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उद्योग पर्व · अध्याय 27

संजय का युधिष्ठिर को युद्ध त्यागने का उपदेश

संजय उत्तर देते हैं कि युद्ध से राज्य पाने की अपेक्षा युधिष्ठिर के लिए अन्धकों और वृष्णियों के बीच भिक्षा माँगकर जीना श्रेयस्कर है। जीवन छोटा है, कामना बन्धन है और कर्म परलोक तक मनुष्य का पीछा करते हैं, इसलिए धर्म में इतने निष्ठ व्यक्ति को उसका पुण्य नहीं गँवाना चाहिए; और यदि युद्ध ही करना था तो वनवास के समय करना चाहिए था, जब सहायक पास थे। भीष्म, द्रोण आदि के संहार का चित्र खींचते हुए वे युधिष्ठिर से क्रोध को पी जाने और देवयान का मार्ग छोड़ने के बजाय अपना भाग भी त्याग देने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (5.27.1)

धर्मनित्या पाण्डव ते विचेष्टा । लोके श्रुता दृश्यते चापि पार्थ । महाश्रावं जीवितं चाप्यनित्यं । संपश्य त्वं पाण्डव मा व्यनीनशः ॥

dharmanityā pāṇḍava te viceṣṭā | loke śrutā dṛśyate cāpi pārtha | mahāśrāvaṃ jīvitaṃ cāpyanityaṃ | saṃpaśya tvaṃ pāṇḍava mā vyanīnaśaḥ

हे पाण्डुनन्दन, आपका आचरण सदा धर्म में स्थित है; हे पार्थ, यह संसार में प्रसिद्ध है और प्रत्यक्ष दिखाई भी देता है। जीवन महान कीर्ति देने वाला होकर भी अनित्य है; हे पाण्डव, इस पर विचार कीजिए और विनाश न कीजिए।

श्लोक 2 (5.27.2)

नचेद्भागं कुरवोऽन्यत्र युद्धा- । त्प्रयच्छेरंस्तुभ्यमजातशत्रो । भैक्षचर्यामन्धकवृष्णिराज्ये । श्रेयो मन्ये न तु युद्धेन राज्यम् ॥

nacedbhāgaṃ kuravo'nyatra yuddhā- | tprayaccheraṃstubhyamajātaśatro | bhaikṣacaryāmandhakavṛṣṇirājye | śreyo manye na tu yuddhena rājyam

हे अजातशत्रु, यदि कुरु युद्ध के बिना आपको आपका भाग न दें, तो मैं अन्धकों और वृष्णियों के राज्य में भिक्षा माँगकर जीना श्रेयस्कर मानता हूँ, युद्ध से राज्य पाना नहीं।

श्लोक 3 (5.27.3)

अल्पकालं जीवितं यन्मनुष्ये । महास्रावं नित्यदुःखं चलं च । भूयश्च तद्यशसो नानुरूपं । तस्मात्पापं पाण्डव मा कृथास्त्वम् ॥

alpakālaṃ jīvitaṃ yanmanuṣye | mahāsrāvaṃ nityaduḥkhaṃ calaṃ ca | bhūyaśca tadyaśaso nānurūpaṃ | tasmātpāpaṃ pāṇḍava mā kṛthāstvam

मनुष्य का जीवन थोड़े समय का है, महान क्लेशों से भरा, सदा दुःखमय और चंचल है; फिर यह कर्म आपके यश के अनुरूप भी नहीं। इसलिए हे पाण्डव, आप पाप न कीजिए।

श्लोक 4 (5.27.4)

कामा मनुष्यं प्रसजन्त एते । धर्मस्य ये विघ्नमूलं नरेन्द्र । पूर्वं नरस्तान्मतिमान्प्रणिघ्नन् । लोके प्रशंसां लभतेऽनवद्याम् ॥

kāmā manuṣyaṃ prasajanta ete | dharmasya ye vighnamūlaṃ narendra | pūrvaṃ narastānmatimānpraṇighnan | loke praśaṃsāṃ labhate'navadyām

हे नरेन्द्र, ये कामनाएँ मनुष्य से चिपट जाती हैं और धर्म के मार्ग की हर बाधा की जड़ हैं। जो बुद्धिमान मनुष्य पहले ही उन्हें नष्ट कर देता है, वह संसार में निर्दोष प्रशंसा पाता है।

श्लोक 5 (5.27.5)

