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उद्योग पर्व · अध्याय 64

बहेलिया और पक्षी, मधु और प्रपात

विदुर एक बहेलिये की कथा सुनाते हैं, जिसके जाल में एक साथ फँसे दो पक्षी उसे लेकर उड़ गए: वह उनका पीछा करता रहा, जब तक वे आपस में झगड़कर धरती पर न गिर पड़े, और तब उसने दोनों को पकड़ लिया — इसी प्रकार धन के लिए लड़ने वाले कुटुम्बी मृत्यु के वश में जाते हैं, जबकि साथ रहने वाले जलती लकड़ियों की तरह एक साथ प्रज्वलित होते हैं। फिर वे गन्धमादन के एक प्रपात पर सर्पों से रक्षित अमरता देने वाले मधु की बात कहते हैं, जिसकी लालसा में किरात नष्ट हो गए: दुर्योधन एकछत्र राज्य का मधु तो देखता है, पर गिरने का गड्ढा नहीं। विराटनगर में अकेले अर्जुन द्वारा भीष्म, द्रोण आदि की पराजय का स्मरण कराकर विदुर धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर को अपनाने का आग्रह करते हैं, क्योंकि युद्ध में विजय कभी निश्चित नहीं होती।

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विदुर उवाच

श्लोक 1 (5.64.1)

शकुनीनामिहार्थाय पाशं भूमावयोजयत् । कश्चिच्छाकुनिकस्तात पूर्वेषामिति शुश्रुम ॥

śakunīnāmihārthāya pāśaṃ bhūmāvayojayat | kaścicchākunikastāta pūrveṣāmiti śuśruma

तात, हमने सुना है कि प्राचीन काल में किसी बहेलिये ने पक्षियों को पकड़ने के लिए भूमि पर जाल बिछाया।

श्लोक 2 (5.64.2)

तस्मिंस्तौ शकुनौ बद्धौ युगपत्सहचारिणौ । तावुपादाय तं पाशं जग्मतुः खचरावुभौ ॥

tasmiṃstau śakunau baddhau yugapatsahacāriṇau | tāvupādāya taṃ pāśaṃ jagmatuḥ khacarāvubhau

उसमें साथ-साथ उड़ने वाले दो पक्षी एक साथ फँस गए। वे दोनों आकाशचारी उस जाल को लेकर उड़ चले।

श्लोक 3 (5.64.3)

तौ विहायसमाक्रान्तौ दृष्ट्वा शाकुनिकस्तदा । अन्वधावदनिर्विण्णो येन येन स्म गच्छतः ॥

tau vihāyasamākrāntau dṛṣṭvā śākunikastadā | anvadhāvadanirviṇṇo yena yena sma gacchataḥ

उन्हें आकाश में चढ़ते देख बहेलिया बिना थके उनके पीछे दौड़ता रहा — वे जिधर-जिधर जाते, उधर-उधर।

श्लोक 4 (5.64.4)

तथा तमनुधावन्तमृगयुं शकुनार्थिनम् । आश्रमस्थो मुनिः कश्चिद्ददर्शाथ कृताह्निकः ॥

tathā tamanudhāvantamṛgayuṃ śakunārthinam | āśramastho muniḥ kaściddadarśātha kṛtāhnikaḥ

आश्रम में रहने वाले किसी मुनि ने, जो अपना नित्यकर्म कर चुके थे, पक्षियों की आशा में इस प्रकार दौड़ते उस शिकारी को देखा।

श्लोक 5 (5.64.5)

तावन्तरिक्षगौ शीघ्रमनुयान्तं महीचरम् । श्लोकेनानेन कौरव्य पप्रच्छ स मुनिस्तदा ॥

tāvantarikṣagau śīghramanuyāntaṃ mahīcaram | ślokenānena kauravya papraccha sa munistadā

हे कौरव्य, आकाश में उड़ते उन दोनों के पीछे तेज़ी से जाते उस भूमिचारी को देखकर मुनि ने तब इस श्लोक से उससे पूछा—

मुनिरुवाच

श्लोक 6 (5.64.6)

विचित्रमिदमाश्चर्यं मृगहन्प्रतिभाति मे । प्लवमानौ हि खचरौ पदातिरनुधावसि ॥

vicitramidamāścaryaṃ mṛgahanpratibhāti me | plavamānau hi khacarau padātiranudhāvasi

हे व्याध, यह मुझे बड़ा विचित्र और आश्चर्यजनक लगता है कि दोनों पक्षी उड़ रहे हैं और तुम पैदल उनके पीछे दौड़ रहे हो!

