उद्योग पर्व · अध्याय 61
दुर्योधन की आत्मप्रशंसा
पिता की आशंकाओं से चिढ़कर दुर्योधन इस विचार को ठुकरा देता है कि देवता पाण्डवों की ओर से लड़ेंगे: देवता काम और द्वेष से रहित होकर आचरण करते हैं, और यदि वे सहायता करना चाहते तो पाण्डव तेरह वर्ष दुःख न भोगते। फिर वह अपनी शक्तियों की डींग मारता है — अग्नि को शान्त करना, फटती पृथ्वी को स्थिर करना, तूफ़ानों को थामना, जल को स्तम्भित कर उस पर सेनाएँ चलाना — और कहता है कि जिससे वह द्वेष करे उसे कोई नहीं बचा सकता तथा भीष्म, द्रोण आदि की सारी अस्त्रविद्या उसमें है। उसके चुप होने पर राजा फिर संजय से प्रश्न करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.61.1)
पितुरेतद्वचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः । आधाय विपुलं क्रोधं पुनरेवेदमब्रवीत् ॥
pituretadvacaḥ śrutvā dhārtarāṣṭro'tyamarṣaṇaḥ | ādhāya vipulaṃ krodhaṃ punarevedamabravīt
पिता के ये वचन सुनकर अत्यन्त असहिष्णु धृतराष्ट्रपुत्र ने भारी क्रोध धारण किया और फिर यह कहा—
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (5.61.2)
अशक्या देवसचिवाः पार्थाः स्युरिति यद्भवान् । मन्यते तद्भयं व्येतु भवतो राजसत्तम ॥
aśakyā devasacivāḥ pārthāḥ syuriti yadbhavān | manyate tadbhayaṃ vyetu bhavato rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, आप जो यह मानते हैं कि देवता जिनके सहायक हैं वे पार्थ अजेय हैं — आपका वह भय दूर हो जाए।
श्लोक 3 (5.61.3)
अकामद्वेषसंयोगाल्लोभद्रोहाच्च भारत । उपेक्षया च भावानां देवा देवत्वमाप्नुवन् ॥
akāmadveṣasaṃyogāllobhadrohācca bhārata | upekṣayā ca bhāvānāṃ devā devatvamāpnuvan
हे भारत, काम और द्वेष, लोभ और द्रोह से कोई सम्बन्ध न रखने तथा सांसारिक भावों के प्रति उदासीन रहने से ही देवताओं ने देवत्व प्राप्त किया है।
श्लोक 4 (5.61.4)
इति द्वैपायनो व्यासो नारदश्च महातपाः । जामदग्न्यश्च रामो नः कथामकथयत्पुरा ॥
iti dvaipāyano vyāso nāradaśca mahātapāḥ | jāmadagnyaśca rāmo naḥ kathāmakathayatpurā
यह बात पूर्वकाल में द्वैपायन व्यास, महातपस्वी नारद और जमदग्निपुत्र परशुराम ने हमें बताई थी।
श्लोक 5 (5.61.5)
नैव मानुषवद्देवाः प्रवर्तन्ते कदाचन । कामात्क्रोधात्तथा लोभाद्द्वेषाच्च भरतर्षभ ॥
naiva mānuṣavaddevāḥ pravartante kadācana | kāmātkrodhāttathā lobhāddveṣācca bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, देवता कभी भी मनुष्यों की भाँति काम, क्रोध, लोभ या द्वेष से प्रेरित होकर आचरण नहीं करते।
श्लोक 6 (5.61.6)
यदा ह्यग्निश्च वायुश्च धर्म इन्द्रोऽश्विनावपि । कामयोगात्प्रवर्तेरन्न पार्था दुःखमाप्नुयुः ॥
yadā hyagniśca vāyuśca dharma indro'śvināvapi | kāmayogātpravarteranna pārthā duḥkhamāpnuyuḥ
यदि अग्नि, वायु, धर्म, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार कामना से प्रेरित होकर काम करते, तो पार्थों को दुःख न झेलना पड़ता।
