उद्योग पर्व · अध्याय 30
युधिष्ठिर का कौरवों को कुशल-संदेश
संजय युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण और पाण्डवों के सहयोगियों से विदा लेते हैं। युधिष्ठिर उन्हें सच्चा और विश्वसनीय दूत बताकर हस्तिनापुर के सब लोगों के लिए कुशल-संदेश देते हैं — ब्राह्मणों और आचार्यों, द्रोण, अश्वत्थामा, कृप, भीष्म और धृतराष्ट्र, दुर्योधन, उसके भाइयों और सहयोगियों, विदुर, अन्तःपुर की स्त्रियों, दास-दासियों, और उन दीन तथा अपंग लोगों के लिए जिनका राजदरबार भरण-पोषण करता है। अंत में वे दुर्योधन के लिए संदेश देते हैं: इन्द्रप्रस्थ लौटा दो, या युद्ध करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.30.1)
आमन्त्रये त्वां नरदेवदेव । गच्छाम्यहं पाण्डव स्वस्ति तेऽस्तु । कच्चिन्न वाचा वृजिनं हि किंचि- । दुच्चारितं मे मनसोऽभिषङ्गात् ॥
āmantraye tvāṃ naradevadeva | gacchāmyahaṃ pāṇḍava svasti te'stu | kaccinna vācā vṛjinaṃ hi kiṃci- | duccāritaṃ me manaso'bhiṣaṅgāt
"हे नरदेवों के देव, मैं आपसे विदा लेता हूँ। हे पाण्डुपुत्र, मैं जा रहा हूँ; आपका कल्याण हो। आशा है कि मन के आवेश में मेरे मुख से कोई अनुचित बात तो नहीं निकल गई।"
श्लोक 2 (5.30.2)
जनार्दनं भीमसेनार्जुनौ च । माद्रीसुतौ सात्यकिं चेकितानम् । आमन्त्र्य गच्छामि शिवं सुखं वः । सौम्येन मां पश्यत चक्षुषा नृपाः ॥
janārdanaṃ bhīmasenārjunau ca | mādrīsutau sātyakiṃ cekitānam | āmantrya gacchāmi śivaṃ sukhaṃ vaḥ | saumyena māṃ paśyata cakṣuṣā nṛpāḥ
"जनार्दन, भीमसेन और अर्जुन, माद्री के दोनों पुत्रों, सात्यकि और चेकितान से विदा लेकर मैं जाता हूँ। आप सबका मंगल और सुख हो। हे राजाओ, मुझे स्नेहभरी दृष्टि से देखिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (5.30.3)
अनुज्ञातः सञ्जय स्वस्ति गच्छ । न नः स्मरस्यप्रियं जातु विद्वन् । विद्मश्च त्वां ते च वयं च सर्वे । शुद्धात्मानं मध्यगतं सभास्थम् ॥
anujñātaḥ sañjaya svasti gaccha | na naḥ smarasyapriyaṃ jātu vidvan | vidmaśca tvāṃ te ca vayaṃ ca sarve | śuddhātmānaṃ madhyagataṃ sabhāstham
"संजय, तुम्हें अनुमति है; कुशलपूर्वक जाओ। हे विद्वान्, तुम हमारे प्रति कभी अप्रिय भाव नहीं रखते। वे और हम सब जानते हैं कि तुम शुद्ध हृदय वाले हो और सभा में निष्पक्ष रहते हो।"
श्लोक 4 (5.30.4)
आप्तो दूतः सञ्जय सुप्रियोऽसि । कल्याणवाक् शीलवांस्तृप्तिमांश्च । न मुह्येस्त्वं सञ्जय जातु मत्या । न च क्रुद्ध्येरुच्यमानोऽपि तत्त्वम् ॥
āpto dūtaḥ sañjaya supriyo'si | kalyāṇavāk śīlavāṃstṛptimāṃśca | na muhyestvaṃ sañjaya jātu matyā | na ca kruddhyerucyamāno'pi tattvam
"संजय, तुम विश्वसनीय दूत हो और हमें अत्यन्त प्रिय हो — मधुरभाषी, शीलवान और संतोषी। संजय, तुम्हारी बुद्धि कभी मोहित नहीं होती, और खरी बात सुनकर भी तुम क्रोध नहीं करते।"
श्लोक 5 (5.30.5)
न मर्मगां जातु वक्ताऽसि रूक्षां । नोपश्रुतिं कटुकां नोत शुष्काम् । धर्मारामामर्थवतीमहिंस्रा- । मेतां वाचं तव जानीम सूत ॥
na marmagāṃ jātu vaktā'si rūkṣāṃ | nopaśrutiṃ kaṭukāṃ nota śuṣkām | dharmārāmāmarthavatīmahiṃsrā- | metāṃ vācaṃ tava jānīma sūta
"तुम कभी मर्म को चोट पहुँचाने वाले कठोर वचन नहीं बोलते, न कड़वी बातें करते हो, न नीरस। हे सूत, हम जानते हैं कि तुम्हारी वाणी धर्म में रमने वाली, सार्थक और हिंसा से रहित है।"
श्लोक 6 (5.30.6)
त्वमेव नः प्रियतमोऽसि दूत । इहागच्छेद्विदुरो वा द्वितीयः । अभीक्ष्णदृष्टोऽसि पुरातनस्त्वं । धनञ्जयस्यात्मसमः सखाऽसि ॥
tvameva naḥ priyatamo'si dūta | ihāgacchedviduro vā dvitīyaḥ | abhīkṣṇadṛṣṭo'si purātanastvaṃ | dhanañjayasyātmasamaḥ sakhā'si
