उद्योग पर्व · अध्याय 63
दुर्योधन की हठ और विदुर का दम-उपदेश
दुर्योधन भीष्म से पूछता है कि जब दोनों पक्ष जन्म, पराक्रम और कौशल में समान मनुष्य हैं, तो वे पार्थों की ही विजय क्यों मानते हैं; भीष्म, द्रोण, कृप या बाह्लीक के भरोसे के बिना वह, कर्ण और दुःशासन पाँचों पाण्डवों को मार डालेंगे, और फिर वह बड़े-बड़े यज्ञों से ब्राह्मणों को तृप्त करेगा। धृतराष्ट्र विदुर से विलाप करते हैं कि उनका पुत्र मृत्यु के पाश में पड़ गया है। विदुर उत्तर में इन्द्रिय-संयम (दम) का उपदेश देते हैं — जो सभी आश्रमों में सर्वोत्तम व्रत है — उसके लक्षण गिनाते हैं और ज्ञान से तृप्त मुनि की शान्ति का वर्णन करते हैं।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (5.63.1)
सदृशानां मनुष्येषु सर्वेषां तुल्यजन्मनाम् । कथमेकान्ततस्तेषां पार्थानां मन्यसे जयम् ॥
sadṛśānāṃ manuṣyeṣu sarveṣāṃ tulyajanmanām | kathamekāntatasteṣāṃ pārthānāṃ manyase jayam
मनुष्यों में हम सब एक समान हैं, सबका जन्म भी एक-सा है। फिर आप केवल पार्थों की ही विजय कैसे मानते हैं?
श्लोक 2 (5.63.2)
वयं च तेऽपि तुल्या वै वीर्येण च पराक्रमैः । समेन वयसा चैव प्रातिभेन श्रुतेन च ॥
vayaṃ ca te'pi tulyā vai vīryeṇa ca parākramaiḥ | samena vayasā caiva prātibhena śrutena ca
हम और वे पराक्रम, शौर्य, आयु, प्रत्युत्पन्नमति और शास्त्रज्ञान में समान ही हैं,
श्लोक 3 (5.63.3)
अस्त्रेण योधयुग्या च शीघ्रत्वे कौशले तथा । सर्वे स्म समजातीयाः सर्वे मानुषयोनयः ॥
astreṇa yodhayugyā ca śīghratve kauśale tathā | sarve sma samajātīyāḥ sarve mānuṣayonayaḥ
अस्त्रविद्या, योद्धाओं की सम्पदा, शीघ्रता और कौशल में भी। हम सब एक ही जाति के हैं, सब मनुष्य-योनि में जन्मे हैं।
श्लोक 4 (5.63.4)
पितामह विजानीषे पार्थेषु विजयं कथम् । नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च बाह्लिके ॥
pitāmaha vijānīṣe pārtheṣu vijayaṃ katham | nāhaṃ bhavati na droṇe na kṛpe na ca bāhlike
पितामह, आप पार्थों की विजय कैसे जानते हैं? मैं न आपके भरोसे, न द्रोण, न कृप, न बाह्लीक के,
श्लोक 5 (5.63.5)
अन्येषु च नरेन्द्रेषु पराक्रम्य समारभे । अहं वैकर्तनः कर्णो भ्राता दुःशासनश्च मे ॥
anyeṣu ca narendreṣu parākramya samārabhe | ahaṃ vaikartanaḥ karṇo bhrātā duḥśāsanaśca me
और न अन्य राजाओं के भरोसे पराक्रम करके यह युद्ध आरम्भ कर रहा हूँ। मैं, वैकर्तन कर्ण और मेरा भाई दुःशासन —
श्लोक 6 (5.63.6)
पाण्डवान्समरे पञ्च हनिष्यामः शितैः शरैः । ततो राजन्महायज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः ॥
pāṇḍavānsamare pañca haniṣyāmaḥ śitaiḥ śaraiḥ | tato rājanmahāyajñairvividhairbhūridakṣiṇaiḥ
हम पाँचों पाण्डवों को युद्ध में तीखे बाणों से मार डालेंगे। फिर, हे राजन्, बहुत-सी दक्षिणा वाले विविध महायज्ञों द्वारा
श्लोक 7 (5.63.7)