श्लोक 7 (5.61.7)
तस्मान्न भवता चिन्ता कार्यैषा स्यात्कथंचन । दैवेष्वपेक्षका ह्येते शश्वद्भावेषु भारत ॥
tasmānna bhavatā cintā kāryaiṣā syātkathaṃcana | daiveṣvapekṣakā hyete śaśvadbhāveṣu bhārata
इसलिए हे भारत, आपको किसी प्रकार यह चिन्ता नहीं करनी चाहिए; क्योंकि देवता सदा दैवी भावों पर ही दृष्टि रखते हैं।
श्लोक 8 (5.61.8)
अथ चेत्कामसंयोगाद्द्वेषो लोभश्च लक्ष्यते । देवेषु दैवप्रामाण्यान्नैषां तद्विक्रमिष्यति ॥
atha cetkāmasaṃyogāddveṣo lobhaśca lakṣyate | deveṣu daivaprāmāṇyānnaiṣāṃ tadvikramiṣyati
और यदि देवताओं में भी कामना से उपजे द्वेष और लोभ दिखाई दें, तो दैवी विधान के प्रमाण से उनका वह (प्रयत्न) सफल नहीं होगा।
श्लोक 9 (5.61.9)
मयाऽभिमन्त्रितः शश्वज्जातवेदाः प्रशाम्यति । दिधक्षुः सकलाँल्लोकान्परिक्षिप्य समन्ततः ॥
mayā'bhimantritaḥ śaśvajjātavedāḥ praśāmyati | didhakṣuḥ sakalām̐llokānparikṣipya samantataḥ
मेरे मन्त्र-प्रयोग से समस्त लोकों को चारों ओर से घेरकर जला डालने को उद्यत अग्नि भी सदा शान्त हो जाती है।
श्लोक 10 (5.61.10)
यद्वा परमकं तेजो येन युक्ता दिवौकसः । ममाप्यनुपमं भूयो देवेभ्यो विद्धि भारत ॥
yadvā paramakaṃ tejo yena yuktā divaukasaḥ | mamāpyanupamaṃ bhūyo devebhyo viddhi bhārata
हे भारत, जिस परम तेज से स्वर्गवासी देवता युक्त हैं, उससे भी बढ़कर अनुपम तेज मुझमें है — यह जान लीजिए।
श्लोक 11 (5.61.11)
विदीर्यमाणां वसुधां गिरीणां शिखराणि च । लोकस्य पश्यतो राजन्स्थापयाम्यभिमन्त्रणात् ॥
vidīryamāṇāṃ vasudhāṃ girīṇāṃ śikharāṇi ca | lokasya paśyato rājansthāpayāmyabhimantraṇāt
हे राजन्, जब पृथ्वी फटने लगती है और पर्वतों के शिखर भी, तब मैं संसार के देखते-देखते अपने मन्त्रबल से उन्हें स्थिर कर देता हूँ।
श्लोक 12 (5.61.12)
चेतनाचेतनस्यास्य जङ्गमस्थावरस्य च । विनाशाय समुत्पन्नमहं घोरं महास्वनम् ॥
cetanācetanasyāsya jaṅgamasthāvarasya ca | vināśāya samutpannamahaṃ ghoraṃ mahāsvanam
चेतन-अचेतन, जंगम और स्थावर — इस समस्त जगत् के विनाश के लिए उठे भयंकर, महागर्जन करते तूफ़ान को मैं—
श्लोक 13 (5.61.13)
अश्मवर्षं च वायुं च शमयामीह नित्यशः । जगतः पश्यतोऽभीक्ष्णं भूतानामनुकम्पया ॥
aśmavarṣaṃ ca vāyuṃ ca śamayāmīha nityaśaḥ | jagataḥ paśyato'bhīkṣṇaṃ bhūtānāmanukampayā
—पत्थरों की वर्षा और प्रचण्ड वायु को — प्राणियों पर दया करके, जगत् के देखते-देखते, यहाँ सदा बार-बार शान्त कर देता हूँ।
श्लोक 14 (5.61.14)
स्तम्भितास्वप्सु गच्छन्ति मया रथपदातयः । देवासुराणां भावानामहमेकः प्रवर्तिता ॥
stambhitāsvapsu gacchanti mayā rathapadātayaḥ | devāsurāṇāṃ bhāvānāmahamekaḥ pravartitā
मैं जल को स्तम्भित कर देता हूँ तो उस पर रथ और पैदल सैनिक चलते हैं। देवताओं और असुरों के व्यापारों का प्रवर्तक अकेला मैं ही हूँ।
