उद्योग पर्व · अध्याय 81
द्रौपदी का विलाप और श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा
सन्धि की बातें सुनकर शोक से व्याकुल द्रौपदी श्रीकृष्ण से कहती हैं। वे युधिष्ठिर द्वारा माँगे गए पाँच गाँवों और दुर्योधन के इनकार का स्मरण कराती हैं, कहती हैं कि जो शत्रु साम और दान से नहीं मानते उन्हें दण्ड देना ही चाहिए, और बताती हैं कि कैसे वे — द्रुपद की पुत्री और पाण्डवों की रानी — केश पकड़कर सभा में घसीटी गईं और दासी बना दी गईं। अपने लम्बे काले केश हाथ में लेकर वे कहती हैं कि शत्रु जब भी सन्धि की बात करें, श्रीकृष्ण इन केशों को याद रखें, और रो पड़ती हैं। श्रीकृष्ण उन्हें सान्त्वना देकर प्रतिज्ञा करते हैं कि शीघ्र ही कौरवों की स्त्रियाँ रोएँगी और उनका वचन कभी व्यर्थ नहीं होगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (5.81.1)
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् । कृष्णा दाशार्हमासीनमब्रवीच्छोककर्शिता ॥
rājñastu vacanaṃ śrutvā dharmārthasahitaṃ hitam | kṛṣṇā dāśārhamāsīnamabravīcchokakarśitā
राजा के धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन सुनकर शोक से दुर्बल कृष्णा (द्रौपदी) ने वहाँ बैठे दाशार्ह श्रीकृष्ण से कहा।
श्लोक 2 (5.81.2)
सुता द्रुपदराजस्य स्वसितायतमूर्धजा । संपूज्य सहदेवं च सात्यकिं च महारथम् ॥
sutā drupadarājasya svasitāyatamūrdhajā | saṃpūjya sahadevaṃ ca sātyakiṃ ca mahāratham
सुन्दर, लम्बे और काले केशों वाली राजा द्रुपद की पुत्री ने सहदेव और महारथी सात्यकि का सम्मान किया;
श्लोक 3 (5.81.3)
भीमसेनं च संशान्तं दृष्ट्वा परमदुर्मनाः । अश्रुपूर्णेक्षणा वाक्यमुवाचेदं मनस्विनी ॥
bhīmasenaṃ ca saṃśāntaṃ dṛṣṭvā paramadurmanāḥ | aśrupūrṇekṣaṇā vākyamuvācedaṃ manasvinī
फिर भीमसेन को शान्त हुआ देखकर वे अत्यन्त खिन्न हो गईं, और आँखों में आँसू भरकर उस मनस्विनी ने यह बात कही —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 4 (5.81.4)
विदितं ते महाबाहो धर्मज्ञ मधुसूदन । यथा निकृतिमास्थाय भ्रंशिताः पाण्डवाः सुखात् ॥
viditaṃ te mahābāho dharmajña madhusūdana | yathā nikṛtimāsthāya bhraṃśitāḥ pāṇḍavāḥ sukhāt
"हे महाबाहु, धर्मज्ञ मधुसूदन, आप जानते हैं कि किस प्रकार छल का सहारा लेकर पाण्डवों को सुख से वंचित किया गया"
श्लोक 5 (5.81.5)
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सामात्येन जनार्दन । यथा च सञ्जयो राज्ञा मन्त्रं रहसि श्रावितः ॥
dhṛtarāṣṭrasya putreṇa sāmātyena janārdana | yathā ca sañjayo rājñā mantraṃ rahasi śrāvitaḥ
"धृतराष्ट्र के पुत्र और उसके मन्त्रियों द्वारा, हे जनार्दन; और किस प्रकार राजा ने एकान्त में संजय को गुप्त सन्देश सुनाया"
श्लोक 6 (5.81.6)