निबन्धनी ह्यर्थतृष्णेह पार्थ । तामिच्छतां बाध्यते धर्म एव । धर्मं तु यः प्रवृणीते स बुद्धः । कामे गृध्नो हीयतेऽर्थानुरोधात् ॥

nibandhanī hyarthatṛṣṇeha pārtha | tāmicchatāṃ bādhyate dharma eva | dharmaṃ tu yaḥ pravṛṇīte sa buddhaḥ | kāme gṛdhno hīyate'rthānurodhāt

हे पार्थ, इस संसार में धन की तृष्णा बन्धन है; उसे चाहने वालों का धर्म ही बाधित होता है। जो धर्म को चुनता है वही ज्ञानी है; भोग का लोभी अर्थ के पीछे भागकर पतित हो जाता है।

श्लोक 6 (5.27.6)

धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं । महाप्रतापः सवितेव भाति । हीनो हि धर्मेण महीमपीमां । लब्ध्वा नरः सीदति पापबुद्धिः ॥

dharmaṃ kṛtvā karmaṇāṃ tāta mukhyaṃ | mahāpratāpaḥ saviteva bhāti | hīno hi dharmeṇa mahīmapīmāṃ | labdhvā naraḥ sīdati pāpabuddhiḥ

हे तात, धर्म को अपने सब कर्मों में प्रधान बनाकर मनुष्य सूर्य के समान महान प्रताप से चमकता है; किन्तु धर्म से हीन पापबुद्धि मनुष्य इस सारी पृथ्वी को पाकर भी दुःख में डूब जाता है।

श्लोक 7 (5.27.7)

वेदोऽधीतश्चरितं ब्रह्मचर्यं । यज्ञैरिष्टं ब्राह्मणेभ्यश्च दत्तम् । परं स्थानं मन्यमानेन भूय । आत्मा दत्तो वर्षपूगं सुखेभ्यः ॥

vedo'dhītaścaritaṃ brahmacaryaṃ | yajñairiṣṭaṃ brāhmaṇebhyaśca dattam | paraṃ sthānaṃ manyamānena bhūya | ātmā datto varṣapūgaṃ sukhebhyaḥ

आपने वेद पढ़े हैं, ब्रह्मचर्य का पालन किया है, यज्ञ किए हैं और ब्राह्मणों को दान दिया है; परलोक के परम स्थान को लक्ष्य मानकर आपने वर्षों तक वहाँ के सुखों के लिए स्वयं को समर्पित किया है।

श्लोक 8 (5.27.8)

सुखप्रिये सेवमानोऽतिवेलं । योगाभ्यासे यो न करोति कर्म । वित्तक्षये हीनसुखोऽतिवेलं । दुःखं शेते कामवेगप्रणुन्नः ॥

sukhapriye sevamāno'tivelaṃ | yogābhyāse yo na karoti karma | vittakṣaye hīnasukho'tivelaṃ | duḥkhaṃ śete kāmavegapraṇunnaḥ

जो सुखों और प्रियजनों का अत्यधिक सेवन करता है और योगाभ्यास का कोई कर्म नहीं करता, वह धन नष्ट होने पर सुख से वंचित होकर कामना के वेग से धकेला हुआ बड़े दुःख में पड़ा रहता है।

श्लोक 9 (5.27.9)

एवं पुनर्ब्रह्मचर्याऽप्रसक्तो । हित्वा धर्मं यः प्रकरोत्यधर्मम् । अश्रद्दधत्परलोकाय मूढो । हित्वा देहं तप्यते प्रेत्य मन्दः ॥

evaṃ punarbrahmacaryā'prasakto | hitvā dharmaṃ yaḥ prakarotyadharmam | aśraddadhatparalokāya mūḍho | hitvā dehaṃ tapyate pretya mandaḥ

इसी प्रकार जो ब्रह्मचर्य में निष्ठ नहीं है, जो धर्म को छोड़कर अधर्म करता है, वह परलोक पर श्रद्धा न रखने वाला मूढ़ और मन्दबुद्धि मनुष्य देह छोड़ने के बाद संताप भोगता है।

श्लोक 10 (5.27.10)

न कर्मणां विप्रणाशोऽस्त्यमुत्र । पुण्यानां वाऽप्यथवा पापकानाम् । पूर्वं कर्तुर्गच्छति पुण्यपापं । पश्चात्त्वेनमनुयात्येव कर्ता ॥

na karmaṇāṃ vipraṇāśo'styamutra | puṇyānāṃ vā'pyathavā pāpakānām | pūrvaṃ karturgacchati puṇyapāpaṃ | paścāttvenamanuyātyeva kartā

परलोक में कर्मों का नाश नहीं होता, चाहे वे पुण्य हों या पाप। कर्ता का पुण्य और पाप पहले जाता है, और फिर कर्ता उसके पीछे-पीछे जाता है।

