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उद्योग पर्व · अध्याय 26

युधिष्ठिर की इन्द्रप्रस्थ की माँग

युधिष्ठिर संजय की शान्ति की विनती का उत्तर देते हैं: उन्होंने कभी युद्ध नहीं चाहा, जिसे कोई समझदार मनुष्य नहीं चुनता। वे धृतराष्ट्र के अतृप्त लोभ, दुर्योधन और उसके दुष्ट मंत्रियों के प्रति उनके मोह तथा विदुर की उपेक्षा को दोष देते हैं, और चेताते हैं कि कर्ण सहित कोई भी अर्जुन और भीम के सामने टिक नहीं सकता। संजय के सम्मान में वे पिछले अन्यायों को क्षमा कर शान्ति करने को तैयार हैं, यदि इन्द्रप्रस्थ उन्हें लौटा दिया जाए।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (5.26.1)

कां नु वाचं सञ्जय मे शृणोषि । युद्धैषिणीं येन युद्धाद्बिभेषि । अयुद्धं वै तात युद्धाद्गरीयः । कस्तल्लब्ध्वा जातु युद्ध्येत सूत ॥

kāṃ nu vācaṃ sañjaya me śṛṇoṣi | yuddhaiṣiṇīṃ yena yuddhādbibheṣi | ayuddhaṃ vai tāta yuddhādgarīyaḥ | kastallabdhvā jātu yuddhyeta sūta

हे संजय, तुमने मेरी कौन-सी ऐसी बात सुनी है जो युद्ध की इच्छा प्रकट करती हो, जिससे तुम युद्ध से डर रहे हो? हे तात, युद्ध न करना युद्ध करने से श्रेष्ठ है। हे सूत, वह मिल जाए तो भला कौन कभी युद्ध करेगा?

श्लोक 2 (5.26.2)

अकुर्वतश्चेत्पुरुषस्य सञ्जय । सिद्ध्येत्सङ्कल्पो मनसा यं यमिच्छेत् । न कर्म कुर्याद्विदितं ममैत- । दन्यत्र युद्धाद्बहु यल्लघीयः ॥

akurvataścetpuruṣasya sañjaya | siddhyetsaṅkalpo manasā yaṃ yamicchet | na karma kuryādviditaṃ mamaita- | danyatra yuddhādbahu yallaghīyaḥ

हे संजय, यदि मनुष्य बिना कर्म किए ही मन में जो-जो चाहे वह संकल्प सिद्ध कर ले, तो वह कोई कर्म न करे — यह मैं भली-भाँति जानता हूँ। युद्ध को छोड़कर जो भी छोटा उपाय हो, वह बहुत मूल्यवान है।

श्लोक 3 (5.26.3)

कुतो युद्धं जातु नरोऽवगच्छे- । त्को देवशप्तो हि वृणीत युद्धम् । सुखैषिणः कर्म कुर्वन्ति पार्था । धर्मादहीनं यच्च लोकस्य पथ्यम् ॥

kuto yuddhaṃ jātu naro'vagacche- | tko devaśapto hi vṛṇīta yuddham | sukhaiṣiṇaḥ karma kurvanti pārthā | dharmādahīnaṃ yacca lokasya pathyam

भला मनुष्य कभी युद्ध का सहारा क्यों ले? देवताओं से शापित हुए बिना कौन युद्ध को चुनेगा? पृथा के पुत्र सुख की इच्छा से वही कर्म करते हैं जो धर्म से विचलित न हो और जो लोक के लिए हितकारी हो।

श्लोक 4 (5.26.4)

धर्मोदयं सुखमाशंसमानाः । कृच्छ्रोपायं तत्त्वतः कर्म दुःखम् । सुखं प्रेप्सुर्विजिघांसुश्च दुःखं । कर्मारभेद्यच्च धर्मानपेतम् ॥

dharmodayaṃ sukhamāśaṃsamānāḥ | kṛcchropāyaṃ tattvataḥ karma duḥkham | sukhaṃ prepsurvijighāṃsuśca duḥkhaṃ | karmārabhedyacca dharmānapetam