"दूत के रूप में तुम ही हमें सबसे प्रिय हो; दूसरे विदुर यहाँ आ सकते हैं। तुम्हें हम बहुत पहले से बार-बार देखते आए हैं, और तुम धनञ्जय के अपने ही समान सखा हो।"
श्लोक 7 (5.30.7)
इतो गत्वा सञ्जय क्षिप्रमेव । उपातिष्ठेथा ब्राह्मणान्ये तदर्हाः । विशुद्धवीर्याश्चरणोपपन्नाः । कुले जाताः सर्वधर्मोपपन्नाः ॥
ito gatvā sañjaya kṣiprameva | upātiṣṭhethā brāhmaṇānye tadarhāḥ | viśuddhavīryāścaraṇopapannāḥ | kule jātāḥ sarvadharmopapannāḥ
"संजय, यहाँ से जाकर शीघ्र ही उन ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित होना जो इसके योग्य हैं — जिनका तेज निर्मल है, जो सदाचारी हैं, उत्तम कुल में जन्मे हैं और सब धर्मों से युक्त हैं।"
श्लोक 8 (5.30.8)
स्वाध्यायिनो ब्राह्मणा भिक्षवश्च । तपस्विनो ये च नित्या वनेषु । अभिवाद्य तान्मद्वचनेन वृद्धां- । स्तथैव तान्कुशलं तात पृच्छेः ॥
svādhyāyino brāhmaṇā bhikṣavaśca | tapasvino ye ca nityā vaneṣu | abhivādya tānmadvacanena vṛddhāṃ- | stathaiva tānkuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"स्वाध्याय में लगे ब्राह्मण, भिक्षु और वे तपस्वी जो सदा वनों में रहते हैं — तात, उन वृद्धजनों को मेरी ओर से प्रणाम करके फिर उनका कुशल-क्षेम पूछना।"
श्लोक 9 (5.30.9)
पुरोहितं धृतराष्ट्रस्य राज्ञ- । स्तथाचार्यानृत्विजो ये च तस्य । तांश्चैव त्वं सहितान्वै यथावत् । सङ्गच्छेथाः कुशलेनैव सूत ॥
purohitaṃ dhṛtarāṣṭrasya rājña- | stathācāryānṛtvijo ye ca tasya | tāṃścaiva tvaṃ sahitānvai yathāvat | saṅgacchethāḥ kuśalenaiva sūta
"हे सूत, राजा धृतराष्ट्र के पुरोहित, उनके आचार्यों और उनके यज्ञ कराने वाले ऋत्विजों से यथोचित रूप से एक साथ मिलना और उनका कुशल-मंगल पूछना।"
श्लोक 10 (5.30.10)
अश्रोत्रिया ये च वसन्ति वृद्धा । मनस्विनः शीलबलोपपन्नाः । आशंसन्तोऽस्माकमनुस्मरन्तो । यथाशक्ति धर्ममात्रां चरन्तः ॥
aśrotriyā ye ca vasanti vṛddhā | manasvinaḥ śīlabalopapannāḥ | āśaṃsanto'smākamanusmaranto | yathāśakti dharmamātrāṃ carantaḥ
"जो वृद्धजन वेदपाठी न होते हुए भी वहाँ रहते हैं, जो मनस्वी तथा शील और बल से सम्पन्न हैं, जो हमारा भला चाहते और हमें स्मरण करते हैं, और अपनी शक्ति भर धर्म का पालन करते हैं —"
श्लोक 11 (5.30.11)
श्लाघस्व मां कुशलिनं स्म तेभ्यो । ह्यनामयं तात पृच्छेर्जघन्यम् । ये जीवन्ति व्यवहारेण राष्ट्रे । ये पालयन्तो निवसन्ति राष्ट्रे । कृषीवला बिभ्रति ये च लोकं । तेषां सर्वेषां कुशलं स्म पृच्छेः ॥
ślāghasva māṃ kuśalinaṃ sma tebhyo | hyanāmayaṃ tāta pṛccherjaghanyam | ye jīvanti vyavahāreṇa rāṣṭre | ye pālayanto nivasanti rāṣṭre | kṛṣīvalā bibhrati ye ca lokaṃ | teṣāṃ sarveṣāṃ kuśalaṃ sma pṛccheḥ
"— तात, उनसे मेरी कुशलता का सराहना के साथ समाचार देना, और उसके बाद उनका स्वास्थ्य पूछना। जो राष्ट्र में व्यापार से जीविका चलाते हैं, जो राष्ट्र की रक्षा करते हुए उसमें बसते हैं, और जो किसान संसार का भरण-पोषण करते हैं — उन सबका कुशल पूछना।"
श्लोक 12 (5.30.12)
आचार्य इष्टो नयगो विधेयो । वेदानभीप्सन्ब्रह्मचर्यं चचार । योऽस्त्रं चतुष्पात्पुनरेव चक्रे । द्रोणः प्रसन्नोऽभिवाद्यस्त्वयासौ ॥
ācārya iṣṭo nayago vidheyo | vedānabhīpsanbrahmacaryaṃ cacāra | yo'straṃ catuṣpātpunareva cakre | droṇaḥ prasanno'bhivādyastvayāsau
"जो प्रिय आचार्य नीति पर चलने वाले और कर्तव्यनिष्ठ हैं, जिन्होंने वेदों की कामना से ब्रह्मचर्य का पालन किया, और जिन्होंने अस्त्रविद्या को फिर से उसके चारों अंगों सहित पूर्ण किया — उन प्रसन्नचित्त द्रोण को तुम प्रणाम करना।"
