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उद्योग पर्व · अध्याय 25

संजय की शान्ति के लिए याचना

पाण्डवों, सृंजयों, श्रीकृष्ण, सात्यकि और विराट के इकट्ठे होने पर युधिष्ठिर संजय से धृतराष्ट्र का सन्देश सुनाने को कहते हैं। संजय बताते हैं कि राजा शान्ति चाहते हैं, और पाण्डवों के उदात्त स्वभाव से अपील करते हैं: स्वजनों का नाश करने वाला युद्ध, चाहे जीता जाए या हारा जाए, कोई भला नहीं करता, और अपने बन्धुओं को मारकर पाया जीवन मृत्यु के ही समान है। पाण्डवों को कोई नहीं हरा सकता, और कौरव-सेना को भी कोई सहज ही नष्ट नहीं कर सकता। हाथ जोड़कर वे श्रीकृष्ण और वृद्ध पांचालराज की शरण लेते हैं और कहते हैं कि शान्ति ही धृतराष्ट्र तथा भीष्म आदि गुरुजनों का मत है।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (5.25.1)

समागताः पाण्डवाः सृञ्जयाश्च । जनार्दनो युयुधानो विराटः । यत्ते वाक्यं धृतराष्ट्रानुशिष्टं । गावल्गणे ब्रूहि तत्सूतपुत्र ॥

samāgatāḥ pāṇḍavāḥ sṛñjayāśca | janārdano yuyudhāno virāṭaḥ | yatte vākyaṃ dhṛtarāṣṭrānuśiṣṭaṃ | gāvalgaṇe brūhi tatsūtaputra

पाण्डव और सृंजय यहाँ इकट्ठे हैं, जनार्दन, युयुधान और विराट भी। हे गावल्गणि, हे सूतपुत्र, धृतराष्ट्र ने तुम्हें जो सन्देश देकर भेजा है, वह कहो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (5.25.2)

अजातशत्रुं च वृकोदरं च । धनञ्जयं माद्रवतीसुतौ च । आमन्त्रये वासुदेवं च शौरिं । युयुधानं चेकितानं विराटम् ॥

ajātaśatruṃ ca vṛkodaraṃ ca | dhanañjayaṃ mādravatīsutau ca | āmantraye vāsudevaṃ ca śauriṃ | yuyudhānaṃ cekitānaṃ virāṭam

मैं अजातशत्रु और वृकोदर को, धनंजय और माद्रवती के दोनों पुत्रों को, शूरवंशी वासुदेव को, युयुधान, चेकितान और विराट को सम्बोधित करता हूँ,

श्लोक 3 (5.25.3)

पञ्चालानामधिपं चैव वृद्धं । धृष्टद्युम्नं पार्षतं याज्ञसेनिम् । सर्वे वाचं शृणुतेमां मदीयां । वक्ष्यामि यां भूतिमिच्छन्कुरूणाम् ॥

pañcālānāmadhipaṃ caiva vṛddhaṃ | dhṛṣṭadyumnaṃ pārṣataṃ yājñasenim | sarve vācaṃ śṛṇutemāṃ madīyāṃ | vakṣyāmi yāṃ bhūtimicchankurūṇām

वृद्ध पांचालराज को, और पृषत के पौत्र, यज्ञसेन के पुत्र धृष्टद्युम्न को भी। आप सब मेरी यह बात सुनें, जो मैं कौरवों का कल्याण चाहते हुए कहूँगा।

श्लोक 4 (5.25.4)

शमं राजा धृतराष्ट्रोऽभिनन्द- । न्नयोजयत्त्वरमाणो रथं मे । सभ्रातृपुत्रस्वजनस्य राज्ञ- । स्तद्रोचतां पाण्डवानां शमोऽस्तु ॥

śamaṃ rājā dhṛtarāṣṭro'bhinanda- | nnayojayattvaramāṇo rathaṃ me | sabhrātṛputrasvajanasya rājña- | stadrocatāṃ pāṇḍavānāṃ śamo'stu

शान्ति का स्वागत करते हुए राजा धृतराष्ट्र ने जल्दी से मेरा रथ जुतवाया। भाइयों, पुत्रों और स्वजनों सहित राजा की यह इच्छा पाण्डवों को रुचे; शान्ति हो।

श्लोक 5 (5.25.5)

