उद्योग पर्व · अध्याय 66
संजय का व्यास और गान्धारी को बुलाने का आग्रह
जब दुर्योधन पिता के वचनों का स्वागत नहीं करता, तो सभा में एकत्र राजा उठकर चले जाते हैं। संजय के साथ अकेले रह जाने पर धृतराष्ट्र उनसे दोनों सेनाओं का बलाबल बताने को कहते हैं, पर संजय इस भय से कि राजा के मन में असूया न जागे, एकान्त में बोलने से मना कर देते हैं और व्यास तथा महारानी गान्धारी की उपस्थिति माँगते हैं। विदुर उन्हें सभा में ले आते हैं, और व्यास संजय से कहते हैं कि वे कृष्ण और अर्जुन के विषय में जो कुछ जानते हैं, सब राजा को बताएँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.66.1)
दुर्योधने धार्तराष्ट्रे तद्वचो नाभिनन्दति । तूष्णींभूतेषु सर्वेषु समुत्तस्थुर्नरर्षभाः ॥
duryodhane dhārtarāṣṭre tadvaco nābhinandati | tūṣṇīṃbhūteṣu sarveṣu samuttasthurnararṣabhāḥ
जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने उन वचनों का स्वागत नहीं किया और सब चुप हो गए, तब वे नरश्रेष्ठ उठ खड़े हुए।
श्लोक 2 (5.66.2)
उत्थितेषु महाराज पृथिव्यां सर्वराजसु । रहिते सञ्जयं राजा परिप्रष्टुं प्रचक्रमे ॥
utthiteṣu mahārāja pṛthivyāṃ sarvarājasu | rahite sañjayaṃ rājā paripraṣṭuṃ pracakrame
हे महाराज, जब पृथ्वी के सब राजा उठ गए, तब एकान्त में राजा धृतराष्ट्र ने संजय से पूछना आरम्भ किया।
श्लोक 3 (5.66.3)
आशंसमानो विजयं तेषां पुत्रवशानुगः । आत्मनश्च परेषां च पाण्डवानां च निश्चयम् ॥
āśaṃsamāno vijayaṃ teṣāṃ putravaśānugaḥ | ātmanaśca pareṣāṃ ca pāṇḍavānāṃ ca niścayam
पुत्र के वश में रहने वाले वे अपने पक्ष की विजय की आशा करते हुए अपने, दूसरों के और पाण्डवों के विषय में निश्चित स्थिति जानना चाहते थे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 4 (5.66.4)
गावल्गणे ब्रूहि नः सारफल्गु । स्वसेनायां यावदिहास्ति किंचित् । त्वं पाण्डवानां निपुणं वेत्थ सर्वं । किमेषां ज्यायः किमु तेषां कनीयः ॥
gāvalgaṇe brūhi naḥ sāraphalgu | svasenāyāṃ yāvadihāsti kiṃcit | tvaṃ pāṇḍavānāṃ nipuṇaṃ vettha sarvaṃ | kimeṣāṃ jyāyaḥ kimu teṣāṃ kanīyaḥ
हे गवल्गणपुत्र, हमारी अपनी सेना में यहाँ जो कुछ सार और असार है, वह सब बताओ। तुम पाण्डवों के विषय में सब कुछ भली-भाँति जानते हो — हमारे पक्ष में क्या बढ़कर है और उनके पक्ष में क्या घटकर?
श्लोक 5 (5.66.5)
त्वमेतयोः सारवित्सर्वदर्शी । धर्मार्थयोर्निपुणो निश्चयज्ञः । स मे पृष्टः सञ्जय ब्रूहि सर्वं । युध्यमानाः कतरेऽस्मिन्न सन्ति ॥
tvametayoḥ sāravitsarvadarśī | dharmārthayornipuṇo niścayajñaḥ | sa me pṛṣṭaḥ sañjaya brūhi sarvaṃ | yudhyamānāḥ katare'sminna santi
तुम दोनों पक्षों का सार जानते हो, सब कुछ देखते हो, धर्म और अर्थ में निपुण हो और निश्चय को जानते हो। इसलिए संजय, मेरे पूछने पर सब कुछ बताओ — इस युद्ध में कौन-कौन लड़ने वालों में नहीं होंगे?
सञ्जय उवाच
श्लोक 6 (5.66.6)
न त्वां ब्रूयां रहिते जातु किंचि- । दसूया हि त्वां प्रविशेत राजन् । आनयस्व पितरं महाव्रतं । गान्धारीं च महिषीमाजमीढ ॥
na tvāṃ brūyāṃ rahite jātu kiṃci- | dasūyā hi tvāṃ praviśeta rājan | ānayasva pitaraṃ mahāvrataṃ | gāndhārīṃ ca mahiṣīmājamīḍha
हे राजन्, मैं एकान्त में आपसे कुछ भी नहीं कहूँगा, क्योंकि आपके मन में असूया जाग सकती है। हे आजमीढ, अपने महाव्रती पिता (व्यास) और महारानी गान्धारी को बुलाइए।
श्लोक 7 (5.66.7)
तौ तेऽसूयां विनयेतां नरेन्द्र । धर्मज्ञौ तौ निपुणौ निश्चयज्ञौ । तयोस्तु त्वां सन्निधौ तद्वदेयं । कृत्स्नं मतं केशवपार्थयोर्यत् ॥
tau te'sūyāṃ vinayetāṃ narendra | dharmajñau tau nipuṇau niścayajñau | tayostu tvāṃ sannidhau tadvadeyaṃ | kṛtsnaṃ mataṃ keśavapārthayoryat
हे नरेन्द्र, वे दोनों धर्मज्ञ, निपुण और निश्चय को जानने वाले हैं; वे आपकी असूया दूर कर देंगे। उनकी उपस्थिति में मैं आपको केशव और पार्थ का सम्पूर्ण मत बताऊँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (5.66.8)
इत्युक्तेन च गान्धारी व्यासश्चात्राजगामह । आनीतौ विदुरेणेह सभां शीघ्रं प्रवेशितौ ॥
ityuktena ca gāndhārī vyāsaścātrājagāmaha | ānītau vidureṇeha sabhāṃ śīghraṃ praveśitau
उसके ऐसा कहने पर गान्धारी और व्यास वहाँ आए; विदुर उन्हें लाए और शीघ्र ही सभा में प्रवेश कराया।
श्लोक 9 (5.66.9)
ततस्तन्मतमाज्ञाय सञ्जयस्यात्मजस्य च । अभ्युपेत्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
tatastanmatamājñāya sañjayasyātmajasya ca | abhyupetya mahāprājñaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt
तब संजय और अपने पुत्र धृतराष्ट्र के मत को जानकर परम बुद्धिमान् कृष्णद्वैपायन पास आकर बोले—
व्यास उवाच
श्लोक 10 (5.66.10)
संपृच्छते धृतराष्ट्राय सञ्जय । आचक्ष्व सर्वं यावदेषोऽनुयुङ्क्ते । सर्वं यावद्वेत्थ तस्मिन्यथाव- । द्याथातथ्यं वासुदेवेऽर्जुने च ॥
saṃpṛcchate dhṛtarāṣṭrāya sañjaya | ācakṣva sarvaṃ yāvadeṣo'nuyuṅkte | sarvaṃ yāvadvettha tasminyathāva- | dyāthātathyaṃ vāsudeve'rjune ca
संजय, प्रश्न करने वाले धृतराष्ट्र को, जितना वे पूछें, सब बता दो। वासुदेव और अर्जुन के विषय में तुम जो कुछ जानते हो, वह सब यथावत् और सच-सच कहो।