शाकुनिक उवाच

श्लोक 7 (5.64.7)

पाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम । यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यतः ॥

pāśamekamubhāvetau sahitau harato mama | yatra vai vivadiṣyete tatra me vaśameṣyataḥ

ये दोनों मिलकर मेरा एक ही जाल लिए जा रहे हैं। जहाँ ये आपस में झगड़ेंगे, वहीं मेरे वश में आ जाएँगे।

विदुर उवाच

श्लोक 8 (5.64.8)

तौ विवादमनुप्राप्तौ शकुनौ मृत्युसन्धितौ । विगृह्य च सुदुर्बुद्धी पृथिव्यां संनिपेततुः ॥

tau vivādamanuprāptau śakunau mṛtyusandhitau | vigṛhya ca sudurbuddhī pṛthivyāṃ saṃnipetatuḥ

मृत्यु के वश में पड़े वे दोनों पक्षी आपस में झगड़ने लगे और लड़ते-लड़ते वे मूर्ख धरती पर आ गिरे।

श्लोक 9 (5.64.9)

तौ युध्यमानौ संरब्धौ मृत्युपाशवशानुगौ । उपसृत्य प्रमत्तौ तौ जग्राह मृगहा तदा ॥

tau yudhyamānau saṃrabdhau mṛtyupāśavaśānugau | upasṛtya pramattau tau jagrāha mṛgahā tadā

जब वे मृत्युपाश के वशीभूत होकर क्रोध से लड़ रहे थे, तब शिकारी ने पास जाकर उन असावधान पक्षियों को पकड़ लिया।

श्लोक 10 (5.64.10)

एवं ये ज्ञातयोऽर्थेषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम् । ते मृत्युवशमायान्ति शकुनाविव विग्रहात् ॥

evaṃ ye jñātayo'rtheṣu mitho gacchanti vigraham | te mṛtyuvaśamāyānti śakunāviva vigrahāt

इसी प्रकार जो कुटुम्बी धन के लिए परस्पर विग्रह करते हैं, वे उन पक्षियों की भाँति कलह के कारण मृत्यु के वश में चले जाते हैं।

श्लोक 11 (5.64.11)

संभोजनं संकथनं संप्रश्नोऽथ समागमः । एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोधः कदाचन ॥

saṃbhojanaṃ saṃkathanaṃ saṃpraśno'tha samāgamaḥ | etāni jñātikāryāṇi na virodhaḥ kadācana

साथ भोजन करना, साथ बातचीत करना, एक-दूसरे का कुशल पूछना और मिलना-जुलना — यही कुटुम्बियों के कार्य हैं, विरोध कभी नहीं।

श्लोक 12 (5.64.12)

ये स्म काले सुमनसः सर्वे वृद्धानुपासते । सिंहगुप्तमिवारण्यमप्रधृष्या भवन्ति ते ॥

ye sma kāle sumanasaḥ sarve vṛddhānupāsate | siṃhaguptamivāraṇyamapradhṛṣyā bhavanti te

जो सब एकमन होकर समय-समय पर वृद्धों की सेवा करते हैं, वे सिंह से रक्षित वन की भाँति अजेय हो जाते हैं।

श्लोक 13 (5.64.13)

