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उद्योग पर्व · अध्याय 77

अर्जुन का निर्णय श्रीकृष्ण पर छोड़ना

अर्जुन शान्ति की सम्भावना के विषय में श्रीकृष्ण की शंकाओं का उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि किसी बात को असम्भव नहीं मानना चाहिए, और दोनों कुलों के हितैषी श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाकर कौरवों और पाण्डवों में सन्धि करा सकते हैं। साथ ही वे दुर्योधन के कपट-द्यूत और द्रौपदी के अपमान का स्मरण करके सन्देह प्रकट करते हैं कि ऐसा व्यक्ति कभी न्याय से बर्ताव करेगा, और शान्ति या युद्ध का निर्णय श्रीकृष्ण के विवेक पर छोड़ देते हैं।

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अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (5.77.1)

उक्तं युधिष्ठिरेणैव यावद्वाच्यं जनार्दन । तव वाक्यं तु मे श्रुत्वा प्रतिभाति परन्तप ॥

uktaṃ yudhiṣṭhireṇaiva yāvadvācyaṃ janārdana | tava vākyaṃ tu me śrutvā pratibhāti parantapa

"हे जनार्दन, जो कुछ कहना आवश्यक था, वह युधिष्ठिर ने स्वयं कह दिया है। किन्तु हे परन्तप, आपकी बात सुनकर मुझे ऐसा प्रतीत होता है"

श्लोक 2 (5.77.2)

नैव प्रशममत्र त्वं मन्यसे सुकरं प्रभो । लोभाद्वा धृतराष्ट्रस्य दैन्याद्वा समुपस्थितात् ॥

naiva praśamamatra tvaṃ manyase sukaraṃ prabho | lobhādvā dhṛtarāṣṭrasya dainyādvā samupasthitāt

"कि हे प्रभो, आप यहाँ शान्ति स्थापित करना सरल नहीं मानते — चाहे धृतराष्ट्र के लोभ के कारण, चाहे हम पर आ पड़ी दीनता के कारण।"

श्लोक 3 (5.77.3)

अफलं मन्यसे वाऽपि पुरुषस्य पराक्रमम् । न चान्तरेण कर्माणि पौरुषेण बलोदयः ॥

aphalaṃ manyase vā'pi puruṣasya parākramam | na cāntareṇa karmāṇi pauruṣeṇa balodayaḥ

"अथवा आप यह मानते हैं कि पुरुष का पराक्रम निष्फल है; और सच ही, कर्म के बिना केवल पौरुष से बल का उदय नहीं होता।"

श्लोक 4 (5.77.4)

तदिदं भाषितं वाक्यं तथाचन तथैव तत् । न चैतदेवं द्रष्टव्यमसाध्यमपि किंचन ॥

tadidaṃ bhāṣitaṃ vākyaṃ tathācana tathaiva tat | na caitadevaṃ draṣṭavyamasādhyamapi kiṃcana

"आपने जो कहा, वह एक प्रकार से वैसा ही है और दूसरे प्रकार से भी ठीक बैठता है; परन्तु यह नहीं मानना चाहिए कि कोई भी बात असाध्य है।"

श्लोक 5 (5.77.5)

किं चैतन्मन्यसे कृच्छ्रमस्माकमवसादकम् । कुर्वन्ति तेषां कर्माणि येषां नास्ति फलोदयः ॥

kiṃ caitanmanyase kṛcchramasmākamavasādakam | kurvanti teṣāṃ karmāṇi yeṣāṃ nāsti phalodayaḥ

"अथवा क्या आप हमारे संकट को ऐसा मानते हैं जो हमें शिथिल कर देगा? पर लोग तो वे काम भी करते हैं जिनका कोई फल प्रकट नहीं होता।"

श्लोक 6 (5.77.6)

संपाद्यमानं सम्यक्च स्यात्कर्म सफलं प्रभो । स तथा कृष्ण वर्तस्व यथा शर्म भवेत्परैः ॥

saṃpādyamānaṃ samyakca syātkarma saphalaṃ prabho | sa tathā kṛṣṇa vartasva yathā śarma bhavetparaiḥ