श्लोक 11 (5.27.11)

न्यायोपेतं ब्राह्मणेभ्योऽथ दत्तं । श्रद्धापूतं गन्धरसोपपन्नम् । अन्वाहार्येषूत्तमदक्षिणेषु । तथारूपं कर्म विख्यायते ते ॥

nyāyopetaṃ brāhmaṇebhyo'tha dattaṃ | śraddhāpūtaṃ gandharasopapannam | anvāhāryeṣūttamadakṣiṇeṣu | tathārūpaṃ karma vikhyāyate te

न्याय से अर्जित, श्रद्धा से पवित्र, सुगन्ध और रस से युक्त जो दान ब्राह्मणों को दिया गया, और उत्तम दक्षिणा वाले अन्वाहार्य-युक्त यज्ञ — ऐसे ही कर्मों के लिए आप विख्यात हैं।

श्लोक 12 (5.27.12)

इह क्षेत्रे क्रियते पार्थ कार्यं । न वै किंचित्क्रियते प्रेत्य कार्यम् । कृतं त्वया पारलोक्यं च कर्म । पुण्यं महत्सद्भिरतिप्रशस्तम् ॥

iha kṣetre kriyate pārtha kāryaṃ | na vai kiṃcitkriyate pretya kāryam | kṛtaṃ tvayā pāralokyaṃ ca karma | puṇyaṃ mahatsadbhiratipraśastam

हे पार्थ, कर्म इसी लोक रूपी क्षेत्र में किया जाता है; मृत्यु के बाद कुछ भी नहीं किया जाता। आपने परलोक के लिए कर्म कर लिया है — वह महान पुण्य, जिसकी सज्जन अत्यन्त प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 13 (5.27.13)

जहाति मृत्युं च जरां भयं च । न क्षुत्पिपासे मनसोऽप्रियाणि । न कर्तव्यं विद्यते तत्र किंचि- । दन्यत्र वै चेन्द्रियप्रीणनाद्धि ॥

jahāti mṛtyuṃ ca jarāṃ bhayaṃ ca | na kṣutpipāse manaso'priyāṇi | na kartavyaṃ vidyate tatra kiṃci- | danyatra vai cendriyaprīṇanāddhi

वहाँ मनुष्य मृत्यु, बुढ़ापे और भय से छूट जाता है; वहाँ न भूख-प्यास है, न मन को अप्रिय लगने वाली कोई बात। वहाँ इन्द्रियों को तृप्त करने के अतिरिक्त कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

श्लोक 14 (5.27.14)

एवंरूपं कर्मफलं नरेन्द्र । मातापित्रोर्हृदयस्याप्रियेण । त्यज क्रोधं पाण्डव हर्षजं च । लोकावुभौ मा प्रहासीश्चिराय ॥

evaṃrūpaṃ karmaphalaṃ narendra | mātāpitrorhṛdayasyāpriyeṇa | tyaja krodhaṃ pāṇḍava harṣajaṃ ca | lokāvubhau mā prahāsīścirāya

हे नरेन्द्र, कर्मों का फल ऐसा ही होता है। हे पाण्डव, माता-पिता के हृदय को दुःख देने वाले क्रोध को और उससे उपजने वाले हर्ष को त्याग दीजिए; दीर्घकाल के लिए दोनों लोकों को न गँवाइए।

श्लोक 15 (5.27.15)

अन्तं गत्वा कर्मणां या प्रशंसा । सत्यं दमं चार्जवमानृशंस्यम् । अश्वमेधं राजसूयं तथेष्ट्वा । पापस्यान्तं कर्मणो मा पुनर्गाः ॥

antaṃ gatvā karmaṇāṃ yā praśaṃsā | satyaṃ damaṃ cārjavamānṛśaṃsyam | aśvamedhaṃ rājasūyaṃ tatheṣṭvā | pāpasyāntaṃ karmaṇo mā punargāḥ

आप प्रशंसनीय कर्मों — सत्य, इन्द्रियसंयम, सरलता और दया — की पराकाष्ठा तक पहुँच चुके हैं और अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञ कर चुके हैं; अब फिर से पापकर्म की ओर न जाइए।

श्लोक 16 (5.27.16)

तच्चेदेवं द्वेषरूपेण पार्थाः । करिष्यध्वं कर्म पापं चिराय । निवसध्वं वर्षपूगान्वनेषु । दुःखं वासं पाण्डवा धर्म एव ॥

taccedevaṃ dveṣarūpeṇa pārthāḥ | kariṣyadhvaṃ karma pāpaṃ cirāya | nivasadhvaṃ varṣapūgānvaneṣu | duḥkhaṃ vāsaṃ pāṇḍavā dharma eva

