उद्योग पर्व · अध्याय 29
संजय को श्रीकृष्ण का उत्तर
श्रीकृष्ण संजय से कहते हैं कि वे शान्ति और दोनों पक्षों का हित चाहते हैं, पर युधिष्ठिर पर धर्म छोड़ने का आरोप लगाने के लिए संजय को फटकारते हैं। कर्म ही, न कि उसका त्याग, देवताओं और संसार को धारण करता है; वे चारों वर्णों के धर्म बताते हैं और कहते हैं कि क्षत्रिय अपना भाग वापस पाने के लिए उचित रूप से युद्ध कर सकता है। द्रौपदी को सभा में घसीटे जाने और कर्ण, दुःशासन तथा शकुनि द्वारा उसके अपमान पर कुरुओं के मौन का स्मरण कराते हुए वे स्वयं शान्ति के लिए कुरुओं के पास जाने का प्रस्ताव रखते हैं, और अन्त में दो वृक्षों तथा एक-दूसरे पर निर्भर वन और बाघों की उपमा देते हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (5.29.1)
अविनाशं सञ्जय पाण्डवाना- । मिच्छाम्यहं भूतिमेषां प्रियं च । तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत । समाशंसे बहुपुत्रस्य वृद्धिम् ॥
avināśaṃ sañjaya pāṇḍavānā- | micchāmyahaṃ bhūtimeṣāṃ priyaṃ ca | tathā rājño dhṛtarāṣṭrasya sūta | samāśaṃse bahuputrasya vṛddhim
हे संजय, मैं चाहता हूँ कि पाण्डवों का विनाश न हो; मैं उनकी समृद्धि और उनका प्रिय चाहता हूँ। और हे सूत, उसी प्रकार मैं बहुत पुत्रों वाले राजा धृतराष्ट्र की उन्नति की भी कामना करता हूँ।
श्लोक 2 (5.29.2)
कामो हि मे सञ्जय नित्यमेव । नान्यद्ब्रूयां तान्प्रति शाम्यतेति । राज्ञश्च हि प्रियमेतच्छृणोमि । मन्ये चैतत्पाण्डवानां समक्षम् ॥
kāmo hi me sañjaya nityameva | nānyadbrūyāṃ tānprati śāmyateti | rājñaśca hi priyametacchṛṇomi | manye caitatpāṇḍavānāṃ samakṣam
हे संजय, मेरी सदा यही कामना है; मैं उनसे 'शान्ति करो' के अतिरिक्त कुछ नहीं कहूँगा। पाण्डवों के सामने राजा युधिष्ठिर से भी मैं यही सुनता हूँ कि उन्हें यह प्रिय है, और मैं भी इसे उचित मानता हूँ।
श्लोक 3 (5.29.3)
सुदुष्करस्तत्र शमो हि नूनं । प्रदर्शितः सञ्जय पाण्डवेन । यस्मिन्गृद्धो धृतराष्ट्रः सपुत्रः । कस्मादेषां कलहो नावमूर्च्छेत् ॥
suduṣkarastatra śamo hi nūnaṃ | pradarśitaḥ sañjaya pāṇḍavena | yasmingṛddho dhṛtarāṣṭraḥ saputraḥ | kasmādeṣāṃ kalaho nāvamūrcchet
हे संजय, पाण्डुपुत्र ने यहाँ जिस शान्ति का प्रस्ताव रखा है, वह निश्चय ही अत्यन्त कठिन है। जब पुत्रों सहित धृतराष्ट्र उस राज्य के लोभी हैं, तो उनके बीच कलह क्यों न भड़के?
श्लोक 4 (5.29.4)
न त्वं धर्मं विचरं सञ्जयेह । मत्तश्च जानामि युधिष्ठिराच्च । अथो कस्मात्सञ्जय पाण्डवस्य । उत्साहिनः पूरयतः स्वकर्म ॥
na tvaṃ dharmaṃ vicaraṃ sañjayeha | mattaśca jānāmi yudhiṣṭhirācca | atho kasmātsañjaya pāṇḍavasya | utsāhinaḥ pūrayataḥ svakarma
हे संजय, तुम धर्म से विचलित नहीं होते — यह मैं स्वयं भी जानता हूँ और युधिष्ठिर से भी। फिर हे संजय, अपना कर्तव्य निभाने वाले उत्साही पाण्डुपुत्र के विषय में,
श्लोक 5 (5.29.5)
यथाख्यातमावसतः कुटुम्बे । पुरा कस्मात्साधुविलोपमात्थ । अस्मिन्विधौ वर्तमाने यथाव- । दुच्चावचा मतयो ब्राह्मणानाम् ॥
yathākhyātamāvasataḥ kuṭumbe | purā kasmātsādhuvilopamāttha | asminvidhau vartamāne yathāva- | duccāvacā matayo brāhmaṇānām
जो शास्त्र के अनुसार अपने परिवार के साथ रहता है — तुमने अभी कुछ देर पहले उसके विषय में धर्म के नाश की बात क्यों कही? इस विधान के विषय में ब्राह्मणों के मत ऊँचे-नीचे, अनेक प्रकार के हैं।
श्लोक 6 (5.29.6)
कर्मणाऽऽहुः सिद्धिमेके परत्र । हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुञ्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्ये- । द्विद्वानपीह विहितं ब्राह्मणानाम् ॥
karmaṇā''huḥ siddhimeke paratra | hitvā karma vidyayā siddhimeke | nābhuñjāno bhakṣyabhojyasya tṛpye- | dvidvānapīha vihitaṃ brāhmaṇānām