धर्म से उत्पन्न सुख की आशा रखते हुए, और यह जानते हुए कि कष्टसाध्य कर्म वास्तव में दुःखरूप है, सुख चाहने वाला और दुःख का नाश करने का इच्छुक मनुष्य वही कर्म आरम्भ करे जो धर्म से विमुख न हो।

श्लोक 5 (5.26.5)

क इन्द्रियाणां प्रीतिवशानुगानां । कर्माभिज्ञः स्वशरीरं दुनोति । यया प्रमुक्तो न करोति दुःखं । तृष्णां त्यजेत्सर्वधर्मादपेताम् ॥

ka indriyāṇāṃ prītivaśānugānāṃ | karmābhijñaḥ svaśarīraṃ dunoti | yayā pramukto na karoti duḥkhaṃ | tṛṣṇāṃ tyajetsarvadharmādapetām

कर्म का मर्म जानने वाला कौन मनुष्य सुख के वश में चलने वाली इन्द्रियों के लिए अपने शरीर को कष्ट देगा? सब धर्मों से विमुख तृष्णा को त्याग देना चाहिए, जिससे मुक्त होकर मनुष्य दुःख उत्पन्न नहीं करता।

श्लोक 6 (5.26.6)

यथेध्यमानस्य समिद्धतेजसो । भूयो बलं वर्धते पावकस्य । कामार्थलाभेन तथैव भूयो । न तृप्यते सर्पिषेवाग्निरिद्धः । संपश्येमं भोगचयं महान्तं । सहास्माभिर्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः ॥

yathedhyamānasya samiddhatejaso | bhūyo balaṃ vardhate pāvakasya | kāmārthalābhena tathaiva bhūyo | na tṛpyate sarpiṣevāgniriddhaḥ | saṃpaśyemaṃ bhogacayaṃ mahāntaṃ | sahāsmābhirdhṛtarāṣṭrasya rājñaḥ

जैसे ईंधन डाले जाने पर प्रज्वलित अग्नि का बल और भी बढ़ता जाता है, वैसे ही इच्छित वस्तुएँ पाकर भी मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता, जैसे घी से धधकती आग तृप्त नहीं होती। राजा धृतराष्ट्र के पास हमारे भाग सहित भोगों का जो यह विशाल भण्डार है, उसे देखो।

श्लोक 7 (5.26.7)

नाश्रेयसामीश्वरो विग्रहाणां । नाश्रेयसां गीतशब्दं शृणोति । नाश्रेयसः सेवते माल्यगन्धा- । न्न चाप्यश्रेयांस्यनुलेपनानि । नाश्रेयसः प्रावरानध्यवस्ते । कथं त्वस्मान्संप्रणुदेत्कुरुभ्यः ॥

nāśreyasāmīśvaro vigrahāṇāṃ | nāśreyasāṃ gītaśabdaṃ śṛṇoti | nāśreyasaḥ sevate mālyagandhā- | nna cāpyaśreyāṃsyanulepanāni | nāśreyasaḥ prāvarānadhyavaste | kathaṃ tvasmānsaṃpraṇudetkurubhyaḥ

कम पुण्य वाला संघर्षों में प्रभुत्व नहीं पाता; कम पुण्य वाला गीतों की ध्वनि नहीं सुनता; कम पुण्य वाला माला और सुगन्ध का सेवन नहीं करता, न ही उत्तम अंगराग का; कम पुण्य वाला उत्तम वस्त्र नहीं ओढ़ता। अन्यथा वह हमें कुरुओं के बीच से कैसे निकाल देता?

श्लोक 8 (5.26.8)

अत्रैव स्यादबुधस्यैव कामः । प्रायः शरीरे हृदयं दुनोति ॥

atraiva syādabudhasyaiva kāmaḥ | prāyaḥ śarīre hṛdayaṃ dunoti

फिर भी ऐसी कामना केवल अज्ञानी की ही होती है; यह प्रायः शरीर के भीतर हृदय को संतप्त करती रहती है।

श्लोक 9 (5.26.9)

स्वयं राजा विषमस्थः परेषु । सामर्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु । यथाऽऽत्मनः पश्यति वृत्तमेव । तथा परेषामपि सोऽभ्युपैति ॥

svayaṃ rājā viṣamasthaḥ pareṣu | sāmarthyamanvicchati tanna sādhu | yathā''tmanaḥ paśyati vṛttameva | tathā pareṣāmapi so'bhyupaiti