श्लोक 13 (5.30.13)
अधीतविद्यश्चरणोपपन्नो । योऽस्त्रं चतुष्पात्पुनरेव चक्रे । गन्धर्वपुत्रप्रतिमं तरस्विनं । तमश्वत्थामानं कुशलं स्म पृच्छेः ॥
adhītavidyaścaraṇopapanno | yo'straṃ catuṣpātpunareva cakre | gandharvaputrapratimaṃ tarasvinaṃ | tamaśvatthāmānaṃ kuśalaṃ sma pṛccheḥ
"जो विद्या में पारंगत और सदाचारी हैं, जिन्होंने भी अस्त्रविद्या को फिर से उसके चारों अंगों सहित पूर्ण किया, जो वेगवान हैं और गन्धर्वपुत्र के समान सुन्दर हैं — उन अश्वत्थामा का कुशल पूछना।"
श्लोक 14 (5.30.14)
शारद्वतस्यावसथं स्म गत्वा । महारथस्यात्मविदां वरस्य । त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तयन्वै । कृपस्य पादौ सञ्जय पाणिना स्पृशेः ॥
śāradvatasyāvasathaṃ sma gatvā | mahārathasyātmavidāṃ varasya | tvaṃ māmabhīkṣṇaṃ parikīrtayanvai | kṛpasya pādau sañjaya pāṇinā spṛśeḥ
"संजय, शरद्वान के पुत्र, महारथी और आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कृप के निवास पर जाकर, बार-बार मेरा नाम लेते हुए अपने हाथ से उनके चरण छूना।"
श्लोक 15 (5.30.15)
यस्मिन्शौर्यमानृशंस्यं तपश्च । प्रज्ञा शीलं श्रुतरूपे धृतिश्च । पादौ गृहीत्वा कुरुसत्तमस्य । भीष्मस्य मां तत्र निवेदयेथाः ॥
yasminśauryamānṛśaṃsyaṃ tapaśca | prajñā śīlaṃ śrutarūpe dhṛtiśca | pādau gṛhītvā kurusattamasya | bhīṣmasya māṃ tatra nivedayethāḥ
"जिनमें शौर्य, दया और तप, प्रज्ञा, शील, विद्या, सौन्दर्य और धैर्य बसते हैं, उन कुरुश्रेष्ठ भीष्म के चरण पकड़कर वहाँ मेरी ओर से निवेदन करना।"
श्लोक 16 (5.30.16)
प्रज्ञाचक्षुर्यः प्रणेता कुरूणां । बहुश्रुतो वृद्धसेवी मनीषी । तस्मै राज्ञे स्थविरायाभिवाद्य । आचक्षीथाः सञ्जय मामरोगम् ॥
prajñācakṣuryaḥ praṇetā kurūṇāṃ | bahuśruto vṛddhasevī manīṣī | tasmai rājñe sthavirāyābhivādya | ācakṣīthāḥ sañjaya māmarogam
"जो प्रज्ञा को ही नेत्र मानने वाले हैं, कुरुओं के नायक हैं, बहुश्रुत, वृद्धों की सेवा करने वाले और मनीषी हैं — संजय, उन वृद्ध राजा को प्रणाम करके कहना कि मैं स्वस्थ हूँ।"
श्लोक 17 (5.30.17)
ज्येष्ठः पुत्रो धृतराष्ट्रस्य मन्दो । मूर्खः शठः सञ्जय पापशीलः । यस्यापवादः पृथिवीं याति सर्वां । सुयोधनं कुशलं तात पृच्छेः ॥
jyeṣṭhaḥ putro dhṛtarāṣṭrasya mando | mūrkhaḥ śaṭhaḥ sañjaya pāpaśīlaḥ | yasyāpavādaḥ pṛthivīṃ yāti sarvāṃ | suyodhanaṃ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"संजय, धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र मन्दबुद्धि, मूर्ख, शठ और पापी स्वभाव का है, और उसकी निन्दा सारी पृथ्वी पर फैली है — तात, उस सुयोधन का कुशल पूछना।"
श्लोक 18 (5.30.18)
भ्राता कनीयानपि तस्य मन्द- । स्तथाशीलः सञ्जय सोऽपि शश्वत् । महेष्वासः शूरतमः कुरूणां । दुःशासनः कुशलं तात वाच्यः ॥
bhrātā kanīyānapi tasya manda- | stathāśīlaḥ sañjaya so'pi śaśvat | maheṣvāsaḥ śūratamaḥ kurūṇāṃ | duḥśāsanaḥ kuśalaṃ tāta vācyaḥ
"संजय, उसका छोटा भाई भी मन्दबुद्धि है और सदा वैसे ही स्वभाव का है; वह महाधनुर्धर और कुरुओं में सबसे शूर है — तात, उस दुःशासन से भी कुशल पूछना।"
श्लोक 19 (5.30.19)
यस्य कामो वर्तते नित्यमेव । नान्यः शमाद्भारतानामिति स्म । स बाह्लिकानामृषभो मनीषी । पुनर्यथा माऽभिवदेत्प्रसन्नः ॥
yasya kāmo vartate nityameva | nānyaḥ śamādbhāratānāmiti sma | sa bāhlikānāmṛṣabho manīṣī | punaryathā mā'bhivadetprasannaḥ
"जिनकी सदा यही कामना रहती है कि भरतवंशियों में शान्ति के सिवा और कुछ न हो, उन बाह्लीकों में श्रेष्ठ मनीषी को ऐसे प्रणाम करना कि वे प्रसन्न होकर फिर मुझसे स्नेह से बोलें।"