कुछ कहते हैं कि परलोक में सिद्धि कर्म से मिलती है; कुछ कर्म छोड़कर ज्ञान से सिद्धि बताते हैं। किन्तु कोई कितना ही विद्वान क्यों न हो, बिना खाए भोजन से तृप्त नहीं होता — ब्राह्मणों के लिए भी यही विहित है।
श्लोक 7 (5.29.7)
या वै विद्याः साधयन्तीह कर्म । तासां फलं विद्यते नेतरासाम् । तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म । पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णयाऽऽर्तः ॥
yā vai vidyāḥ sādhayantīha karma | tāsāṃ phalaṃ vidyate netarāsām | tatreha vai dṛṣṭaphalaṃ tu karma | pītvodakaṃ śāmyati tṛṣṇayā''rtaḥ
जो विद्याएँ कर्म को सिद्ध करती हैं, उन्हीं का फल होता है, दूसरों का नहीं। यहाँ कर्म का फल प्रत्यक्ष दिखता है — प्यास से व्याकुल मनुष्य जल पीकर ही शान्त होता है।
श्लोक 8 (5.29.8)
सोऽयं विधिर्विहितः कर्मणैव । संवर्तते सञ्जय तत्र कर्म । तत्र योऽन्यत्कर्मणः साधु मन्ये- । न्मोघं तस्यालपितं दुर्बलस्य ॥
so'yaṃ vidhirvihitaḥ karmaṇaiva | saṃvartate sañjaya tatra karma | tatra yo'nyatkarmaṇaḥ sādhu manye- | nmoghaṃ tasyālapitaṃ durbalasya
यह विधान कर्म के द्वारा ही स्थापित है; हे संजय, इसमें कर्म ही प्रधान है। जो कर्म से भिन्न किसी और को श्रेष्ठ मानता है, उस दुर्बल का कथन व्यर्थ है।
श्लोक 9 (5.29.9)
कर्मणाऽमी भान्ति देवाः परत्र । कर्मणैवेह प्लवते मातरिश्वा । अहोरात्रे विदधत्कर्मणैव । अतन्द्रितो नित्यमुदेति सूर्यः ॥
karmaṇā'mī bhānti devāḥ paratra | karmaṇaiveha plavate mātariśvā | ahorātre vidadhatkarmaṇaiva | atandrito nityamudeti sūryaḥ
कर्म से ही ये देवता स्वर्ग में शोभा पाते हैं; कर्म से ही यहाँ वायु बहती है; कर्म से ही सूर्य दिन और रात का विधान करता हुआ बिना थके नित्य उदित होता है।
श्लोक 10 (5.29.10)
मासार्धमासानथ नक्षत्रयोगा- । नतन्द्रितश्चन्द्रमाश्चाभ्युपैति । अतन्द्रितो दहते जातवेदाः । समिद्ध्यमानः कर्म कुर्वन्प्रजाभ्यः ॥
māsārdhamāsānatha nakṣatrayogā- | natandritaścandramāścābhyupaiti | atandrito dahate jātavedāḥ | samiddhyamānaḥ karma kurvanprajābhyaḥ
चन्द्रमा बिना थके मासों, पक्षों और नक्षत्रों के योगों से होकर चलता है; अग्नि बिना थके प्रज्वलित होकर प्राणियों के लिए कर्म करती हुई जलती है।
श्लोक 11 (5.29.11)
अतन्द्रिता भारमिमं महान्तं । बिभर्ति देवी पृथिवी बलेन । अतन्द्रिताः शीघ्रमपो वहन्ति । सन्तर्पयन्त्यः सर्वभूतानि नद्यः ॥
atandritā bhāramimaṃ mahāntaṃ | bibharti devī pṛthivī balena | atandritāḥ śīghramapo vahanti | santarpayantyaḥ sarvabhūtāni nadyaḥ
देवी पृथ्वी बिना थके अपने बल से इस महान भार को धारण करती है; नदियाँ बिना थके तेज़ी से जल बहाती हुई सब प्राणियों को तृप्त करती हैं।
श्लोक 12 (5.29.12)
अतन्द्रितो वर्षति भूरितेजाः । सन्नादयन्नन्तरिक्षं दिशश्च । अतन्द्रितो ब्रह्मचर्यं चचार । श्रेष्ठत्वमिच्छन्बलभिद्देवतानाम् ॥
atandrito varṣati bhūritejāḥ | sannādayannantarikṣaṃ diśaśca | atandrito brahmacaryaṃ cacāra | śreṣṭhatvamicchanbalabhiddevatānām
महातेजस्वी इन्द्र बिना थके वर्षा करते हैं और आकाश तथा दिशाओं को गुँजा देते हैं; बल का वध करने वाले इन्द्र ने देवताओं में श्रेष्ठता की इच्छा से बिना थके ब्रह्मचर्य का पालन किया।
श्लोक 13 (5.29.13)
हित्वा सुखं मनसश्च प्रियाणि । तेन शक्रः कर्मणा श्रैष्ठ्यमाप । सत्यं धर्मं पालयन्नप्रमत्तो । दमं तितिक्षां समतां प्रियं च ॥
hitvā sukhaṃ manasaśca priyāṇi | tena śakraḥ karmaṇā śraiṣṭhyamāpa | satyaṃ dharmaṃ pālayannapramatto | damaṃ titikṣāṃ samatāṃ priyaṃ ca
सुख और मन को प्रिय लगने वाली वस्तुओं को त्यागकर शक्र ने उसी कर्म से श्रेष्ठता पाई। सावधान रहकर सत्य और धर्म का पालन करते हुए, तथा इन्द्रियसंयम, सहनशीलता, समता और प्रिय व्यवहार —
श्लोक 14 (5.29.14)
