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उद्योग पर्व · अध्याय 60

धृतराष्ट्र द्वारा दोनों पक्षों का आकलन

धृतराष्ट्र संजय के वृत्तान्त और दोनों पक्षों के बलाबल पर विचार करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दैवी और मानवी — दोनों प्रकार की शक्ति में पाण्डव बढ़कर हैं। वे दुर्योधन से कहते हैं कि पाण्डवों को जन्म देने वाले देवता, और खाण्डव वन का उपकार याद रखने वाले अग्निदेव, युद्ध में उनका साथ देंगे; फिर वे अर्जुन के अनुपम धनुष, तरकस, ध्वज, रथ और बाण चलाने की गति का वर्णन करते हैं। चिन्ता से नींद गँवा चुके धृतराष्ट्र कहते हैं कि इस कलह का अन्त शान्ति के सिवा किसी और उपाय से नहीं हो सकता, और वे सदा से पाण्डवों को कौरवों से अधिक शक्तिशाली मानते आए हैं।

अध्याय 59अध्याय-सूचीअध्याय 61

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (5.60.1)

सञ्जयस्य वचः श्रुत्वा प्रज्ञाचक्षुर्जनेश्वरः । ततः सङ्ख्यातुमारेभे तद्वचो गुणदोषतः ॥

sañjayasya vacaḥ śrutvā prajñācakṣurjaneśvaraḥ | tataḥ saṅkhyātumārebhe tadvaco guṇadoṣataḥ

संजय के वचन सुनकर प्रज्ञाचक्षु राजा (धृतराष्ट्र) उन वचनों के गुण-दोषों पर विचार करने लगे।

श्लोक 2 (5.60.2)

प्रसङ्ख्याय च सौक्ष्म्येण गुणदोषान्विचक्षणः । यथावन्मतितत्त्वेन जयकामः सुतान्प्रति ॥

prasaṅkhyāya ca saukṣmyeṇa guṇadoṣānvicakṣaṇaḥ | yathāvanmatitattvena jayakāmaḥ sutānprati

सूक्ष्मता से गुण-दोषों का भली-भाँति आकलन करके, अपनी बुद्धि के अनुसार यथावत् विचार करके, पुत्रों की विजय चाहने वाले उस विवेकी राजा ने

श्लोक 3 (5.60.3)

बलाबलं विनिश्चित्य याथातथ्येन बुद्धिमान् । यदा तु मेने भूयिष्ठं तद्वचो गुणदोषतः ॥

balābalaṃ viniścitya yāthātathyena buddhimān | yadā tu mene bhūyiṣṭhaṃ tadvaco guṇadoṣataḥ

और दोनों पक्षों के बलाबल का यथार्थ रूप से निश्चय करके — जब उस बुद्धिमान ने गुण-दोषों के विचार से उन वचनों को अधिकांशतः ठीक माना,

श्लोक 4 (5.60.4)

पुनरेव कुरूणां च पाण्डवानां च बुद्धिमान् । शक्तिं सङ्ख्यातुमारेभे तदा वै मनुजाधिपः ॥

punareva kurūṇāṃ ca pāṇḍavānāṃ ca buddhimān | śaktiṃ saṅkhyātumārebhe tadā vai manujādhipaḥ

तब उस बुद्धिमान नरेश ने एक बार फिर कौरवों और पाण्डवों की शक्ति का आकलन आरम्भ किया।

श्लोक 5 (5.60.5)

देवमानुषयोः शक्त्या तेजसा चैव पाण्डवान् । कुरूञ्शक्त्याऽल्पतरया दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥

devamānuṣayoḥ śaktyā tejasā caiva pāṇḍavān | kurūñśaktyā'lpatarayā duryodhanamathābravīt

दैवी और मानवी शक्ति में तथा तेज में पाण्डवों को अधिक और कौरवों को कम शक्ति वाला समझकर उन्होंने दुर्योधन से कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 6 (5.60.6)

दुर्योधनेयं चिन्ता मे शश्वन्न व्युपशाम्यति । सत्यं ह्येतदहं मन्ये प्रत्यक्षं नानुमानतः ॥

duryodhaneyaṃ cintā me śaśvanna vyupaśāmyati | satyaṃ hyetadahaṃ manye pratyakṣaṃ nānumānataḥ

दुर्योधन, मेरी यह चिन्ता कभी शान्त नहीं होती। मैं इसे सत्य मानता हूँ — इसे मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ, अनुमान से नहीं।

श्लोक 7 (5.60.7)

आत्मजेषु परं स्नेहं सर्वभूतानि कुर्वते । प्रियाणि चैषां कुर्वन्ति यथाशक्ति हितानि च ॥

ātmajeṣu paraṃ snehaṃ sarvabhūtāni kurvate | priyāṇi caiṣāṃ kurvanti yathāśakti hitāni ca

