उद्योग पर्व · अध्याय 62
कर्ण का शस्त्र-त्याग
धृतराष्ट्र के चिन्तित प्रश्नों की उपेक्षा करके कर्ण दुर्योधन से कहता है कि परशुराम से पाया ब्रह्मास्त्र अब भी उसके पास है और वह अकेला ही पाण्डवों तथा उनके सहयोगियों को मार डालेगा। भीष्म खाण्डव-दाह का स्मरण कराकर उसका उपहास करते हैं और कहते हैं कि कृष्ण का चक्र इन्द्र की दी हुई शक्ति को और अर्जुन के बाण कर्ण के सर्पमुख बाण को नष्ट कर देंगे। आहत कर्ण भीष्म के जीते-जी युद्ध न करने की प्रतिज्ञा करके शस्त्र रख देता है और सभा से चला जाता है; भीष्म उसकी निन्दा करते हुए हजारों शत्रु-योद्धाओं को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं, और दुर्योधन उन्हें उत्तर देने को मुड़ता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.62.1)
तथा तु पृच्छन्तमतीव पार्थं । वैचित्रवीर्यं तमचिन्तयित्वा । उवाच कर्णो धृतराष्ट्रपुत्रं । प्रहर्षयन्संसदि कौरवाणाम् ॥
tathā tu pṛcchantamatīva pārthaṃ | vaicitravīryaṃ tamacintayitvā | uvāca karṇo dhṛtarāṣṭraputraṃ | praharṣayansaṃsadi kauravāṇām
जब विचित्रवीर्यपुत्र धृतराष्ट्र पार्थ के विषय में इस प्रकार बार-बार पूछ रहे थे, तब उनकी उपेक्षा करके कर्ण ने कौरवों की सभा में दुर्योधन को हर्षित करते हुए कहा—
कर्ण उवाच
श्लोक 2 (5.62.2)
मिथ्या प्रतिज्ञाय मया यदस्त्रं । रामात्कृतं ब्रह्ममयं पुरस्तात् । विज्ञाय तेनास्मि तदैवमुक्त- । स्ते नान्तकाले प्रतिभास्यतीति ॥
mithyā pratijñāya mayā yadastraṃ | rāmātkṛtaṃ brahmamayaṃ purastāt | vijñāya tenāsmi tadaivamukta- | ste nāntakāle pratibhāsyatīti
पूर्वकाल में मैंने झूठा परिचय देकर परशुराम से जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, सच जानकर उन्होंने उसी समय मुझसे कहा था— 'अन्तकाल में यह तुम्हें स्मरण नहीं आएगा।'
श्लोक 3 (5.62.3)
महापराधे ह्यपि यन्न तेन । महर्षिणाऽहं गुरुणा च शप्तः । शक्तः प्रदग्धुं ह्यपि तिग्मतेजाः । ससागरामप्यवनिं महर्षिः ॥
mahāparādhe hyapi yanna tena | maharṣiṇā'haṃ guruṇā ca śaptaḥ | śaktaḥ pradagdhuṃ hyapi tigmatejāḥ | sasāgarāmapyavaniṃ maharṣiḥ
मेरा अपराध बड़ा था, फिर भी उन महर्षि गुरु ने मुझे उससे अधिक शाप नहीं दिया — जबकि वे प्रचण्ड तेजस्वी महर्षि सागरों सहित पृथ्वी को भी भस्म कर सकते थे।
श्लोक 4 (5.62.4)
प्रसादितं ह्यस्य मया मनोऽभू- । च्छुश्रूषया स्वेन च पौरुषेण । तदस्ति चास्त्रं मम सावशेषं । तस्मात्समर्थोऽस्मि ममैष भारः ॥
prasāditaṃ hyasya mayā mano'bhū- | cchuśrūṣayā svena ca pauruṣeṇa | tadasti cāstraṃ mama sāvaśeṣaṃ | tasmātsamartho'smi mamaiṣa bhāraḥ
मैंने अपनी सेवा और अपने पुरुषार्थ से उनका मन प्रसन्न कर लिया था। इसलिए जब तक मेरी आयु शेष है, वह अस्त्र मेरे पास है; अतः मैं समर्थ हूँ — यह भार मेरा है।
श्लोक 5 (5.62.5)
निमेषमात्रात्तमृषेः प्रसाद- । मवाप्य पाञ्चालकरूषमत्स्यान् । निहत्य पार्थान्सह पुत्रपौत्रै- । र्लोकानहं शस्त्रजितान्प्रपत्स्ये ॥
nimeṣamātrāttamṛṣeḥ prasāda- | mavāpya pāñcālakarūṣamatsyān | nihatya pārthānsaha putrapautrai- | rlokānahaṃ śastrajitānprapatsye
उन ऋषि का अनुग्रह पाकर मैं पलक झपकते ही पाञ्चालों, करूषों, मत्स्यों और पुत्र-पौत्रों सहित पार्थों को मारकर शस्त्र से जीते जाने वाले लोकों को प्राप्त करूँगा।
श्लोक 6 (5.62.6)
पितामहस्तिष्ठतु ते समीपे । द्रोणश्च सर्वे च नरेन्द्रमुख्याः । ऋषिप्रसादेन बलेन गत्वा । पार्थान्हनिष्यामि ममैष भारः ॥
pitāmahastiṣṭhatu te samīpe | droṇaśca sarve ca narendramukhyāḥ | ṛṣiprasādena balena gatvā | pārthānhaniṣyāmi mamaiṣa bhāraḥ
पितामह आपके पास ही रहें, द्रोण और सभी प्रमुख राजा भी। ऋषि के अनुग्रह के बल से मैं जाकर पार्थों को मार डालूँगा — यह भार मेरा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (5.62.7)
एवं ब्रुवन्तं तमुवाच भीष्मः । किं कत्थसे कालपरीतबुद्धे । न कर्ण जानासि यथा प्रधाने । हते हताः स्युर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥
evaṃ bruvantaṃ tamuvāca bhīṣmaḥ | kiṃ katthase kālaparītabuddhe | na karṇa jānāsi yathā pradhāne | hate hatāḥ syurdhṛtarāṣṭraputrāḥ
ऐसा कहते हुए कर्ण से भीष्म ने कहा— 'काल से ग्रस्त बुद्धि वाले, क्यों डींग मारते हो? कर्ण, क्या तुम नहीं जानते कि प्रधान के मारे जाने पर धृतराष्ट्र के पुत्र मारे गए ही समझो?'