एतानि सर्वाण्युपसेवमानो । यो देवराज्यं मघवान्प्राप मुख्यम् । बृहस्पतिर्ब्रह्मचर्यं चचार । समाहितः संशितात्मा यथावत् ॥
etāni sarvāṇyupasevamāno | yo devarājyaṃ maghavānprāpa mukhyam | bṛhaspatirbrahmacaryaṃ cacāra | samāhitaḥ saṃśitātmā yathāvat
— इन सबका सेवन करते हुए मघवा ने देवताओं का प्रमुख राज्य पाया। बृहस्पति ने भी एकाग्र और दृढ़ संयमी रहकर विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन किया;
श्लोक 15 (5.29.15)
हित्वा सुखं प्रतिरुध्येन्द्रियाणि । तेन देवानामगमद्गौरवं सः । तथा नक्षत्राणि कर्मणाऽमुत्र भान्ति । रुद्रादित्या वसवोऽथापि विश्वे ॥
hitvā sukhaṃ pratirudhyendriyāṇi | tena devānāmagamadgauravaṃ saḥ | tathā nakṣatrāṇi karmaṇā'mutra bhānti | rudrādityā vasavo'thāpi viśve
सुख को त्यागकर और इन्द्रियों को रोककर उन्होंने उसी से देवताओं में गौरव पाया। इसी प्रकार नक्षत्र कर्म से परलोक में चमकते हैं, और रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वेदेव भी;
श्लोक 16 (5.29.16)
यमो राजा वैश्रवणः कुबेरो । गन्धर्वयक्षाप्सरसश्च सूत । ब्रह्मविद्यां ब्रह्मचर्यं क्रियां च । निषेवमाणा ऋषयोऽमुत्र भान्ति ॥
yamo rājā vaiśravaṇaḥ kubero | gandharvayakṣāpsarasaśca sūta | brahmavidyāṃ brahmacaryaṃ kriyāṃ ca | niṣevamāṇā ṛṣayo'mutra bhānti
राजा यम, विश्रवा के पुत्र कुबेर, गन्धर्व, यक्ष और अप्सराएँ भी, हे सूत; तथा ब्रह्मविद्या, ब्रह्मचर्य और यज्ञ-कर्मों का सेवन करने वाले ऋषि परलोक में शोभा पाते हैं।
श्लोक 17 (5.29.17)
जानन्निमं सर्वलोकस्य धर्मं । विप्रेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां च । स कस्मात्त्वं जानतां ज्ञानवान्सन् । व्यायच्छसे सञ्जय कौरवार्थे ॥
jānannimaṃ sarvalokasya dharmaṃ | viprendrāṇāṃ kṣatriyāṇāṃ viśāṃ ca | sa kasmāttvaṃ jānatāṃ jñānavānsan | vyāyacchase sañjaya kauravārthe
समस्त लोक के इस धर्म को — ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के धर्म को — जानते हुए भी, हे संजय, तुम ज्ञानियों में ज्ञानवान होकर कौरवों के लिए (पाण्डवों को) रोकने का प्रयास क्यों कर रहे हो?
श्लोक 18 (5.29.18)
आम्नायेषु नित्यसंयोगमस्य । तथाऽश्वमेधे राजसूये च विद्धि । संयुज्यते धनुषा वर्मणा च । हस्त्यश्वाद्यै रथशस्त्रैश्च भूयः ॥
āmnāyeṣu nityasaṃyogamasya | tathā'śvamedhe rājasūye ca viddhi | saṃyujyate dhanuṣā varmaṇā ca | hastyaśvādyai rathaśastraiśca bhūyaḥ
जान लो कि युधिष्ठिर वेदों में सदा लगे रहते हैं, तथा अश्वमेध और राजसूय में भी; साथ ही वे धनुष और कवच से, हाथी-घोड़े आदि से तथा रथों और शस्त्रों से भी भरपूर सम्पन्न हैं।
श्लोक 19 (5.29.19)
ते चेदिमे कौरवाणामुपाय- । मवगच्छेयुरवधेनैव पार्थाः । धर्मत्राणं पुण्यमेषां कृतं स्या- । दार्ये वृत्ते भीमसेनं निगृह्य ॥
te cedime kauravāṇāmupāya- | mavagaccheyuravadhenaiva pārthāḥ | dharmatrāṇaṃ puṇyameṣāṃ kṛtaṃ syā- | dārye vṛtte bhīmasenaṃ nigṛhya
यदि ये पार्थ कौरवों का वध किए बिना ही (राज्य पाने का) कोई उपाय पा सकें, तो भीमसेन को सज्जनोचित आचरण में रोककर वे धर्म की रक्षा करने वाला पुण्यकर्म ही करेंगे।
श्लोक 20 (5.29.20)
ते चेत्पित्र्ये कर्मणि वर्तमाना । आपद्येरन्दिष्टवशेन मृत्युम् । यथाशक्त्यापूरयन्तः स्वकर्म । तदप्येषां निधनं स्यात्प्रशस्तम् ॥
te cetpitrye karmaṇi vartamānā | āpadyerandiṣṭavaśena mṛtyum | yathāśaktyāpūrayantaḥ svakarma | tadapyeṣāṃ nidhanaṃ syātpraśastam
यदि अपने पितरों के कर्म में लगे हुए, यथाशक्ति अपना कर्तव्य पूरा करते हुए, वे दैववश मृत्यु को प्राप्त हों, तो उनकी वह मृत्यु भी प्रशंसनीय होगी।
श्लोक 21 (5.29.21)
उताहो त्वं मन्यसे शाम्यमेव । राज्ञां युद्धे वर्तते धर्मतन्त्रम् । अयुद्धे वा वर्तते धर्मतन्त्रं । तथैव ते वाचमिमां शृणोमि ॥
