

गावल्गणिः सञ्जयः सूतसूनु- । रजातशत्रुमवदत्प्रतीतः । दिष्ट्या राजंस्त्वामरोगं प्रपश्ये । सहायवन्तं च महेन्द्रकल्पम् ॥

gāvalgaṇiḥ sañjayaḥ sūtasūnu- | rajātaśatrumavadatpratītaḥ | diṣṭyā rājaṃstvāmarogaṃ prapaśye | sahāyavantaṃ ca mahendrakalpam

गवल्गण के पुत्र, सूतपुत्र संजय ने प्रसन्न होकर अजातशत्रु से कहा — "हे राजन्, सौभाग्य है कि मैं आपको नीरोग और महेन्द्र के समान सहायकों से घिरा देख रहा हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 4 (5.23.4)

अनामयं पृच्छति त्वाम्बिकेयो । वृद्धो राजा धृतराष्ट्रो मनीषी । कच्चिद्भीमः कुशली पाण्डवाग्र्यो । धनञ्जयस्तौ च माद्रीतनूजौ ॥

anāmayaṃ pṛcchati tvāmbikeyo | vṛddho rājā dhṛtarāṣṭro manīṣī | kaccidbhīmaḥ kuśalī pāṇḍavāgryo | dhanañjayastau ca mādrītanūjau

अम्बिका के पुत्र, वृद्ध और मनीषी राजा धृतराष्ट्र आपका कुशल पूछते हैं। क्या पाण्डवों में अग्रगण्य भीम कुशल से हैं? और धनंजय तथा दोनों माद्रीपुत्र?

श्लोक 5 (5.23.5)

कच्चित्कृष्णा द्रौपदी राजपुत्री । सत्यव्रता वीरपत्नी सुपुत्रा । मनस्विनी यत्र च वाञ्छसि त्व- । मिष्टान्कामान्भारत स्वस्तिकामः ॥

kaccitkṛṣṇā draupadī rājaputrī | satyavratā vīrapatnī suputrā | manasvinī yatra ca vāñchasi tva- | miṣṭānkāmānbhārata svastikāmaḥ

क्या राजकुमारी कृष्णा द्रौपदी कुशल से हैं — सत्यव्रता, वीरों की पत्नी, पुत्रवती और मनस्विनी — जिनमें, हे भारत, उनका कल्याण चाहते हुए आप अपनी सारी प्रिय कामनाएँ देखते हैं?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (5.23.6)

गावल्गणे सञ्जय स्वागतं ते । प्रीतात्माऽहं त्वाऽभिनन्दामि सूत । अनामयं प्रतिजाने तवाहं । सहानुजैः कुशली चास्मि विद्वन् ॥

gāvalgaṇe sañjaya svāgataṃ te | prītātmā'haṃ tvā'bhinandāmi sūta | anāmayaṃ pratijāne tavāhaṃ | sahānujaiḥ kuśalī cāsmi vidvan

हे गावल्गणि संजय, तुम्हारा स्वागत है! हे सूत, मैं प्रसन्न मन से तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ। हे विद्वन्, बदले में मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं अपने छोटे भाइयों सहित नीरोग और कुशल से हूँ।

श्लोक 7 (5.23.7)

चिरादिदं कुशलं भारतस्य । श्रुत्वा राज्ञः कुरुवृद्धस्य सूत । मन्ये साक्षाद्दृष्टमहं नरेन्द्रं । दृष्ट्वैव त्वां सञ्जय प्रीतियोगात् ॥

cirādidaṃ kuśalaṃ bhāratasya | śrutvā rājñaḥ kuruvṛddhasya sūta | manye sākṣāddṛṣṭamahaṃ narendraṃ | dṛṣṭvaiva tvāṃ sañjaya prītiyogāt

हे सूत, बहुत दिनों बाद कुरुवंश के वृद्ध, भरतवंशी राजा का यह कुशल-समाचार सुनकर और प्रेमवश तुम्हें देखकर, हे संजय, मुझे लगता है मानो मैंने स्वयं राजा को देख लिया।

श्लोक 8 (5.23.8)