युधिष्ठिरस्य दाशार्ह तच्चापि विदितं तव । यथोक्तः सञ्जयश्चैव तच्च सर्वं श्रुतं त्वया ॥
yudhiṣṭhirasya dāśārha taccāpi viditaṃ tava | yathoktaḥ sañjayaścaiva tacca sarvaṃ śrutaṃ tvayā
"युधिष्ठिर के लिए, हे दाशार्ह — यह भी आपको विदित है; और संजय को जो उत्तर दिया गया, वह सब भी आपने सुना है।"
श्लोक 7 (5.81.7)
पञ्च नस्तात दीयन्तां ग्रामा इति महाद्युते । अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दीं वारणावतम् ॥
pañca nastāta dīyantāṃ grāmā iti mahādyute | avisthalaṃ vṛkasthalaṃ mākandīṃ vāraṇāvatam
"हे महातेजस्वी, 'हे तात, हमें पाँच गाँव दे दीजिए': अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत,"
श्लोक 8 (5.81.8)
अवसानं महाबाहो कंचिदेकं च पञ्चमम् । इति दुर्योधनो वाच्यः सुहृदश्चास्य केशव ॥
avasānaṃ mahābāho kaṃcidekaṃ ca pañcamam | iti duryodhano vācyaḥ suhṛdaścāsya keśava
"और हे महाबाहु, पाँचवाँ कोई भी एक निवास-स्थान — हे केशव, दुर्योधन और उसके मित्रों से यही कहलाया गया था।"
श्लोक 9 (5.81.9)
न चापि ह्यकरोद्वाक्यं श्रुत्वा कृष्ण सुयोधनः । युधिष्ठिरस्य दाशार्ह श्रीमतः सन्धिमिच्छतः ॥
na cāpi hyakarodvākyaṃ śrutvā kṛṣṇa suyodhanaḥ | yudhiṣṭhirasya dāśārha śrīmataḥ sandhimicchataḥ
"हे कृष्ण, हे दाशार्ह, सन्धि चाहने वाले श्रीमान् युधिष्ठिर की वह बात सुनकर भी सुयोधन ने उसे नहीं माना।"
श्लोक 10 (5.81.10)
अप्रदानेन राज्यस्य यदि कृष्ण सुयोधनः । सन्धिमिच्छेन्न कर्तव्यं तत्र गत्वा कथंचन ॥
apradānena rājyasya yadi kṛṣṇa suyodhanaḥ | sandhimicchenna kartavyaṃ tatra gatvā kathaṃcana
"हे कृष्ण, यदि सुयोधन राज्य लौटाए बिना सन्धि चाहे, तो आपको वहाँ जाकर किसी भी प्रकार सन्धि नहीं करनी चाहिए।"
श्लोक 11 (5.81.11)
शक्ष्यन्ति हि महाबाहो पाण्डवाः सृञ्जयैः सह । धार्तराष्ट्रबलं घोरं क्रुद्धं प्रतिसमासितुम् ॥
śakṣyanti hi mahābāho pāṇḍavāḥ sṛñjayaiḥ saha | dhārtarāṣṭrabalaṃ ghoraṃ kruddhaṃ pratisamāsitum
"क्योंकि हे महाबाहु, सृंजयों सहित पाण्डव धृतराष्ट्र-पुत्रों की भयंकर और क्रुद्ध सेना का सामना करने में समर्थ हैं।"
श्लोक 12 (5.81.12)
न हि साम्ना न दानेन शक्योऽर्थस्तेषु कश्चन । तस्मात्तेषु न कर्तव्या कृपा ते मधुसूदन ॥
na hi sāmnā na dānena śakyo'rthasteṣu kaścana | tasmātteṣu na kartavyā kṛpā te madhusūdana
"उनसे साम या दान के द्वारा कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता; इसलिए हे मधुसूदन, आपको उन पर दया नहीं करनी चाहिए।"
श्लोक 13 (5.81.13)
साम्ना दानेन वा कृष्ण ये न शाम्यन्ति शत्रवः । योक्तव्यस्तेषु दण्डः स्याज्जीवितं परिरक्षता ॥
sāmnā dānena vā kṛṣṇa ye na śāmyanti śatravaḥ | yoktavyasteṣu daṇḍaḥ syājjīvitaṃ parirakṣatā