utāho tvaṃ manyase śāmyameva | rājñāṃ yuddhe vartate dharmatantram | ayuddhe vā vartate dharmatantraṃ | tathaiva te vācamimāṃ śṛṇomi
अथवा क्या तुम मानते हो कि केवल शान्ति ही उचित है? राजाओं का धर्म-विधान युद्ध में है या युद्ध न करने में? इस विषय में तुम जो कहोगे, मैं तुम्हारी वह बात सुनूँगा और वैसा ही करूँगा।
श्लोक 22 (5.29.22)
चातुर्वर्ण्यस्य प्रथमं संविभाग- । मवेक्ष्य त्वं सञ्जय स्वं च कर्म । निशम्याथो पाण्डवानां च कर्म । प्रशंस वा निन्द वा या मतिस्ते ॥
cāturvarṇyasya prathamaṃ saṃvibhāga- | mavekṣya tvaṃ sañjaya svaṃ ca karma | niśamyātho pāṇḍavānāṃ ca karma | praśaṃsa vā ninda vā yā matiste
हे संजय, पहले चारों वर्णों के विभाग पर और अपने कर्तव्य पर विचार करो; फिर पाण्डवों का कर्तव्य सुनकर, जैसा तुम्हारा मत हो, उनकी प्रशंसा या निन्दा करो।
श्लोक 23 (5.29.23)
अधीयीत ब्राह्मणो वै यजेत । दद्यादीयात्तीर्थमुख्यानि चैव । अध्यापयेद्याजयेच्चापि याज्यान् । प्रतिग्रहान्वा विहितान्प्रतीच्छेत् ॥
adhīyīta brāhmaṇo vai yajeta | dadyādīyāttīrthamukhyāni caiva | adhyāpayedyājayeccāpi yājyān | pratigrahānvā vihitānpratīcchet
ब्राह्मण अध्ययन करे और यज्ञ करे, दान दे और प्रमुख तीर्थों की यात्रा करे; वह पढ़ाए, यज्ञ के अधिकारी यजमानों का यज्ञ कराए और विधि के अनुसार दान ग्रहण करे।
श्लोक 24 (5.29.24)
अधीयीत क्षत्रियोऽथो यजेत । दद्याद्धनं न तु याचेत किंचित् । न याजयेन्न तु चाध्यापयीत । एवं स्मृतः क्षत्रधर्मः पुराणः ॥
adhīyīta kṣatriyo'tho yajeta | dadyāddhanaṃ na tu yāceta kiṃcit | na yājayenna tu cādhyāpayīta | evaṃ smṛtaḥ kṣatradharmaḥ purāṇaḥ
क्षत्रिय अध्ययन करे और यज्ञ करे, धन का दान दे, पर किसी से कुछ न माँगे; वह न दूसरों का यज्ञ कराए, न अध्यापन करे। यही परम्परा से माना गया क्षत्रिय का प्राचीन धर्म है।
श्लोक 25 (5.29.25)
तथा राजन्यो रक्षणं वै प्रजानां । कृत्वा धर्मेणाप्रमत्तोऽथ दत्त्वा । यज्ञैरिष्ट्वा सर्ववेदानधीत्य । दारान्कृत्वा पुण्यकृदावसेद्गृहान् ॥
tathā rājanyo rakṣaṇaṃ vai prajānāṃ | kṛtvā dharmeṇāpramatto'tha dattvā | yajñairiṣṭvā sarvavedānadhītya | dārānkṛtvā puṇyakṛdāvasedgṛhān
इस प्रकार क्षत्रिय धर्मपूर्वक और सावधानी से प्रजा की रक्षा करते हुए, दान देकर, यज्ञ करके, सब वेदों का अध्ययन करके और विवाह करके पुण्यकर्म करता हुआ गृहस्थ-जीवन बिताए।
श्लोक 26 (5.29.26)
स धर्मात्मा धर्ममधीत्य पुण्यं । यदृच्छया व्रजति ब्रह्मलोकम् । वैश्योऽधीत्य कृषिगोरक्षपण्यै- । र्वित्तं चिन्वन्पालयन्नप्रमत्तः ॥
sa dharmātmā dharmamadhītya puṇyaṃ | yadṛcchayā vrajati brahmalokam | vaiśyo'dhītya kṛṣigorakṣapaṇyai- | rvittaṃ cinvanpālayannapramattaḥ
वह धर्मात्मा पवित्र धर्म को अपनाकर अपनी इच्छा से ब्रह्मलोक को जाता है। वैश्य अध्ययन करके खेती, गोरक्षा और व्यापार से धन कमाए और सावधानी से उसकी रक्षा करे,
श्लोक 27 (5.29.27)
प्रियं कुर्वन्ब्राह्मणक्षत्रियाणां । धर्मशीलः पुण्यकृदावसेद्गृहान् । परिचर्या वन्दनं ब्राह्मणानां । नाधीयीत प्रतिषिद्धोऽस्य यज्ञः । नित्योत्थितो भूतयेऽतन्द्रितः स्या- । देवं स्मृतः शूद्रधर्मः पुराणः ॥
priyaṃ kurvanbrāhmaṇakṣatriyāṇāṃ | dharmaśīlaḥ puṇyakṛdāvasedgṛhān | paricaryā vandanaṃ brāhmaṇānāṃ | nādhīyīta pratiṣiddho'sya yajñaḥ | nityotthito bhūtaye'tandritaḥ syā- | devaṃ smṛtaḥ śūdradharmaḥ purāṇaḥ
ब्राह्मणों और क्षत्रियों का प्रिय करते हुए, धर्मशील और पुण्यकर्मा होकर वह गृहस्थ-जीवन बिताए। ब्राह्मणों की सेवा और वन्दना शूद्र का कर्म है; वह अध्ययन न करे, उसके लिए यज्ञ निषिद्ध है; वह समृद्धि के लिए सदा उद्यमी और आलस्यरहित रहे। यही परम्परा से माना गया शूद्र का प्राचीन धर्म है।
श्लोक 28 (5.29.28)