पितामहो नः स्थविरो मनस्वी । महाप्राज्ञः सर्वधर्मोपपन्नः । सकौरव्यः कुशली तात भीष्मो । यथापूर्वं वृत्तिरस्त्यस्य कच्चित् ॥

pitāmaho naḥ sthaviro manasvī | mahāprājñaḥ sarvadharmopapannaḥ | sakauravyaḥ kuśalī tāta bhīṣmo | yathāpūrvaṃ vṛttirastyasya kaccit

हमारे वृद्ध, मनस्वी, महाज्ञानी और सब धर्मों से सम्पन्न पितामह कुरुवंशी भीष्म, हे तात, कुशल से तो हैं? क्या उनका आचरण पहले जैसा ही है?

श्लोक 9 (5.23.9)

कच्चिद्राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो । वैचित्रवीर्यः कुशली महात्मा । महाराजो बाह्लिकः प्रातिपेयः । कच्चिद्विद्वान्कुशली सूतपुत्र ॥

kaccidrājā dhṛtarāṣṭraḥ saputro | vaicitravīryaḥ kuśalī mahātmā | mahārājo bāhlikaḥ prātipeyaḥ | kaccidvidvānkuśalī sūtaputra

क्या विचित्रवीर्य के पुत्र, महात्मा राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रों सहित कुशल से हैं? हे सूतपुत्र, क्या प्रतीप के पुत्र, विद्वान् महाराज बाह्लीक कुशल से हैं?

श्लोक 10 (5.23.10)

स सोमदत्तः कुशली तात कच्चि- । द्भूरिश्रवाः सत्यसन्धः शलश्च । द्रोणः सपुत्रश्च कृपश्च विप्रो । महेष्वासाः कच्चिदेतेऽप्यरोगाः ॥

sa somadattaḥ kuśalī tāta kacci- | dbhūriśravāḥ satyasandhaḥ śalaśca | droṇaḥ saputraśca kṛpaśca vipro | maheṣvāsāḥ kaccidete'pyarogāḥ

हे तात, क्या सोमदत्त कुशल से हैं, और सत्यप्रतिज्ञ भूरिश्रवा तथा शल? पुत्र सहित द्रोण और ब्राह्मण कृप — क्या ये महान् धनुर्धर नीरोग हैं?

श्लोक 11 (5.23.11)

सर्वे कुरुभ्यः स्पृहयन्ति सञ्जय । धनुर्धरा ये पृथिव्यां प्रधानाः । महाप्रज्ञाः सर्वशास्त्रावदाता । धनुर्भृतां मुख्यतमाः पृथिव्याम् ॥

sarve kurubhyaḥ spṛhayanti sañjaya | dhanurdharā ye pṛthivyāṃ pradhānāḥ | mahāprajñāḥ sarvaśāstrāvadātā | dhanurbhṛtāṃ mukhyatamāḥ pṛthivyām

हे संजय, क्या पृथ्वी के सभी प्रमुख धनुर्धर अब भी कौरवों को आदर से देखते हैं — वे महाज्ञानी, सब शास्त्रों से निर्मल, पृथ्वी के धनुर्धारियों में सबसे मुख्य वीर?

श्लोक 12 (5.23.12)

कच्चिन्मानं तात लभन्त एते । धनुर्भृतः कच्चिदेतेऽप्यरोगाः । येषां राष्ट्रे निवसति दर्शनीयो । महेष्वासः शीलवान्द्रोणपुत्रः ॥

kaccinmānaṃ tāta labhanta ete | dhanurbhṛtaḥ kaccidete'pyarogāḥ | yeṣāṃ rāṣṭre nivasati darśanīyo | maheṣvāsaḥ śīlavāndroṇaputraḥ

हे तात, क्या उन्हें उचित सम्मान मिलता है? क्या वे धनुर्धर नीरोग हैं — जिनके राज्य में द्रोण के पुत्र, दर्शनीय, शीलवान् महाधनुर्धर अश्वत्थामा रहते हैं?