राजा स्वयं संकट में खड़ा होकर दूसरों में सामर्थ्य खोजता है — यह उचित नहीं। जैसा वह अपना आचरण देखता है, वैसा ही दूसरों का भी समझ लेता है।

श्लोक 10 (5.26.10)

आसन्नमग्निं तु निदाघकाले । गम्भीरकक्षे गहने विसृज्य । यथा विवृद्धं वायुवशेन शोचे- । त्क्षेमं मुमुक्षुः शिशिरव्यपाये ॥

āsannamagniṃ tu nidāghakāle | gambhīrakakṣe gahane visṛjya | yathā vivṛddhaṃ vāyuvaśena śoce- | tkṣemaṃ mumukṣuḥ śiśiravyapāye

जैसे कोई मनुष्य शिशिर बीतने पर, ग्रीष्म ऋतु में, घनी घास वाले गहन वन में पास ही आग छोड़ दे, और जब वह वायु के वेग से बढ़ जाए तब अपने बचाव के लिए छटपटाता हुआ शोक करे —

श्लोक 11 (5.26.11)

प्राप्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रोऽद्य राजा । लालप्यते सञ्जय कस्य हेतोः । प्रगृह्य दुर्बुद्धिमनार्जवे रतं । पुत्रं मन्दं मूढममन्त्रिणं तु ॥

prāptaiśvaryo dhṛtarāṣṭro'dya rājā | lālapyate sañjaya kasya hetoḥ | pragṛhya durbuddhimanārjave rataṃ | putraṃ mandaṃ mūḍhamamantriṇaṃ tu

— वैसे ही हे संजय, ऐश्वर्य पा चुके राजा धृतराष्ट्र आज किस कारण विलाप कर रहे हैं, जबकि उन्होंने अपने दुर्बुद्धि, कुटिलता में रत, अभागे, मूढ़ और सत्परामर्श न मानने वाले पुत्र को ही अपनाया है?

श्लोक 12 (5.26.12)

अनाप्तवच्चाप्ततमस्य वाचः । सुयोधनो विदुरस्यावमत्य । सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी । संबुध्यमानो विशतेऽधर्ममेव ॥

anāptavaccāptatamasya vācaḥ | suyodhano vidurasyāvamatya | sutasya rājā dhṛtarāṣṭraḥ priyaiṣī | saṃbudhyamāno viśate'dharmameva

सुयोधन परम विश्वसनीय विदुर की बातों का ऐसे अनादर करता है मानो वे किसी अविश्वसनीय व्यक्ति की हों; और पुत्र का प्रिय चाहने वाले राजा धृतराष्ट्र जानते-बूझते अधर्म में ही प्रवेश करते हैं।

श्लोक 13 (5.26.13)

मेधाविनं ह्यर्थकामं कुरूणां । बहुश्रुतं वाग्मिनं शीलवन्तम् । स तं राजा धृतराष्ट्रः कुरुभ्यो । न सस्मार विदुरं पुत्रकाम्यात् ॥

medhāvinaṃ hyarthakāmaṃ kurūṇāṃ | bahuśrutaṃ vāgminaṃ śīlavantam | sa taṃ rājā dhṛtarāṣṭraḥ kurubhyo | na sasmāra viduraṃ putrakāmyāt

विदुर मेधावी, कुरुओं का हित चाहने वाले, बहुश्रुत, वाक्पटु और शीलवान हैं; फिर भी राजा धृतराष्ट्र ने पुत्र-मोह के कारण कुरुओं के हित में उनकी बात का आदर नहीं किया।

श्लोक 14 (5.26.14)

मानघ्नस्यासौ मानकामस्य चेर्षोः । संरम्भिणश्चार्थधर्मातिगस्य । दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य । कामात्मनो दौर्हृदैर्भावितस्य ॥

mānaghnasyāsau mānakāmasya cerṣoḥ | saṃrambhiṇaścārthadharmātigasya | durbhāṣiṇo manyuvaśānugasya | kāmātmano daurhṛdairbhāvitasya