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (5.62.8)
यत्खाण्डवं दाहयता कृतं हि । कृष्णद्वितीयेन धनञ्जयेन । श्रुत्वैव तत्कर्म नियन्तुमात्मा । युक्तस्त्वया वै सहबान्धवेन ॥
yatkhāṇḍavaṃ dāhayatā kṛtaṃ hi | kṛṣṇadvitīyena dhanañjayena | śrutvaiva tatkarma niyantumātmā | yuktastvayā vai sahabāndhavena
कृष्ण के साथ खाण्डव वन को जलाते समय धनंजय ने जो कर्म किया था, उसे सुनकर ही तुम्हें अपने बन्धु-बान्धवों सहित स्वयं को संयम में रखना चाहिए था।
श्लोक 9 (5.62.9)
यां चापि शक्तिं त्रिदशाधिपस्ते । ददौ महात्मा भगवान्महेन्द्रः । भस्मीकृतां तां समरे विशीर्णां । चक्राहतां द्रक्ष्यसि केशवेन ॥
yāṃ cāpi śaktiṃ tridaśādhipaste | dadau mahātmā bhagavānmahendraḥ | bhasmīkṛtāṃ tāṃ samare viśīrṇāṃ | cakrāhatāṃ drakṣyasi keśavena
और देवताओं के अधिपति महात्मा भगवान् महेन्द्र ने तुम्हें जो शक्ति दी है, उसे तुम युद्ध में केशव के चक्र से आहत होकर भस्म और छिन्न-भिन्न हुआ देखोगे।
श्लोक 10 (5.62.10)
यस्ते शरः सर्पमुखो विभाति । सदाऽग्र्यमाल्यैर्महितः प्रयत्नात् । स पाण्डुपुत्राभिहतः शरौघैः । सह त्वया यास्यति कर्ण नाशम् ॥
yaste śaraḥ sarpamukho vibhāti | sadā'gryamālyairmahitaḥ prayatnāt | sa pāṇḍuputrābhihataḥ śaraughaiḥ | saha tvayā yāsyati karṇa nāśam
कर्ण, तुम्हारा जो सर्पमुख बाण सदा श्रेष्ठ मालाओं से यत्नपूर्वक पूजित होकर चमकता है, वह पाण्डुपुत्र के बाण-समूहों से आहत होकर तुम्हारे साथ ही नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 11 (5.62.11)
बाणस्य भौमस्य च कर्ण हन्ता । किरीटिनं रक्षति वासुदेवः । यस्त्वादृशानां च वरीयसां च । हन्ता रिपूणां तुमुले प्रगाढे ॥
bāṇasya bhaumasya ca karṇa hantā | kirīṭinaṃ rakṣati vāsudevaḥ | yastvādṛśānāṃ ca varīyasāṃ ca | hantā ripūṇāṃ tumule pragāḍhe
कर्ण, बाणासुर और भौमासुर का वध करने वाले वासुदेव किरीटी अर्जुन की रक्षा करते हैं — वे, जो घमासान युद्ध में तुम जैसे और तुमसे भी बड़े शत्रुओं का संहार करते हैं।
कर्ण उवाच
श्लोक 12 (5.62.12)
असंशयं वृष्णिपतिर्यथोक्त- । स्तथा च भूयांश्च ततो महात्मा । अहं यदुक्तः परुषं तु किंचि- । त्पितामहस्तस्य फलं शृणोतु ॥
asaṃśayaṃ vṛṣṇipatiryathokta- | stathā ca bhūyāṃśca tato mahātmā | ahaṃ yaduktaḥ paruṣaṃ tu kiṃci- | tpitāmahastasya phalaṃ śṛṇotu
निःसन्देह वृष्णिपति वैसे ही हैं जैसा कहा गया, बल्कि उससे भी बढ़कर महात्मा हैं। किन्तु पितामह ने मुझसे जो कुछ कठोर वचन कहे हैं, उनका फल भी वे सुन लें।
श्लोक 13 (5.62.13)
न्यस्यामि शस्त्राणि न जातु सङ्ख्ये । पितामहो द्रक्ष्यति मां सभायाम् । त्वयि प्रशान्ते तु मम प्रभावं । द्रक्ष्यन्ति सर्वे भुवि भूमिपालाः ॥
nyasyāmi śastrāṇi na jātu saṅkhye | pitāmaho drakṣyati māṃ sabhāyām | tvayi praśānte tu mama prabhāvaṃ | drakṣyanti sarve bhuvi bhūmipālāḥ