ब्राह्मणांस्तर्पयिष्यामि गोभिरश्वैर्धनेन च । यदा परिकरिष्यन्ति ऐणेयानिव तन्तुना । अतरित्रानिव जले बाहुभिर्मामका रणे ॥
brāhmaṇāṃstarpayiṣyāmi gobhiraśvairdhanena ca | yadā parikariṣyanti aiṇeyāniva tantunā | ataritrāniva jale bāhubhirmāmakā raṇe
मैं गायों, घोड़ों और धन से ब्राह्मणों को तृप्त करूँगा। जब मेरे योद्धा रण में उन्हें अपनी भुजाओं से वैसे ही घेर लेंगे जैसे फंदे में फँसे हिरणों को, या बिना नाव के गहरे जल में पड़े लोगों को,
श्लोक 8 (5.63.8)
पश्यन्तस्ते परांस्तत्र रथनागसमाकुलान् । तदा दर्पं विमोक्ष्यन्ति पाण्डवाः स च केशवः ॥
paśyantaste parāṃstatra rathanāgasamākulān | tadā darpaṃ vimokṣyanti pāṇḍavāḥ sa ca keśavaḥ
और जब वे वहाँ रथों और हाथियों से भरे शत्रुओं को देखेंगे, तब पाण्डव और वह केशव भी अपना दर्प छोड़ देंगे।
श्लोक 9 (5.63.9)
सुखान्यवाप्य सहिताः कृत्वा कर्म सुदुस्तरम् । विस्रब्धास्तु भविष्यामः प्राप्ते काले गतज्वराः ॥
sukhānyavāpya sahitāḥ kṛtvā karma sudustaram | visrabdhāstu bhaviṣyāmaḥ prāpte kāle gatajvarāḥ
इस अत्यन्त कठिन कर्म को करके और साथ मिलकर सुख प्राप्त करके, समय आने पर हम निश्चिन्त और निःशोक होकर रहेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (5.63.10)
अथाब्रवीन्महाराजो धृतराष्ट्रः सुदुर्मनाः । विदुरं विदुषां श्रेष्ठं सर्वपार्थिवसंनिधौ ॥
athābravīnmahārājo dhṛtarāṣṭraḥ sudurmanāḥ | viduraṃ viduṣāṃ śreṣṭhaṃ sarvapārthivasaṃnidhau
तब अत्यन्त दुःखी मन वाले महाराज धृतराष्ट्र ने सब राजाओं के सामने विद्वानों में श्रेष्ठ विदुर से कहा—
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 11 (5.63.11)
मोहितो मृत्युपाशेन कालस्य वशमागतः । तात कर्णेन सहितः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥
mohito mṛtyupāśena kālasya vaśamāgataḥ | tāta karṇena sahitaḥ putro duryodhano mama
तात, कर्ण के साथ मेरा पुत्र दुर्योधन मृत्यु के पाश से मोहित होकर काल के वश में जा पड़ा है।
विदुर उवाच
श्लोक 12 (5.63.12)
इह निःश्रेयसं प्राहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः । ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ॥
iha niḥśreyasaṃ prāhurvṛddhā niścitadarśinaḥ | brāhmaṇasya viśeṣeṇa damo dharmaḥ sanātanaḥ
यहाँ निश्चित दृष्टि वाले वृद्ध पुरुष कहते हैं कि इन्द्रिय-संयम (दम) ही परम कल्याण है; विशेष रूप से ब्राह्मण का तो दम ही सनातन धर्म है।
श्लोक 13 (5.63.13)
तस्य दानं क्षमा सिद्धिर्यथावदुपपद्यते । दमो दानं तपो ज्ञानमधीतं चानुवर्तते ॥
tasya dānaṃ kṣamā siddhiryathāvadupapadyate | damo dānaṃ tapo jñānamadhītaṃ cānuvartate
दम से युक्त पुरुष को दान, क्षमा और सिद्धि यथावत् प्राप्त होती हैं; दान, तप, ज्ञान और अध्ययन — ये सब दम के पीछे-पीछे चलते हैं।
श्लोक 14 (5.63.14)
दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उत्तमम् । विपाप्मा वृद्धतेजास्तु पुरुषो विन्दते महत् ॥
damastejo vardhayati pavitraṃ dama uttamam | vipāpmā vṛddhatejāstu puruṣo vindate mahat
दम तेज को बढ़ाता है; दम सबसे उत्तम पवित्र करने वाला है। पापरहित और बढ़े हुए तेज वाला पुरुष महान् पद पाता है।
श्लोक 15 (5.63.15)
क्रव्याद्भ्य इव भूतानामदान्तेभ्यः सदा भयम् । येषां च प्रतिषेधार्थं क्षत्रं सृष्टं स्वयंभुवा ॥
kravyādbhya iva bhūtānāmadāntebhyaḥ sadā bhayam | yeṣāṃ ca pratiṣedhārthaṃ kṣatraṃ sṛṣṭaṃ svayaṃbhuvā
जैसे मांसभक्षी जीवों से, वैसे ही असंयमी लोगों से प्राणियों को सदा भय रहता है; उन्हीं को रोकने के लिए स्वयम्भू ब्रह्मा ने क्षत्रियों की सृष्टि की।
श्लोक 16 (5.63.16)
आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम् । तस्य लिङ्गं प्रवक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ॥
āśrameṣu caturṣvāhurdamamevottamaṃ vratam | tasya liṅgaṃ pravakṣyāmi yeṣāṃ samudayo damaḥ
चारों आश्रमों में दम को ही सर्वोत्तम व्रत कहा गया है। अब मैं उसके लक्षण बताता हूँ — वे गुण जिनका उद्गम दम है।
श्लोक 17 (5.63.17)
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । इन्द्रियाभिजयो धैर्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
kṣamā dhṛtirahiṃsā ca samatā satyamārjavam | indriyābhijayo dhairyaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam
क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, इन्द्रियजय, धैर्य, मृदुता, लज्जा, अचपलता,
श्लोक 18 (5.63.18)
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषं श्रद्दधानता । एतानि यस्य राजेन्द्र स दान्तः पुरुषः स्मृतः ॥
akārpaṇyamasaṃrambhaḥ santoṣaṃ śraddadhānatā | etāni yasya rājendra sa dāntaḥ puruṣaḥ smṛtaḥ
अकृपणता, आवेश का अभाव, सन्तोष और श्रद्धा — हे राजेन्द्र, जिसमें ये गुण हों, वही पुरुष दान्त (संयमी) कहलाता है।
श्लोक 19 (5.63.19)
कामो लोभश्च दर्पश्च मन्युर्निद्रा विकत्थनम् । मान ईर्ष्या च शोकश्च नैतद्दान्तो निषेवते । अजिह्ममशठं शुद्धमेतद्दान्तस्य लक्षणम् ॥
kāmo lobhaśca darpaśca manyurnidrā vikatthanam | māna īrṣyā ca śokaśca naitaddānto niṣevate | ajihmamaśaṭhaṃ śuddhametaddāntasya lakṣaṇam
काम, लोभ, दर्प, क्रोध, निद्रा, आत्मप्रशंसा, मान, ईर्ष्या और शोक — संयमी पुरुष इनका सेवन नहीं करता। कुटिलता और शठता से रहित तथा शुद्ध होना — यही दान्त का लक्षण है।
श्लोक 20 (5.63.20)
अलोलुपस्तथाऽल्पेप्सुः कामानामविचिन्तिता । समुद्रकल्पः पुरुषः स दान्तः परिकीर्तितः ॥
alolupastathā'lpepsuḥ kāmānāmavicintitā | samudrakalpaḥ puruṣaḥ sa dāntaḥ parikīrtitaḥ
जो लोलुप नहीं है, थोड़े से सन्तुष्ट रहता है, विषय-भोगों का चिन्तन नहीं करता और समुद्र के समान गम्भीर है — वह पुरुष दान्त कहलाता है।