जो दूसरों का मान नष्ट करता है पर स्वयं मान चाहता है, जो ईर्ष्यालु और क्रोधी है, अर्थ और धर्म दोनों की मर्यादा लाँघता है, कटुभाषी है, क्रोध के वश में चलता है, कामनाओं में डूबा है और पापों से पोषित है —

श्लोक 15 (5.26.15)

अनेयस्याश्रेयसो दीर्घमन्यो- । र्मित्रद्रुहः सञ्जय पापबुद्धेः । सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी । प्रपश्यमानः प्राजहाद्धर्मकामौ ॥

aneyasyāśreyaso dīrghamanyo- | rmitradruhaḥ sañjaya pāpabuddheḥ | sutasya rājā dhṛtarāṣṭraḥ priyaiṣī | prapaśyamānaḥ prājahāddharmakāmau

जो शिक्षा के योग्य नहीं, अभागा है, लंबे समय तक बैर पालता है, मित्रों से द्रोह करता है और पापबुद्धि है — हे संजय, ऐसे पुत्र का प्रिय चाहने वाले राजा धृतराष्ट्र ने सब कुछ देखते हुए भी धर्म और काम दोनों को त्याग दिया है।

श्लोक 16 (5.26.16)

तदैव मे सञ्जय दीव्यतोऽभू- । न्मतिः कुरूणामागतः स्यादभावः । काव्यां वाचं विदुरो भाषमाणो । न विन्दते यद्धार्तराष्ट्रात्प्रशंसाम् ॥

tadaiva me sañjaya dīvyato'bhū- | nmatiḥ kurūṇāmāgataḥ syādabhāvaḥ | kāvyāṃ vācaṃ viduro bhāṣamāṇo | na vindate yaddhārtarāṣṭrātpraśaṃsām

हे संजय, जब मैं जुआ खेल रहा था, तभी मेरे मन में यह विचार आया कि कुरुओं का विनाश आ पहुँचा है, क्योंकि विवेकपूर्ण वचन कहने वाले विदुर को धृतराष्ट्र के पुत्र से कोई सराहना नहीं मिली।

श्लोक 17 (5.26.17)

क्षत्तुर्यदा नान्ववर्तन्त बुद्धिं । कृच्छ्रं कुरून्सूत तदाऽभ्याजगाम । यावत्प्रज्ञामन्ववर्तन्त तस्य । तावत्तेषां राष्ट्रवृद्धिर्बभूव ॥

kṣatturyadā nānvavartanta buddhiṃ | kṛcchraṃ kurūnsūta tadā'bhyājagāma | yāvatprajñāmanvavartanta tasya | tāvatteṣāṃ rāṣṭravṛddhirbabhūva

हे सूत, जब उन्होंने क्षत्ता विदुर की बुद्धि का अनुसरण करना छोड़ दिया, तभी कुरुओं पर संकट आ पड़ा; जब तक वे उनकी प्रज्ञा पर चलते रहे, तब तक उनका राष्ट्र बढ़ता रहा।

श्लोक 18 (5.26.18)

तदर्थलुब्धस्य निबोध मेऽद्य । ये मन्त्रिणो धार्तराष्ट्रस्य सूत । दुःशासनः शकुनिः सूतपुत्रो । गावल्गणे पश्य संमोहमस्य ॥

tadarthalubdhasya nibodha me'dya | ye mantriṇo dhārtarāṣṭrasya sūta | duḥśāsanaḥ śakuniḥ sūtaputro | gāvalgaṇe paśya saṃmohamasya

हे सूत, अब मुझसे सुनो कि धन के लोभी धृतराष्ट्र-पुत्र के मंत्री कौन हैं — दुःशासन, शकुनि और सूतपुत्र कर्ण। हे गावल्गणि, उसका मोह तो देखो!