"हे प्रभो, भली-भाँति किया गया कर्म सफल भी हो सकता है। अतः हे कृष्ण, आप ऐसा आचरण करें जिससे शत्रुओं के साथ शान्ति हो जाए।"

श्लोक 7 (5.77.7)

पाण्डवानां कुरूणां च भवान्नः प्रथमः सुहृत् । सुराणामसुराणां च यथा वीर प्रजापतिः ॥

pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca bhavānnaḥ prathamaḥ suhṛt | surāṇāmasurāṇāṃ ca yathā vīra prajāpatiḥ

"हे वीर, जैसे देवताओं और असुरों के लिए प्रजापति हैं, वैसे ही पाण्डवों और कौरवों के लिए आप हमारे सबसे बड़े सुहृद् हैं।"

श्लोक 8 (5.77.8)

कुरूणां पाण्डवानां च प्रतिपत्स्व निरामयम् । अस्मद्धितमनुष्ठानं मन्ये तव न दुष्करम् ॥

kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca pratipatsva nirāmayam | asmaddhitamanuṣṭhānaṃ manye tava na duṣkaram

"कौरवों और पाण्डवों का कल्याण कीजिए। मेरी समझ में हमारा हित-साधन आपके लिए कठिन नहीं है।"

श्लोक 9 (5.77.9)

एवं च कार्यतामेति कार्यं तव जनार्दन । गमनादेवमेव त्वं करिष्यसि न संशयः ॥

evaṃ ca kāryatāmeti kāryaṃ tava janārdana | gamanādevameva tvaṃ kariṣyasi na saṃśayaḥ

"हे जनार्दन, इस प्रकार आपका कार्य उचित ठहरता है; केवल आपके वहाँ जाने से ही आप यह कर लेंगे, इसमें सन्देह नहीं।"

श्लोक 10 (5.77.10)

चिकीर्षितमथान्यत्ते तस्मिन्वीर दुरात्मनि । भविष्यति च तत्सर्वं यथा तव चिकीर्षितम् ॥

cikīrṣitamathānyatte tasminvīra durātmani | bhaviṣyati ca tatsarvaṃ yathā tava cikīrṣitam

"अथवा हे वीर, यदि उस दुरात्मा के लिए आपका कोई और विचार है, तो वह सब भी वैसा ही होगा जैसा आप चाहते हैं।"

श्लोक 11 (5.77.11)

शर्म तैः सह वा नोऽस्तु तव वा यच्चिकीर्षितम् । विचार्यमाणो यः कामस्तव कृष्ण स नो गुरुः ॥

śarma taiḥ saha vā no'stu tava vā yaccikīrṣitam | vicāryamāṇo yaḥ kāmastava kṛṣṇa sa no guruḥ

"हे कृष्ण, चाहे उनके साथ हमारी सन्धि हो, चाहे आप जो और करना चाहें — सोच-विचार कर आप जो निश्चय करेंगे, वही हमारे लिए मान्य होगा।"

श्लोक 12 (5.77.12)

न स नार्हति दुष्टात्मा वधं ससुतबान्धवः । येन धर्मसुते दृष्टा न सा श्रीरुपमर्षिता ॥

na sa nārhati duṣṭātmā vadhaṃ sasutabāndhavaḥ | yena dharmasute dṛṣṭā na sā śrīrupamarṣitā

"क्या वह दुष्टात्मा अपने पुत्रों और बन्धुओं सहित वध के योग्य नहीं है, जो धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पास देखी हुई लक्ष्मी को सह नहीं सका,"

श्लोक 13 (5.77.13)

यच्चाप्यपश्यतोपायं धर्मिष्ठं मधुसूदन । उपायेन नृशंसेन हृता दुर्द्यूतदेविना ॥

yaccāpyapaśyatopāyaṃ dharmiṣṭhaṃ madhusūdana | upāyena nṛśaṃsena hṛtā durdyūtadevinā

"और हे मधुसूदन, जिसने कोई धर्मसम्मत उपाय न देखकर कपट-द्यूत खेलते हुए क्रूर उपाय से उसे छीन लिया?"