"हे कृष्ण, जो शत्रु साम या दान से शान्त नहीं होते, अपने जीवन की रक्षा करने वाले को उन पर दण्ड का प्रयोग करना चाहिए।"
श्लोक 14 (5.81.14)
तस्मात्तेषु महादण्डः क्षेप्तव्यः क्षिप्रमच्युत । त्वया चैव महाबाहो पाण्डवैः सह सृञ्जयैः ॥
tasmātteṣu mahādaṇḍaḥ kṣeptavyaḥ kṣipramacyuta | tvayā caiva mahābāho pāṇḍavaiḥ saha sṛñjayaiḥ
"इसलिए हे अच्युत, हे महाबाहु, आपको पाण्डवों और सृंजयों के साथ मिलकर शीघ्र ही उन पर कठोर दण्ड का प्रहार करना चाहिए।"
श्लोक 15 (5.81.15)
एतत्समर्थं पार्थानां तव चैव यशस्करम् । क्रियमाणं भवेत्कृष्ण क्षत्रस्य च सुखावहम् ॥
etatsamarthaṃ pārthānāṃ tava caiva yaśaskaram | kriyamāṇaṃ bhavetkṛṣṇa kṣatrasya ca sukhāvaham
"हे कृष्ण, ऐसा करना पार्थों के लिए उचित, आपके लिए यशस्कर और क्षत्रिय-समाज के लिए सुखदायक होगा।"
श्लोक 16 (5.81.16)
क्षत्रियेण हि हन्तव्यः क्षत्रियो लोभमास्थितः । अक्षत्रियो वा दाशार्ह स्वधर्ममनुतिष्ठता ॥
kṣatriyeṇa hi hantavyaḥ kṣatriyo lobhamāsthitaḥ | akṣatriyo vā dāśārha svadharmamanutiṣṭhatā
"क्योंकि हे दाशार्ह, लोभ में पड़े क्षत्रिय का वध क्षत्रिय को करना चाहिए, अथवा अपने धर्म का पालन करने वाले किसी अक्षत्रिय को —"
श्लोक 17 (5.81.17)
अन्यत्र ब्राह्मणात्तात सर्वपापेष्ववस्थितात् । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक् ॥
anyatra brāhmaṇāttāta sarvapāpeṣvavasthitāt | gururhi sarvavarṇānāṃ brāhmaṇaḥ prasṛtāgrabhuk
"हे तात, ब्राह्मण को छोड़कर, चाहे वह सब पापों में लिप्त ही क्यों न हो; क्योंकि ब्राह्मण सब वर्णों का गुरु है और दिए गए पदार्थ का पहला भाग पाने का अधिकारी है।"
श्लोक 18 (5.81.18)
यथाऽवध्ये वध्यमाने भवेद्दोषो जनार्दन । स वध्यस्यावधे दृष्ट इति धर्मविदो विदुः ॥
yathā'vadhye vadhyamāne bhaveddoṣo janārdana | sa vadhyasyāvadhe dṛṣṭa iti dharmavido viduḥ
"हे जनार्दन, जैसे अवध्य का वध करने में दोष होता है, वैसे ही वध्य का वध न करने में भी दोष देखा गया है — ऐसा धर्मज्ञ कहते हैं।"
श्लोक 19 (5.81.19)
यथा त्वां न स्पृशेदेष दोषः कृष्ण तथा कुरु । पाण्डवैः सह दाशार्हैः सृञ्जयैश्च ससैनिकैः ॥
yathā tvāṃ na spṛśedeṣa doṣaḥ kṛṣṇa tathā kuru | pāṇḍavaiḥ saha dāśārhaiḥ sṛñjayaiśca sasainikaiḥ
"हे कृष्ण, ऐसा कीजिए कि पाण्डवों, दाशार्हों और सेनासहित सृंजयों के साथ आपको यह दोष स्पर्श न करे।"
श्लोक 20 (5.81.20)
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि विश्रम्भेण जनार्दन । का तु सीमन्तिनी मादृक् पृथिव्यामस्ति केशव ॥
punaruktaṃ ca vakṣyāmi viśrambheṇa janārdana | kā tu sīmantinī mādṛk pṛthivyāmasti keśava
"हे जनार्दन, आप पर विश्वास करके मैं कही हुई बात फिर से कहूँगी — हे केशव, पृथ्वी पर मेरे समान और कौन स्त्री है?"