श्लोक 19 (5.26.19)

सोऽहं न पश्यामि परीक्षमाणः । कथं स्वस्ति स्यात्कुरुसृञ्जयानाम् । आत्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रः परेभ्यः । प्रव्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टौ ॥

so'haṃ na paśyāmi parīkṣamāṇaḥ | kathaṃ svasti syātkurusṛñjayānām | āttaiśvaryo dhṛtarāṣṭraḥ parebhyaḥ | pravrājite vidure dīrghadṛṣṭau

भली-भाँति विचार करने पर भी मुझे नहीं दिखता कि कुरुओं और सृंजयों का कल्याण कैसे होगा, जबकि धृतराष्ट्र ने दूसरों से ऐश्वर्य छीन लिया है और दूरदर्शी विदुर को दूर कर दिया गया है।

श्लोक 20 (5.26.20)

आशंसते वै धृतराष्ट्रः सपुत्रो । महाराज्यमसपत्नं पृथिव्याम् । तस्मिञ्शमः केवलं नोपलभ्यः । सर्वं स्वकं मद्गते मन्यतेऽर्थम् ॥

āśaṃsate vai dhṛtarāṣṭraḥ saputro | mahārājyamasapatnaṃ pṛthivyām | tasmiñśamaḥ kevalaṃ nopalabhyaḥ | sarvaṃ svakaṃ madgate manyate'rtham

धृतराष्ट्र अपने पुत्रों सहित पृथ्वी पर निष्कण्टक महान राज्य की आशा करते हैं। उनमें शान्ति बिल्कुल नहीं मिलती; मेरे चले जाने पर वे सारी सम्पत्ति को अपनी ही मानते हैं।

श्लोक 21 (5.26.21)

यत्तत्कर्णो मन्यते पारणीयं । युद्धे गृहीतायुधमर्जुनं वै । आसंश्च युद्धानि पुरा महान्ति । कथं कर्णो नाभवद्द्वीप एषाम् ॥

yattatkarṇo manyate pāraṇīyaṃ | yuddhe gṛhītāyudhamarjunaṃ vai | āsaṃśca yuddhāni purā mahānti | kathaṃ karṇo nābhavaddvīpa eṣām

कर्ण जो यह मानता है कि हाथ में शस्त्र लिए अर्जुन को युद्ध में जीता जा सकता है — पहले भी तो बड़े-बड़े युद्ध हुए थे; तब कर्ण उनका सहारा क्यों नहीं बन सका?

श्लोक 22 (5.26.22)

कर्णश्च जानाति सुयोधनश्च । द्रोणश्च जानाति पितामहश्च । अन्ये च ये कुरवस्तत्र सन्ति । यथाऽर्जुनान्नास्त्यपरो धनुर्धरः ॥

karṇaśca jānāti suyodhanaśca | droṇaśca jānāti pitāmahaśca | anye ca ye kuravastatra santi | yathā'rjunānnāstyaparo dhanurdharaḥ

कर्ण जानता है, सुयोधन जानता है, द्रोण जानते हैं और पितामह भी जानते हैं, तथा वहाँ जो अन्य कुरु हैं वे भी जानते हैं कि अर्जुन के समान दूसरा धनुर्धर नहीं है।

श्लोक 23 (5.26.23)

जानन्त्येतत्कुरवः सर्व एव । ये चाप्यन्ये भूमिपालाः समेताः । दुर्योधने राज्यमिहाभवद्यथा । अरिन्दमे फाल्गुनेऽविद्यमाने ॥

jānantyetatkuravaḥ sarva eva | ye cāpyanye bhūmipālāḥ sametāḥ | duryodhane rājyamihābhavadyathā | arindame phālgune'vidyamāne

सभी कुरु यह जानते हैं, और वहाँ एकत्र अन्य राजा भी जानते हैं, कि शत्रुदमन अर्जुन के न रहने पर ही यह राज्य यहाँ दुर्योधन के हाथ आया।

श्लोक 24 (5.26.24)

तेनानुबन्धं मन्यते धार्तराष्ट्रः । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वम् । किरीटिना तालमात्रायुधेन । तद्वेदिना संयुगं तत्र गत्वा ॥

tenānubandhaṃ manyate dhārtarāṣṭraḥ | śakyaṃ hartuṃ pāṇḍavānāṃ mamatvam | kirīṭinā tālamātrāyudhena | tadvedinā saṃyugaṃ tatra gatvā

इसी कारण धृतराष्ट्र-पुत्र यह मानता है कि ताल-परिमाण के धनुष वाले, धनुर्विद्या के ज्ञाता किरीटी अर्जुन से वहाँ युद्ध करके भी वह पाण्डवों का सब कुछ, उससे जुड़ी हर वस्तु समेत, छीन सकता है।