श्लोक 13 (5.23.13)

वैश्यापुत्रः कुशली तात कच्चित् । महाप्राज्ञो राजपुत्रो युयुत्सुः । कर्णो मानी कुशली तात कच्चित् । सुयोधनो यस्य मन्दो विधेयः ॥

vaiśyāputraḥ kuśalī tāta kaccit | mahāprājño rājaputro yuyutsuḥ | karṇo mānī kuśalī tāta kaccit | suyodhano yasya mando vidheyaḥ

हे तात, क्या वैश्या के पुत्र, बुद्धिमान् राजकुमार युयुत्सु कुशल से हैं? हे तात, क्या अभिमानी कर्ण कुशल से है — जिसकी बात मूर्ख सुयोधन मानता है?

श्लोक 14 (5.23.14)

स्त्रियो वृद्धा भारतानां जनन्यो । महादास्यो दासभार्याश्च सूत । वध्वः पुत्रा भागिनेया भगिन्यो । दौहित्रा वा कच्चिदप्यव्यलीकाः ॥

striyo vṛddhā bhāratānāṃ jananyo | mahādāsyo dāsabhāryāśca sūta | vadhvaḥ putrā bhāgineyā bhaginyo | dauhitrā vā kaccidapyavyalīkāḥ

हे सूत, भरतवंश की वृद्ध स्त्रियाँ, हमारी माताएँ, प्रमुख दासियाँ और सेवकों की पत्नियाँ, बहुएँ, पुत्र, भानजे, बहनें और नाती — क्या वे सब कुशल से और निष्कपट हैं?

श्लोक 15 (5.23.15)

कच्चिद्राजा ब्राह्मणानां यथावत् । प्रवर्तते पूर्ववत्तात वृत्तिम् । कच्चिद्दायान्मामकान्धार्तराष्ट्रो । द्विजातीनां सञ्जय नोपहन्ति ॥

kaccidrājā brāhmaṇānāṃ yathāvat | pravartate pūrvavattāta vṛttim | kacciddāyānmāmakāndhārtarāṣṭro | dvijātīnāṃ sañjaya nopahanti

हे तात, क्या राजा पहले की तरह ब्राह्मणों की जीविका की ठीक व्यवस्था करते हैं? हे संजय, क्या धृतराष्ट्र का पुत्र द्विजों को दिए मेरे दानों में बाधा तो नहीं डालता?

श्लोक 16 (5.23.16)

कच्चिद्राजा धृतराष्ट्रः सपुत्र । उपेक्षते ब्राह्मणातिक्रमान्वै । स्वर्गस्य कच्चिन्न तथा वर्त्मभूता- । मुपेक्षते तेषु सदैव वृत्तिम् ॥

kaccidrājā dhṛtarāṣṭraḥ saputra | upekṣate brāhmaṇātikramānvai | svargasya kaccinna tathā vartmabhūtā- | mupekṣate teṣu sadaiva vṛttim

क्या पुत्रों सहित राजा धृतराष्ट्र ब्राह्मणों पर होने वाले अत्याचारों की उपेक्षा करते हैं? आशा है कि वे स्वर्ग का मार्ग बनी उनकी जीविका की भी वैसी उपेक्षा नहीं करते।

श्लोक 17 (5.23.17)

एतज्ज्योतिश्चोत्तमं जीवलोके । शुक्लं प्रजानां विहितं विधात्रा । ते चेद्दोषं न नियच्छन्ति मन्दाः । कृत्स्नो नाशो भविता कौरवाणाम् ॥

etajjyotiścottamaṃ jīvaloke | śuklaṃ prajānāṃ vihitaṃ vidhātrā | te ceddoṣaṃ na niyacchanti mandāḥ | kṛtsno nāśo bhavitā kauravāṇām

यही जीवलोक में सर्वोत्तम ज्योति है, विधाता द्वारा प्रजाओं के लिए बनाया गया उज्ज्वल मार्ग। यदि वे मूर्ख इस दोष को नहीं रोकते, तो कौरवों का पूरा नाश हो जाएगा।

श्लोक 18 (5.23.18)

कच्चिद्राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो । बुभूषते वृत्तिममात्यवर्गे । कच्चिन्न भेदेन जिजीविषन्ति । सुहृद्रूपा दुर्हृदश्चैकमत्यात् ॥

kaccidrājā dhṛtarāṣṭraḥ saputro | bubhūṣate vṛttimamātyavarge | kaccinna bhedena jijīviṣanti | suhṛdrūpā durhṛdaścaikamatyāt

क्या पुत्रों सहित राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्रियों की जीविका का ध्यान रखते हैं? कहीं मित्र का रूप धरे शत्रु एकमत होकर फूट डालकर तो जीना नहीं चाहते?