सभी प्राणी अपनी सन्तानों से परम स्नेह करते हैं, और यथाशक्ति उनका प्रिय और हित करते हैं।

श्लोक 8 (5.60.8)

एवमेवोपकर्तॄणां प्रायशो लक्षयामहे । इच्छन्ति बहुलं सन्तः प्रतिकर्तुं महत्प्रियम् ॥

evamevopakartṝṇāṃ prāyaśo lakṣayāmahe | icchanti bahulaṃ santaḥ pratikartuṃ mahatpriyam

इसी प्रकार हम प्रायः देखते हैं कि सज्जन अपने उपकारियों के बड़े उपकार का बदला भरपूर चुकाना चाहते हैं।

श्लोक 9 (5.60.9)

अग्निः साचिव्यकर्ता स्यात्खाण्डवे तत्कृतं स्मरन् । अर्जुनस्यापि भीमेऽस्मिन्कुरुपाण्डुसमागमे ॥

agniḥ sācivyakartā syātkhāṇḍave tatkṛtaṃ smaran | arjunasyāpi bhīme'sminkurupāṇḍusamāgame

खाण्डव वन में अर्जुन के किए उपकार को याद करके अग्निदेव कौरवों और पाण्डवों के इस भयंकर संग्राम में अवश्य उसके सहायक होंगे।

श्लोक 10 (5.60.10)

जातिगृद्ध्याऽभिपन्नाश्च पाण्डवानामनेकशः । धर्मादयः समेष्यन्ति समाहूता दिवौकसः ॥

jātigṛddhyā'bhipannāśca pāṇḍavānāmanekaśaḥ | dharmādayaḥ sameṣyanti samāhūtā divaukasaḥ

और अपनी सन्तान के प्रति स्नेह से प्रेरित धर्म आदि देवता बार-बार बुलाए जाने पर पाण्डवों के पक्ष में आ जुटेंगे।

श्लोक 11 (5.60.11)

भीष्मद्रोणकृपादीनां भयादशनिसन्निभम् । रिरक्षिषन्तः संरम्भं गमिष्यन्तीति मे मतिः ॥

bhīṣmadroṇakṛpādīnāṃ bhayādaśanisannibham | rirakṣiṣantaḥ saṃrambhaṃ gamiṣyantīti me matiḥ

भीष्म, द्रोण, कृप आदि के भय से उनकी रक्षा करना चाहते हुए वे वज्र के समान प्रचण्ड रोष धारण करेंगे — ऐसा मेरा विचार है।

श्लोक 12 (5.60.12)

ते देवैः सहिताः पार्था न शक्याः प्रतिवीक्षितुम् । मानुषेण नरव्याघ्रा वीर्यवन्तोऽस्त्रपारगाः ॥

te devaiḥ sahitāḥ pārthā na śakyāḥ prativīkṣitum | mānuṣeṇa naravyāghrā vīryavanto'strapāragāḥ

देवताओं के साथ होने पर उन पुरुषसिंह, पराक्रमी और अस्त्र-विद्या के पारंगत पार्थों की ओर कोई मनुष्य आँख उठाकर देख भी नहीं सकता।

श्लोक 13 (5.60.13)

दुरासदं यस्य दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । वारुणौ चाक्षयौ दिव्यौ शरपूर्णौ महेषुधी ॥

durāsadaṃ yasya divyaṃ gāṇḍīvaṃ dhanuruttamam | vāruṇau cākṣayau divyau śarapūrṇau maheṣudhī

जिसका धनुष दुर्जय, दिव्य और श्रेष्ठ गाण्डीव है; जिसके वरुण के दिए दो विशाल तरकस दिव्य, अक्षय और बाणों से भरे हैं;

श्लोक 14 (5.60.14)

वानरश्च ध्वजे दिव्यो निःसङ्गे धूमवद्गतिः । रथश्च चतुरन्तायां यस्य नास्ति समः क्षितौ ॥

vānaraśca dhvaje divyo niḥsaṅge dhūmavadgatiḥ | rathaśca caturantāyāṃ yasya nāsti samaḥ kṣitau

जिसकी ध्वजा पर दिव्य वानर विराजता है; जिसकी गति धुएँ की तरह कहीं नहीं रुकती; जिसके रथ के समान चारों दिशाओं वाली पृथ्वी पर कोई रथ नहीं है;

श्लोक 15 (5.60.15)

महामेघनिभश्चापि निर्घोषः श्रूयते जनैः । महाशनिसमः शब्दः शात्रवाणां भयंकरः ॥

mahāmeghanibhaścāpi nirghoṣaḥ śrūyate janaiḥ | mahāśanisamaḥ śabdaḥ śātravāṇāṃ bhayaṃkaraḥ

जिसका महामेघ के समान गर्जन लोग सुनते हैं — महान वज्र के समान वह शब्द शत्रुओं को भयभीत कर देता है;