श्लोक 25 (5.26.25)

गाण्डीवविष्फारितशब्दमात्रं । श्रुत्वैव ते धार्तराष्ट्रा म्रियन्ते । क्रुद्धं न चेदीक्षते भीमसेनं । सुयोधनो मन्यते सिद्धमर्थम् ॥

gāṇḍīvaviṣphāritaśabdamātraṃ | śrutvaiva te dhārtarāṣṭrā mriyante | kruddhaṃ na cedīkṣate bhīmasenaṃ | suyodhano manyate siddhamartham

गाण्डीव की टंकार सुनते ही धृतराष्ट्र के पुत्र मर जाएँगे; सुयोधन तभी तक अपना प्रयोजन सिद्ध समझता है जब तक वह क्रुद्ध भीमसेन को नहीं देखता।

श्लोक 26 (5.26.26)

इन्द्रोऽप्येतन्नोत्सहेत्तात हर्तु- । मैश्वर्यं नो जीवति भीमसेने । धनञ्जये नकुले चैव सूत । तथा वीरे सहदेवेऽसहिष्णौ ॥

indro'pyetannotsahettāta hartu- | maiśvaryaṃ no jīvati bhīmasene | dhanañjaye nakule caiva sūta | tathā vīre sahadeve'sahiṣṇau

हे तात सूत, जब तक भीमसेन, धनञ्जय, नकुल और अन्याय न सहने वाले वीर सहदेव जीवित हैं, तब तक इन्द्र भी हमारा ऐश्वर्य छीनने का साहस नहीं कर सकता।

श्लोक 27 (5.26.27)

सचेदेतां प्रतिपद्येत बुद्धिं । वृद्धो राजा सह पुत्रेण सूत । एवं रणे पाण्डवकोपदग्धा । न नश्येयुः सञ्जय धार्तराष्ट्राः ॥

sacedetāṃ pratipadyeta buddhiṃ | vṛddho rājā saha putreṇa sūta | evaṃ raṇe pāṇḍavakopadagdhā | na naśyeyuḥ sañjaya dhārtarāṣṭrāḥ

हे सूत, यदि वृद्ध राजा अपने पुत्र सहित इस बात को समझ लें, तो हे संजय, धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में पाण्डवों के क्रोध से जलकर नष्ट न हों।

श्लोक 28 (5.26.28)

जानामि त्वं क्लेशमस्मासु वृत्तं । त्वां पूजयन्सञ्जयाहं क्षमेयम् । यच्चास्माकं कौरवैर्भूतपूर्वं । या नो वृत्तिर्धार्तराष्ट्रे तदाऽऽसीत् ॥

jānāmi tvaṃ kleśamasmāsu vṛttaṃ | tvāṃ pūjayansañjayāhaṃ kṣameyam | yaccāsmākaṃ kauravairbhūtapūrvaṃ | yā no vṛttirdhārtarāṣṭre tadā''sīt

मैं जानता हूँ, और तुम भी जानते हो, कि हम पर कैसा क्लेश बीता; फिर भी हे संजय, तुम्हारा सम्मान करते हुए मैं उसे क्षमा कर सकता हूँ — कौरवों ने पहले हमारे साथ जो किया, वह भी। और उस समय धृतराष्ट्र-पुत्र के साथ हमारा जो सम्बन्ध था —

श्लोक 29 (5.26.29)

अद्यापि सा तत्र तथैव वर्ततां । शान्तिं गमिष्यामि यथा त्वमात्थ । इन्द्रप्रस्थे भवतु ममैव राज्यं । सुयोधनो यच्छतु भारताग्र्यः ॥

adyāpi sā tatra tathaiva vartatāṃ | śāntiṃ gamiṣyāmi yathā tvamāttha | indraprasthe bhavatu mamaiva rājyaṃ | suyodhano yacchatu bhāratāgryaḥ

— वह आज भी वहाँ वैसा ही बना रहे। तुम जैसा कहते हो, मैं शान्ति का मार्ग अपनाऊँगा। इन्द्रप्रस्थ मेरा राज्य हो; भरतश्रेष्ठ सुयोधन उसे लौटा दे।

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