उद्योग पर्व · अध्याय 68
श्रीकृष्ण को कैसे जाना जाए
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि संजय माधव को समस्त लोकों का स्वामी कैसे जानते हैं; संजय उत्तर देते हैं कि वे उन्हें ज्ञान और निष्कपट भक्ति से जानते हैं। धृतराष्ट्र दुर्योधन से श्रीकृष्ण की शरण लेने को कहते हैं; दुर्योधन मना कर देता है, और गान्धारी उसे फटकारते हुए भीम के हाथों उसकी मृत्यु की बात कहती हैं। व्यास राजा को आश्वासन देते हैं कि संजय उन्हें महान् भय से छुड़ाएँगे, और संजय सिखाते हैं कि केशव केवल इन्द्रियों के संयम से ही प्राप्त होते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (5.68.1)
कथं त्वं माधवं वेत्थ सर्वलोकमहेश्वरम् । कथमेनं न वेदाहं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
kathaṃ tvaṃ mādhavaṃ vettha sarvalokamaheśvaram | kathamenaṃ na vedāhaṃ tanmamācakṣva sañjaya
"संजय, तुम माधव को समस्त लोकों का महेश्वर कैसे जानते हो, और मैं उन्हें क्यों नहीं जानता? यह मुझे बताओ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (5.68.2)
शृणु राजन्न ते विद्या मम विद्या न हीयते । विद्याहीनस्तमोध्वस्तो नाभिजानाति केशवम् ॥
śṛṇu rājanna te vidyā mama vidyā na hīyate | vidyāhīnastamodhvasto nābhijānāti keśavam
"सुनिए राजन्, आपके पास ज्ञान नहीं है, और मेरा ज्ञान कभी क्षीण नहीं होता। जो ज्ञान से हीन है और अज्ञान के अन्धकार से घिरा है, वह केशव को नहीं पहचानता।
श्लोक 3 (5.68.3)
विद्यया तात जानामि त्रियुगं मधुसूदनम् । कर्तारमकृतं देवं भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥
vidyayā tāta jānāmi triyugaṃ madhusūdanam | kartāramakṛtaṃ devaṃ bhūtānāṃ prabhavāpyayam
तात, ज्ञान के द्वारा ही मैं मधुसूदन को जानता हूँ — जो तीनों युगों में प्रकट होते हैं, जो सबके कर्ता हैं पर स्वयं किसी के बनाए नहीं, और जो प्राणियों की उत्पत्ति और लय के स्थान हैं।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 4 (5.68.4)
गावल्गणेऽत्र का भक्तिर्या ते नित्या जनार्दने । यया त्वमभिजानासि त्रियुगं मधुसूदनम् ॥
gāvalgaṇe'tra kā bhaktiryā te nityā janārdane | yayā tvamabhijānāsi triyugaṃ madhusūdanam
"गावल्गणि, जनार्दन के प्रति तुम्हारी यह नित्य भक्ति कैसी है, जिसके द्वारा तुम तीनों युगों में प्रकट होने वाले मधुसूदन को जानते हो?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (5.68.5)
मायां न सेवे भद्रं ते न वृथाधर्ममाचरे । शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद्वेद्मि जनार्दनम् ॥
māyāṃ na seve bhadraṃ te na vṛthādharmamācare | śuddhabhāvaṃ gato bhaktyā śāstrādvedmi janārdanam
"आपका कल्याण हो, मैं छल-कपट का सहारा नहीं लेता और न व्यर्थ का धर्माचरण करता हूँ। भक्ति से शुद्ध-हृदय होकर मैं शास्त्रों के द्वारा जनार्दन को जानता हूँ।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 6 (5.68.6)
दुर्योधन हृषीकेशं प्रपद्यस्व जनार्दनम् । आप्तो नः सञ्जयस्तात शरणं गच्छ केशवम् ॥