श्लोक 21 (5.81.21)
सुता द्रुपदराजस्य वेदिमध्यात्समुत्थिता । धृष्टद्युम्नस्य भगिनी तव कृष्ण प्रिया सखी ॥
sutā drupadarājasya vedimadhyātsamutthitā | dhṛṣṭadyumnasya bhaginī tava kṛṣṇa priyā sakhī
"हे कृष्ण, मैं राजा द्रुपद की पुत्री हूँ, यज्ञवेदी के मध्य से प्रकट हुई हूँ, धृष्टद्युम्न की बहन और आपकी प्रिय सखी हूँ;"
श्लोक 22 (5.81.22)
आजमीढकुलं प्राप्ता स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः । महिषी पाण्डुपुत्राणां पञ्चेन्द्रसमवर्चसाम् ॥
ājamīḍhakulaṃ prāptā snuṣā pāṇḍormahātmanaḥ | mahiṣī pāṇḍuputrāṇāṃ pañcendrasamavarcasām
"अजमीढ के कुल में आई हूँ, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू हूँ, और पाँच इन्द्रों के समान तेजस्वी पाण्डुपुत्रों की पटरानी हूँ।"
श्लोक 23 (5.81.23)
सुता मे पञ्चभिर्वीरैः पञ्च जाता महारथाः । अभिमन्युर्यथा कृष्ण तथा ते तव धर्मतः ॥
sutā me pañcabhirvīraiḥ pañca jātā mahārathāḥ | abhimanyuryathā kṛṣṇa tathā te tava dharmataḥ
"हे कृष्ण, पाँचों वीरों से मेरे पाँच महारथी पुत्र हुए हैं, जो धर्मतः आपके लिए वैसे ही हैं जैसे अभिमन्यु।"
श्लोक 24 (5.81.24)
साऽहं केशग्रहं प्राप्ता परिक्लिष्टा सभां गता । पश्यतां पाण्डुपुत्राणां त्वयि जीवति केशव ॥
sā'haṃ keśagrahaṃ prāptā parikliṣṭā sabhāṃ gatā | paśyatāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ tvayi jīvati keśava
"हे केशव, फिर भी पाण्डुपुत्रों के देखते-देखते और आपके जीवित रहते मेरे केश पकड़े गए और मुझे क्लेश देते हुए सभा में ले जाया गया।"
श्लोक 25 (5.81.25)
जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु पञ्चालेष्वथ वृष्णिषु । दासीभूताऽस्मि पापानां सभामध्ये व्यवस्थिता ॥
jīvatsu pāṇḍuputreṣu pañcāleṣvatha vṛṣṇiṣu | dāsībhūtā'smi pāpānāṃ sabhāmadhye vyavasthitā
"पाण्डुपुत्रों, पांचालों और वृष्णियों के जीवित रहते हुए मैं भरी सभा में खड़ी उन पापियों की दासी बना दी गई।"
श्लोक 26 (5.81.26)
निरमर्षेष्वचेष्टेषु प्रेक्षमाणेषु पाण्डुषु । पाहि मामिति गोविन्द मनसा चिन्तितोऽसि मे ॥
niramarṣeṣvaceṣṭeṣu prekṣamāṇeṣu pāṇḍuṣu | pāhi māmiti govinda manasā cintito'si me
"हे गोविन्द, जब पाण्डव बिना क्रोध के, निश्चेष्ट होकर देख रहे थे, तब मैंने मन ही मन 'मेरी रक्षा करो' कहते हुए आपका स्मरण किया था।"
श्लोक 27 (5.81.27)
यत्र मां भगवान्राजा श्वशुरो वाक्यमब्रवीत् । वरं वृणीष्व पाञ्चालि वरार्हाऽसि मता मम ॥
yatra māṃ bhagavānrājā śvaśuro vākyamabravīt | varaṃ vṛṇīṣva pāñcāli varārhā'si matā mama
"तब मेरे श्वशुर, पूज्य राजा ने मुझसे कहा था — 'पांचाली, वर माँगो; मेरी दृष्टि में तुम वर पाने के योग्य हो।'"
श्लोक 28 (5.81.28)
अदासाः पाण्डवाः सन्तु सरथाः सायुधा इति । मयोक्ते यत्र निर्मुक्ता वनवासाय केशव ॥