श्लोक 15 (5.61.15)
अक्षौहिणीभिर्यान्देशान्यामि कार्येण केनचित् । तत्रापो मे प्रवर्तन्ते यत्र यत्राभिकामये ॥
akṣauhiṇībhiryāndeśānyāmi kāryeṇa kenacit | tatrāpo me pravartante yatra yatrābhikāmaye
किसी भी कार्य से मैं अपनी अक्षौहिणी सेनाओं के साथ जिन देशों में जाता हूँ, वहाँ जहाँ-जहाँ मैं चाहता हूँ, वहीं जल बहने लगता है।
श्लोक 16 (5.61.16)
भयानकानि विषये व्यालादीनि न सन्ति मे । मन्त्रगुप्तानि भूतानि न हिंसन्ति भयंकराः ॥
bhayānakāni viṣaye vyālādīni na santi me | mantraguptāni bhūtāni na hiṃsanti bhayaṃkarāḥ
मेरे राज्य में सर्प आदि भयानक जीव नहीं हैं; मेरे मन्त्रों से बँधे प्राणी भयंकर होते हुए भी किसी की हिंसा नहीं करते।
श्लोक 17 (5.61.17)
निकामवर्षी पर्जन्यो राजन्विषयवासिनाम् । धर्मिष्ठाश्च प्रजाः सर्वा ईतयश्च न सन्ति मे ॥
nikāmavarṣī parjanyo rājanviṣayavāsinām | dharmiṣṭhāśca prajāḥ sarvā ītayaśca na santi me
हे राजन्, मेरे राज्य के निवासियों के लिए मेघ इच्छानुसार वर्षा करता है; मेरी समस्त प्रजा धर्मपरायण है और मेरे यहाँ कोई ईति (उपद्रव) नहीं है।
श्लोक 18 (5.61.18)
अश्विनावथ वाय्वग्नी मरुद्भिः सह वृत्रहा । धर्मश्चैव मया द्विष्टान्नोत्सहन्तेऽभिरक्षितुम् ॥
aśvināvatha vāyvagnī marudbhiḥ saha vṛtrahā | dharmaścaiva mayā dviṣṭānnotsahante'bhirakṣitum
दोनों अश्विनीकुमार, वायु और अग्नि, मरुद्गणों सहित वृत्रहन्ता इन्द्र तथा धर्म भी उनकी रक्षा करने का साहस नहीं करते जिनसे मैं द्वेष करता हूँ।
श्लोक 19 (5.61.19)
यदि ह्येते समर्थाः स्युर्मद्द्विषस्त्रातुमञ्जसा । न स्म त्रयोदश समाः पार्था दुःखमवाप्नुयुः ॥
yadi hyete samarthāḥ syurmaddviṣastrātumañjasā | na sma trayodaśa samāḥ pārthā duḥkhamavāpnuyuḥ
यदि ये मेरे शत्रुओं की सहज ही रक्षा कर सकते, तो पार्थ तेरह वर्षों तक दुःख न भोगते।
श्लोक 20 (5.61.20)
नैव देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः । शक्तास्त्रातुं मया द्विष्टं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
naiva devā na gandharvā nāsurā na ca rākṣasāḥ | śaktāstrātuṃ mayā dviṣṭaṃ satyametadbravīmi te
न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस — कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता जिससे मैं द्वेष करता हूँ। यह मैं आपसे सच कहता हूँ।
श्लोक 21 (5.61.21)
यदभिध्याम्यहं शश्वच्छुभं वा यदि वाऽशुभम् । नैतद्विपन्नपूर्वं मे मित्रेष्वरिषु चोभयोः ॥
yadabhidhyāmyahaṃ śaśvacchubhaṃ vā yadi vā'śubham | naitadvipannapūrvaṃ me mitreṣvariṣu cobhayoḥ
मैं जो भी शुभ या अशुभ संकल्प करता हूँ, वह मित्रों और शत्रुओं — दोनों के विषय में आज तक कभी विफल नहीं हुआ।
श्लोक 22 (5.61.22)
भविष्यतीदमिति वा यद्ब्रवीमि परन्तप । नान्यथा भूतपूर्वं च सत्यवागिति मां विदुः ॥