duryodhana hṛṣīkeśaṃ prapadyasva janārdanam | āpto naḥ sañjayastāta śaraṇaṃ gaccha keśavam
"दुर्योधन, हृषीकेश जनार्दन की शरण लो। बेटा, संजय हमारे विश्वसनीय हैं; केशव की शरण में जाओ।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 7 (5.68.7)
भगवान्देवकीपुत्रो लोकांश्चेन्निहनिष्यति । प्रवदन्नर्जुने सख्यं नाहं गच्छेऽद्य केशवम् ॥
bhagavāndevakīputro lokāṃścennihaniṣyati | pravadannarjune sakhyaṃ nāhaṃ gacche'dya keśavam
"भगवान् देवकीनन्दन चाहे सारे लोकों का संहार कर दें, पर अर्जुन से अपनी मित्रता का बखान करने वाले केशव की शरण में मैं आज नहीं जाऊँगा।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 8 (5.68.8)
अवाग्गान्धारि पुत्रस्ते गच्छत्येष सुदुर्मतिः । ईर्ष्युर्दुरात्मा मानी च श्रेयसां वचनातिगः ॥
avāggāndhāri putraste gacchatyeṣa sudurmatiḥ | īrṣyurdurātmā mānī ca śreyasāṃ vacanātigaḥ
"गान्धारी, तुम्हारा यह दुर्बुद्धि पुत्र पतन की ओर जा रहा है। यह ईर्ष्यालु, दुष्टात्मा और अभिमानी है, और अपने हितैषियों की बात नहीं मानता।"
गान्धार्युवाच
श्लोक 9 (5.68.9)
ऐश्वर्यकाम दुष्टात्मन्वृद्धानां शासनातिग । ऐश्वर्यजीविते हित्वा पितरं मां च बालिश ॥
aiśvaryakāma duṣṭātmanvṛddhānāṃ śāsanātiga | aiśvaryajīvite hitvā pitaraṃ māṃ ca bāliśa
"अरे ऐश्वर्य के लोभी, दुष्टात्मा, बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले मूर्ख! ऐश्वर्य और जीवन को, अपने पिता को और मुझे त्यागकर,
श्लोक 10 (5.68.10)
वर्धयन्दुर्हृदां प्रीतिं मां च शोकेन वर्धयन् । निहतो भीमसेनेन स्मर्तासि वचनं पितुः ॥
vardhayandurhṛdāṃ prītiṃ māṃ ca śokena vardhayan | nihato bhīmasenena smartāsi vacanaṃ pituḥ
अपने शत्रुओं का हर्ष और मेरा शोक बढ़ाते हुए, जब तुम भीमसेन के हाथों मारे जाओगे, तब तुम्हें पिता की बात याद आएगी।"
व्यास उवाच
श्लोक 11 (5.68.11)
प्रियोऽसि राजन्कृष्णस्य धृतराष्ट्र निबोध मे । यस्य ते सञ्जयो दूतो यस्त्वां श्रेयसि योक्ष्यते ॥
priyo'si rājankṛṣṇasya dhṛtarāṣṭra nibodha me | yasya te sañjayo dūto yastvāṃ śreyasi yokṣyate
"राजन् धृतराष्ट्र, तुम कृष्ण के प्रिय हो; मेरी बात सुनो। संजय तुम्हारा दूत है और वही तुम्हें कल्याण के मार्ग पर लगाएगा।
श्लोक 12 (5.68.12)
जानात्येष हृषीकेशं पुराणं यच्च वै परम् । शुश्रूषमाणमैकाग्र्यं मोक्ष्यते महतो भयात् ॥
jānātyeṣa hṛṣīkeśaṃ purāṇaṃ yacca vai param | śuśrūṣamāṇamaikāgryaṃ mokṣyate mahato bhayāt
यह संजय उन पुराणपुरुष हृषीकेश को जानता है, जो परम तत्त्व भी हैं। यदि तुम एकाग्र होकर इसकी बात सुनोगे, तो यह तुम्हें महान् भय से छुड़ा देगा।
श्लोक 13 (5.68.13)
वैचित्रवीर्य पुरुषाः क्रोधहर्षसमावृताः । सिता बहुविधैः पाशैर्ये न तुष्टाः स्वकैर्धनैः ॥
vaicitravīrya puruṣāḥ krodhaharṣasamāvṛtāḥ | sitā bahuvidhaiḥ pāśairye na tuṣṭāḥ svakairdhanaiḥ
हे विचित्रवीर्यनन्दन, जो मनुष्य क्रोध और हर्ष से घिरे हैं, अनेक प्रकार के पाशों में बँधे हैं और अपने धन से कभी सन्तुष्ट नहीं होते,
श्लोक 14 (5.68.14)
यमस्य वशमायान्ति काममूढाः पुनः पुनः । अन्धनेत्रा यथैवान्धा नीयमानाः स्वकर्मभिः ॥