श्लोक 21 (5.63.21)
सुवृत्तः शीलसंपन्नः प्रसन्नात्माऽत्मविद्बुधः । प्राप्येह लोके संमानं सुगतिं प्रेत्य गच्छति ॥
suvṛttaḥ śīlasaṃpannaḥ prasannātmā'tmavidbudhaḥ | prāpyeha loke saṃmānaṃ sugatiṃ pretya gacchati
सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त, आत्मज्ञानी और बुद्धिमान् पुरुष इस लोक में सम्मान पाकर मृत्यु के बाद सद्गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 22 (5.63.22)
अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः । स वै परिणतप्रज्ञः प्रख्यातो मनुजोत्तमः ॥
abhayaṃ yasya bhūtebhyaḥ sarveṣāmabhayaṃ yataḥ | sa vai pariṇataprajñaḥ prakhyāto manujottamaḥ
जिसे प्राणियों से कोई भय नहीं और जिससे सब प्राणी निर्भय रहते हैं, वही परिपक्व बुद्धि वाला, विख्यात श्रेष्ठ मनुष्य है।
श्लोक 23 (5.63.23)
सर्वभूतहितो मैत्रस्तस्मान्नोद्विजते जनः । समुद्र इव गम्भीरः प्रज्ञातृप्तः प्रशाम्यति ॥
sarvabhūtahito maitrastasmānnodvijate janaḥ | samudra iva gambhīraḥ prajñātṛptaḥ praśāmyati
वह सब प्राणियों का हितैषी और सबका मित्र होता है, इसलिए लोग उससे उद्विग्न नहीं होते; समुद्र के समान गम्भीर और ज्ञान से तृप्त होकर वह शान्त रहता है।
श्लोक 24 (5.63.24)
कर्मणाऽचरितं पूर्वं सद्भिराचरितं च यत् । तदेवास्थाय मोदन्ते दान्ताः शमपरायणाः ॥
karmaṇā'caritaṃ pūrvaṃ sadbhirācaritaṃ ca yat | tadevāsthāya modante dāntāḥ śamaparāyaṇāḥ
पूर्वकाल से जो कर्म आचरित होता आया है और सत्पुरुषों ने जिसका आचरण किया है, उसी का आश्रय लेकर शमपरायण संयमी पुरुष आनन्द से रहते हैं।
श्लोक 25 (5.63.25)
नैष्कर्म्यं वा समास्थाय ज्ञानतृप्तो जितेन्द्रियः । कालाकाङ्क्षी चरँल्लोके ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
naiṣkarmyaṃ vā samāsthāya jñānatṛpto jitendriyaḥ | kālākāṅkṣī caram̐lloke brahmabhūyāya kalpate
अथवा नैष्कर्म्य का आश्रय लेकर, ज्ञान से तृप्त और जितेन्द्रिय होकर, अपने समय की प्रतीक्षा करते हुए संसार में विचरने वाला पुरुष ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
श्लोक 26 (5.63.26)
शकुनीनामिवाकाशे पदं नैवोपलभ्यते । एवं प्रज्ञानतृप्तस्य मुनेर्वर्त्म न दृश्यते ॥
śakunīnāmivākāśe padaṃ naivopalabhyate | evaṃ prajñānatṛptasya munervartma na dṛśyate
जैसे आकाश में पक्षियों के पदचिह्न नहीं मिलते, वैसे ही ज्ञान से तृप्त मुनि का मार्ग दिखाई नहीं देता।
श्लोक 27 (5.63.27)
उत्सृज्यैव गृहान्यस्तु मोक्षमेवाभिमन्यते । लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वता दिवि ॥
utsṛjyaiva gṛhānyastu mokṣamevābhimanyate | lokāstejomayāstasya kalpante śāśvatā divi
जो घर-बार छोड़कर केवल मोक्ष को ही लक्ष्य मानता है, उसके लिए स्वर्ग में तेजोमय सनातन लोक तैयार रहते हैं।