उद्योग पर्व · अध्याय 78
पुरुषार्थ और दैव पर श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हर परिणाम पुरुषार्थ और दैव दोनों के मेल से होता है — भली-भाँति जोता हुआ खेत भी वर्षा के बिना फल नहीं देता। वे पुरुषार्थ से जो हो सकता है वह सब करेंगे, पर दैव उनके वश में नहीं। शकुनि, कर्ण और दुःशासन से उकसाया गया दुर्योधन धर्म को त्याग चुका है और मृत्यु के बिना राज्य नहीं छोड़ेगा। श्रीकृष्ण उसकी दुष्टता और आने वाले युद्ध के पीछे के दैवी विधान को जानते हैं, इसलिए सन्धि की आशा नहीं रखते, फिर भी वचन और कर्म से युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन करेंगे।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (5.78.1)
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव । पाण्डवानां कुरूणां च प्रतिपत्स्ये निरामयम् । सर्वं त्विदं ममायत्तं बीभत्सो कर्मणोर्द्वयोः ॥
evametanmahābāho yathā vadasi pāṇḍava | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca pratipatsye nirāmayam | sarvaṃ tvidaṃ mamāyattaṃ bībhatso karmaṇordvayoḥ
"हे महाबाहु पाण्डुनन्दन, जैसा तुम कहते हो, वैसा ही है। मैं पाण्डवों और कौरवों का कल्याण करने का प्रयत्न करूँगा। हे बीभत्सु, दोनों प्रकार के कर्मों के बीच यह सब मेरे ही अधीन है।"
श्लोक 2 (5.78.2)
क्षेत्रं हि रसवच्छुद्धं कर्मणैवोपपादितम् । ऋते वर्षान्न कौन्तेय जातु निर्वर्तयेत्फलम् ॥
kṣetraṃ hi rasavacchuddhaṃ karmaṇaivopapāditam | ṛte varṣānna kaunteya jātu nirvartayetphalam
"हे कुन्तीपुत्र, खेत चाहे रसयुक्त और स्वच्छ हो और केवल परिश्रम से तैयार किया गया हो, फिर भी वर्षा के बिना वह कभी फल नहीं देता।"
श्लोक 3 (5.78.3)
तत्र वै पौरुषं ब्रूयुरासेकं यत्र कारितम् । तत्र चापि ध्रुवं पश्येच्छोषणं दैवकारितम् ॥
tatra vai pauruṣaṃ brūyurāsekaṃ yatra kāritam | tatra cāpi dhruvaṃ paśyecchoṣaṇaṃ daivakāritam
"जहाँ सिंचाई की गई हो, वहाँ लोग इसे पुरुषार्थ कह सकते हैं; पर वहाँ भी दैव के कारण होने वाला सूखा निश्चय ही दिखाई पड़ता है।"
श्लोक 4 (5.78.4)
तदिदं निश्चितं बुद्ध्या पूर्वैरपि महात्मभिः । दैवे च मानुषे चैव संयुक्तं लोककारणम् ॥
tadidaṃ niścitaṃ buddhyā pūrvairapi mahātmabhiḥ | daive ca mānuṣe caiva saṃyuktaṃ lokakāraṇam
"प्राचीन महात्माओं ने भी अपनी बुद्धि से यही निश्चय किया है कि लोक का हित दैव और मानव-प्रयत्न दोनों के संयोग पर टिका है।"
श्लोक 5 (5.78.5)
अहं हि तत्करिष्यामि परं पुरुषकारतः । दैवं तु न मया शक्यं कर्म कर्तुं कथंचन ॥
ahaṃ hi tatkariṣyāmi paraṃ puruṣakārataḥ | daivaṃ tu na mayā śakyaṃ karma kartuṃ kathaṃcana
"पुरुषार्थ से जो कुछ हो सकता है, वह सब मैं करूँगा; परन्तु दैव का कार्य मैं किसी प्रकार नहीं कर सकता।"
श्लोक 6 (5.78.6)
स हि धर्मं च लोकं च त्यक्त्वा चरति दुर्मतिः । न हि सन्तप्यते तेन तथारूपेण कर्मणा ॥