श्लोक 16 (5.60.16)

यं चातिमानुषं वीर्ये कृत्स्नो लोको व्यवस्यति । देवानामपि जेतारं यं विदुः पार्थिवा रणे ॥

yaṃ cātimānuṣaṃ vīrye kṛtsno loko vyavasyati | devānāmapi jetāraṃ yaṃ viduḥ pārthivā raṇe

जिसे सारा संसार पराक्रम में मनुष्य से बढ़कर मानता है, और जिसे राजा युद्ध में देवताओं को भी जीतने वाला जानते हैं;

श्लोक 17 (5.60.17)

शतानि पञ्च चैवेषून्यो गृह्णन्नैव दृश्यते । निमेषान्तरमात्रेण मुञ्चन्दूरं च पातयन् ॥

śatāni pañca caiveṣūnyo gṛhṇannaiva dṛśyate | nimeṣāntaramātreṇa muñcandūraṃ ca pātayan

जो पाँच सौ बाण उठाता हुआ दिखाई भी नहीं देता, पर पलक झपकते ही उन्हें छोड़कर दूर तक लक्ष्यों को गिरा देता है;

श्लोक 18 (5.60.18)

यमाह भीष्मो द्रोणश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च । मद्रराजस्तथा शल्यो मध्यस्था ये च मानवाः ॥

yamāha bhīṣmo droṇaśca kṛpo drauṇistathaiva ca | madrarājastathā śalyo madhyasthā ye ca mānavāḥ

जिसके विषय में भीष्म, द्रोण, कृप, द्रोणपुत्र, मद्रराज शल्य और तटस्थ लोग भी कहते हैं

श्लोक 19 (5.60.19)

युद्धायावस्थितं पार्थं पार्थिवैरतिमानुषैः । अशक्यं रथशार्दूलं पराजेतुमरिंदमम् ॥

yuddhāyāvasthitaṃ pārthaṃ pārthivairatimānuṣaiḥ | aśakyaṃ rathaśārdūlaṃ parājetumariṃdamam

कि युद्ध के लिए डटे हुए, रथियों में सिंह के समान, शत्रुदमन पार्थ को अलौकिक बल वाले राजा भी पराजित नहीं कर सकते;

श्लोक 20 (5.60.20)

क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्चबाणशतानि यः । सदृशं बाहुवीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् ॥

kṣipatyekena vegena pañcabāṇaśatāni yaḥ | sadṛśaṃ bāhuvīryeṇa kārtavīryasya pāṇḍavam

वह पाण्डव, जो एक ही वेग में पाँच सौ बाण छोड़ता है, और भुजाओं के बल में कार्तवीर्य के समान है —

श्लोक 21 (5.60.21)

तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् । निघ्नन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन्महाहवे ॥

tamarjunaṃ maheṣvāsaṃ mahendropendravikramam | nighnantamiva paśyāmi vimarde'sminmahāhave

उस महान धनुर्धर अर्जुन को, जो महेन्द्र और उपेन्द्र के समान पराक्रमी है, मैं इस महासंग्राम के घमासान में मानो संहार करता हुआ देख रहा हूँ।

श्लोक 22 (5.60.22)

इत्येवं चिन्तयन्कृत्स्नमहोरात्राणि भारत । अनिद्रो निःसुखश्चास्मि कुरूणां शमचिन्तया ॥

ityevaṃ cintayankṛtsnamahorātrāṇi bhārata | anidro niḥsukhaścāsmi kurūṇāṃ śamacintayā

हे भारत, दिन-रात यही सब सोचते हुए, कौरवों की शान्ति की चिन्ता में मेरी नींद और सुख दोनों जाते रहे हैं।

श्लोक 23 (5.60.23)

क्षयोदयोऽयं सुमहान्कुरूणां प्रत्युपस्थितः । अस्य चेत्कलहस्यान्तः शमादन्यो न विद्यते ॥

kṣayodayo'yaṃ sumahānkurūṇāṃ pratyupasthitaḥ | asya cetkalahasyāntaḥ śamādanyo na vidyate

कौरवों का यह महाविनाश सामने आ खड़ा हुआ है। यदि इस कलह का अन्त होना है, तो शान्ति के सिवा उसका कोई दूसरा अन्त नहीं है।

श्लोक 24 (5.60.24)

शमो मे रोचते नित्यं पार्थैस्तात न विग्रहः । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवाञ्शक्तिमत्तरान् ॥

śamo me rocate nityaṃ pārthaistāta na vigrahaḥ | kurubhyo hi sadā manye pāṇḍavāñśaktimattarān

पुत्र, मुझे पार्थों के साथ शान्ति ही सदा अच्छी लगती है, युद्ध नहीं; क्योंकि मैं सदा से पाण्डवों को कौरवों से अधिक शक्तिशाली मानता आया हूँ।

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