adāsāḥ pāṇḍavāḥ santu sarathāḥ sāyudhā iti | mayokte yatra nirmuktā vanavāsāya keśava
"हे केशव, जब मैंने कहा कि 'पाण्डव रथों और शस्त्रों सहित दासता से मुक्त हों', तब वे वनवास के लिए छोड़ दिए गए।"
श्लोक 29 (5.81.29)
एवंविधानां दुःखानामभिज्ञोऽसि जनार्दन । त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष सभर्तृज्ञातिबान्धवान् ॥
evaṃvidhānāṃ duḥkhānāmabhijño'si janārdana | trāyasva puṇḍarīkākṣa sabhartṛjñātibāndhavān
"हे जनार्दन, आप ऐसे दुःखों को जानते हैं। हे कमलनयन, पतियों, जाति-बन्धुओं और सम्बन्धियों सहित हमारी रक्षा कीजिए।"
श्लोक 30 (5.81.30)
नन्वहं कृष्ण भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः । स्नुषा भवामि धर्मेण साऽहं दासीकृता बलात् ॥
nanvahaṃ kṛṣṇa bhīṣmasya dhṛtarāṣṭrasya cobhayoḥ | snuṣā bhavāmi dharmeṇa sā'haṃ dāsīkṛtā balāt
"हे कृष्ण, क्या मैं धर्मानुसार भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्रवधू नहीं हूँ? फिर भी मुझे बलपूर्वक दासी बना दिया गया।"
श्लोक 31 (5.81.31)
धिक्पार्थस्य धनुष्मत्तां भीमसेनस्य धिग्बलम् । यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ॥
dhikpārthasya dhanuṣmattāṃ bhīmasenasya dhigbalam | yatra duryodhanaḥ kṛṣṇa muhūrtamapi jīvati
"धिक्कार है अर्जुन की धनुर्विद्या को, धिक्कार है भीमसेन के बल को, यदि हे कृष्ण, दुर्योधन एक मुहूर्त भी जीवित रहता है!"
श्लोक 32 (5.81.32)
यदि तेऽहमनुग्राह्या यदि तेऽस्ति कृपा मयि । धार्तराष्ट्रेषु वै कोपः सर्वः कृष्ण विधीयताम् ॥
yadi te'hamanugrāhyā yadi te'sti kṛpā mayi | dhārtarāṣṭreṣu vai kopaḥ sarvaḥ kṛṣṇa vidhīyatām
"हे कृष्ण, यदि मैं आपकी कृपा के योग्य हूँ, यदि मुझ पर आपकी दया है, तो अपना सारा क्रोध धृतराष्ट्र के पुत्रों पर कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (5.81.33)
इत्युक्त्वा मृदुसंहारं वृजिनाग्रं सुदर्शनम् । सुनीलमसितापाङ्गी सर्वगन्धादिवासितम् ॥
ityuktvā mṛdusaṃhāraṃ vṛjināgraṃ sudarśanam | sunīlamasitāpāṅgī sarvagandhādivāsitam
यह कहकर उस श्याम नेत्रों वाली नारी ने अपने केशपाश को — जो वेणी में बँधा होकर भी कोमल था, जिसके सिरे घुँघराले थे, जो देखने में सुन्दर, गहरा काला और सब प्रकार की सुगन्धों से सुवासित था,
श्लोक 34 (5.81.34)
सर्वलक्षणसंपन्नं महाभुजगवर्चसम् । केशपक्षं वरारोहा गृह्य वामेन पाणिना ॥
sarvalakṣaṇasaṃpannaṃ mahābhujagavarcasam | keśapakṣaṃ varārohā gṛhya vāmena pāṇinā
सब शुभ लक्षणों से युक्त और विशाल नाग के समान चमकीला था — उस सुन्दरी ने बाएँ हाथ में पकड़ा,
श्लोक 35 (5.81.35)
पद्माक्षी पुण्डरीकाक्षमुपेत्य गजगामिनी । अश्रुपूर्णेक्षणा कृष्णा कृष्णं वचनमब्रवीत् ॥
padmākṣī puṇḍarīkākṣamupetya gajagāminī | aśrupūrṇekṣaṇā kṛṣṇā kṛṣṇaṃ vacanamabravīt