श्लोक 20 (5.30.20)
भूरिश्रवास्तात निपातयोधी । महेष्वासो रथिनामुत्तमोऽग्र्यः । गत्वा स्म तं मद्वचनेन ब्रूयाः । शल्यं तथा मद्वचनात्प्रतीतः ॥
bhūriśravāstāta nipātayodhī | maheṣvāso rathināmuttamo'gryaḥ | gatvā sma taṃ madvacanena brūyāḥ | śalyaṃ tathā madvacanātpratītaḥ
"तात, शत्रुओं को मार गिराकर लड़ने वाले, महाधनुर्धर और रथियों में अग्रणी भूरिश्रवा के पास जाकर मेरी ओर से उनसे कहना; और उसी प्रकार प्रसन्न मन से मेरी ओर से शल्य से भी —"
श्लोक 21 (5.30.21)
महेष्वासो रथिनामुत्तमोऽग्र्यः । समः शलो रक्षिता पृष्ठमस्य । ह्रीनिषेधो देविता वै मताक्षः । सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयश्च । ये प्रस्थानं तत्र मे नाभ्यनन्दं- । स्तेषां सर्वेषां कुशलं तात पृच्छेः ॥
maheṣvāso rathināmuttamo'gryaḥ | samaḥ śalo rakṣitā pṛṣṭhamasya | hrīniṣedho devitā vai matākṣaḥ | satyavrataḥ purumitro jayaśca | ye prasthānaṃ tatra me nābhyanandaṃ- | steṣāṃ sarveṣāṃ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"— जो महाधनुर्धर और रथियों में श्रेष्ठ हैं; उनके समान शल, जो उनकी पीठ की रक्षा करते हैं; लज्जा को त्याग चुका पासों में निपुण वह जुआरी; सत्यव्रत, पुरुमित्र और जय; और वहाँ के वे सब लोग जो मेरे चले जाने से प्रसन्न नहीं थे — तात, उन सबका कुशल पूछना।"
श्लोक 22 (5.30.22)
गुणैरनेकैः प्रवरैश्च युक्तो । विज्ञानवान्नैव च निष्ठुरो यः । स्नेहादमर्षं सहते सदैव । स सोमदत्तः पूजनीयो मतो मे ॥
guṇairanekaiḥ pravaraiśca yukto | vijñānavānnaiva ca niṣṭhuro yaḥ | snehādamarṣaṃ sahate sadaiva | sa somadattaḥ pūjanīyo mato me
"जो अनेक श्रेष्ठ गुणों से युक्त, विवेकी और कभी कठोर न होने वाले हैं, जो स्नेहवश सदा अधीरता को भी सह लेते हैं — वे सोमदत्त मेरे मत में पूजनीय हैं।"
श्लोक 23 (5.30.23)
अर्हत्तमः कुरुषु सौमदत्तिः । स नो भ्राता संजय मत्सखा च । महेष्वासो रथिनामुत्तमोऽर्हः । सहामात्यः कुशलं तस्य पृच्छेः ॥
arhattamaḥ kuruṣu saumadattiḥ | sa no bhrātā saṃjaya matsakhā ca | maheṣvāso rathināmuttamo'rhaḥ | sahāmātyaḥ kuśalaṃ tasya pṛccheḥ
"सोमदत्त के पुत्र कुरुओं में सबसे अधिक आदरणीय हैं; संजय, वे हमारे भाई और मेरे मित्र हैं, महाधनुर्धर तथा रथियों में उत्तम और योग्य — उनका और उनके मंत्रियों का कुशल पूछना।"
श्लोक 24 (5.30.24)
ये चैवान्ये कुरुमुख्या युवानः । पुत्राः पौत्रा भ्रातरश्चैव ये नः । यंयमेषां मन्यसे येन योग्यं । तत्तत्प्रोच्यानामयं सूत वाच्याः ॥
ye caivānye kurumukhyā yuvānaḥ | putrāḥ pautrā bhrātaraścaiva ye naḥ | yaṃyameṣāṃ manyase yena yogyaṃ | tattatprocyānāmayaṃ sūta vācyāḥ
"और कुरुओं के जो अन्य प्रमुख युवक हैं, जो हमारे पुत्र, पौत्र और भाई हैं — हे सूत, उनमें से जिसे जिस वचन के योग्य समझो, उससे वही कहकर उनका कुशल पूछना।"
श्लोक 25 (5.30.25)
ये राजानः पाण्डवायोधनाय । समानीता धार्तराष्ट्रेण केचित् । वशातयः साल्वकाः केकयाश्च । तथाम्बष्ठा ये त्रिगर्ताश्च मुख्याः ॥
ye rājānaḥ pāṇḍavāyodhanāya | samānītā dhārtarāṣṭreṇa kecit | vaśātayaḥ sālvakāḥ kekayāśca | tathāmbaṣṭhā ye trigartāśca mukhyāḥ
"धृतराष्ट्र के पुत्र ने पाण्डवों से युद्ध के लिए जिन राजाओं को इकट्ठा किया है — वशाति, साल्वक और केकय, अम्बष्ठ और प्रमुख त्रिगर्त —"
श्लोक 26 (5.30.26)
प्राच्योदीच्या दाक्षिण्यात्याश्च शूरा- । स्तथा प्रतीच्याः पार्वतीयाश्च सर्वे । अनृशंसाः शीलवृत्तोपपन्ना- । स्तेषां सर्वेषां कुशलं सूत पृच्छेः ॥