एतान्राजा पालयन्नप्रमत्तो । नियोजयन्सर्ववर्णान्स्वधर्मे । अकामात्मा समवृत्तिः प्रजासु । नाधार्मिकाननुरुध्येत कामात् ॥
etānrājā pālayannapramatto | niyojayansarvavarṇānsvadharme | akāmātmā samavṛttiḥ prajāsu | nādhārmikānanurudhyeta kāmāt
इन सबकी सावधानी से रक्षा करते हुए और सब वर्णों को अपने-अपने धर्म में लगाते हुए, राजा कामनारहित और प्रजा के प्रति समान व्यवहार वाला रहे; वह कामनावश अधार्मिकों का पक्ष न ले।
श्लोक 29 (5.29.29)
श्रेयांस्तस्माद्यदि विद्येत कश्चि- । दभिज्ञातः सर्वधर्मोपपन्नः । स तं द्रष्टुमनुशिष्यन्प्रजानां । न चैतद्बुध्येदिति तस्मिन्नसाधुः ॥
śreyāṃstasmādyadi vidyeta kaści- | dabhijñātaḥ sarvadharmopapannaḥ | sa taṃ draṣṭumanuśiṣyanprajānāṃ | na caitadbudhyediti tasminnasādhuḥ
यदि उस राजा से श्रेष्ठ कोई विख्यात और सब धर्मों से सम्पन्न व्यक्ति हो, तो यह समझना चाहिए कि वही प्रजा की देखभाल और शासन के योग्य है; उसमें कोई दोष नहीं है।
श्लोक 30 (5.29.30)
यदा गृध्येत्परभूमिं नृशंसो । विधिप्रकोपाद्बलमाददानः । ततो राज्ञां भविता युद्धमेत- । त्तत्र जातं वर्म शस्त्रं धनुश्च । इन्द्रेणेदं दस्युवधाय कर्म । उत्पादितं वर्म शस्त्रं धनुश्च ॥
yadā gṛdhyetparabhūmiṃ nṛśaṃso | vidhiprakopādbalamādadānaḥ | tato rājñāṃ bhavitā yuddhameta- | ttatra jātaṃ varma śastraṃ dhanuśca | indreṇedaṃ dasyuvadhāya karma | utpāditaṃ varma śastraṃ dhanuśca
जब कोई क्रूर मनुष्य दैव के प्रकोप से बल को हाथ में लेकर दूसरे की भूमि का लोभ करता है, तब राजाओं में यह युद्ध होता है; उसी के लिए कवच, शस्त्र और धनुष उत्पन्न हुए। इन्द्र ने दस्युओं के वध के लिए यह साधन — कवच, शस्त्र और धनुष — उत्पन्न किया।
श्लोक 31 (5.29.31)
तत्र पुण्यं दस्युवधेन लभ्यते । सोऽयं दोषः कुरुभिस्तीव्ररूपः । अधर्मज्ञैर्धर्ममबुध्यमानैः । प्रादुर्भूतः सञ्जय साधु तन्न ॥
tatra puṇyaṃ dasyuvadhena labhyate | so'yaṃ doṣaḥ kurubhistīvrarūpaḥ | adharmajñairdharmamabudhyamānaiḥ | prādurbhūtaḥ sañjaya sādhu tanna
दस्युओं के वध से पुण्य प्राप्त होता है। हे संजय, धर्म को न जानने और न समझने वाले कुरुओं के कारण यह भयंकर दोष उत्पन्न हुआ है; यह अच्छा नहीं है।
श्लोक 32 (5.29.32)
तत्र राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो । धर्म्यं हरेत्पाण्डवानामकस्मात् । नावेक्षन्ते राजधर्मं पुराणं । तदन्वयाः कुरवः सर्व एव ॥
tatra rājā dhṛtarāṣṭraḥ saputro | dharmyaṃ haretpāṇḍavānāmakasmāt | nāvekṣante rājadharmaṃ purāṇaṃ | tadanvayāḥ kuravaḥ sarva eva
इसमें राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्र सहित अकारण पाण्डवों का धर्मसम्मत (पैतृक) भाग छीनना चाहते हैं; और उनके पीछे चलने वाले सभी कुरु राजधर्म की प्राचीन मर्यादा की ओर ध्यान नहीं देते।
श्लोक 33 (5.29.33)
स्तेनो हरेद्यत्र धनं ह्यदृष्टः । प्रसह्य वा यत्र हरेत दृष्टः । उभौ गर्ह्यौ भवतः सञ्जयैतौ । किं वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे ॥
steno haredyatra dhanaṃ hyadṛṣṭaḥ | prasahya vā yatra hareta dṛṣṭaḥ | ubhau garhyau bhavataḥ sañjayaitau | kiṃ vai pṛthaktvaṃ dhṛtarāṣṭrasya putre
जहाँ चोर छिपकर धन चुराता है, या जहाँ कोई सबके सामने बलपूर्वक उसे छीन लेता है — हे संजय, ये दोनों ही निन्दनीय हैं। फिर धृतराष्ट्र के पुत्र में (चोर से) क्या भिन्नता है?
श्लोक 34 (5.29.34)
सोऽयं लोभान्मन्यते धर्ममेतं । यमिच्छति क्रोधवशानुगामी । भागः पुनः पाण्डवानां निविष्ट- । स्तं नः कस्मादाददीरन्परे वै ॥
so'yaṃ lobhānmanyate dharmametaṃ | yamicchati krodhavaśānugāmī | bhāgaḥ punaḥ pāṇḍavānāṃ niviṣṭa- | staṃ naḥ kasmādādadīranpare vai
लोभवश वह इसी को धर्म मानता है, जिसे क्रोध के वश में चलने वाला वह चाहता है। पाण्डवों का भाग धरोहर के रूप में रखा गया था; उसे दूसरे हमसे क्यों छीन लें?