और कमलनयनी, गजगामिनी कृष्णा (द्रौपदी) आँखों में आँसू भरे कमलनयन श्रीकृष्ण के पास जाकर उनसे बोलीं —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 36 (5.81.36)
अयं ते पुण्डरीकाक्ष दुःशासनकरोद्धृतः । स्मर्तव्यः सर्वकार्येषु परेषां सन्धिमिच्छताम् ॥
ayaṃ te puṇḍarīkākṣa duḥśāsanakaroddhṛtaḥ | smartavyaḥ sarvakāryeṣu pareṣāṃ sandhimicchatām
"हे कमलनयन, दुःशासन के हाथों खींचे गए इन केशों को आप हर कार्य में याद रखिए, जब भी शत्रु सन्धि की इच्छा करें।"
श्लोक 37 (5.81.37)
यदि भीमार्जुनौ कृष्ण कृपणौ सन्धिकामुकौ । पिता मे योत्स्यते वृद्धः सह पुत्रैर्महारथैः ॥
yadi bhīmārjunau kṛṣṇa kṛpaṇau sandhikāmukau | pitā me yotsyate vṛddhaḥ saha putrairmahārathaiḥ
"हे कृष्ण, यदि भीम और अर्जुन दीन होकर सन्धि चाहने लगे हैं, तो मेरे वृद्ध पिता अपने महारथी पुत्रों के साथ युद्ध करेंगे,"
श्लोक 38 (5.81.38)
पञ्च चैव महावीर्याः पुत्रा मे मधुसूदन । अभिमन्युं पुरस्कृत्य योत्स्यन्ते कुरुभिः सह ॥
pañca caiva mahāvīryāḥ putrā me madhusūdana | abhimanyuṃ puraskṛtya yotsyante kurubhiḥ saha
"और हे मधुसूदन, मेरे पाँच महापराक्रमी पुत्र अभिमन्यु को आगे करके कौरवों से लड़ेंगे।"
श्लोक 39 (5.81.39)
दुःशासनभुजं श्यामं संछिन्नं पांसुगुण्ठितम् । यद्यहं तु न पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥
duḥśāsanabhujaṃ śyāmaṃ saṃchinnaṃ pāṃsuguṇṭhitam | yadyahaṃ tu na paśyāmi kā śāntirhṛdayasya me
"यदि मैं दुःशासन की साँवली भुजा को कटी हुई और धूल में लिपटी हुई न देखूँ, तो मेरे हृदय को क्या शान्ति मिलेगी?"
श्लोक 40 (5.81.40)
त्रयोदश हि वर्षाणि प्रतीक्षन्त्या गतानि मे । विधाय हृदये मन्युं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥
trayodaśa hi varṣāṇi pratīkṣantyā gatāni me | vidhāya hṛdaye manyuṃ pradīptamiva pāvakam
"हृदय में प्रज्वलित अग्नि के समान क्रोध को रखकर प्रतीक्षा करते हुए मेरे तेरह वर्ष बीत गए हैं।"
श्लोक 41 (5.81.41)
विदीर्यते मे हृदयं भीमवाक्शल्यपीडितम् । योऽयमद्य महाबाहुर्धर्ममेवानुपश्यति ॥
vidīryate me hṛdayaṃ bhīmavākśalyapīḍitam | yo'yamadya mahābāhurdharmamevānupaśyati
"भीम के वचन रूपी बाण से पीड़ित मेरा हृदय फटा जा रहा है, क्योंकि आज यह महाबाहु केवल धर्म की ओर ही देख रहा है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (5.81.42)
इत्युक्त्वा बाष्परुद्धेन कण्ठेनायतलोचना । रुरोद कृष्णा सोत्कम्पं सस्वरं बाष्पगद्गदम् ॥
ityuktvā bāṣparuddhena kaṇṭhenāyatalocanā | ruroda kṛṣṇā sotkampaṃ sasvaraṃ bāṣpagadgadam
यह कहकर विशाल नेत्रों वाली कृष्णा आँसुओं से रुँधे कण्ठ से काँपती हुई, ऊँचे स्वर में, गद्गद वाणी से रोने लगीं।
श्लोक 43 (5.81.43)
स्तनौ पीनायतश्रोणी सहितावभिवर्षती । द्रवीभूतमिवात्युष्णं मुञ्चन्ती वारि नेत्रजम् ॥