सर्वैर्धर्मैः समुपेतास्तु पार्थाः । संस्थानेन मार्दवेनार्जवेन । जाताः कुले ह्यनृशंसा वदान्या । ह्रीनिषेवाः कर्मणां निश्चयज्ञाः ॥

sarvairdharmaiḥ samupetāstu pārthāḥ | saṃsthānena mārdavenārjavena | jātāḥ kule hyanṛśaṃsā vadānyā | hrīniṣevāḥ karmaṇāṃ niścayajñāḥ

पार्थ सब धर्मों से युक्त हैं — आकृति, कोमलता और सरलता से सम्पन्न। उत्तम कुल में जन्मे वे दयालु, उदार और लज्जाशील हैं, और कर्मों के उचित निश्चय को जानते हैं।

श्लोक 6 (5.25.6)

न युज्यते कर्म युष्मासु हीनं । सत्त्वं हि वस्तादृशं भीमसेनाः । उद्भासते ह्यञ्जनबिन्दुवत्त- । च्छुभ्रे वस्त्रे यद्भवेत्किल्बिषं वः ॥

na yujyate karma yuṣmāsu hīnaṃ | sattvaṃ hi vastādṛśaṃ bhīmasenāḥ | udbhāsate hyañjanabinduvatta- | cchubhre vastre yadbhavetkilbiṣaṃ vaḥ

हे भयंकर सेनाओं वाले वीरो, हीन कर्म आपको शोभा नहीं देता, क्योंकि आपका स्वभाव ऐसा ही है। आप पर कोई भी कलंक वैसे ही चमक उठेगा जैसे सफ़ेद वस्त्र पर काजल की बूँद।

श्लोक 7 (5.25.7)

सर्वक्षयो दृश्यते यत्र कृत्स्नः । पापोदयो भावसंस्थः कुरूणाम् । कस्तत्र कुर्याज्जातु कर्म प्रजानन् । पराजयो यत्र समो जयश्च ॥

sarvakṣayo dṛśyate yatra kṛtsnaḥ | pāpodayo bhāvasaṃsthaḥ kurūṇām | kastatra kuryājjātu karma prajānan | parājayo yatra samo jayaśca

जहाँ सम्पूर्ण विनाश दिखाई देता हो, पाप का उदय हो जो कौरवों के अस्तित्व का ही अन्त कर दे, और जहाँ हार और जीत एक-सी हों — यह जानते हुए कौन ऐसा कर्म कभी करेगा?

श्लोक 8 (5.25.8)

ते वै धन्या यैः कृतं ज्ञातिकार्यं । ते वै पुत्राः सुहृदो बान्धवाश्च । उपक्रुष्टं जीवितं सन्त्यजेयु- । र्यतः कुरूणां नियतो वै भवः स्यात् ॥

te vai dhanyā yaiḥ kṛtaṃ jñātikāryaṃ | te vai putrāḥ suhṛdo bāndhavāśca | upakruṣṭaṃ jīvitaṃ santyajeyu- | ryataḥ kurūṇāṃ niyato vai bhavaḥ syāt

धन्य हैं वे जिन्होंने अपने स्वजनों का काम किया है। वे ही सच्चे पुत्र, मित्र और बन्धु हैं जो कौरवों का कल्याण निश्चित करने के लिए निन्दित जीवन को भी त्याग दें।

श्लोक 9 (5.25.9)

ते चेत्कुरूननुशिष्याथ पार्था । निर्णीय सर्वान्द्विषतो निगृह्य । समं वस्तज्जीवितं मृत्युना स्या- । द्यज्जीवध्वं ज्ञातिवधे न साधु ॥

te cetkurūnanuśiṣyātha pārthā | nirṇīya sarvāndviṣato nigṛhya | samaṃ vastajjīvitaṃ mṛtyunā syā- | dyajjīvadhvaṃ jñātivadhe na sādhu

हे पार्थो, यदि आप कौरवों को दण्ड देकर, सब शत्रुओं का निर्णय करके उन्हें कुचल डालें, तो आपका वह जीवन मृत्यु के समान ही होगा; क्योंकि स्वजनों का वध करके जीना अच्छा नहीं।

श्लोक 10 (5.25.10)

को ह्येव युष्मान्सह केशवेन । सचेकितानान्पार्षतबाहुगुप्तान् । ससात्यकीन्विषहेत प्रजेतुं । लब्ध्वाऽपि देवान्सचिवान्सहेन्द्रान् ॥

ko hyeva yuṣmānsaha keśavena | sacekitānānpārṣatabāhuguptān | sasātyakīnviṣaheta prajetuṃ | labdhvā'pi devānsacivānsahendrān

केशव के साथ, चेकितान और सात्यकि के साथ, धृष्टद्युम्न की भुजाओं से रक्षित आप लोगों को कौन जीतने का साहस कर सकता है — चाहे इन्द्र सहित देवता भी उसके सहायक हों?