prācyodīcyā dākṣiṇyātyāśca śūrā- | stathā pratīcyāḥ pārvatīyāśca sarve | anṛśaṃsāḥ śīlavṛttopapannā- | steṣāṃ sarveṣāṃ kuśalaṃ sūta pṛccheḥ
"पूर्व, उत्तर और दक्षिण के शूरवीर, तथा पश्चिम के और सभी पर्वतीय लोग — जो क्रूर नहीं हैं और शील तथा सदाचार से युक्त हैं — हे सूत, उन सबका कुशल पूछना।"
श्लोक 27 (5.30.27)
हस्त्यारोहा रथिनः सादिनश्च । पदातयश्चार्यसङ्घा महान्तः । आख्याय मां कुशलिनं स्म नित्य- । मनामयं परिपृच्छेः समग्रान् ॥
hastyārohā rathinaḥ sādinaśca | padātayaścāryasaṅghā mahāntaḥ | ākhyāya māṃ kuśalinaṃ sma nitya- | manāmayaṃ paripṛccheḥ samagrān
"हाथियों पर सवार योद्धा, रथी और घुड़सवार, तथा श्रेष्ठ पैदल योद्धाओं के बड़े-बड़े दल — उन्हें बताना कि मैं सदा कुशल से हूँ, और उन सबका स्वास्थ्य पूछना।"
श्लोक 28 (5.30.28)
तथा राज्ञो ह्यर्थयुक्तानमात्यान् । दौवारिकान्ये च सेनां नयन्ति । आयव्ययं ये गमयन्ति नित्य- । मर्थांश्च ये महतश्चिन्तयन्ति ॥
tathā rājño hyarthayuktānamātyān | dauvārikānye ca senāṃ nayanti | āyavyayaṃ ye gamayanti nitya- | marthāṃśca ye mahataścintayanti
"इसी प्रकार राजा के कार्य सँभालने वाले मंत्री, द्वारपाल, सेना का संचालन करने वाले, जो प्रतिदिन आय-व्यय का हिसाब रखते हैं, और जो राज्य के बड़े-बड़े विषयों पर विचार करते हैं —"
श्लोक 29 (5.30.29)
वृन्दारकं कुरुमध्येष्वमूढं । महाप्रज्ञं सर्वधर्मोपपन्नम् । न तस्य युद्धं रोचते वै कदाचि- । द्वैश्यापुत्रं कुशलं तात पृच्छेः ॥
vṛndārakaṃ kurumadhyeṣvamūḍhaṃ | mahāprajñaṃ sarvadharmopapannam | na tasya yuddhaṃ rocate vai kadāci- | dvaiśyāputraṃ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"जो श्रेष्ठ हैं, कुरुओं के बीच कभी मोहित नहीं होते, महाप्रज्ञ और सब धर्मों से युक्त हैं, जिन्हें युद्ध कभी अच्छा नहीं लगता — तात, उन वैश्या-पुत्र का कुशल पूछना।"
श्लोक 30 (5.30.30)
निकर्तने देवने योऽद्वितीय- । श्छन्नोपधः साधुदेवी मताक्षः । यो दुर्जयो देवरथेन सङ्ख्ये । स चित्रसेनः कुशलं तात वाच्यः ॥
nikartane devane yo'dvitīya- | śchannopadhaḥ sādhudevī matākṣaḥ | yo durjayo devarathena saṅkhye | sa citrasenaḥ kuśalaṃ tāta vācyaḥ
"जो जुए में छल करने में अद्वितीय है, अपनी चालें छिपाकर रखता है, कुशल खिलाड़ी है और पासे जिसके मन के अनुसार पड़ते हैं, और जो युद्ध में अपने दिव्य रथ पर दुर्जय है — तात, उस चित्रसेन से कुशल पूछना।"
श्लोक 31 (5.30.31)
गान्धारराजः शकुनिः पार्वतीयो । निकर्तने योऽद्वितीयोऽक्षदेवी । मानं कुर्वन्धार्तराष्ट्रस्य सूत । मिथ्याबुद्धेः कुशलं तात पृच्छेः ॥
gāndhārarājaḥ śakuniḥ pārvatīyo | nikartane yo'dvitīyo'kṣadevī | mānaṃ kurvandhārtarāṣṭrasya sūta | mithyābuddheḥ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"हे सूत, गान्धारराज पर्वतीय शकुनि, जो छल में अद्वितीय है और पासों का जुआरी है, और जो धृतराष्ट्र के पुत्र का अभिमान बढ़ाता है — तात, उस कुटिल बुद्धि वाले का कुशल पूछना।"
श्लोक 32 (5.30.32)
यः पाण्डवानेकरथेन वीरः । समुत्सहत्यप्रधृष्यान्विजेतुम् । यो मुह्यतां मोहयिताऽद्वितीयो । वैकर्तनः कुशलं तस्य पृच्छेः ॥
yaḥ pāṇḍavānekarathena vīraḥ | samutsahatyapradhṛṣyānvijetum | yo muhyatāṃ mohayitā'dvitīyo | vaikartanaḥ kuśalaṃ tasya pṛccheḥ
"जो वीर अकेले रथ से अजेय पाण्डवों को जीतने का उत्साह रखता है, और जो मोहग्रस्त लोगों को और भी मोहित करने में अद्वितीय है — उस वैकर्तन कर्ण का कुशल पूछना।"
श्लोक 33 (5.30.33)
स एव भक्तः स गुरुः स भर्ता । स वै पिता स च माता सुहृच्च । अगाधबुद्धिर्विदुरो दीर्घदर्शी । स नो मन्त्री कुशलं तं स्म पृच्छेः ॥
