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उद्योग पर्व · अध्याय 28

आपद्धर्म पर युधिष्ठिर के वचन

युधिष्ठिर मानते हैं कि सब कर्मों में धर्म श्रेष्ठ है, पर संजय से कहते हैं कि निन्दा करने से पहले उन्हें समझ लें। वे बताते हैं कि धर्म और अधर्म एक-दूसरे का रूप धारण कर सकते हैं, और आपद्धर्म का स्वरूप समझाते हैं, जिसके अनुसार जीविका नष्ट होने पर मनुष्य दूसरे वर्ण का कर्म अपना सकता है। यह कहकर कि वे अधर्म से देवताओं के लोक भी नहीं लेंगे, वे निर्णय यादवों के मार्गदर्शक श्रीकृष्ण पर छोड़ते हैं, जिनके वचन का वे उल्लंघन नहीं करेंगे।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (5.28.1)

असंशयं सञ्जय सत्यमेत- । द्धर्मो वरः कर्मणां यत्त्वमात्थ । ज्ञात्वा तु मां सञ्जय गर्हयेस्त्वं । यदि धर्मं यद्यधर्मं चरामि ॥

asaṃśayaṃ sañjaya satyameta- | ddharmo varaḥ karmaṇāṃ yattvamāttha | jñātvā tu māṃ sañjaya garhayestvaṃ | yadi dharmaṃ yadyadharmaṃ carāmi

हे संजय, निःसन्देह तुम्हारा कहना सत्य है कि सब कर्मों में धर्म श्रेष्ठ है। पर हे संजय, पहले मुझे जान लो, फिर मेरी निन्दा करना — कि मैं धर्म का आचरण करता हूँ या अधर्म का।

श्लोक 2 (5.28.2)

यत्राधर्मो धर्मरूपाणि धत्ते । धर्मः कृत्स्नो दृश्यतेऽधर्मरूपः । बिभ्रद्धर्मो धर्मरूपं तथा च । विद्वांसस्तं संप्रपश्यन्ति बुद्ध्या ॥

yatrādharmo dharmarūpāṇi dhatte | dharmaḥ kṛtsno dṛśyate'dharmarūpaḥ | bibhraddharmo dharmarūpaṃ tathā ca | vidvāṃsastaṃ saṃprapaśyanti buddhyā

कभी अधर्म धर्म के रूप धारण कर लेता है, कभी सम्पूर्ण धर्म अधर्म के रूप में दिखाई देता है, और कहीं धर्म अपने सच्चे रूप में ही रहता है। विद्वान अपनी बुद्धि से इन्हें भली-भाँति पहचान लेते हैं।

श्लोक 3 (5.28.3)

एवं तथैवापदि लिङ्गमेत- । द्धर्माधर्मौ नित्यवृत्ती भजेताम् । आद्यं लिङ्गं यस्य तस्य प्रमाण- । मापद्धर्मं सञ्जय तं निबोध ॥

evaṃ tathaivāpadi liṅgameta- | ddharmādharmau nityavṛttī bhajetām | ādyaṃ liṅgaṃ yasya tasya pramāṇa- | māpaddharmaṃ sañjaya taṃ nibodha

आपत्काल में भी यही होता है — वर्णों के लक्षण वैसे ही बने रहते हैं, पर सदा विद्यमान धर्म और अधर्म बारी-बारी से उन्हें अपना लेते हैं। फिर भी पहला लक्षण उसी के लिए प्रमाण है जिसका वह है। हे संजय, इसे आपद्धर्म समझो।

श्लोक 4 (5.28.4)

लुप्तायां तु प्रकृतौ येन कर्म । निष्पादयेत्तत्परीप्सेद्विहीनः । प्रकृतिस्थश्चापदि वर्तमान । उभौ गर्ह्यौ भवतः सञ्जयैतौ ॥

luptāyāṃ tu prakṛtau yena karma | niṣpādayettatparīpsedvihīnaḥ | prakṛtisthaścāpadi vartamāna | ubhau garhyau bhavataḥ sañjayaitau

जब मनुष्य की स्वाभाविक जीविका पूरी तरह नष्ट हो जाए, तब वह अभावग्रस्त होकर वह उपाय अपनाए जिससे वह अपने कर्तव्य पूरे कर सके। पर जो स्वाभाविक स्थिति में होकर आपद्धर्म अपनाए, और जो आपत्ति में होकर भी स्वाभाविक धर्म पर अड़ा रहे — हे संजय, ये दोनों ही निन्दनीय हैं।