श्लोक 11 (5.25.11)

को वा कुरून्द्रोणभीष्माभिगुप्ता- । नश्वत्थाम्ना शल्यकृपादिभिश्च । रणे विजेतुं विषहेत राजन् । राधेयगुप्तान्सह भूमिपालैः ॥

ko vā kurūndroṇabhīṣmābhiguptā- | naśvatthāmnā śalyakṛpādibhiśca | raṇe vijetuṃ viṣaheta rājan | rādheyaguptānsaha bhūmipālaiḥ

या हे राजन्, द्रोण और भीष्म से, अश्वत्थामा, शल्य, कृप आदि से, और राजाओं सहित राधापुत्र कर्ण से रक्षित कौरवों को युद्ध में कौन जीतने का साहस कर सकता है?

श्लोक 12 (5.25.12)

महद्बलं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञः । को वै शक्तो हन्तुमक्षीयमाणः । सोऽहं जये चैव पराजये च । निःश्रेयसं नाधिगच्छामि किंचित् ॥

mahadbalaṃ dhārtarāṣṭrasya rājñaḥ | ko vai śakto hantumakṣīyamāṇaḥ | so'haṃ jaye caiva parājaye ca | niḥśreyasaṃ nādhigacchāmi kiṃcit

राजा दुर्योधन की विशाल सेना को स्वयं नष्ट हुए बिना कौन मार सकता है? इसलिए मुझे जीत में भी और हार में भी कुछ भी कल्याण नहीं दिखता।

श्लोक 13 (5.25.13)

कथं हि नीचा इव दौष्कुलेया । निर्धर्मार्थं कर्म कुर्युश्च पार्थाः । सोऽहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं । पञ्चालानामधिपं चैव वृद्धम् ॥

kathaṃ hi nīcā iva dauṣkuleyā | nirdharmārthaṃ karma kuryuśca pārthāḥ | so'haṃ prasādya praṇato vāsudevaṃ | pañcālānāmadhipaṃ caiva vṛddham

पार्थ नीच कुल के ओछे लोगों की तरह धर्म और अर्थ के विरुद्ध कर्म कैसे करेंगे? इसलिए मैं वासुदेव और वृद्ध पांचालराज को प्रसन्न करने के लिए झुककर प्रणाम करता हूँ;

श्लोक 14 (5.25.14)

कृताञ्जलिः शरणं वः प्रपद्ये । कथं स्वस्ति स्यात्कुरुसृञ्जयानाम् । न ह्येवमेवं वचनं वासुदेवो । धनञ्जयो वा जातु किंचिन्न कुर्यात् ॥

kṛtāñjaliḥ śaraṇaṃ vaḥ prapadye | kathaṃ svasti syātkurusṛñjayānām | na hyevamevaṃ vacanaṃ vāsudevo | dhanañjayo vā jātu kiṃcinna kuryāt

हाथ जोड़कर मैं आपकी शरण आता हूँ: कौरवों और सृंजयों का कल्याण कैसे हो? निश्चय ही वासुदेव या धनंजय इस तरह कही गई किसी बात को कभी नहीं टालेंगे।

श्लोक 15 (5.25.15)

प्राणान्दद्याद्याचमानः कुतोऽन्य- । देतद्विद्वन्साधनार्थं ब्रवीमि । एतद्राज्ञो भीष्मपुरोगमस्य । मतं यद्वः शान्तिरिहोत्तमा स्यात् ॥

prāṇāndadyādyācamānaḥ kuto'nya- | detadvidvansādhanārthaṃ bravīmi | etadrājño bhīṣmapurogamasya | mataṃ yadvaḥ śāntirihottamā syāt

माँगे जाने पर वे प्राण तक दे देंगे, फिर किसी और वस्तु की तो बात ही क्या? हे विद्वन्, मैं यह शान्ति सिद्ध करने के लिए कह रहा हूँ। राजा का और भीष्म आदि गुरुजनों का यही मत है कि आपको यहाँ उत्तम शान्ति प्राप्त हो।

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