श्लोक 35 (5.29.35)
अस्मिन्पदे युध्यतां नो वधोऽपि । श्लाघ्यः पित्र्यं परराज्याद्विशिष्टम् । एतान्धर्मान्कौरवाणां पुराणा- । नाचक्षीथाः सञ्जय राजमध्ये ॥
asminpade yudhyatāṃ no vadho'pi | ślāghyaḥ pitryaṃ pararājyādviśiṣṭam | etāndharmānkauravāṇāṃ purāṇā- | nācakṣīthāḥ sañjaya rājamadhye
ऐसे कारण के लिए युद्ध करते हुए हमारी मृत्यु भी प्रशंसनीय होगी; पैतृक राज्य पराए राज्य से कहीं श्रेष्ठ है। हे संजय, कौरवों के ये प्राचीन धर्म राजाओं के बीच कह देना।
श्लोक 36 (5.29.36)
एते मदान्मृत्युवशाभिपन्नाः । समानीता धार्तराष्ट्रेण मूढाः । इदं पुनः कर्म पापीय एव । सभामध्ये पश्य वृत्तं कुरूणाम् ॥
ete madānmṛtyuvaśābhipannāḥ | samānītā dhārtarāṣṭreṇa mūḍhāḥ | idaṃ punaḥ karma pāpīya eva | sabhāmadhye paśya vṛttaṃ kurūṇām
धृतराष्ट्र-पुत्र द्वारा एकत्र किए गए ये मूढ़ अहंकार के कारण मृत्यु के वश में जा पड़े हैं। और फिर सभा के बीच कुरुओं का वह और भी पापपूर्ण आचरण देखो —
श्लोक 37 (5.29.37)
प्रियां भार्यां द्रौपदीं पाण्डवानां । यशस्विनीं शीलवृत्तोपपन्नाम् । यदुपैक्षन्त कुरवो भीष्ममुख्याः । कामानुगेनोपरुद्धां व्रजन्तीम् ॥
priyāṃ bhāryāṃ draupadīṃ pāṇḍavānāṃ | yaśasvinīṃ śīlavṛttopapannām | yadupaikṣanta kuravo bhīṣmamukhyāḥ | kāmānugenoparuddhāṃ vrajantīm
कि भीष्म आदि प्रमुख कुरु देखते रहे, जब पाण्डवों की प्रिय पत्नी, यशस्विनी तथा शील और सदाचार से सम्पन्न द्रौपदी को वह कामवश चलने वाला जाते हुए पकड़कर रोक रहा था।
श्लोक 38 (5.29.38)
तां चेत्तदा ते सकुमारवृद्धा । अवारयिष्यन्कुरवः समेताः । मम प्रियं धृतराष्ट्रोऽकरिष्यत् । पुत्राणां च कृतमस्याभविष्यत् ॥
tāṃ cettadā te sakumāravṛddhā | avārayiṣyankuravaḥ sametāḥ | mama priyaṃ dhṛtarāṣṭro'kariṣyat | putrāṇāṃ ca kṛtamasyābhaviṣyat
यदि उस समय वहाँ एकत्र बालक-वृद्ध सभी कुरु उसकी रक्षा करके उसे रोकते, तो धृतराष्ट्र मेरा प्रिय करते और अपने पुत्रों का भी भला करते।
श्लोक 39 (5.29.39)
दुःशासनः प्रातिलोम्यान्निनाय । सभामध्ये श्वशुराणां च कृष्णाम् । सा तत्र नीता करुणं व्यपेक्ष्य । नान्यं क्षत्तुर्नाथमवाप किंचित् ॥
duḥśāsanaḥ prātilomyānnināya | sabhāmadhye śvaśurāṇāṃ ca kṛṣṇām | sā tatra nītā karuṇaṃ vyapekṣya | nānyaṃ kṣatturnāthamavāpa kiṃcit
दुःशासन मर्यादा के विपरीत कृष्णा को सभा के बीच ससुरजनों के सामने घसीट लाया। वहाँ लाई गई कृष्णा ने करुण दृष्टि से चारों ओर देखा, पर क्षत्ता विदुर के अतिरिक्त उसे कोई रक्षक नहीं मिला।
श्लोक 40 (5.29.40)
कार्पण्यादेव सहितास्तत्र भूपा । नाशक्नुवन्प्रतिवक्तुं सभायाम् । एकः क्षत्ता धर्म्यमर्थं ब्रुवाणो । धर्मबुद्ध्या प्रत्युवाचाल्पबुद्धिम् ॥
kārpaṇyādeva sahitāstatra bhūpā | nāśaknuvanprativaktuṃ sabhāyām | ekaḥ kṣattā dharmyamarthaṃ bruvāṇo | dharmabuddhyā pratyuvācālpabuddhim
केवल दीनता के कारण वहाँ एकत्र राजा सभा में कोई उत्तर नहीं दे सके; अकेले क्षत्ता विदुर ने धर्मबुद्धि से धर्मसम्मत और सार्थक बात कहते हुए उस मन्दबुद्धि को उत्तर दिया।
श्लोक 41 (5.29.41)
अबुद्ध्वा त्वं धर्ममेतं सभाया- । मथेच्छसे पाण्डवस्योपदेष्टुम् । कृष्णा त्वेतत्कर्म चकार शुद्धं । सुदुष्करं तत्र सभां समेत्य ॥
abuddhvā tvaṃ dharmametaṃ sabhāyā- | mathecchase pāṇḍavasyopadeṣṭum | kṛṣṇā tvetatkarma cakāra śuddhaṃ | suduṣkaraṃ tatra sabhāṃ sametya
सभा में तुमने इस धर्म को नहीं समझा, और अब तुम पाण्डुपुत्र को उपदेश देना चाहते हो! वहाँ सभा में आकर कृष्णा ने ही वह पवित्र और अत्यन्त कठिन कर्म किया,
श्लोक 42 (5.29.42)
येन कृच्छ्रात्पाण्डवानुज्जहार । तथाऽऽत्मानं नौरिव सागरौघात् । यत्राब्रवीत्सूतपुत्रः सभायां । कृष्णां स्थितां श्वशुराणां समीपे ॥
yena kṛcchrātpāṇḍavānujjahāra | tathā''tmānaṃ nauriva sāgaraughāt | yatrābravītsūtaputraḥ sabhāyāṃ | kṛṣṇāṃ sthitāṃ śvaśurāṇāṃ samīpe
जिससे उसने पाण्डवों को और स्वयं को भी संकट से उसी प्रकार उबार लिया जैसे नौका सागर की बाढ़ से उबारती है — वहीं सभा में सूतपुत्र ने ससुरजनों के पास खड़ी कृष्णा से कहा था —
श्लोक 43 (5.29.43)
न ते गतिर्विद्यते याज्ञसेनि । प्रपद्येथा धार्तराष्ट्रस्य वेश्म । पराजितास्ते पतयो न सन्ति । पतिं चान्यं भामिनि त्वं वृणीष्व ॥
na te gatirvidyate yājñaseni | prapadyethā dhārtarāṣṭrasya veśma | parājitāste patayo na santi | patiṃ cānyaṃ bhāmini tvaṃ vṛṇīṣva