sa eva bhaktaḥ sa guruḥ sa bhartā | sa vai pitā sa ca mātā suhṛcca | agādhabuddhirviduro dīrghadarśī | sa no mantrī kuśalaṃ taṃ sma pṛccheḥ
"वही हमारे भक्त, वही गुरु, वही पालनकर्ता, वही पिता, वही माता और वही सुहृद् हैं; अथाह बुद्धि वाले, दूरदर्शी विदुर हमारे मंत्री हैं — उनका कुशल पूछना।"
श्लोक 34 (5.30.34)
वृद्धाः स्त्रियो याश्च गुणोपपन्ना । ज्ञायन्ते नः सञ्जय मातरस्ताः । ताभिः सर्वाभिः सहिताभिः समेत्य । स्त्रीभिः सवृद्धाभिरभिवादं वदेथाः ॥
vṛddhāḥ striyo yāśca guṇopapannā | jñāyante naḥ sañjaya mātarastāḥ | tābhiḥ sarvābhiḥ sahitābhiḥ sametya | strībhiḥ savṛddhābhirabhivādaṃ vadethāḥ
"संजय, जो वृद्ध स्त्रियाँ गुणों से सम्पन्न हैं और जिन्हें हम अपनी माताओं के रूप में जानते हैं, उन सबसे एक साथ मिलकर, उन स्त्रियों और वृद्धाओं से मेरा प्रणाम कहना।"
श्लोक 35 (5.30.35)
कच्चित्पुत्रा जीवपुत्राः सुसम्य- । ग्वर्तन्ते वो वृत्तिमनृशंसरूपाः । इति स्मोक्त्वा सञ्जय ब्रूहि पश्चा- । दजातशत्रुः कुशली सपुत्रः ॥
kaccitputrā jīvaputrāḥ susamya- | gvartante vo vṛttimanṛśaṃsarūpāḥ | iti smoktvā sañjaya brūhi paścā- | dajātaśatruḥ kuśalī saputraḥ
"'हे जीवित पुत्रों वाली माताओ, क्या तुम्हारे पुत्र तुम्हारे साथ भली-भाँति और कोमलता से व्यवहार करते हैं?' संजय, यह कहने के बाद उनसे कहना: 'अजातशत्रु अपने पुत्रों सहित कुशल से हैं।'"
श्लोक 36 (5.30.36)
राज्ञो भार्याः सञ्जय वेत्थ तत्र । तासां सर्वासां कुशलं तात पृच्छेः । सुसंगुप्ताः सुरभयोऽनवद्याः । कच्चिद्गृहानावसथाप्रमत्ताः ॥
rājño bhāryāḥ sañjaya vettha tatra | tāsāṃ sarvāsāṃ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ | susaṃguptāḥ surabhayo'navadyāḥ | kaccidgṛhānāvasathāpramattāḥ
"संजय, वहाँ राजा की जिन पत्नियों को तुम जानते हो, तात, उन सबका कुशल पूछना: 'क्या तुम भली-भाँति सुरक्षित, सुगन्धित और निर्दोष हो? क्या तुम अपने घरों में सावधानी से रहती हो?'"
श्लोक 37 (5.30.37)
कच्चिद्वृत्तिं श्वशुरेषु भद्राः । कल्याणीं वर्तध्वमनृशंसरूपाम् । यथा च वः स्युः पतयोऽनुकूला- । स्तथा वृत्तिमात्मनः स्थापयध्वम् ॥
kaccidvṛttiṃ śvaśureṣu bhadrāḥ | kalyāṇīṃ vartadhvamanṛśaṃsarūpām | yathā ca vaḥ syuḥ patayo'nukūlā- | stathā vṛttimātmanaḥ sthāpayadhvam
"'हे भद्र स्त्रियो, क्या तुम अपने ससुरालवालों के साथ कल्याणकारी और कोमल व्यवहार करती हो? अपना आचरण ऐसा रखो कि तुम्हारे पति तुम्हारे अनुकूल रहें।'"
श्लोक 38 (5.30.38)
या नः स्नुषाः सञ्जय वेत्थ तत्र । प्राप्ताः कुलेभ्यश्च गुणोपपन्नाः । प्रजावत्यो ब्रूहि समेत्य ताश्च । युधिष्ठिरो वोऽभ्यवदत्प्रसन्नः ॥
yā naḥ snuṣāḥ sañjaya vettha tatra | prāptāḥ kulebhyaśca guṇopapannāḥ | prajāvatyo brūhi sametya tāśca | yudhiṣṭhiro vo'bhyavadatprasannaḥ
"संजय, वहाँ हमारी जिन पुत्रवधुओं को तुम जानते हो, जो उत्तम कुलों से आई हैं, गुणवती और संतानवती हैं — उनसे भी मिलकर कहना: 'युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर तुम्हें स्नेहपूर्वक संदेश भेजा है।'"
श्लोक 39 (5.30.39)
कन्याः स्वजेथाः सदनेषु सञ्जय । अनामयं मद्वचनेन पृष्ट्वा । कल्याणा वः सन्तु पतयोऽनुकूला । यूयं पतीनां भवतानुकूलाः ॥
kanyāḥ svajethāḥ sadaneṣu sañjaya | anāmayaṃ madvacanena pṛṣṭvā | kalyāṇā vaḥ santu patayo'nukūlā | yūyaṃ patīnāṃ bhavatānukūlāḥ
"संजय, घरों में कन्याओं को गले लगाना और मेरी ओर से उनका कुशल पूछकर कहना: 'तुम्हें भले और अनुकूल पति मिलें, और तुम भी अपने पतियों के अनुकूल रहो।'"
