उद्योग पर्व · अध्याय 67
समस्त जगत् से बढ़कर श्रीकृष्ण
संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन और श्रीकृष्ण के विषय में बताते हैं — श्रीकृष्ण के उस चक्र के बारे में जो उनकी माया से अदृश्य रूप में चलता है, और उन असुरों तथा राजाओं के बारे में जिन्हें उन्होंने मानो खेल-खेल में जीत लिया। वे कहते हैं कि एक ओर सारा जगत् हो और दूसरी ओर जनार्दन, तो जनार्दन ही भारी पड़ेंगे; जहाँ सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, वहाँ गोविन्द हैं, और जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है। श्रीकृष्ण काल, जगत् और युगों के चक्र घुमाते हैं, अपनी माया से लोकों को मोहित करते हैं, और केवल उनकी शरण में आए लोग ही मोह से बचते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (5.67.1)
अर्जुनो वासुदेवश्च धन्विनौ परमार्थितौ । कामादन्यत्र संभूतौ सर्वभावाय संमितौ ॥
arjuno vāsudevaśca dhanvinau paramārthitau | kāmādanyatra saṃbhūtau sarvabhāvāya saṃmitau
अर्जुन और वासुदेव — ये दोनों धनुर्धर परम सम्मानित हैं। इनका जन्म कामना से नहीं, अपनी इच्छा से हुआ है, और ये हर कार्य करने में समर्थ हैं।
श्लोक 2 (5.67.2)
व्यामान्तरं समास्थाय यथामुक्तं मनस्विनः । चक्रं तद्वासुदेवस्य मायया वर्तते विभो ॥
vyāmāntaraṃ samāsthāya yathāmuktaṃ manasvinaḥ | cakraṃ tadvāsudevasya māyayā vartate vibho
हे प्रभो, वासुदेव का वह चक्र एक व्याम (फैली हुई दोनों भुजाओं जितना) चौड़ा है; वे मनस्वी उसे जितना बड़ा चाहते हैं, उतना ही होकर वह छूटता है, और उनकी माया से ऐसे चलता है कि कोई उसे देख नहीं पाता।
श्लोक 3 (5.67.3)
सापह्नवं कौरवेषु पाण्डवानां सुसंमतम् । सारासारबलं ज्ञातुं तेजःपुञ्जावभासितम् ॥
sāpahnavaṃ kauraveṣu pāṇḍavānāṃ susaṃmatam | sārāsārabalaṃ jñātuṃ tejaḥpuñjāvabhāsitam
वह चक्र कौरवों का संहार करने वाला है और पाण्डवों को अत्यन्त प्रिय है। वह तेज के पुंज से जगमगाता है, और उसी से जाना जा सकता है कि सच्चा बल और निर्बलता कहाँ है।
श्लोक 4 (5.67.4)
नरकं शम्बरं चैव कंसं चैद्यं च माधवः । जितवान्घोरसङ्काशान्क्रीडन्निव महाबलः ॥
narakaṃ śambaraṃ caiva kaṃsaṃ caidyaṃ ca mādhavaḥ | jitavānghorasaṅkāśānkrīḍanniva mahābalaḥ
महाबली माधव ने भयंकर नरक, शम्बर, कंस और चेदिराज शिशुपाल को मानो खेल-खेल में जीत लिया।
श्लोक 5 (5.67.5)
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव पुरुषोत्तमः । मनसैव विशिष्टात्मा नयत्यात्मवशं वशी ॥
pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca dyāṃ caiva puruṣottamaḥ | manasaiva viśiṣṭātmā nayatyātmavaśaṃ vaśī
विशिष्ट आत्मा वाले, जितेन्द्रिय पुरुषोत्तम केवल मन से ही पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग को अपने वश में कर लेते हैं।
श्लोक 6 (5.67.6)
भूयो भूयो हि यद्राजन्पृच्छसे पाण्डवान्प्रति । सारासारबलं ज्ञातुं तत्समासेन मे शृणु ॥
bhūyo bhūyo hi yadrājanpṛcchase pāṇḍavānprati | sārāsārabalaṃ jñātuṃ tatsamāsena me śṛṇu
हे राजन्, आप बार-बार पाण्डवों के विषय में पूछते हैं, उनके बल और निर्बलता को जानना चाहते हैं; तो वह मुझसे संक्षेप में सुनिए।
श्लोक 7 (5.67.7)
एकतो वा जगत्कृत्स्नमेकतो वा जनार्दनः । सारतो जगतः कृत्स्नादतिरिक्तो जनार्दनः ॥