श्लोक 14 (5.77.14)

कथं हि पुरुषो जातः क्षत्रियेषु धनुर्धरः । समाहूतो निवर्तेत प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ॥

kathaṃ hi puruṣo jātaḥ kṣatriyeṣu dhanurdharaḥ | samāhūto nivarteta prāṇatyāge'pyupasthite

"क्षत्रियों में जन्मा कोई धनुर्धर पुरुष ललकारे जाने पर, प्राण जाने की नौबत आने पर भी, भला पीछे कैसे हट सकता है?"

श्लोक 15 (5.77.15)

अधर्मेण जितान्दृष्ट्वा वने प्रव्रजितांस्तथा । वध्यतां मम वार्ष्णेय निर्गतोऽसौ सुयोधनः ॥

adharmeṇa jitāndṛṣṭvā vane pravrajitāṃstathā | vadhyatāṃ mama vārṣṇeya nirgato'sau suyodhanaḥ

"हे वार्ष्णेय, जब मैंने देखा कि हम अधर्म से जीते गए और वन में निर्वासित कर दिए गए, तभी से वह सुयोधन निश्चय ही मेरे हाथों वध के योग्य हो गया।"

श्लोक 16 (5.77.16)

न चैतदद्भुतं कृष्ण मित्रार्थे यच्चिकीर्षसि । क्रिया कथंच मुख्या स्यान्मृदुना चेतरेण वा ॥

na caitadadbhutaṃ kṛṣṇa mitrārthe yaccikīrṣasi | kriyā kathaṃca mukhyā syānmṛdunā cetareṇa vā

"हे कृष्ण, मित्रों के लिए आप जो करना चाहते हैं, उसमें कोई आश्चर्य नहीं। पर यह कार्य किस प्रकार सफल हो — कोमल उपाय से या दूसरे (युद्ध के) उपाय से?"

श्लोक 17 (5.77.17)

अथवा मन्यसे ज्यायान्वधस्तेषामनन्तरम् । तदेव क्रियतामाशु न विचार्यमतस्त्वया ॥

athavā manyase jyāyānvadhasteṣāmanantaram | tadeva kriyatāmāśu na vicāryamatastvayā

"अथवा यदि आप उनका तुरन्त वध ही श्रेयस्कर मानते हैं, तो वही शीघ्र किया जाए; फिर आपको और कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं।"

श्लोक 18 (5.77.18)

जानासि हि यथैतेन द्रौपदी पापबुद्धिना । परिक्लिष्टा सभामध्ये तच्च तस्योपमर्षितम् ॥

jānāsi hi yathaitena draupadī pāpabuddhinā | parikliṣṭā sabhāmadhye tacca tasyopamarṣitam

"आप जानते ही हैं कि उस पापबुद्धि ने भरी सभा में द्रौपदी को कैसे क्लेश दिया, और उसका वह कृत्य भी सह लिया गया।"

श्लोक 19 (5.77.19)

स नाम सम्यग्वर्तेत पाण्डवेष्विति माधव । न मे सञ्जायते बुद्धिर्बीजमुप्तमिवोषरे ॥

sa nāma samyagvarteta pāṇḍaveṣviti mādhava | na me sañjāyate buddhirbījamuptamivoṣare

"हे माधव, ऐसा व्यक्ति पाण्डवों के साथ उचित व्यवहार करेगा — यह मेरी बुद्धि नहीं मानती, जैसे ऊसर भूमि में बोया गया बीज नहीं उगता।"

श्लोक 20 (5.77.20)

तस्माद्यन्मन्यसे युक्तं पाण्डवानां हितं च यत् । तथाऽऽशु कुरु वार्ष्णेय यन्नः कार्यमनन्तरम् ॥

tasmādyanmanyase yuktaṃ pāṇḍavānāṃ hitaṃ ca yat | tathā''śu kuru vārṣṇeya yannaḥ kāryamanantaram

"इसलिए हे वार्ष्णेय, जो आप उचित समझें और जो पाण्डवों के लिए हितकर हो, तथा जो हमें आगे करना हो, वह शीघ्र कीजिए।"

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