sa hi dharmaṃ ca lokaṃ ca tyaktvā carati durmatiḥ | na hi santapyate tena tathārūpeṇa karmaṇā
"वह दुर्बुद्धि धर्म और लोक दोनों की उपेक्षा करके विचरता है, और ऐसे कर्मों से उसे तनिक भी पश्चात्ताप नहीं होता।"
श्लोक 7 (5.78.7)
तथापि बुद्धिं पापिष्ठां वर्धयन्त्यस्य मन्त्रिणः । शकुनिः सूतपुत्रश्च भ्राता दुःशासनस्तथा ॥
tathāpi buddhiṃ pāpiṣṭhāṃ vardhayantyasya mantriṇaḥ | śakuniḥ sūtaputraśca bhrātā duḥśāsanastathā
"फिर भी उसके मन्त्री — शकुनि, सूतपुत्र कर्ण और उसका भाई दुःशासन — उसकी उस अत्यन्त पापपूर्ण बुद्धि को और बढ़ाते रहते हैं।"
श्लोक 8 (5.78.8)
स हि त्यागेन राज्यस्य न शमं समुपैष्यति । अन्तरेण वधं पार्थ सानुबन्धः सुयोधनः ॥
sa hi tyāgena rājyasya na śamaṃ samupaiṣyati | antareṇa vadhaṃ pārtha sānubandhaḥ suyodhanaḥ
"हे पार्थ, सुयोधन अपने अनुयायियों सहित राज्य छोड़कर शान्ति नहीं अपनाएगा — बिना वध के नहीं।"
श्लोक 9 (5.78.9)
न चापि प्रणिपातेन त्यक्तुमिच्छति धर्मराट् । याच्यमानश्च राज्यं स न प्रदास्यति दुर्मतिः ॥
na cāpi praṇipātena tyaktumicchati dharmarāṭ | yācyamānaśca rājyaṃ sa na pradāsyati durmatiḥ
"धर्मराज भी झुककर राज्य छोड़ना नहीं चाहते; और वह दुर्बुद्धि माँगने पर भी राज्य नहीं देगा।"
श्लोक 10 (5.78.10)
न तु मन्ये स तद्वाच्यो यद्युधिष्ठिरशासनम् । उक्तं प्रयोजनं यत्तु धर्मराजेन भारत ॥
na tu manye sa tadvācyo yadyudhiṣṭhiraśāsanam | uktaṃ prayojanaṃ yattu dharmarājena bhārata
"हे भारत, किन्तु मैं नहीं समझता कि उससे युधिष्ठिर का वह आदेश — धर्मराज द्वारा बताया गया वह प्रयोजन — कहा जाना चाहिए।"
श्लोक 11 (5.78.11)
तथा पापस्तु तत्सर्वं न करिष्यति कौरवः । तस्मिंश्चाक्रियमाणेऽसौ लोके वध्यो भविष्यति ॥
tathā pāpastu tatsarvaṃ na kariṣyati kauravaḥ | tasmiṃścākriyamāṇe'sau loke vadhyo bhaviṣyati
"क्योंकि वह पापी कौरव उसमें से कुछ भी नहीं करेगा; और ऐसा न करने पर वह संसार की दृष्टि में वध के योग्य हो जाएगा।"
श्लोक 12 (5.78.12)
मम चापि स वध्यो हि जगतश्चापि भारत । तेन कौमारके यूयं सर्वे विप्रकृताः सदा ॥
mama cāpi sa vadhyo hi jagataścāpi bhārata | tena kaumārake yūyaṃ sarve viprakṛtāḥ sadā
"हे भारत, वह मेरे लिए भी और समस्त जगत् के लिए भी वध्य है, क्योंकि उसी ने बचपन से तुम सबके साथ सदा अन्याय किया है,"
श्लोक 13 (5.78.13)
विप्रलुप्तं च वो राज्यं नृशंसेन दुरात्मना । न चोपशाम्यते पापः श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ॥
vipraluptaṃ ca vo rājyaṃ nṛśaṃsena durātmanā | na copaśāmyate pāpaḥ śriyaṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhire
"और उसी क्रूर दुरात्मा ने तुम्हारा राज्य छीन लिया; युधिष्ठिर के पास लक्ष्मी देखकर उस पापी को शान्ति नहीं मिलती।"
श्लोक 14 (5.78.14)
