उद्योग पर्व · अध्याय 80
सहदेव और सात्यकि की युद्ध की माँग
सहदेव स्वीकार करते हैं कि राजा का कथन सनातन धर्म है, फिर भी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि कौरव सन्धि चाहें तब भी वे युद्ध ही कराएँ, क्योंकि सभा में घसीटी गई द्रौपदी की स्मृति दुर्योधन के वध के बिना उन्हें शान्त नहीं होने देती। सात्यकि भी कहते हैं कि दुर्योधन के वध से ही उनका क्रोध शान्त होगा और सहदेव सब योद्धाओं के मन की बात कह रहे हैं; इस पर वहाँ एकत्र योद्धा भीषण सिंहनाद करके उनका समर्थन करते हैं।
सहदेव उवाच
श्लोक 1 (5.80.1)
यदेतत्कथितं राज्ञा धर्म एष सनातनः । यथा च युद्धमेव स्यात्तथा कार्यमरिन्दम ॥
yadetatkathitaṃ rājñā dharma eṣa sanātanaḥ | yathā ca yuddhameva syāttathā kāryamarindama
"हे शत्रुदमन, राजा ने जो कहा है वह सनातन धर्म है; पर आप ऐसा कीजिए कि युद्ध ही हो।"
श्लोक 2 (5.80.2)
यदि प्रशममिच्छेयुः कुरवः पाण्डवैः सह । तथापि युद्धं दाशार्ह योजयेथाः सहैव तैः ॥
yadi praśamamiccheyuḥ kuravaḥ pāṇḍavaiḥ saha | tathāpi yuddhaṃ dāśārha yojayethāḥ sahaiva taiḥ
"हे दाशार्ह, यदि कौरव पाण्डवों के साथ शान्ति चाहें, तब भी आप उनके साथ युद्ध ही कराइए।"
श्लोक 3 (5.80.3)
कथं नु दृष्ट्वा पाञ्चालीं तथा कृष्ण सभागताम् । अवधेन प्रशाम्येत मम मन्युः सुयोधने ॥
kathaṃ nu dṛṣṭvā pāñcālīṃ tathā kṛṣṇa sabhāgatām | avadhena praśāmyeta mama manyuḥ suyodhane
"हे कृष्ण, पांचाली को उस प्रकार सभा में लाई गई देखकर, सुयोधन के वध के बिना उसके प्रति मेरा क्रोध कैसे शान्त हो सकता है?"
श्लोक 4 (5.80.4)
यदि भीमार्जुनौ कृष्ण धर्मराजश्च धार्मिकः । धर्ममुत्सृज्य तेनाहं योद्धुमिच्छामि संयुगे ॥
yadi bhīmārjunau kṛṣṇa dharmarājaśca dhārmikaḥ | dharmamutsṛjya tenāhaṃ yoddhumicchāmi saṃyuge
"हे कृष्ण, भीम, अर्जुन और धर्मात्मा धर्मराज भले ही धर्म पर टिके रहें, मैं धर्म को छोड़कर भी युद्ध में उससे लड़ना चाहता हूँ।"
श्लोक 5 (5.80.5)
ब्रूहि मद्वचनं कृष्ण सुयोधनमपण्डितम् । कृच्छ्रे वने वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये ॥
brūhi madvacanaṃ kṛṣṇa suyodhanamapaṇḍitam | kṛcchre vane vā vastavyaṃ pure vā nāgasāhvaye
"हे कृष्ण, मूर्ख सुयोधन से मेरी यह बात कहिए — या तो कष्टमय वन में रहना होगा, या हस्तिनापुर नगर में।"
सात्यकिरुवाच
श्लोक 6 (5.80.6)
सत्यमाह महाबाहो सहदेवो महामतिः । दुर्योधनवधे शान्तिस्तस्य कोपस्य मे भवेत् ॥
satyamāha mahābāho sahadevo mahāmatiḥ | duryodhanavadhe śāntistasya kopasya me bhavet
"हे महाबाहु, बुद्धिमान सहदेव ने सत्य कहा है। दुर्योधन के वध से ही मेरे इस क्रोध को शान्ति मिलेगी।"
श्लोक 7 (5.80.7)
न जानासि यथा दृष्ट्वा चीराजिनधरान्वने । तवापि मन्युरुद्धूतो दुःखितान्प्रेक्ष्य पाण्डवान् ॥
na jānāsi yathā dṛṣṭvā cīrājinadharānvane | tavāpi manyuruddhūto duḥkhitānprekṣya pāṇḍavān
"क्या आप नहीं जानते कि वन में वल्कल और मृगचर्म धारण किए दुःखी पाण्डवों को देखकर आपका भी क्रोध भड़क उठा था?"
श्लोक 8 (5.80.8)
तस्मान्माद्रीसुतः शूरो यदाह रणकर्कशः । वचनं सर्वयोधानां तन्मतं पुरुषोत्तम ॥
tasmānmādrīsutaḥ śūro yadāha raṇakarkaśaḥ | vacanaṃ sarvayodhānāṃ tanmataṃ puruṣottama
"इसलिए हे पुरुषोत्तम, रण में कठोर वीर माद्रीपुत्र ने जो कहा है, वही सब योद्धाओं का मत है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (5.80.9)
एवं वदति वाक्यं तु युयुधाने महामतौ । सुभीमः सिंहनादोऽभूद्योधानां तत्र सर्वशः ॥
evaṃ vadati vākyaṃ tu yuyudhāne mahāmatau | subhīmaḥ siṃhanādo'bhūdyodhānāṃ tatra sarvaśaḥ
जब महाबुद्धिमान युयुधान (सात्यकि) ऐसा कह रहे थे, तभी वहाँ सब ओर से योद्धाओं का भीषण सिंहनाद गूँज उठा।
श्लोक 10 (5.80.10)
सर्वे हि सर्वशो वीरास्तद्वचः प्रत्यपूजयन् । साधुसाध्विति शैनेयं हर्षयन्तो युयुत्सवः ॥
sarve hi sarvaśo vīrāstadvacaḥ pratyapūjayan | sādhusādhviti śaineyaṃ harṣayanto yuyutsavaḥ
युद्ध के इच्छुक सभी वीरों ने चारों ओर से उनकी बात की प्रशंसा की और "साधु, साधु!" कहते हुए शिनि के पौत्र सात्यकि का उत्साह बढ़ाया।