श्लोक 19 (5.23.19)

कच्चिन्न पापं कथयन्ति तात । ते पाण्डवानां कुरवः सर्व एव । द्रोणः सपुत्रश्च कृपश्च वीरो । नास्मासु पापानि वदन्ति कच्चित् ॥

kaccinna pāpaṃ kathayanti tāta | te pāṇḍavānāṃ kuravaḥ sarva eva | droṇaḥ saputraśca kṛpaśca vīro | nāsmāsu pāpāni vadanti kaccit

हे तात, कहीं सब कौरव पाण्डवों की बुराई तो नहीं करते? कहीं पुत्र सहित द्रोण और वीर कृप हमारे विषय में बुरा तो नहीं कहते?

श्लोक 20 (5.23.20)

कच्चिद्राज्ये धृतराष्ट्रं सपुत्रं । समेत्याहुः कुरवः सर्व एव । कच्चिद्दृष्ट्वा दस्युसङ्घान्समेता- । न्स्मरन्ति पार्थस्य युधां प्रणेतुः ॥

kaccidrājye dhṛtarāṣṭraṃ saputraṃ | sametyāhuḥ kuravaḥ sarva eva | kacciddṛṣṭvā dasyusaṅghānsametā- | nsmaranti pārthasya yudhāṃ praṇetuḥ

क्या सब कौरव मिलकर राज्य के विषय में पुत्रों सहित धृतराष्ट्र से बात करते हैं? क्या लुटेरों के दल इकट्ठे देखकर वे युद्ध के नायक पार्थ को याद करते हैं?

श्लोक 21 (5.23.21)

मौर्वीभुजाग्रप्रहितान्स्म तात । दोधूयमानेन धनुर्धरेण । गाण्डीवनुन्नांस्तनयित्नुघोषा- । नजिह्मगान्कच्चिदनुस्मरन्ति ॥

maurvībhujāgraprahitānsma tāta | dodhūyamānena dhanurdhareṇa | gāṇḍīvanunnāṃstanayitnughoṣā- | najihmagānkaccidanusmaranti

हे तात, क्या वे उन सीधे जाने वाले बाणों को याद करते हैं, जिन्हें धनुष हिलाते हुए उस धनुर्धर ने प्रत्यंचा के छोर से छोड़ा था, और जो गाण्डीव से छूटकर मेघ की तरह गरजते थे?

श्लोक 22 (5.23.22)

न चापश्यं कंचिदहं पृथिव्यां । योधं समं वाऽधिकमर्जुनेन । यस्यैकषष्टिर्निशितास्तीक्ष्णधाराः । सुवाससः संमतो हस्तवापः ॥

na cāpaśyaṃ kaṃcidahaṃ pṛthivyāṃ | yodhaṃ samaṃ vā'dhikamarjunena | yasyaikaṣaṣṭirniśitāstīkṣṇadhārāḥ | suvāsasaḥ saṃmato hastavāpaḥ

मैंने पृथ्वी पर ऐसा कोई योद्धा नहीं देखा जो अर्जुन के बराबर या उनसे बढ़कर हो — जिनके एक ही बार हाथ चलाने से इकसठ तीखे, पैनी धार वाले, सुन्दर पंखों वाले बाण छूटते हैं, और जिस कौशल को सब सराहते हैं।

श्लोक 23 (5.23.23)

गदापाणिर्भीमसेनस्तरस्वी । प्रवेपयञ्छत्रुसङ्घाननीके । नागः प्रभिन्न इव नड्वलेषु । चंक्रम्यते कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥

gadāpāṇirbhīmasenastarasvī | pravepayañchatrusaṅghānanīke | nāgaḥ prabhinna iva naḍvaleṣu | caṃkramyate kaccidenaṃ smaranti

क्या वे वेगवान्, हाथ में गदा लिए भीमसेन को याद करते हैं, जो रणभूमि में शत्रु-दलों को कँपाते हुए सरकंडों के बीच मदमत्त हाथी की तरह घूमते हैं?