हे पार्थो, यदि इतने समय बाद आप द्वेषवश यही पापकर्म करने वाले थे, तो हे पाण्डवो, आपने वर्षों तक वनों में जो कष्टमय निवास किया, वह धर्म के अनुसार उचित ही था।

श्लोक 17 (5.27.17)

प्रव्रज्यया यातयित्वा पुरस्ता- । दात्माधीनं यद्बलं ते तदाऽऽसीत् । नित्यं च वश्याः सचिवास्तवेमे । जनार्दनो युयुधानश्च वीरः ॥

pravrajyayā yātayitvā purastā- | dātmādhīnaṃ yadbalaṃ te tadā''sīt | nityaṃ ca vaśyāḥ sacivāstaveme | janārdano yuyudhānaśca vīraḥ

वनवास के समय भी आपके पास जो बल था, वह आपके अपने अधीन था; ये मंत्री सदा आपके वश में थे, तथा जनार्दन और वीर युयुधान भी,

श्लोक 18 (5.27.18)

मत्स्यो राजा रुक्मरथः सपुत्रः । प्रहारिभिः सहपुत्रैर्विराटः । राजानस्ते ये विजिताः पुरस्ता- । त्त्वामेव ते संश्रयेयुः समस्ताः ॥

matsyo rājā rukmarathaḥ saputraḥ | prahāribhiḥ sahaputrairvirāṭaḥ | rājānaste ye vijitāḥ purastā- | ttvāmeva te saṃśrayeyuḥ samastāḥ

स्वर्ण-रथ वाले मत्स्यराज विराट अपने प्रहारकुशल पुत्रों सहित, और जिन राजाओं को आपने पहले जीता था — वे सब आपकी ही शरण लेते।

श्लोक 19 (5.27.19)

महासहायः प्रतपन्बलस्थः । पुरस्कृतो वासुदेवार्जुनाभ्याम् । वरान्हनिष्यन्द्विषतो रङ्गमध्ये । व्यनेष्यथा धार्तराष्ट्रस्य दर्पम् ॥

mahāsahāyaḥ pratapanbalasthaḥ | puraskṛto vāsudevārjunābhyām | varānhaniṣyandviṣato raṅgamadhye | vyaneṣyathā dhārtarāṣṭrasya darpam

महान सहायकों से युक्त, प्रतापी और बल में दृढ़ रहकर, वासुदेव और अर्जुन को आगे रखकर, आप रणभूमि में श्रेष्ठ शत्रुओं का वध करते और धृतराष्ट्र-पुत्र का दर्प चूर कर देते।

श्लोक 20 (5.27.20)

बलं कस्माद्वर्धयित्वा परस्य । निजान्कस्मात्कर्शयित्वा सहायान् । निरुष्य कस्माद्वर्षपूगान्वनेषु । युयुत्ससे पाण्डव हीनकाले ॥

balaṃ kasmādvardhayitvā parasya | nijānkasmātkarśayitvā sahāyān | niruṣya kasmādvarṣapūgānvaneṣu | yuyutsase pāṇḍava hīnakāle

फिर आपने शत्रु का बल क्यों बढ़ने दिया? अपने सहायकों को क्यों दुर्बल होने दिया? हे पाण्डव, वर्षों तक वनों में रहने के बाद अब, जब समय बीत चुका है, आप युद्ध क्यों करना चाहते हैं?

श्लोक 21 (5.27.21)

अप्राज्ञो वा पाण्डव युद्ध्यमानो- । ऽधर्मज्ञो वा भूतिमथोऽभ्युपैति । प्रज्ञावान्वा बुद्ध्यमानोऽपि धर्मं । संस्तम्भाद्वा सोऽपि भूतेरपैति ॥

aprājño vā pāṇḍava yuddhyamāno- | 'dharmajño vā bhūtimatho'bhyupaiti | prajñāvānvā buddhyamāno'pi dharmaṃ | saṃstambhādvā so'pi bhūterapaiti

हे पाण्डव, अज्ञानी या धर्म न जानने वाला भी युद्ध करके समृद्धि पा सकता है; और धर्म को समझने वाला बुद्धिमान भी हठ के कारण समृद्धि से हाथ धो सकता है।

श्लोक 22 (5.27.22)

नाधर्मे ते धीयते पार्थ बुद्धि- । र्न संरम्भात्कर्म चकर्थ पापम् । आत्थ किं तत्कारणं यस्य हेतोः । प्रज्ञाविरुद्धं कर्म चिकीर्षसीदम् ॥

nādharme te dhīyate pārtha buddhi- | rna saṃrambhātkarma cakartha pāpam | āttha kiṃ tatkāraṇaṃ yasya hetoḥ | prajñāviruddhaṃ karma cikīrṣasīdam

हे पार्थ, आपकी बुद्धि अधर्म में नहीं लगती, न ही आपने कभी क्रोध में आकर पापकर्म किया है। तो बताइए, वह कौन-सा कारण है जिसके लिए आप यह विवेक-विरुद्ध कर्म करना चाहते हैं?