'हे याज्ञसेनी, तुम्हारी कोई गति नहीं है; धृतराष्ट्र-पुत्र के घर चली जाओ। तुम्हारे पति हार चुके हैं, अब वे तुम्हारे पति नहीं रहे; हे भामिनी, कोई दूसरा पति चुन लो।'
श्लोक 44 (5.29.44)
यो बीभत्सोर्हृदये प्रोत आसी- । दस्थि छिन्दन्मर्मघाती सुघोरः । कर्णाच्छरो वाङ्मयस्तिग्मतेजाः । प्रतिष्ठितो हृदये फाल्गुनस्य ॥
yo bībhatsorhṛdaye prota āsī- | dasthi chindanmarmaghātī sughoraḥ | karṇāccharo vāṅmayastigmatejāḥ | pratiṣṭhito hṛdaye phālgunasya
कर्ण का वह वाणी-रूपी तीक्ष्ण और भयानक बाण, जो हड्डियों को काटता और मर्मस्थलों पर चोट करता हुआ बीभत्सु के हृदय में बिंध गया था, आज भी फाल्गुन के हृदय में गड़ा हुआ है।
श्लोक 45 (5.29.45)
कृष्णाजिनानि परिधित्समानान् । दुःशासनः कटुकान्यभ्यभाषत् । एते सर्वे षण्डतिला विनष्टाः । क्षयं गता नरकं दीर्घकालम् ॥
kṛṣṇājināni paridhitsamānān | duḥśāsanaḥ kaṭukānyabhyabhāṣat | ete sarve ṣaṇḍatilā vinaṣṭāḥ | kṣayaṃ gatā narakaṃ dīrghakālam
जब वे काले मृगचर्म पहनने को उद्यत थे, तब दुःशासन ने कटु वचन कहे थे — 'ये सब थोथे तिलों के समान नष्ट हो गए; ये दीर्घकाल के लिए विनाश और नरक को प्राप्त हो गए।'
श्लोक 46 (5.29.46)
गान्धारराजः शकुनिर्निकृत्या । यदब्रवीद्द्यूतकाले स पार्थान् । पराजितो नकुलः किं तवास्ति । कृष्णया त्वं दीव्य वै याज्ञसेन्या । जानासि त्वं सञ्जय सर्वमेत- । द्द्यूते वाक्यं गर्ह्यमेवं यथोक्तम् ॥
gāndhārarājaḥ śakunirnikṛtyā | yadabravīddyūtakāle sa pārthān | parājito nakulaḥ kiṃ tavāsti | kṛṣṇayā tvaṃ dīvya vai yājñasenyā | jānāsi tvaṃ sañjaya sarvameta- | ddyūte vākyaṃ garhyamevaṃ yathoktam
गान्धारराज शकुनि ने जुए के समय छलपूर्वक पार्थों से जो कहा था — 'नकुल हार गया, अब तुम्हारे पास क्या बचा है? अब याज्ञसेनी कृष्णा को दाँव पर लगाकर खेलो!' — हे संजय, तुम यह सब जानते हो; जुए में ऐसे निन्दनीय वचन कहे गए थे।
श्लोक 47 (5.29.47)
स्वयं त्वहं प्रार्थये तत्र गन्तुं । समाधातुं कार्यमेतद्विपन्नम् । जानासि त्वं धार्तराष्ट्रस्य मोहं । दुरात्मनः पापवशानुगस्य ॥
svayaṃ tvahaṃ prārthaye tatra gantuṃ | samādhātuṃ kāryametadvipannam | jānāsi tvaṃ dhārtarāṣṭrasya mohaṃ | durātmanaḥ pāpavaśānugasya
फिर भी मैं स्वयं वहाँ जाकर इस बिगड़े हुए काम को सुधारना चाहता हूँ। तुम पाप के वश में चलने वाले दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र के मोह को जानते हो।
श्लोक 48 (5.29.48)
अहापयित्वा यदि पाण्डवार्थं । शमं कुरूणामपि चेच्छकेयम् । पुण्यं च मे स्याच्चरितं महोदयं । मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात् ॥
ahāpayitvā yadi pāṇḍavārthaṃ | śamaṃ kurūṇāmapi cecchakeyam | puṇyaṃ ca me syāccaritaṃ mahodayaṃ | mucyeraṃśca kuravo mṛtyupāśāt
यदि पाण्डवों के हित की हानि किए बिना मैं कुरुओं में शान्ति स्थापित कर सकूँ, तो मेरा यह कर्म महान अभ्युदय वाला पुण्य होगा, और कुरु मृत्यु के पाश से छूट जाएँगे।
श्लोक 49 (5.29.49)
अपि मे वाचं भाषमाणस्य काव्यां । धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम् । अवेक्षेरन्धार्तराष्ट्राः समक्षं । मां च प्राप्तं कुरवः पूजयेयुः ॥
api me vācaṃ bhāṣamāṇasya kāvyāṃ | dharmārāmāmarthavatīmahiṃsrām | avekṣerandhārtarāṣṭrāḥ samakṣaṃ | māṃ ca prāptaṃ kuravaḥ pūjayeyuḥ
और सम्भव है कि जब मैं धर्म में रमे, सार्थक और अहिंसक विवेकपूर्ण वचन कहूँ, तो धृतराष्ट्र के पुत्र मेरे सामने उन पर ध्यान दें, और मेरे पहुँचने पर कुरु मेरा सम्मान करें।
श्लोक 50 (5.29.50)
अतोऽन्यथा रथिना फाल्गुनेन । भीमेन चैवाहवदंशितेन । बलोत्सिक्तान्धार्तराष्ट्रांश्च विद्धि । प्रदह्यमानान्कर्मणा स्वेन पापान् ॥
ato'nyathā rathinā phālgunena | bhīmena caivāhavadaṃśitena | balotsiktāndhārtarāṣṭrāṃśca viddhi | pradahyamānānkarmaṇā svena pāpān
अन्यथा जान लो कि बल के मद में चूर पापी धृतराष्ट्र-पुत्र रथी फाल्गुन और युद्ध के लिए कवचधारी भीम के हाथों अपने ही कर्मों से जल जाएँगे।
श्लोक 51 (5.29.51)
पराजितान्पाण्डवेयांस्तु वाचो । रौद्रा रूक्षा भाषते धार्तराष्ट्रः । गदाहस्तो भीमसेनोऽप्रमत्तो । दुर्योधनं स्मारयिता हि काले ॥
parājitānpāṇḍaveyāṃstu vāco | raudrā rūkṣā bhāṣate dhārtarāṣṭraḥ | gadāhasto bhīmaseno'pramatto | duryodhanaṃ smārayitā hi kāle