मैं अपने शस्त्र रख देता हूँ। पितामह मुझे युद्ध में कभी नहीं, केवल सभा में ही देखेंगे। आपके शान्त हो जाने पर ही पृथ्वी के सब राजा मेरा प्रभाव देखेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (5.62.14)
इत्येवमुक्त्वा स महाधनुष्मान् । हित्वा सभां स्वं भवनं जगाम । भीष्मस्तु दुर्योधनमेव राजन् । मध्ये कुरूणां प्रहसन्नुवाच ॥
ityevamuktvā sa mahādhanuṣmān | hitvā sabhāṃ svaṃ bhavanaṃ jagāma | bhīṣmastu duryodhanameva rājan | madhye kurūṇāṃ prahasannuvāca
ऐसा कहकर वह महाधनुर्धर सभा छोड़कर अपने भवन को चला गया। हे राजन्, तब भीष्म ने कुरुओं के बीच हँसते हुए दुर्योधन से ही कहा—
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (5.62.15)
सत्यप्रतिज्ञः किल सूतपुत्र- । स्तथा स भारं विषहेत कस्मात् । व्यूहं प्रतिव्यूह्य शिरांसि भित्त्वा । लोकक्षयं पश्यत भीमसेनात् ॥
satyapratijñaḥ kila sūtaputra- | stathā sa bhāraṃ viṣaheta kasmāt | vyūhaṃ prativyūhya śirāṃsi bhittvā | lokakṣayaṃ paśyata bhīmasenāt
सूतपुत्र तो बड़ा सत्यप्रतिज्ञ है! फिर वह यह भार कैसे उठाएगा? अब व्यूह के सामने प्रतिव्यूह रचकर सिर फोड़ते हुए भीमसेन के हाथों होने वाला लोकसंहार देखो।
श्लोक 16 (5.62.16)
आवन्त्यकालिङ्गजयद्रथेषु । चेदिध्वजे तिष्ठति बाह्लिके च । अहं हनिष्यामि सदा परेषां । सहस्रशश्चायुतशश्च योधान् ॥
āvantyakāliṅgajayadratheṣu | cedidhvaje tiṣṭhati bāhlike ca | ahaṃ haniṣyāmi sadā pareṣāṃ | sahasraśaścāyutaśaśca yodhān
अवन्ति और कलिंग के राजा, जयद्रथ, चेदिध्वज और बाह्लीक खड़े देखते रहेंगे, और मैं स्वयं प्रतिदिन शत्रुपक्ष के हजारों और दसियों हजार योद्धाओं को मारूँगा।
श्लोक 17 (5.62.17)
यदैव रामे भगवत्यनिन्द्ये । ब्रह्मब्रुवाणः कृतवांस्तदस्त्रम् । तदैव धर्मश्च तपश्च नष्टं । वैकर्तनस्याधमपूरुषस्य ॥
yadaiva rāme bhagavatyanindye | brahmabruvāṇaḥ kṛtavāṃstadastram | tadaiva dharmaśca tapaśca naṣṭaṃ | vaikartanasyādhamapūruṣasya
जिस समय उस अधम पुरुष वैकर्तन ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर निर्दोष भगवान् परशुराम से वह अस्त्र प्राप्त किया, उसी समय उसका धर्म और तप नष्ट हो गया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (5.62.18)
तथोक्तवाक्ये नृपतीन्द्र भीष्मे । निक्षिप्य शस्त्राणि गते च कर्णे । वैचित्रवीर्यस्य सुतोऽल्पबुद्धि- । र्दुर्योधनः शान्तनवं बभाषे ॥
tathoktavākye nṛpatīndra bhīṣme | nikṣipya śastrāṇi gate ca karṇe | vaicitravīryasya suto'lpabuddhi- | rduryodhanaḥ śāntanavaṃ babhāṣe
हे राजेन्द्र, भीष्म के ऐसा कहने पर और कर्ण के शस्त्र रखकर चले जाने पर विचित्रवीर्य के पुत्र का अल्पबुद्धि पुत्र दुर्योधन शान्तनुनन्दन भीष्म से बोला—