श्लोक 23 (5.27.23)

अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगि । यशोमुषं पापफलोदयं वा । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो । मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य ॥

avyādhijaṃ kaṭukaṃ śīrṣarogi | yaśomuṣaṃ pāpaphalodayaṃ vā | satāṃ peyaṃ yanna pibantyasanto | manyuṃ mahārāja piba praśāmya

क्रोध बिना रोग के ही कड़वा है, सिर में पीड़ा देता है, यश को हर लेता है और पाप का फल लाता है; सज्जन इसे पी जाते हैं, दुर्जन नहीं पी पाते। हे महाराज, इस क्रोध को पी जाइए और शान्त हो जाइए।

श्लोक 24 (5.27.24)

पापानुबन्धं को नु तं कामयेत । क्षमैव ते ज्यायसी नोत भोगाः । यत्र भीष्मः शान्तनवो हतः स्या- । द्यत्र द्रोणः सहपुत्रो हतः स्यात् ॥

pāpānubandhaṃ ko nu taṃ kāmayeta | kṣamaiva te jyāyasī nota bhogāḥ | yatra bhīṣmaḥ śāntanavo hataḥ syā- | dyatra droṇaḥ sahaputro hataḥ syāt

पाप से बँधी उस वस्तु की कौन कामना करेगा? आपके लिए भोगों से क्षमा ही श्रेष्ठ है — उन भोगों से, जिनके लिए शान्तनुपुत्र भीष्म मारे जाएँ, पुत्र सहित द्रोण मारे जाएँ,

श्लोक 25 (5.27.25)

कृपः शल्यः सौमदत्तिर्विकर्णो । विविंशतिः कर्णदुर्योधनौ च । एतान्हत्वा कीदृशं तत्सुखं स्या- । द्यद्विन्देथास्तदनुब्रूहि पार्थ ॥

kṛpaḥ śalyaḥ saumadattirvikarṇo | viviṃśatiḥ karṇaduryodhanau ca | etānhatvā kīdṛśaṃ tatsukhaṃ syā- | dyadvindethāstadanubrūhi pārtha

और कृप, शल्य, सौमदत्ति, विकर्ण, विविंशति, कर्ण और दुर्योधन भी। इन्हें मारकर आपको कैसा सुख मिलेगा? हे पार्थ, यह मुझे बताइए।

श्लोक 26 (5.27.26)

लब्ध्वाऽपीमां पृथिवीं सागरान्तां । जरामृत्यू नैव हि त्वं प्रजह्याः । प्रियाप्रिये सुखदुःखे च राज- । न्नेवं विद्वान्नैव युद्धं कुरु त्वम् ॥

labdhvā'pīmāṃ pṛthivīṃ sāgarāntāṃ | jarāmṛtyū naiva hi tvaṃ prajahyāḥ | priyāpriye sukhaduḥkhe ca rāja- | nnevaṃ vidvānnaiva yuddhaṃ kuru tvam

हे राजन्, समुद्र तक फैली इस पृथ्वी को पाकर भी आप बुढ़ापे और मृत्यु से, प्रिय और अप्रिय से, सुख और दुःख से छूट नहीं पाएँगे। यह जानकर आप युद्ध न कीजिए।

श्लोक 27 (5.27.27)

अमात्यानां यदि कामस्य हेतो- । रेवं युक्तं कर्म चिकीर्षसि त्वम् । अपक्रमेः स्वं प्रदायैव तेषां । मागास्त्वं वै देवयानात्पथोऽद्य ॥

amātyānāṃ yadi kāmasya heto- | revaṃ yuktaṃ karma cikīrṣasi tvam | apakrameḥ svaṃ pradāyaiva teṣāṃ | māgāstvaṃ vai devayānātpatho'dya

यदि आप अपने मंत्रियों की इच्छा के कारण ऐसा कर्म करना चाहते हैं, तो अपना सब कुछ उन्हें देकर स्वयं हट जाइए; पर आज देवयान के मार्ग से विचलित न होइए।

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