श्लोक 24 (5.23.24)

माद्रीपुत्रः सहदेवः कलिङ्गान् । समागतानजयद्दन्तकूरे । वामेनास्यन्दक्षिणेनैव यो वै । महाबलं कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥

mādrīputraḥ sahadevaḥ kaliṅgān | samāgatānajayaddantakūre | vāmenāsyandakṣiṇenaiva yo vai | mahābalaṃ kaccidenaṃ smaranti

क्या वे माद्रीपुत्र महाबली सहदेव को याद करते हैं, जिन्होंने बाएँ और दाएँ दोनों हाथों से बाण चलाते हुए दन्तकूर में इकट्ठे हुए कलिंगों को जीत लिया था?

श्लोक 25 (5.23.25)

पुरा जेतुं नकुलः प्रेषितोऽयं । शिबींस्त्रिगर्तान्सञ्जय पश्यतस्ते । दिशं प्रतीचीं वशमानयन्मे । माद्रीसुतं कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥

purā jetuṃ nakulaḥ preṣito'yaṃ | śibīṃstrigartānsañjaya paśyataste | diśaṃ pratīcīṃ vaśamānayanme | mādrīsutaṃ kaccidenaṃ smaranti

हे संजय, यह नकुल पहले विजय के लिए भेजे गए थे और तुम्हारे देखते-देखते उन्होंने शिबियों, त्रिगर्तों और पश्चिम दिशा को मेरे वश में कर दिया था। क्या वे माद्रीपुत्र को याद करते हैं?

श्लोक 26 (5.23.26)

पराभवो द्वैतवने य आसी- । द्दुर्मन्त्रिते घोषयात्रागतानाम् । यत्र मन्दाञ्छत्रुवशं प्रयाता- । नमोचयद्भीमसेनो जयश्च ॥

parābhavo dvaitavane ya āsī- | ddurmantrite ghoṣayātrāgatānām | yatra mandāñchatruvaśaṃ prayātā- | namocayadbhīmaseno jayaśca

द्वैतवन में उस कुमन्त्रणा से की गई घोषयात्रा पर आए लोगों की जो पराजय हुई थी, जब शत्रुओं के वश में पड़े उन मूर्खों को भीमसेन और जय (अर्जुन) ने छुड़ाया था —

श्लोक 27 (5.23.27)

अहं पश्चादर्जुनमभ्यरक्षं । माद्रीपुत्रौ भीमसेनोऽप्यरक्षत् । गाण्डीवधन्वा शत्रुसङ्घानुदस्य । स्वस्त्यागमत्कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥

ahaṃ paścādarjunamabhyarakṣaṃ | mādrīputrau bhīmaseno'pyarakṣat | gāṇḍīvadhanvā śatrusaṅghānudasya | svastyāgamatkaccidenaṃ smaranti

मैंने पीछे से अर्जुन की रक्षा की, भीमसेन ने दोनों माद्रीपुत्रों की रक्षा की, और गाण्डीवधारी शत्रु-दलों को तितर-बितर करके सकुशल लौट आए। क्या वे यह याद करते हैं?

श्लोक 28 (5.23.28)

न कर्मणा साधुनैकेन नूनं । सुखं शक्यं वै भवतीह सञ्जय । सर्वात्मना परिजेतुं वयं चे- । न्न शक्नुमो धृतराष्ट्रस्य पुत्रम् ॥

na karmaṇā sādhunaikena nūnaṃ | sukhaṃ śakyaṃ vai bhavatīha sañjaya | sarvātmanā parijetuṃ vayaṃ ce- | nna śaknumo dhṛtarāṣṭrasya putram

हे संजय, निश्चय ही केवल एक सत्कर्म से यहाँ सुख नहीं मिल सकता, यदि हम पूरे मन से प्रयत्न करके भी धृतराष्ट्र के पुत्र को जीत न सकें।

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