ekato vā jagatkṛtsnamekato vā janārdanaḥ | sārato jagataḥ kṛtsnādatirikto janārdanaḥ
एक ओर सारा जगत् हो और दूसरी ओर जनार्दन, तो सार की दृष्टि से जनार्दन समस्त जगत् से बढ़कर हैं।
श्लोक 8 (5.67.8)
भस्म कुर्याज्जगदिदं मनसैव जनार्दनः । न तु कृत्स्नं जगच्छक्तं किञ्चित्कर्तुं जनार्दने ॥
bhasma kuryājjagadidaṃ manasaiva janārdanaḥ | na tu kṛtsnaṃ jagacchaktaṃ kiñcitkartuṃ janārdane
जनार्दन केवल मन से ही इस जगत् को भस्म कर सकते हैं, पर सारा जगत् मिलकर भी जनार्दन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
श्लोक 9 (5.67.9)
यतः सत्यं यतो धर्मो यतो ह्रीरार्जवं यतः । ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥
yataḥ satyaṃ yato dharmo yato hrīrārjavaṃ yataḥ | tato bhavati govindo yataḥ kṛṣṇastato jayaḥ
जहाँ सत्य है, जहाँ धर्म है, जहाँ लज्जा और सरलता है, वहीं गोविन्द होते हैं; और जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है।
श्लोक 10 (5.67.10)
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः । विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः ॥
pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca divaṃ ca puruṣottamaḥ | viceṣṭayati bhūtātmā krīḍanniva janārdanaḥ
समस्त प्राणियों के आत्मा पुरुषोत्तम जनार्दन मानो खेल करते हुए पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग को गति देते हैं।
श्लोक 11 (5.67.11)
स कृत्वा पाण्डवान्सत्रं लोकं संमोहयन्निव । अधर्मनिरतान्मूढान्दग्धुमिच्छति ते सुतान् ॥
sa kṛtvā pāṇḍavānsatraṃ lokaṃ saṃmohayanniva | adharmaniratānmūḍhāndagdhumicchati te sutān
पाण्डवों को निमित्त बनाकर और मानो संसार को मोह में डालते हुए, वे अधर्म में लगे आपके मूढ़ पुत्रों को भस्म कर देना चाहते हैं।
श्लोक 12 (5.67.12)
कालचक्रं जगच्चक्रं युगचक्रं च केशवः । आत्मयोगेन भगवान्परिवर्तयतेऽनिशम् ॥
kālacakraṃ jagaccakraṃ yugacakraṃ ca keśavaḥ | ātmayogena bhagavānparivartayate'niśam
भगवान् केशव अपने योग-बल से काल-चक्र, जगत्-चक्र और युग-चक्र को निरन्तर घुमाते रहते हैं।
श्लोक 13 (5.67.13)
कालस्य च हि मृत्योश्च जङ्गमस्थावरस्य च । ईष्टे हि भगवानेकः सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
kālasya ca hi mṛtyośca jaṅgamasthāvarasya ca | īṣṭe hi bhagavānekaḥ satyametadbravīmi te
काल, मृत्यु और समस्त चर-अचर के एकमात्र स्वामी भगवान् ही हैं — यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 14 (5.67.14)
ईशन्नपि महायोगी सर्वस्य जगतो हरिः । कर्माण्यारभते कर्तुं कीनाश इव दुर्बलः ॥
īśannapi mahāyogī sarvasya jagato hariḥ | karmāṇyārabhate kartuṃ kīnāśa iva durbalaḥ
महायोगी हरि सम्पूर्ण जगत् के स्वामी होते हुए भी एक दुर्बल किसान की भाँति कर्म करने में लगते हैं।
श्लोक 15 (5.67.15)
तेन वञ्चयते लोकान्मायायोगेन केशवः । ये तमेव प्रपद्यन्ते न ते मुह्यन्ति मानवाः ॥
tena vañcayate lokānmāyāyogena keśavaḥ | ye tameva prapadyante na te muhyanti mānavāḥ
इसी माया-योग से केशव लोकों को भ्रम में रखते हैं; परन्तु जो मनुष्य केवल उन्हीं की शरण लेते हैं, वे मोहित नहीं होते।