येऽर्थं सन्ततमासाद्य दीना इव समासते । श्रियं ते संप्रयच्छन्ति द्विषद्भ्यो भरतर्षभ ॥

ye'rthaṃ santatamāsādya dīnā iva samāsate | śriyaṃ te saṃprayacchanti dviṣadbhyo bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, जो स्थायी धन पाकर भी दीनों की तरह बैठे रहते हैं, वे अपनी लक्ष्मी शत्रुओं को सौंप देते हैं।

श्लोक 14 (5.64.14)

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च । धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ ॥

dhūmāyante vyapetāni jvalanti sahitāni ca | dhṛtarāṣṭrolmukānīva jñātayo bharatarṣabha

हे धृतराष्ट्र, हे भरतश्रेष्ठ, कुटुम्बी जलती लकड़ियों के समान हैं — अलग-अलग होने पर धुआँ देते हैं और एक साथ रहने पर प्रज्वलित होते हैं।

श्लोक 15 (5.64.15)

इदमन्यत्प्रवक्ष्यामि यथा दृष्टं गिरौ मया । श्रुत्वा तदपि कौरव्य यथा श्रेयस्तथा कुरु ॥

idamanyatpravakṣyāmi yathā dṛṣṭaṃ girau mayā | śrutvā tadapi kauravya yathā śreyastathā kuru

हे कौरव्य, अब मैं एक और बात बताता हूँ, जैसी मैंने पर्वत पर देखी थी। उसे भी सुनकर जो कल्याणकारी हो, वही करो।

श्लोक 16 (5.64.16)

वयं किरातैः सहिता गच्छामो गिरिमुत्तरम् । ब्राह्मणैर्देवकल्पैश्च विद्याजम्भकवार्तिकैः ॥

vayaṃ kirātaiḥ sahitā gacchāmo girimuttaram | brāhmaṇairdevakalpaiśca vidyājambhakavārtikaiḥ

हम किरातों तथा मन्त्रविद्या और औषधि-साधन के जानकार देवतुल्य ब्राह्मणों के साथ उत्तर के पर्वत पर गए थे —

श्लोक 17 (5.64.17)

कुञ्जभूतं गिरिं सर्वमभितो गन्धमादनम् । दीप्यमानौषधिगणं सिद्धगन्धर्वसेवितम् ॥

kuñjabhūtaṃ giriṃ sarvamabhito gandhamādanam | dīpyamānauṣadhigaṇaṃ siddhagandharvasevitam

वह गन्धमादन पर्वत, जो चारों ओर से लताओं से ढका कुंज-सा था, जिस पर औषधियों के समूह चमकते थे और सिद्ध तथा गन्धर्व विचरते थे।

श्लोक 18 (5.64.18)

तत्रापश्याम वै सर्वे मधु पीतकमाक्षिकम् । मरुप्रपाते विषमे निविष्टं कुम्भसंमितम् ॥

tatrāpaśyāma vai sarve madhu pītakamākṣikam | maruprapāte viṣame niviṣṭaṃ kumbhasaṃmitam

वहाँ हम सबने एक दुर्गम, विषम प्रपात के कगार पर घड़े भर जितना पीला मधु लगा देखा,

श्लोक 19 (5.64.19)

आशीविषै रक्ष्यमाणं कुबेरदयितं भृशम् । यत्प्राप्य पुरुषो मर्त्योऽप्यमरत्वं निगच्छति ॥

āśīviṣai rakṣyamāṇaṃ kuberadayitaṃ bhṛśam | yatprāpya puruṣo martyo'pyamaratvaṃ nigacchati

जिसकी विषैले सर्प रक्षा करते थे और जो कुबेर को अत्यन्त प्रिय था; उसे पाकर मरणशील मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है;

श्लोक 20 (5.64.20)

अचक्षुर्लभते चक्षुर्वृद्धो भवति वै युवा । इति ते कथयन्तिस्म ब्राह्मणा जम्भसाधकाः ॥

acakṣurlabhate cakṣurvṛddho bhavati vai yuvā | iti te kathayantisma brāhmaṇā jambhasādhakāḥ

अन्धे को आँखें मिल जाती हैं और बूढ़ा युवा हो जाता है — ऐसा औषधि-साधक ब्राह्मण कहा करते थे।