yamasya vaśamāyānti kāmamūḍhāḥ punaḥ punaḥ | andhanetrā yathaivāndhā nīyamānāḥ svakarmabhiḥ
वे काम से मोहित होकर बार-बार यमराज के वश में पड़ते हैं; अपने ही कर्म उन्हें वैसे ले जाते हैं जैसे अन्धे को अन्धा अगुआ ले जाता है।
श्लोक 15 (5.68.15)
एष एकायनः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । तं दृष्ट्वा मृत्युमत्येति महांस्तत्र न सज्जति ॥
eṣa ekāyanaḥ panthā yena yānti manīṣiṇaḥ | taṃ dṛṣṭvā mṛtyumatyeti mahāṃstatra na sajjati
यही वह एकमात्र मार्ग है जिस पर मनीषी चलते हैं। उन्हें देखकर महात्मा मृत्यु को पार कर जाता है और इस संसार में किसी वस्तु में आसक्त नहीं होता।"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 16 (5.68.16)
अङ्ग सञ्जय मे शंस पन्थानमकुतोभयम् । येन गत्वा हृषीकेशं प्राप्नुयां सिद्धिमुत्तमाम् ॥
aṅga sañjaya me śaṃsa panthānamakutobhayam | yena gatvā hṛṣīkeśaṃ prāpnuyāṃ siddhimuttamām
"प्रिय संजय, मुझे वह निर्भय मार्ग बताओ, जिस पर चलकर मैं हृषीकेश को पा सकूँ और परम सिद्धि प्राप्त करूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (5.68.17)
नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् । आत्मनस्तु क्रियोपायो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ॥
nākṛtātmā kṛtātmānaṃ jātu vidyājjanārdanam | ātmanastu kriyopāyo nānyatrendriyanigrahāt
"जिसने अपने मन को वश में नहीं किया, वह सिद्धात्मा जनार्दन को कभी नहीं जान सकता। अपने लिए इन्द्रियों के निग्रह के सिवा और कोई साधन नहीं है।
श्लोक 18 (5.68.18)
इन्द्रियाणामुदीर्णानां कामत्यागोऽप्रमादतः । अप्रमादोऽविहिंसा च ज्ञानयोनिरसंशयम् ॥
indriyāṇāmudīrṇānāṃ kāmatyāgo'pramādataḥ | apramādo'vihiṃsā ca jñānayonirasaṃśayam
उभरी हुई इन्द्रियों की कामनाओं का सावधानी से त्याग, सावधानी और अहिंसा — ये निःसन्देह ज्ञान के मूल हैं।
श्लोक 19 (5.68.19)
इन्द्रियाणां यमे यत्तो भव राजन्नतन्द्रितः । बुद्धिश्च ते मा च्यवतु नियच्छैनां यतस्ततः ॥
indriyāṇāṃ yame yatto bhava rājannatandritaḥ | buddhiśca te mā cyavatu niyacchaināṃ yatastataḥ
राजन्, आलस्य छोड़कर इन्द्रियों के संयम में तत्पर रहिए। आपकी बुद्धि विचलित न हो; उसे सब ओर से रोककर रखिए।
श्लोक 20 (5.68.20)
एतज्ज्ञानं विदुर्विप्रा ध्रुवमिन्द्रियधारणम् । एतज्ज्ञानं च पन्थाश्च येन यान्ति मनीषिणः ॥
etajjñānaṃ vidurviprā dhruvamindriyadhāraṇam | etajjñānaṃ ca panthāśca yena yānti manīṣiṇaḥ
विद्वान् ब्राह्मण इन्द्रियों के इस दृढ़ धारण को ही ज्ञान मानते हैं। यही ज्ञान है और यही वह मार्ग है, जिस पर मनीषी चलते हैं।
श्लोक 21 (5.68.21)
अप्राप्यः केशवो राजन्निन्द्रियैरजितैर्नृभिः । आगमाधिगमाद्योगाद्वशी तत्त्वे प्रसीदति ॥
aprāpyaḥ keśavo rājannindriyairajitairnṛbhiḥ | āgamādhigamādyogādvaśī tattve prasīdati
राजन्, जिन मनुष्यों ने इन्द्रियों को नहीं जीता, उनके लिए केशव अप्राप्य हैं। शास्त्रों के अध्ययन और योग से ही वे प्रभु प्रसन्न होकर अपने यथार्थ स्वरूप का ज्ञान देते हैं।"