bhaviṣyatīdamiti vā yadbravīmi parantapa | nānyathā bhūtapūrvaṃ ca satyavāgiti māṃ viduḥ
हे परन्तप, 'यह होकर रहेगा' — ऐसा मैं जो कुछ कहता हूँ, वह कभी अन्यथा नहीं हुआ; इसीलिए लोग मुझे सत्यवादी जानते हैं।
श्लोक 23 (5.61.23)
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् । आश्वासनार्थं भवतः प्रोक्तं न श्लाघया नृप ॥
lokasākṣikametanme māhātmyaṃ dikṣu viśrutam | āśvāsanārthaṃ bhavataḥ proktaṃ na ślāghayā nṛpa
मेरी यह महिमा सारा जगत् देख चुका है और सब दिशाओं में विख्यात है। हे नृप, यह मैंने आपको आश्वस्त करने के लिए कहा है, आत्मश्लाघा के लिए नहीं।
श्लोक 24 (5.61.24)
न ह्यहं श्लाघनो राजन्भूतपूर्वः कदाचन । असदाचरितं ह्येतद्यदात्मानं प्रशंसति ॥
na hyahaṃ ślāghano rājanbhūtapūrvaḥ kadācana | asadācaritaṃ hyetadyadātmānaṃ praśaṃsati
हे राजन्, मैं पहले कभी आत्मप्रशंसा करने वाला नहीं रहा; अपनी प्रशंसा करना तो दुर्जनों का आचरण है।
श्लोक 25 (5.61.25)
पाण्डवांश्चैव मत्स्यांश्च पाञ्चालान्केकयैः सह । सात्यकिं वासुदेवं च श्रोतासि विजितान्मया ॥
pāṇḍavāṃścaiva matsyāṃśca pāñcālānkekayaiḥ saha | sātyakiṃ vāsudevaṃ ca śrotāsi vijitānmayā
आप सुनेंगे कि पाण्डव और मत्स्य, केकयों सहित पाञ्चाल, सात्यकि और वासुदेव — सब मेरे द्वारा जीत लिए गए।
श्लोक 26 (5.61.26)
सरितः सागरं प्राप्य यथा नश्यन्ति सर्वशः । तथैव ते विनङ्क्ष्यन्ति मामासाद्य सहान्वयाः ॥
saritaḥ sāgaraṃ prāpya yathā naśyanti sarvaśaḥ | tathaiva te vinaṅkṣyanti māmāsādya sahānvayāḥ
जैसे नदियाँ समुद्र में पहुँचकर पूरी तरह विलीन हो जाती हैं, वैसे ही वे भी मुझसे टकराकर अपने वंश सहित नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 27 (5.61.27)
परा बुद्धिः परं तेजो वीर्यं च परमं मम । परा विद्या परो योगो मम तेभ्यो विशिष्यते ॥
parā buddhiḥ paraṃ tejo vīryaṃ ca paramaṃ mama | parā vidyā paro yogo mama tebhyo viśiṣyate
मेरी बुद्धि श्रेष्ठ है, तेज श्रेष्ठ है और पराक्रम भी परम है; मेरी विद्या श्रेष्ठ है, योग श्रेष्ठ है — इन सबमें मैं उनसे बढ़कर हूँ।
श्लोक 28 (5.61.28)
पितामहश्च द्रोणश्च कृपः शल्यः शलस्तथा । अस्त्रेषु यत्प्रजानन्ति सर्वं तन्मयि विद्यते ॥
pitāmahaśca droṇaśca kṛpaḥ śalyaḥ śalastathā | astreṣu yatprajānanti sarvaṃ tanmayi vidyate
पितामह, द्रोण, कृप, शल्य और शल अस्त्रविद्या में जो कुछ जानते हैं, वह सब मुझमें विद्यमान है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (5.61.29)
इत्युक्ते सञ्जयं भूयः पर्यपृच्छत भारत । ज्ञात्वा युयुत्सोः कार्याणि प्राप्तकालमरिन्दमः ॥
ityukte sañjayaṃ bhūyaḥ paryapṛcchata bhārata | jñātvā yuyutsoḥ kāryāṇi prāptakālamarindamaḥ
हे भारत, यह कहे जाने पर शत्रुदमन राजा ने युद्ध के इच्छुक के अभिप्राय जानकर, समय के अनुरूप, संजय से फिर प्रश्न किया।