श्लोक 5 (5.28.5)

अविनाशमिच्छतां ब्राह्मणानां । प्रायश्चित्तं विहितं यद्विधात्रा । संपश्येथाः कर्मसु वर्तमानान् । विकर्मस्थान्सञ्जय गर्हयेस्त्वम् ॥

avināśamicchatāṃ brāhmaṇānāṃ | prāyaścittaṃ vihitaṃ yadvidhātrā | saṃpaśyethāḥ karmasu vartamānān | vikarmasthānsañjaya garhayestvam

जो ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व का नाश नहीं चाहते, उनके लिए विधाता ने प्रायश्चित्त का विधान किया है। इसलिए हे संजय, अपने कर्मों में लगे लोगों को और दूसरे कर्म अपनाने वालों को भली-भाँति परखकर ही तुम निन्दा करना।

श्लोक 6 (5.28.6)

मनीषिणां सत्त्विच्छेदनाय । विधीयते सत्सु वृत्तिः सदैव । अब्राह्मणाः सन्ति तु ये न वैद्याः । सर्वोत्सङ्गं साधु मन्येत तेभ्यः ॥

manīṣiṇāṃ sattvicchedanāya | vidhīyate satsu vṛttiḥ sadaiva | abrāhmaṇāḥ santi tu ye na vaidyāḥ | sarvotsaṅgaṃ sādhu manyeta tebhyaḥ

जो मनीषी आत्मा को सब बन्धनों से अलग करना चाहते हैं, उनके लिए सज्जनों के बीच (भिक्षा द्वारा) जीविका सदा विहित है। किन्तु जो ब्राह्मण नहीं हैं और ज्ञाननिष्ठ नहीं हैं, उनके लिए अपने धर्म में पूरी तरह लगे रहना ही उचित मानना चाहिए।

श्लोक 7 (5.28.7)

तदध्वानः पितरो ये च पूर्वे । पितामहा ये च तेभ्यः परेऽन्ये । यज्ञैषिणो ये च हि कर्म कुर्यु- । र्नान्यं ततो नास्तिकोऽस्मीति मन्ये ॥

tadadhvānaḥ pitaro ye ca pūrve | pitāmahā ye ca tebhyaḥ pare'nye | yajñaiṣiṇo ye ca hi karma kuryu- | rnānyaṃ tato nāstiko'smīti manye

हमारे पूर्वज पितर, पितामह और उनसे भी पहले के लोग, जो यज्ञ के इच्छुक थे और कर्म करते रहे — सब इसी मार्ग पर चले। मैं इससे भिन्न कोई मार्ग नहीं मानता; ऐसा करूँ तो मैं स्वयं को नास्तिक समझूँगा।

श्लोक 8 (5.28.8)

यत्किंचनेदं वित्तमस्यां पृथिव्यां । यद्देवानां त्रिदशानां परं यत् । प्राजापत्यं त्रिदिवं ब्रह्मलोकं । नाधर्मतः सञ्जय कामयेयम् ॥

yatkiṃcanedaṃ vittamasyāṃ pṛthivyāṃ | yaddevānāṃ tridaśānāṃ paraṃ yat | prājāpatyaṃ tridivaṃ brahmalokaṃ | nādharmataḥ sañjaya kāmayeyam

हे संजय, इस पृथ्वी पर जो भी धन है, तैंतीस देवताओं का जो कुछ है, और उससे परे जो है — प्रजापति का लोक, स्वर्ग और ब्रह्मलोक — उसे भी मैं अधर्म से पाना नहीं चाहूँगा।

श्लोक 9 (5.28.9)

धर्मेश्वरः कुशलो नीतिमांश्चा- । प्युपासिता ब्राह्मणानां मनीषी । नानाविधांश्चैव महाबलांश्च । राजन्यभोजाननुशास्ति कृष्णः ॥

dharmeśvaraḥ kuśalo nītimāṃścā- | pyupāsitā brāhmaṇānāṃ manīṣī | nānāvidhāṃścaiva mahābalāṃśca | rājanyabhojānanuśāsti kṛṣṇaḥ