stanau pīnāyataśroṇī sahitāvabhivarṣatī | dravībhūtamivātyuṣṇaṃ muñcantī vāri netrajam
पुष्ट और विशाल नितम्बों वाली वे अपने नेत्रों से पिघले हुए-से अत्यन्त गर्म आँसू बहाती हुई अपने सटे हुए स्तनों को भिगोने लगीं।
श्लोक 44 (5.81.44)
तामुवाच महाबाहुः केशवः परिसान्त्वयन् । अचिराद्द्रक्ष्यसे कृष्णे रुदतीर्भरतस्त्रियः ॥
tāmuvāca mahābāhuḥ keśavaḥ parisāntvayan | acirāddrakṣyase kṛṣṇe rudatīrbharatastriyaḥ
तब महाबाहु केशव ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा — "हे कृष्णे, शीघ्र ही तुम भरतवंश की स्त्रियों को रोते हुए देखोगी।"
कृष्ण उवाच
श्लोक 45 (5.81.45)
एवं ता भीरु रोत्स्यन्ति निहतज्ञातिबान्धवाः । हतमित्रा हतबला येषां क्रुद्धाऽसि भामिनी ॥
evaṃ tā bhīru rotsyanti nihatajñātibāndhavāḥ | hatamitrā hatabalā yeṣāṃ kruddhā'si bhāminī
"हे भीरु, जिन पर तुम, हे मानिनी, क्रुद्ध हो, वे स्त्रियाँ इसी प्रकार रोएँगी, जब उनके जाति-बन्धु मारे जा चुके होंगे, मित्र मारे जा चुके होंगे और सेना नष्ट हो चुकी होगी।"
श्लोक 46 (5.81.46)
अहं च तत्करिष्यामि भीमार्जुनयमैः सह । युधिष्ठिरनियोगेन दैवाच्च विधिनिर्मितात् ॥
ahaṃ ca tatkariṣyāmi bhīmārjunayamaiḥ saha | yudhiṣṭhiraniyogena daivācca vidhinirmitāt
"और भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव के साथ मिलकर, युधिष्ठिर की आज्ञा से और विधाता द्वारा रचे गए दैव से, मैं वह कर दिखाऊँगा।"
श्लोक 47 (5.81.47)
धार्तराष्ट्राः कालपक्वा न चेच्छृण्वन्ति मे वचः । शेष्यन्ते निहता भूमौ श्वसृगालादनीकृताः ॥
dhārtarāṣṭrāḥ kālapakvā na cecchṛṇvanti me vacaḥ | śeṣyante nihatā bhūmau śvasṛgālādanīkṛtāḥ
"यदि काल के ग्रास बने धृतराष्ट्र-पुत्र मेरी बात नहीं सुनेंगे, तो वे मारे जाकर कुत्तों और सियारों का भोजन बने भूमि पर पड़े होंगे।"
श्लोक 48 (5.81.48)
चलेद्धि हिमवाञ्शैलो मेदिनी शतधा भवेत् । द्यौः पतेच्च सनक्षत्रा न मे मोघं वचो भवेत् ॥
caleddhi himavāñśailo medinī śatadhā bhavet | dyauḥ patecca sanakṣatrā na me moghaṃ vaco bhavet
"हिमालय पर्वत अपने स्थान से हिल जाए, पृथ्वी के सौ टुकड़े हो जाएँ, नक्षत्रों सहित आकाश गिर पड़े — पर मेरा वचन व्यर्थ नहीं होगा।"
श्लोक 49 (5.81.49)
शुष्येत्तोयनिधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् । सत्यं ते प्रतिजानामि कृष्णे बाष्पो निगृह्यताम् । हतामित्राञ्श्रिया युक्तानचिराद्द्रक्ष्यसे पतीन् ॥
śuṣyettoyanidhiḥ kṛṣṇe na me moghaṃ vaco bhavet | satyaṃ te pratijānāmi kṛṣṇe bāṣpo nigṛhyatām | hatāmitrāñśriyā yuktānacirāddrakṣyase patīn
"हे कृष्णे, समुद्र भले ही सूख जाए, पर मेरा वचन व्यर्थ नहीं होगा। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, हे कृष्णे — अपने आँसू रोक लो। शीघ्र ही तुम अपने पतियों को शत्रुओं का संहार किए हुए और राजलक्ष्मी से युक्त देखोगी।"