असकृच्चाप्यहं तेन त्वत्कृते पार्थ भेदितः । न मया तद्गृहीतं च पापं तस्य चिकीर्षितम् ॥
asakṛccāpyahaṃ tena tvatkṛte pārtha bheditaḥ | na mayā tadgṛhītaṃ ca pāpaṃ tasya cikīrṣitam
"हे पार्थ, उसने अनेक बार तुम्हारे विषय में मुझमें फूट डालने का प्रयत्न किया, पर मैंने उसकी वह पापपूर्ण इच्छा स्वीकार नहीं की।"
श्लोक 15 (5.78.15)
जानासि हि महाबाहो त्वमप्यस्य परं मतम् । प्रियं चिकीर्षमाणं च धर्मराजस्य मामपि ॥
jānāsi hi mahābāho tvamapyasya paraṃ matam | priyaṃ cikīrṣamāṇaṃ ca dharmarājasya māmapi
"हे महाबाहु, तुम भी उसका गहरा अभिप्राय जानते हो, और यह भी जानते हो कि मैं धर्मराज का प्रिय करना चाहता हूँ।"
श्लोक 16 (5.78.16)
संजानंस्तस्य चात्मानं मम चैव परं मतम् । अजानन्निव मां कस्मादर्जुनाद्याभिशङ्कसे ॥
saṃjānaṃstasya cātmānaṃ mama caiva paraṃ matam | ajānanniva māṃ kasmādarjunādyābhiśaṅkase
"उसके स्वभाव को और मेरे दृढ़ विचार को जानते हुए भी, हे अर्जुन, आज तुम मानो अनजान बनकर मुझ पर शंका क्यों करते हो?"
श्लोक 17 (5.78.17)
यच्चापि परमं दिव्यं तच्चाप्यनुगतं त्वया । विधानं विहितं पार्थ कथं शर्म भवेत्परैः ॥
yaccāpi paramaṃ divyaṃ taccāpyanugataṃ tvayā | vidhānaṃ vihitaṃ pārtha kathaṃ śarma bhavetparaiḥ
"हे पार्थ, जो परम दिव्य विधान है, उसे भी तुम समझ चुके हो। फिर शत्रुओं के साथ सन्धि कैसे हो सकती है?"
श्लोक 18 (5.78.18)
यत्तु वाचा मया शक्यं कर्मणा वाऽपि पाण्डव । करिष्ये तदहं पार्थ न त्वाशंसे शमं परैः ॥
yattu vācā mayā śakyaṃ karmaṇā vā'pi pāṇḍava | kariṣye tadahaṃ pārtha na tvāśaṃse śamaṃ paraiḥ
"हे पाण्डुनन्दन, फिर भी वाणी से या कर्म से जो कुछ मुझसे हो सकेगा, वह मैं करूँगा; परन्तु हे पार्थ, शत्रुओं से सन्धि की मुझे आशा नहीं है।"
श्लोक 19 (5.78.19)
कथं गोहरणे ह्युक्तो नैतच्छर्म तथा हितम् । याच्यमानो हि भीष्मेण संवत्सरगतेऽध्वनि ॥
kathaṃ goharaṇe hyukto naitaccharma tathā hitam | yācyamāno hi bhīṣmeṇa saṃvatsaragate'dhvani
"गो-हरण के समय, जब (अज्ञातवास का) वर्ष पूरा हो चुका था, क्या भीष्म के अनुनय करते हुए उससे यह नहीं कहा गया था कि यह सन्धि ही उसके लिए हितकर है?"
श्लोक 20 (5.78.20)
तदैव ते पराभूता यदा सङ्कल्पितास्त्वया । लवशः क्षणशश्चापि न च तुष्टः सुयोधनः ॥
tadaiva te parābhūtā yadā saṅkalpitāstvayā | lavaśaḥ kṣaṇaśaścāpi na ca tuṣṭaḥ suyodhanaḥ
"जिस क्षण तुमने उनके विषय में संकल्प कर लिया, वे उसी समय पराजित हो गए; फिर भी सुयोधन लेश-मात्र और क्षण-भर के लिए भी सन्तुष्ट नहीं हुआ।"
श्लोक 21 (5.78.21)
सर्वथा तु मया कार्यं धर्मराजस्य शासनम् । विभाव्यं तस्य भूयश्च कर्म पापं दुरात्मनः ॥
sarvathā tu mayā kāryaṃ dharmarājasya śāsanam | vibhāvyaṃ tasya bhūyaśca karma pāpaṃ durātmanaḥ
"सब प्रकार से मुझे धर्मराज की आज्ञा का पालन करना है; और उस दुरात्मा के पापकर्म पर फिर से विचार करना होगा।"