धर्म के स्वामी, कुशल, नीतिज्ञ, ब्राह्मणों का आदर करने वाले और मनीषी श्रीकृष्ण अनेक प्रकार के महाबली राजाओं और भोजों का मार्गदर्शन करते हैं।

श्लोक 10 (5.28.10)

यदि ह्यहं विसृजन्साम गर्ह्यो । नियुध्यमानो यदि जह्यां स्वधर्मम् । महायशाः केशवस्तद्ब्रवीतु । वासुदेवस्तूभयोरर्थकामः ॥

yadi hyahaṃ visṛjansāma garhyo | niyudhyamāno yadi jahyāṃ svadharmam | mahāyaśāḥ keśavastadbravītu | vāsudevastūbhayorarthakāmaḥ

यदि मैं सन्धि का मार्ग छोड़ने के कारण निन्दनीय ठहरूँ, या युद्ध करके अपना स्वधर्म त्यागूँ, तो महायशस्वी केशव ही यह बताएँ — वासुदेव, जो दोनों पक्षों का हित चाहते हैं।

श्लोक 11 (5.28.11)

शैनेयोऽयं चेदयश्चान्धकाश्च । वार्ष्णेयभोजाः कुकुराः सृञ्जयाश्च । उपासीना वासुदेवस्य बुद्धिं । निगृह्य शत्रून्सुहृदो नन्दयन्ति ॥

śaineyo'yaṃ cedayaścāndhakāśca | vārṣṇeyabhojāḥ kukurāḥ sṛñjayāśca | upāsīnā vāsudevasya buddhiṃ | nigṛhya śatrūnsuhṛdo nandayanti

यह शिनि का पौत्र (सात्यकि), चेदि और अन्धक, वार्ष्णेय और भोज, कुकुर और सृंजय — ये सब वासुदेव की बुद्धि का अनुसरण करते हुए शत्रुओं को वश में करके मित्रों को आनन्दित करते हैं।

श्लोक 12 (5.28.12)

वृष्ण्यन्धका ह्युग्रसेनादयो वै । कृष्णप्रणीताः सर्व एवेन्द्रकल्पाः । मनस्विनः सत्यपरायणाश्च । महाबला यादवा भोगवन्तः ॥

vṛṣṇyandhakā hyugrasenādayo vai | kṛṣṇapraṇītāḥ sarva evendrakalpāḥ | manasvinaḥ satyaparāyaṇāśca | mahābalā yādavā bhogavantaḥ

उग्रसेन आदि वृष्णि और अन्धक कृष्ण के मार्गदर्शन में सभी इन्द्र के समान हो गए हैं — मनस्वी, सत्यपरायण, महाबली और ऐश्वर्यशाली यादव।

श्लोक 13 (5.28.13)

काश्यो बभ्रुः श्रियमुत्तमां गतो । लब्ध्वा कृष्णं भ्रातरमीशितारम् । यस्मै कामान्वर्षति वासुदेवो । ग्रीष्मात्यये मेघ इव प्रजाभ्यः ॥

kāśyo babhruḥ śriyamuttamāṃ gato | labdhvā kṛṣṇaṃ bhrātaramīśitāram | yasmai kāmānvarṣati vāsudevo | grīṣmātyaye megha iva prajābhyaḥ

काशिराज बभ्रु ने कृष्ण को भाई और स्वामी के रूप में पाकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त किया; वासुदेव उन पर उसी प्रकार कामनाओं की वर्षा करते हैं जैसे ग्रीष्म के अन्त में मेघ प्रजाओं पर जल बरसाता है।

श्लोक 14 (5.28.14)

ईदृशोऽयं केशवस्तात विद्वान् । विद्धि ह्येनं कर्मणां निश्चयज्ञम् । प्रियश्च नः साधुतमश्च कृष्णो । नातिक्रामे वचनं केशवस्य ॥

īdṛśo'yaṃ keśavastāta vidvān | viddhi hyenaṃ karmaṇāṃ niścayajñam | priyaśca naḥ sādhutamaśca kṛṣṇo | nātikrāme vacanaṃ keśavasya

हे तात, केशव ऐसे ही ज्ञानी हैं; उन्हें सब कर्मों का सही निश्चय जानने वाला समझो। कृष्ण हमें प्रिय हैं और सज्जनों में श्रेष्ठ हैं; मैं केशव के वचन का उल्लंघन नहीं करूँगा।

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