धृतराष्ट्र के पुत्र ने पराजित पाण्डवों से रौद्र और कठोर वचन कहे थे; हाथ में गदा लिए सावधान भीमसेन समय आने पर दुर्योधन को उनकी याद दिलाएँगे।
श्लोक 52 (5.29.52)
सुयोधनो मन्युमयो महाद्रुमः । स्कन्धः कर्णः शकुनिस्तस्य शाखाः । दुःशासनः पुष्पफले समृद्धे । मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषी ॥
suyodhano manyumayo mahādrumaḥ | skandhaḥ karṇaḥ śakunistasya śākhāḥ | duḥśāsanaḥ puṣpaphale samṛddhe | mūlaṃ rājā dhṛtarāṣṭro'manīṣī
सुयोधन क्रोध से बना एक विशाल वृक्ष है: कर्ण उसका तना है, शकुनि उसकी शाखाएँ हैं, दुःशासन उसके भरपूर फूल और फल हैं, और विवेकहीन राजा धृतराष्ट्र उसकी जड़ हैं।
श्लोक 53 (5.29.53)
युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुमः । स्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखाः । माद्रीपुत्रौ पुष्पफले समृद्धे । मूलं त्वहं ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च ॥
yudhiṣṭhiro dharmamayo mahādrumaḥ | skandho'rjuno bhīmaseno'sya śākhāḥ | mādrīputrau puṣpaphale samṛddhe | mūlaṃ tvahaṃ brahma ca brāhmaṇāśca
युधिष्ठिर धर्म से बना एक विशाल वृक्ष है: अर्जुन उसका तना है, भीमसेन उसकी शाखाएँ हैं, माद्री के दोनों पुत्र उसके भरपूर फूल और फल हैं, और मैं, वेद तथा ब्राह्मण उसकी जड़ हैं।
श्लोक 54 (5.29.54)
वनं राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रः । सिंहा वने सञ्जय पाण्डवेयाः । सिंहाभिगुप्तं न वनं विनश्येत् । सिंहो न नश्येत वनाभिगुप्तः ॥
vanaṃ rājā dhṛtarāṣṭraḥ saputraḥ | siṃhā vane sañjaya pāṇḍaveyāḥ | siṃhābhiguptaṃ na vanaṃ vinaśyet | siṃho na naśyeta vanābhiguptaḥ
हे संजय, पुत्रों सहित राजा धृतराष्ट्र वन हैं और पाण्डुपुत्र उस वन के सिंह हैं। सिंहों से रक्षित वन नष्ट नहीं होता, और वन से रक्षित सिंह नष्ट नहीं होता।
श्लोक 55 (5.29.55)
निर्वनो वध्यते सिंहो निःसिंहं वध्यते वनम् । तस्मात्सिंहो वनं रक्षेद्वनं सिंहं च पालयेत् ॥
nirvano vadhyate siṃho niḥsiṃhaṃ vadhyate vanam | tasmātsiṃho vanaṃ rakṣedvanaṃ siṃhaṃ ca pālayet
वन के बिना सिंह मारा जाता है और सिंह के बिना वन काट डाला जाता है। इसलिए सिंह वन की रक्षा करे और वन सिंह का पालन करे।
श्लोक 56 (5.29.56)
वनं राजा धृतराष्ट्रो वने व्याघ्राश्च पाण्डवाः । मा वनं छिन्धि सव्याघ्रं व्याघ्रा नेशुर्वनं विना ॥
vanaṃ rājā dhṛtarāṣṭro vane vyāghrāśca pāṇḍavāḥ | mā vanaṃ chindhi savyāghraṃ vyāghrā neśurvanaṃ vinā
राजा धृतराष्ट्र वन हैं और पाण्डव उस वन के बाघ हैं। बाघों सहित वन को मत काटो; वन के बिना बाघ नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 57 (5.29.57)
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम् । तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वनं व्याघ्रं च पालयेत् ॥
nirvano vadhyate vyāghro nirvyāghraṃ chidyate vanam | tasmādvyāghro vanaṃ rakṣedvanaṃ vyāghraṃ ca pālayet
वन के बिना बाघ मारा जाता है और बाघ के बिना वन काट डाला जाता है। इसलिए बाघ वन की रक्षा करे और वन बाघ का पालन करे।
श्लोक 58 (5.29.58)
लताधर्मा धार्तराष्ट्राः सालाः सञ्जय पाण्डवाः । न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता ॥
latādharmā dhārtarāṣṭrāḥ sālāḥ sañjaya pāṇḍavāḥ | na latā vardhate jātu mahādrumamanāśritā
हे संजय, धृतराष्ट्र के पुत्र लताओं के समान हैं और पाण्डव शाल वृक्षों के समान; कोई लता किसी विशाल वृक्ष का आश्रय लिए बिना कभी नहीं बढ़ती।
श्लोक 59 (5.29.59)
स्थिताः शुश्रूषितुं पार्थाः स्थिता योद्धुमरिन्दमाः । यत्कृत्यं धृतराष्ट्रस्य तत्करोतु नराधिपः ॥
sthitāḥ śuśrūṣituṃ pārthāḥ sthitā yoddhumarindamāḥ | yatkṛtyaṃ dhṛtarāṣṭrasya tatkarotu narādhipaḥ
पार्थ सेवा करने को भी तैयार हैं और ये शत्रुदमन युद्ध करने को भी तैयार हैं। धृतराष्ट्र का जो कर्तव्य हो, नरेश वही करें।
श्लोक 60 (5.29.60)
स्थिताः शमे महात्मानः पाण्डवा धर्मचारिणः । योधाः समर्थास्तद्विद्वन्नाचक्षीथा यथातथम् ॥
sthitāḥ śame mahātmānaḥ pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | yodhāḥ samarthāstadvidvannācakṣīthā yathātatham
धर्म का आचरण करने वाले महात्मा पाण्डव शान्ति के लिए तैयार हैं, और वे युद्ध में समर्थ योद्धा भी हैं। हे विद्वान, यह सब जैसा है वैसा ही जाकर कह देना।