श्लोक 40 (5.30.40)
अलङ्कृता वस्त्रवत्यः सुगन्धा । अबीभत्साः सुखिता भोगवत्यः । लघु यासां दर्शनं वाक्च लघ्वी । वेशस्त्रियः कुशलं तात पृच्छेः ॥
alaṅkṛtā vastravatyaḥ sugandhā | abībhatsāḥ sukhitā bhogavatyaḥ | laghu yāsāṃ darśanaṃ vākca laghvī | veśastriyaḥ kuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"जो वेश्याएँ अलंकृत, सुन्दर वस्त्रों वाली, सुगन्धित, मनोहर, सुखी और भोगसम्पन्न हैं, जिनकी चितवन और वाणी सहज और हल्की है — तात, उनका भी कुशल पूछना।"
श्लोक 41 (5.30.41)
दास्यः स्युर्या ये च दासाः कुरूणां । तदाश्रया बहवः कुब्जखञ्जाः । आख्याय मां कुशलिनं स्म तेभ्यो- । ऽप्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम् ॥
dāsyaḥ syuryā ye ca dāsāḥ kurūṇāṃ | tadāśrayā bahavaḥ kubjakhañjāḥ | ākhyāya māṃ kuśalinaṃ sma tebhyo- | 'pyanāmayaṃ paripṛccherjaghanyam
"कुरुओं की दासियाँ और दास, और उनके आश्रय में रहने वाले बहुत-से कुबड़े और लँगड़े — उन्हें बताना कि मैं कुशल से हूँ, और उसके बाद उनका स्वास्थ्य पूछना।"
श्लोक 42 (5.30.42)
कच्चिद्वृत्तिं वर्तते वै पुराणीं । कच्चिद्भोगान्धार्तराष्ट्रो ददाति । अङ्गहीनान्कृपणान्वामनान्वा । यानानृशंस्याद्धार्तराष्ट्रो बिभर्ति ॥
kaccidvṛttiṃ vartate vai purāṇīṃ | kaccidbhogāndhārtarāṣṭro dadāti | aṅgahīnānkṛpaṇānvāmanānvā | yānānṛśaṃsyāddhārtarāṣṭro bibharti
"पूछना कि जिन अंगहीनों, दीनों और बौनों का धृतराष्ट्र का पुत्र दया करके भरण-पोषण करता है, क्या उनकी पुरानी जीविका अब भी चल रही है, और क्या वह उन्हें जीवन की आवश्यक वस्तुएँ देता है।"
श्लोक 43 (5.30.43)
अन्धाश्च सर्वे बधिरास्तथैव । हस्ताजीवा बहवो येऽत्र सन्ति । आख्याय मां कुशलिनं स्म तेभ्यो- । ऽप्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम् ॥
andhāśca sarve badhirāstathaiva | hastājīvā bahavo ye'tra santi | ākhyāya māṃ kuśalinaṃ sma tebhyo- | 'pyanāmayaṃ paripṛccherjaghanyam
"सभी अंधे और उसी प्रकार बहरे, और यहाँ जो बहुत-से लोग हाथ के काम से जीविका चलाते हैं — उन्हें बताना कि मैं कुशल से हूँ, और उसके बाद उनका स्वास्थ्य पूछना।"
श्लोक 44 (5.30.44)
मा भैष्ट दुःखेन कुजीवितेन । नूनं कृतं परलोकेषु पापम् । निगृह्य शत्रून्सुहृदोऽनुगृह्य । वासोभिरन्नेन च वो भरिष्ये ॥
mā bhaiṣṭa duḥkhena kujīvitena | nūnaṃ kṛtaṃ paralokeṣu pāpam | nigṛhya śatrūnsuhṛdo'nugṛhya | vāsobhirannena ca vo bhariṣye
"'अपने दुःख और कष्टभरे जीवन से भयभीत मत हो; निश्चय ही यह पहले के लोकों में किए गए पाप का फल है। शत्रुओं का दमन करके और मित्रों पर अनुग्रह करके मैं वस्त्र और अन्न से तुम्हारा पालन करूँगा।'"
श्लोक 45 (5.30.45)
न चाप्येतच्छक्यमेकेन वक्तुं । नानादेश्या बहवो जातिसंघाः । विप्रोषितो बालवद्द्रष्टुमिच्छन् । नमस्येऽहं संजय भैमसेनान् । ते मे यथा वाचमिमां यथोक्तां । त्वयोच्यमानां शृणुयुस्तथा कुरु ॥
na cāpyetacchakyamekena vaktuṃ | nānādeśyā bahavo jātisaṃghāḥ | viproṣito bālavaddraṣṭumicchan | namasye'haṃ saṃjaya bhaimasenān | te me yathā vācamimāṃ yathoktāṃ | tvayocyamānāṃ śṛṇuyustathā kuru
"एक व्यक्ति के लिए उन सबके नाम ले पाना सम्भव नहीं — अनेक देशों के बहुत-से लोग और अनेक जातियों के समूह। बहुत समय से उनसे दूर रहकर, बालक की भाँति उन्हें देखने को उत्सुक मैं, संजय, भीमसेन के वंशजों को नमस्कार करता हूँ। ऐसा करना कि वे मेरा यह संदेश, जैसा मैंने कहा है ठीक वैसा ही, तुम्हारे मुख से सुनें।"
श्लोक 46 (5.30.46)
सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्यः कृतानि । भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान्पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव । तामेव सिद्धिं श्रावयेथा नृपं तम् ॥
santyeva me brāhmaṇebhyaḥ kṛtāni | bhāvīnyatho no bata vartayanti | tānpaśyāmi yuktarūpāṃstathaiva | tāmeva siddhiṃ śrāvayethā nṛpaṃ tam
"मैंने ब्राह्मणों को जो दान दिए हैं, वे आगे भी चलने के लिए थे, पर खेद है कि अब उन्हें चालू नहीं रखा जा रहा। मैं उन्हें अब भी उचित रूप से दिया हुआ मानता हूँ; उस राजा को यही व्यवस्था सुना देना।"
श्लोक 47 (5.30.47)
ये चानाथा दुर्बलाः सर्वकाल- । मात्मन्येव प्रयतन्तेऽथ मूढाः । तांश्चापि त्वं कृपणान्सर्वथैव । ह्यस्मद्वाक्यात्कुशलं तात पृच्छेः ॥
ye cānāthā durbalāḥ sarvakāla- | mātmanyeva prayatante'tha mūḍhāḥ | tāṃścāpi tvaṃ kṛpaṇānsarvathaiva | hyasmadvākyātkuśalaṃ tāta pṛccheḥ
"जो सदा अनाथ और दुर्बल हैं, जो केवल अपने भीतर ही प्रयत्न करते रह जाते हैं और मोहग्रस्त हैं — तात, उन दीनों का भी मेरी ओर से हर प्रकार से कुशल पूछना।"
श्लोक 48 (5.30.48)
ये चाप्यन्ये संश्रिता धार्तराष्ट्रा- । न्नानादिग्भ्योऽभ्यागताः सूतपुत्र । दृष्ट्वा तांश्चैवार्हतश्चापि सर्वा- । न्संपृच्छेथाः कुशलं चाव्ययं च ॥
ye cāpyanye saṃśritā dhārtarāṣṭrā- | nnānādigbhyo'bhyāgatāḥ sūtaputra | dṛṣṭvā tāṃścaivārhataścāpi sarvā- | nsaṃpṛcchethāḥ kuśalaṃ cāvyayaṃ ca
"हे सूतपुत्र, और जो दूसरे लोग अनेक दिशाओं से आकर धृतराष्ट्र के पुत्रों के आश्रय में रहते हैं — उन्हें और सभी सम्माननीय जनों को देखकर उनका कुशल और क्षेम पूछना।"
श्लोक 49 (5.30.49)
एवं सर्वानागताभ्यागतांश्च । राज्ञो दूतान्सर्वदिग्भ्योऽभ्युपेतान् । पृष्ट्वा सर्वान्कुशलं तांश्च सूत । पश्चादहं कुशली तेषु वाच्यः ॥
evaṃ sarvānāgatābhyāgatāṃśca | rājño dūtānsarvadigbhyo'bhyupetān | pṛṣṭvā sarvānkuśalaṃ tāṃśca sūta | paścādahaṃ kuśalī teṣu vācyaḥ
"हे सूत, इस प्रकार जो आए हैं और पधारे हैं, और जो राजाओं के दूत सब दिशाओं से आए हैं, उन सबका कुशल पूछकर, बाद में उन्हें बताना कि मैं कुशल से हूँ।"
श्लोक 50 (5.30.50)
न हीदृशाः सन्त्यपरे पृथिव्यां । ये योधका धार्तराष्ट्रेण लब्धाः । धर्मस्तु नित्यो मम धर्म एव । महाबलः शत्रुनिबर्हणाय ॥
na hīdṛśāḥ santyapare pṛthivyāṃ | ye yodhakā dhārtarāṣṭreṇa labdhāḥ | dharmastu nityo mama dharma eva | mahābalaḥ śatrunibarhaṇāya
"धृतराष्ट्र के पुत्र ने जो योद्धा पाए हैं, उनके जैसे पृथ्वी पर दूसरे नहीं हैं। परन्तु धर्म सनातन है, और शत्रुओं के विनाश के लिए धर्म ही मेरा महान बल है।"
श्लोक 51 (5.30.51)
इदं पुनर्वचनं धार्तराष्ट्रं । सुयोधनं सञ्जय श्रावयेथाः । यस्ते शरीरे हृदयं दुनोति । कामः कुरूनसपत्नोऽनुशिष्याम् ॥
idaṃ punarvacanaṃ dhārtarāṣṭraṃ | suyodhanaṃ sañjaya śrāvayethāḥ | yaste śarīre hṛdayaṃ dunoti | kāmaḥ kurūnasapatno'nuśiṣyām
"संजय, धृतराष्ट्र के पुत्र सुयोधन को यह बात भी सुनाना: 'तुम्हारे शरीर के भीतर हृदय को जो कामना जलाती है — कि तुम बिना किसी प्रतिद्वन्द्वी के कुरुओं पर शासन करो —"
श्लोक 52 (5.30.52)
न विद्यते युक्तिरेतस्य काचि- । न्नैवं विधास्यामि यथा प्रियं ते । ददस्व वा शक्रपुरीं ममैव । युध्यस्व वा भारतमुख्यवीर ॥
na vidyate yuktiretasya kāci- | nnaivaṃ vidhāsyāmi yathā priyaṃ te | dadasva vā śakrapurīṃ mamaiva | yudhyasva vā bhāratamukhyavīra
"उसकी पूर्ति का कोई उपाय नहीं है। मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार यह नहीं होने दूँगा। या तो मुझे इन्द्र की नगरी लौटा दो, या फिर हे भरतवंश के प्रमुख वीर, युद्ध करो।'"