श्लोक 21 (5.64.21)

ततः किरातास्तद्दृष्ट्वा प्रार्थयन्तो महीपते । विनेशुर्विषमे तस्मिन्ससर्पे गिरिगह्वरे ॥

tataḥ kirātāstaddṛṣṭvā prārthayanto mahīpate | vineśurviṣame tasminsasarpe girigahvare

हे महीपति, तब उसे देखकर किरात उसे पाने को लालायित हुए और सर्पों से भरी उस विषम पर्वत-खाई में नष्ट हो गए।

श्लोक 22 (5.64.22)

तथैव तव पुत्रोऽयं पृथिवीमेक इच्छति । मधु पश्यति संमोहात्प्रपातं नानुपश्यति ॥

tathaiva tava putro'yaṃ pṛthivīmeka icchati | madhu paśyati saṃmohātprapātaṃ nānupaśyati

उसी प्रकार तुम्हारा यह पुत्र अकेला ही सारी पृथ्वी चाहता है। मोहवश वह मधु तो देखता है, पर गिरने का गड्ढा नहीं देखता।

श्लोक 23 (5.64.23)

दुर्योधनो योद्धुमनाः समरे सव्यसाचिना । न च पश्यामि तेजोऽस्य विक्रमं वा तथाविधम् ॥

duryodhano yoddhumanāḥ samare savyasācinā | na ca paśyāmi tejo'sya vikramaṃ vā tathāvidham

दुर्योधन युद्ध में सव्यसाची अर्जुन से लड़ना चाहता है, परन्तु मैं इसमें वैसा तेज या पराक्रम नहीं देखता।

श्लोक 24 (5.64.24)

एकेन रथमास्थाय पृथिवी येन निर्जिता । भीष्मद्रोणप्रभृतयः सन्त्रस्ताः साधुयायिनः ॥

ekena rathamāsthāya pṛthivī yena nirjitā | bhīṣmadroṇaprabhṛtayaḥ santrastāḥ sādhuyāyinaḥ

जिसने अकेले रथ पर चढ़कर पृथ्वी जीत ली, उसके सामने भीष्म, द्रोण आदि अच्छे योद्धा भी भयभीत हो गए

श्लोक 25 (5.64.25)

विराटनगरे भग्नाः किं तत्र तव दृश्यताम् । प्रतीक्षमाणो यो वीरः क्षमते वीक्षितं तव ॥

virāṭanagare bhagnāḥ kiṃ tatra tava dṛśyatām | pratīkṣamāṇo yo vīraḥ kṣamate vīkṣitaṃ tava

और विराटनगर में भाग खड़े हुए — उसमें तुम्हें क्या दिखाई दिया? वह वीर अब भी प्रतीक्षा करता हुआ तुम्हारे रुख़ को धैर्य से सह रहा है।

श्लोक 26 (5.64.26)

द्रुपदो मत्स्यराजश्च सङ्क्रुद्धश्च धनञ्जयः । न शेषयेयुः समरे वायुयुक्ता इवाग्नयः ॥

drupado matsyarājaśca saṅkruddhaśca dhanañjayaḥ | na śeṣayeyuḥ samare vāyuyuktā ivāgnayaḥ

द्रुपद, मत्स्यराज और क्रुद्ध धनंजय युद्ध में वायु से प्रेरित अग्नियों के समान किसी को शेष नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 27 (5.64.27)

अङ्के कुरुष्व राजानं धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम् । युध्यतोर्हि द्वयोर्युद्धे नैकान्तेन भवेज्जयः ॥

aṅke kuruṣva rājānaṃ dhṛtarāṣṭra yudhiṣṭhiram | yudhyatorhi dvayoryuddhe naikāntena bhavejjayaḥ

हे धृतराष्ट्र, राजा युधिष्ठिर को अपनी गोद में ले लो (अपना लो)। दो पक्षों के युद्ध में किसी एक की विजय निश्चित नहीं होती।

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