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उद्योग पर्व · अध्याय 79

नकुल का शान्ति के लिए आग्रह

नकुल श्रीकृष्ण को स्मरण कराते हैं कि युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन सब अपनी बात कह चुके हैं, और उनसे आग्रह करते हैं कि जो समयोचित हो वही करें, क्योंकि परिस्थिति के अनुसार मनुष्यों के विचार बदलते रहते हैं। वे बताते हैं कि अब सात अक्षौहिणी सेना एकत्र हो चुकी है, और श्रीकृष्ण से कहते हैं कि कौरवों की सभा में पहले मधुर और फिर भय दिखाने वाली बात कहें तथा उन पाण्डव-सहायकों के नाम लें जिनका सामना कोई मनुष्य नहीं कर सकता। उनका विश्वास है कि विदुर सुनने वाले और श्रीकृष्ण कहने वाले हों, तो भीष्म, द्रोण आदि बड़े धृतराष्ट्र और दुर्योधन को मना लेंगे।

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नकुल उवाच

श्लोक 1 (5.79.1)

उक्तं बहुविधं वाक्यं धर्मराजेन माधव । धर्मज्ञेन वदान्येन श्रुतं चैव हि तत्त्वया ॥

uktaṃ bahuvidhaṃ vākyaṃ dharmarājena mādhava | dharmajñena vadānyena śrutaṃ caiva hi tattvayā

"हे माधव, धर्म के ज्ञाता और उदार धर्मराज ने अनेक प्रकार की बातें कही हैं, और वे आपने सुन भी ली हैं।"

श्लोक 2 (5.79.2)

मतमाज्ञाय राज्ञश्च भीमसेनेन माधव । संशमो बाहुवीर्यं च ख्यापितं माधवात्मनः ॥

matamājñāya rājñaśca bhīmasenena mādhava | saṃśamo bāhuvīryaṃ ca khyāpitaṃ mādhavātmanaḥ

"हे माधव, भीमसेन ने भी राजा का मत समझकर शान्ति की बात और अपनी भुजाओं का बल — दोनों प्रकट कर दिए हैं।"

श्लोक 3 (5.79.3)

तथैव फाल्गुनेनापि यदुक्तं तत्त्वया श्रुतम् । आत्मनश्च मतं वीर कथितं भवताऽसकृत् ॥

tathaiva phālgunenāpi yaduktaṃ tattvayā śrutam | ātmanaśca mataṃ vīra kathitaṃ bhavatā'sakṛt

"इसी प्रकार अर्जुन ने जो कहा, वह भी आपने सुना है; और हे वीर, अपना मत भी आप अनेक बार कह चुके हैं।"

श्लोक 4 (5.79.4)

सर्वमेतदतिक्रम्य श्रुत्वा परमतं भवान् । यत्प्राप्तकालं मन्येथास्तत्कुर्याः पुरुषोत्तम ॥

sarvametadatikramya śrutvā paramataṃ bhavān | yatprāptakālaṃ manyethāstatkuryāḥ puruṣottama

"हे पुरुषोत्तम, इन सब बातों से ऊपर उठकर और दूसरों का मत सुनकर, जो आपको समयोचित लगे, वही कीजिए।"

श्लोक 5 (5.79.5)

तस्मिंस्तस्मिन्निमित्ते हि मतं भवति केशव । प्राप्तकालं मनुष्येण क्षमं कार्यमरिन्दम ॥

tasmiṃstasminnimitte hi mataṃ bhavati keśava | prāptakālaṃ manuṣyeṇa kṣamaṃ kāryamarindama

"हे केशव, हर परिस्थिति के अनुसार मत बनता है; हे शत्रुदमन, मनुष्य को वही करना चाहिए जो समय के अनुकूल और उचित हो।"

श्लोक 6 (5.79.6)

अन्यथा चिन्तितो ह्यर्थः पुनर्भवति सोऽन्यथा । अनित्यमतयो लोके नराः पुरुषसत्तम ॥

anyathā cintito hyarthaḥ punarbhavati so'nyathā | anityamatayo loke narāḥ puruṣasattama

"हे पुरुषश्रेष्ठ, जो बात एक प्रकार से सोची जाती है, वह दूसरे प्रकार से घटित हो जाती है; संसार में मनुष्यों की बुद्धि स्थिर नहीं रहती।"

श्लोक 7 (5.79.7)

अन्यथाबुद्धयो ह्यासन्नस्मासु वनवासिषु । अदृश्येष्वन्यथा कृष्ण दृश्येषु पुनरन्यथा ॥

anyathābuddhayo hyāsannasmāsu vanavāsiṣu | adṛśyeṣvanyathā kṛṣṇa dṛśyeṣu punaranyathā

"हे कृष्ण, जब हम वन में रहते थे तब हमारे विचार कुछ और थे, जब हम छिपे थे तब कुछ और, और अब प्रकट होने पर फिर कुछ और हैं।"

श्लोक 8 (5.79.8)

अस्माकमपि वार्ष्णेय वने विचरतां तदा । न तथा प्रणयो राज्ये यथा संप्रति वर्तते ॥

asmākamapi vārṣṇeya vane vicaratāṃ tadā | na tathā praṇayo rājye yathā saṃprati vartate

"हे वार्ष्णेय, तब वन में विचरते हुए हमें राज्य की वैसी चाह नहीं थी जैसी अब है।"

श्लोक 9 (5.79.9)

निवृत्तवनवासान्नः श्रुत्वा वीर समागताः । अक्षौहिण्यो हि सप्तेमास्त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥

nivṛttavanavāsānnaḥ śrutvā vīra samāgatāḥ | akṣauhiṇyo hi saptemāstvatprasādājjanārdana

"हे वीर जनार्दन, हमारे वनवास से लौटने का समाचार सुनकर आपकी कृपा से ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई हैं।"

श्लोक 10 (5.79.10)

इमान्हि पुरुषव्याघ्रानचिन्त्यबलपौरुषान् । आत्तशस्त्रान्रणे दृष्ट्वा न व्यथेदिह कः पुमान् ॥

imānhi puruṣavyāghrānacintyabalapauruṣān | āttaśastrānraṇe dṛṣṭvā na vyathediha kaḥ pumān

"अचिन्त्य बल और पराक्रम वाले इन पुरुषसिंहों को रणभूमि में शस्त्र उठाए देखकर यहाँ कौन पुरुष व्यथित नहीं होगा?"

श्लोक 11 (5.79.11)

स भवान्कुरुमध्ये तं सान्त्वपूर्वं भयोत्तरम् । ब्रूयाद्वाक्यं यथा मन्दो न व्यथेत सुयोधनः ॥

sa bhavānkurumadhye taṃ sāntvapūrvaṃ bhayottaram | brūyādvākyaṃ yathā mando na vyatheta suyodhanaḥ

"अतः आप कौरवों के बीच उससे ऐसी बात कहें जो पहले सान्त्वना देने वाली और फिर भय दिखाने वाली हो, जिससे मूढ़ सुयोधन विचलित न हो।"

श्लोक 12 (5.79.12)

युधिष्ठिरं भीमसेनं बीभत्सुं चापराजितम् । सहदेवं च मां चैव त्वां च रामं च केशव ॥

yudhiṣṭhiraṃ bhīmasenaṃ bībhatsuṃ cāparājitam | sahadevaṃ ca māṃ caiva tvāṃ ca rāmaṃ ca keśava

"हे केशव, युधिष्ठिर, भीमसेन, अपराजित अर्जुन, सहदेव और मैं, स्वयं आप और बलराम,"

श्लोक 13 (5.79.13)

सात्यकिं च महावीर्यं विराटं च महात्मजम् । द्रुपदं च महामात्यं धृष्टद्युम्नं च माधव ॥

sātyakiṃ ca mahāvīryaṃ virāṭaṃ ca mahātmajam | drupadaṃ ca mahāmātyaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ ca mādhava

"हे माधव, महापराक्रमी सात्यकि, अपने वीर पुत्र सहित विराट, श्रेष्ठ मन्त्रियों सहित द्रुपद और धृष्टद्युम्न,"

श्लोक 14 (5.79.14)

काशिराजं च विक्रान्तं धृष्टकेतुं च चेदिपम् । मांसशोणितभृन्मर्त्यः प्रतियुध्येत को युधि ॥

kāśirājaṃ ca vikrāntaṃ dhṛṣṭaketuṃ ca cedipam | māṃsaśoṇitabhṛnmartyaḥ pratiyudhyeta ko yudhi

"पराक्रमी काशिराज और चेदिराज धृष्टकेतु — रक्त-मांस का बना कौन मनुष्य युद्ध में इनका सामना कर सकता है?"

श्लोक 15 (5.79.15)

स भवान्गमनादेव साधयिष्यत्यसंशयम् । इष्टमर्थं महाबाहो धर्मराजस्य केवलम् ॥

sa bhavāngamanādeva sādhayiṣyatyasaṃśayam | iṣṭamarthaṃ mahābāho dharmarājasya kevalam

"हे महाबाहु, केवल आपके जाने से ही आप निःसन्देह धर्मराज का अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध कर देंगे।"

श्लोक 16 (5.79.16)

विदुरश्चैव भीष्मश्च द्रोणश्च सहबाह्लिकः । श्रेयः समर्था विज्ञातुमुच्यमानास्त्वयाऽनघ ॥

viduraścaiva bhīṣmaśca droṇaśca sahabāhlikaḥ | śreyaḥ samarthā vijñātumucyamānāstvayā'nagha

"हे निष्पाप, आपके कहने पर विदुर, भीष्म और बाह्लीक सहित द्रोण कल्याण की बात समझने में समर्थ हैं।"

श्लोक 17 (5.79.17)

ते चैनमनुनेष्यन्ति धृतराष्ट्रं जनाधिपम् । तं च पापसमाचारं सहामात्यं सुयोधनम् ॥

te cainamanuneṣyanti dhṛtarāṣṭraṃ janādhipam | taṃ ca pāpasamācāraṃ sahāmātyaṃ suyodhanam

"और वे इस जनपति धृतराष्ट्र को तथा मन्त्रियों सहित उस पापाचारी सुयोधन को मना लेंगे।"

श्लोक 18 (5.79.18)

श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दन । कमिवार्थं निवर्तन्तं स्थापयेतां न वर्त्मनि ॥

śrotā cārthasya vidurastvaṃ ca vaktā janārdana | kamivārthaṃ nivartantaṃ sthāpayetāṃ na vartmani

"हे जनार्दन, जब विदुर सुनने वाले हों और आप कहने वाले, तो ऐसा कौन-सा भटका हुआ प्रयोजन है जिसे आप दोनों फिर से मार्ग पर न ला सकें?"

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